पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Wednesday, August 5, 2009

जगदीश भल्ला होंगे राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।


हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला अब राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश होंगे। उनके नियुक्ति आदेश सोमवार को जारी हो गए। भल्ला मूलत: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश का पद गत मई से खाली है। मुख्य न्यायाधीश दीपक वर्मा के सुप्रीम कोर्ट चले जाने से यह पद खाली हुआ था।

न्यायालय के आदेश की अवमानना पर नोटिस।


राजस्थान हाईकोर्ट ने एनआरएचएम योजना के तहत जीएनएम भर्ती मामले में दिए आदेश की पालना न होने पर राज्य के स्वास्थ्य सचिव, निदेशक व सहायक निदेशक को अवमानना नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा है।

प्रार्थी लिछमणाराम व अन्य 14 लोगों की ओर से अधिवक्ता हनुमानसिंह चौधरी ने न्यायालय को बताया कि उच्च न्यायालय ने मई में इन लोगों की याचिका पर सरकार को निर्देश दिए थे कि अभ्यावेदन प्रस्तुत करने पर उन पर एक माह में फैसला करे। इसके साथ ही राज्य स्तरीय वरीयता सूची बनाए तथा उसके अनुसार उपलब्ध रिक्तियों पर नियुक्ति दे। प्रार्थियों ने निर्धारित समय सीमा में अभ्यावेदन प्रस्तुत कर दिए लेकिन स्वास्थ्य विभाग ने उस पर विचार ही नहीं किया। उल्टे उपलब्ध 950 रिक्त पदों पर पूर्व में फरवरी में जारी वरीयता सूची के आधार पर प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को नियुक्तियां देनी शुरू कर दी। इस पर न्यायाधीश प्रकाश टाटिया ने अवमानना नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में स्वास्थ्य सचिव, निदेशक व सहायक निदेशक से जवाब मांगा है कि उन्होंने न्यायालय के आदेश की पालना क्यों नहीं की। उल्लेखनीय है कि जीएनएम भर्ती मामले में हाईकोर्ट की जोधपुर स्थित मुख्य व जयपुर पीठ में बड़ी संख्या में याचिकाएं दायर की गई थी।

'संथारा' पर रोक नहीं लगाएगी राजस्थान सरकार।


राजस्थान सरकार ने जैनियों की संथारा प्रथा पर रोक नहीं लगाने का फैसला किया है. हालांकि सरकार ने इस मामले में केंद्र से भी राय मांगने की बात कही है यानी अब गेंद केंद्र के पाले में है।
अपनी मर्जी से अन्न-जल त्यागकर मौत को गले लगाने को जैन समुदाय में संथारा प्रथा का नाम दिया जाता है। सैंकड़ों सालों से चली आ रही इस प्रथा पर राजस्थान सरकार ने भी रोक नहीं लगाने का फैसला किया है. हालांकि सरकार का तर्क थोड़ा अजीबोगरीब जरूर है।
साल 2006 में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से संथारा पर जवाब मांगा था। आखिरकार हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद सरकार ने जैन समाज के साथ जाने का फैसला किया. सरकार के इस रुख से सामाजिक कार्यकर्ता भी हैरान हैं। वजह साफ है कि राज्य सरकार जैन समाज की नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती हालांकि इस विवाद से बचने के लिए उसने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बताते हुए केंद्र सरकार से राय मांगने का भी फैसला किया है।

रैगिंग के आरोपी छात्रों की याचिका खारिज।


चंडीगढ़ यूआईईटी में रैंगिग के आरोपी दो छात्र सौरभ और रूपेश द्वारा स्थानीय अदालत में दायर जमानत याचिका रद्द कर दी गई है। इन दोनों दात्रों ने सोमवार को जेएमआईसी महेश कुमार की कोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी। अदालत ने जमानत याचिका रद्द करते हुए कहा कि रैगिंग, स्कूल कॉलेज में पढ़ाई के लिए आने वाले स्टूडेंट्स के लिए घातक है। 

रैंगिंग से जहां स्टूडेंट के भविष्य पर असर पड़ता है वहीं समाज में भी गलत मैसेज जाता है। अदालत ने यह भी कहा कि रैगिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट की भी गाइडलाइन है कि रैंगिंग करने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आया जाए। बचाव पक्ष ने अपनी दलील में कहा कि दोनों स्टूडेंट्स का रैगिंग का झूठा आरोप लगाया है। शिकायतकर्ता ने भी रैगिंग की पुष्टि नहीं की है। इस पर अदालत ने कहा कि अगर शिकायतकर्ता ने इसकी पुष्टि नहीं की है तो उसे कोर्ट में हाजिर होना चाहिए था, किंतु शिकायतकर्ता कोर्ट में सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं था।

अदालत में रैगिंग के इन आरोपियों के खिलाफ आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो इन्हें पीयू से हमेशा के लिए निकाला जा सकता है। इससे पहले सोमवार को रै¨गग के आरोपी छात्रों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। इन छात्रों ने इसी दिन जमानत याचिका दायर की थी। गौरतलब है कि शुक्रवार रात यूआईईटी के हॉस्टल के बाहर बनी अंडरग्राउंड पार्किग की सीढ़ियों पर सीनियर स्टूडेंट्स अपने जूनियर अनिरुद्ध को खड़ा करके सवाल पूछ रहे थे। तभी वहां से इंडियन थियेटर डिपार्टमेंट के कुछ स्टूडेंट्स निकले। इन्होंने अनिरुद्ध को वहां से जाने को कहा। सीनियर्स ने इसका विरोध जताया। लेकिन कुछ ही देर बाद सभी मौके से चले गए। किसी ने इसकी सूचना हॉस्टल के वार्डन डॉ. जेके गोस्वामी को दी तो वह भी हॉस्टल पहुंच गए। इसके अगले दिन ही पीयू ने यूआईईटी के फस्र्ट ईयर के स्टूडेंट् अनिरुद्ध की रैगिंग करने पर थर्ड ईयर के स्टूडेंट सौरभ नंदेल को यूनिवर्सिटी से सस्पेंड कर दिया। पीयू ने सौरभ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी। सौरभ ने पुलिस जांच में अपने एक अन्य साथी रूपेश का भी नाम लिया था जिस पर पुलिस ने उसे रविवार को गिरफ्तार कर लिया था।

मां को पिटते नहीं देख पाया और पिता को मार डाला।


जयपुर. पिता ने मां को पीटा तो गुस्से में युवक ने पिता पर सरिए से ताबड़तोड़ 50 से अधिक वार किए, जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई। बाद में आरोपी ने खुद पुलिस को सूचना दी। श्याम एनक्लेव निवासी आरोपी सत्येंद्र सिंह का पिता विष्णु सिंह हाथोज में कृषि विभाग में ग्राम सेवक था। दहेज उत्पीड़न के केस में सोमवार को उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। 

ऑफिस से लौट कर रात 12.30 बजे वह पत्नी केसर कंवर, बेटे सत्येंद्र व बेटी ममता से गाली-गलौच करने लगा। पत्नी समझाने गई तो विष्णु उसे पीटने लगा। इस पर सत्येंद्र रसोई में रखे लोहे के सरिए से पिता को मारने लगा। बीच-बचाव में आई मां व बहन को भी उसने कमरे में बंद कर दिया। पिता के दम तोड़ने पर उसने एंबुलेंस व पुलिस को खुद ही सूचना दी। 

आरोपी सत्येंद्र का कहना है कि उसे कोई पछतावा नहीं है। उसे सिर्फ अपनी मां और बहन की चिंता है। बहन ममता ने कहा कि उसका भाई निर्दोष है। उसके पिता रोजाना उनसे मारपीट करते थे। उन्हें नानी के यहां रहना पड़ता था। 


वकीलों ने कलेक्ट्री को बनाया निशाना।


उदयपुर  में हाईकोर्ट बैंच की मांग को लेकर आंदोलनरत वकीलों ने मंगलवार को जिला कलेक्ट्री को निशाना बनाते हुए कलेक्ट्री परिसर में तोडफ़ोड़ कर डाली । उदयपुर इतिहास की यह पहली घटना कही जा सकती है जिसमें आंदोलनकारियों ने कलेक्ट्री के अन्दर घुस तोडफ़ोड़ की हो ।
उदयपुर में हाईकोर्ट बैंच की मांग को लेकर पिछले कई दिनों से आंदोलनरत वकीलों ने मंगलवार सुबह न्यायालय परिसर में एकत्र होकर वहां न्यायिक कार्यों का बहिष्कार जारी रखते हुए पक्षकारों को भी कोर्ट में प्रवेश नहीं करने दिया। इसके बाद वकील जुलूस के रूप में कलेक्ट्री के बाहर पहुंचे। यहां तक तो सब कुछ सामान्य था मगर इसी बीच वकीलों ने कलेक्ट्री बाहर विरोध-प्रदर्शन के साथ ऐसा कदम उठा लिया जिसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी। 
कलेक्ट्री परिसर में घुसते ही वकीलों ने उग्र रूप धारण कर सबसे पहले तो कलेक्टर चेम्बर के बाहर पोर्च में रखे गमलों को तहस-नहस कर डाला। यहां इन लोगों ने और आगे बढऩे का प्रयास भी किया मगर पुलिस बल के चलते सफलता नहीं मिल पाई। वकीलों ने गमले फोडऩे के बाद यहीं पर मुख्यमंत्री के पुतले का दहन किया।

सास के ताने दहेज प्रताड़ना की श्रेणी में नहीं: कोर्ट


उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ महज इस आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है क्योंकि उसकी सास या अन्य किसी रिश्तेदार ने उसे धक्का दिया हो या तलाक की धमकी दी हो।
उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति एस बी सिन्हा तथा न्यायमूर्ति साइरैक जोसेफ की पीठ ने कहा कि अगर कोई सास अपनी पुत्र बधु को लगातार उपदेश देती हो अथवा अपने प्रयोग में लाये गए फटे पुराने कपड़े पहनने को देती हो तो ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत मामला नहीं चलाया जा सकता है।
बहरहाल, अगर सास शादी के समय उपहार स्वरूप दी गई वस्तुओं को वापस ले लेती है तो इसे ‘विश्वास भंग' का मामला माना जायेगा और यह मामले आईपीसी की धारा 406 के तहत आयेगा।
उच्चतम न्यायालय ने दक्षिण अफ्रीका स्थित अप्रवासी भारतीय पति और उसके ससुराल पक्ष के बीच वैवाहिक विवाद मामले की सुनवाई के दौरान यह बातें कही।

पुराने वाहनों को हटाने के आदेश पर स्थगन नहीं।


उच्चतम न्यायालय ने 15 साल पुराने वाणिज्यिक डीजल वाहनों को हटाने संबंधी कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देश पर अंतरिम स्थगन से आज इनकार कर दिया। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पुराने वाणिज्यिक वाहनों को हटाने के लिए 31 जुलाई तक की तारीख तय की थी।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहाकि आवश्यक होने पर कोई आदेश 10 अगस्त को इस मामले की सुनवाई के बाद पारित किया जाएगा। परिवहन एसोसिएशन ने उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थगनादेश का आग्रह किया था।
एसोसिएशन के वकील का कहना था कि उच्च न्यायालय ने उनका पक्ष सुने बिना आदेश पारित किया। खंडपीठ ने इस पर कहा,  आप उच्च न्यायालय को संतुष्ठ कर सकते थे।  बंगाल बस सिंडीकेट तथा अन्य परिवहन संगठनों का तर्क था कि राज्य सरकार को 15 साल पुराने वाहनों को हटाने संबंधी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है ।

Tuesday, August 4, 2009

पहले अपराध किया, अब कानून पढ़ेगा।



हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहा एक कैदी अब कानून की पढ़ाई करेगा। 10 साल से ज्यादा जयपुर जेल में बिता चुका ये कैदी अब तक जेल से ही कई डिग्रियां और डिप्लोमा हासिल कर चुका है। अब उसने हाईकोर्ट से कानून की पढ़ाई की अनुमति मांगी है।

न्यायाधीश मनीष भण्डारी ने कारागार महानिदेशक व सेवर जेल अधीक्षक को आदेश दिया कि बंदी का प्रवेश पत्र भरवाने की व्यवस्था की जाए। इस बंदी ने जेल में रहते बीए और एमए की डिग्री तो हासिल कर ही ली है, मानव अधिकार व कम्प्यूटर साईन्स का डिप्लोमा भी कर लिया है।

बार कौंसिल आफ इंडिया को नोटिस।


एलएलबी में दाखिले के लिए 30 वर्ष की आयुसीमा निर्धारित करने के मामले में हाईकोर्ट ने बार कौंसिल आफ इंडिया, स्टेट बार कौंसिल सहित अन्य को नोटिस जारी किया है। जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा, आरएन चंद्राकर की डिविजन बेंच ने चार सप्ताह में जवाब देने को कहा है। 

रायपुर निवासी पारत्पर मिश्रा ने दुर्गा एजुकेशन सोसायटी द्वारा संचालित ला कालेज में दाखिले के लिए आवेदन किया था। कालेज ने उनका आवेदन अस्वीकार करते हुए बताया कि बार कौंसिल आफ इंडिया ने नियम-28 शेड्यूल-3 के तहत घोषणा की है कि 30 साल से ज्यादा उम्र वालों को एलएलबी प्रथम वर्ष में दाखिला नहीं दिया जाएगा। चूंकि उनकी उम्र 47 साल है, इसलिए उन्हें एडमिशन नहीं दिया जा सकता। 

इसके खिलाफ श्री मिश्रा ने वकील शैलेंद्र शुक्ला के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि बार कौंसिल आफ इंडिया को एलएलबी में दाखिला संबंधी नियम बनाने का अधिकार ही नहीं है, इसलिए यह नियम अवैध है। उन्होंने इस प्रावधान को संविधान के खिलाफ भी बताते हुए शिक्षा पाना व्यक्ति का मूल अधिकार है। उन्होंने इस नियम को निरस्त करने की मांग की। सुनवाई के बाद कोर्ट ने बार कौंसिल आफ इंडिया सहित स्टेट बार कौंसिल, रविशंकर यूनिवर्सिटी दुर्गा एजुकेशन सोसायटी को नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया।

सोहराबुद्दीन के परिवार को मुआवजा दे गुजरात सरकार: सुप्रीम कोर्ट


गुजरात में चर्चित फर्जी एनकाउंटर में मारे गए सोहराबुद्दीन के परिवार को मुआवजा दिया जाएगा। जस्टिस तरुण चटर्जी और जस्टिस आफताब आलम की बेंच ने  राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह सोहराबुद्दीन के परिवार को मुआवजा दे, लेकिन वह कितना होगा, कोर्ट ने यह तय नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट तय करेगी कि कितना मुआवजा दिया जाए।

इससे पहले गुजरात सरकार ये मान चुकी है कि सोहराबुद्दीन को फर्जी एनकाउंटर में मारा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से मुआवजे की रकम बताने को कहा है। अगली सुनवाई में मुआवजे की रकम तय की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से पूछा है कि क्या इस मामले को भी दंगों की जांच कर रही एसआईटी के हवाले कर दिया जाये।

मालूम हो कि सोहराबुद्दीन को 26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद में फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया था। बाद में सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी की भी हत्या कर दी गई और उसके शव को जला दिया गया। फर्जी एनकाउंटर मामले में फिलहाल कई पुलिसवाले जेल में बंद हैं।
गुजरात में फर्जी मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन शेख की हत्या की जांच अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) करेगी। 

Monday, August 3, 2009

सार्वजनिक स्थल पर धार्मिक निर्माण रोके केंद्र- सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि सार्वजनिक स्थानों पर पूजा स्थल बनाए जाने को रोके। कोर्ट ने इस संबंध में सरकार से चार हफ्ते में हलफनामा तैयार करने को कहा है। जस्टिस दलवीर भंडारी और एमके शर्मा की बेंच ने कहा, सॉलीसिटर जनरल यह सुनिश्चित करने के लिए हलफनामा तैयार करें कि किसी सार्वजनिक स्थल, सड़क, फुटपाथ आदि पर कोई मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारा नहीं बनाया जाए। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि सार्वजनिक स्थान पर एक भी पूजा स्थल बना तो संबंधित अधिकारियों को समुचित दंड दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को यह निर्देश गुजरात हाईकोर्ट के 2006 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान दिया।

पुलिस अधिकारी के रिश्वत लेते पकड़े जाने पर फरियादी को पीटा एसीबी टीम से धक्का-मुक्की।


महावीर नगर कोटा थाने के सीआई रामनारायण मीणा को दलाल संजय शर्मा के मार्फत 10 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगहाथों पकड़ने के बाद थाने के स्टाफ ने फरियादी के साथ मारपीट कर दी। उन्होंने एसीबी की टीम के साथ भी धक्का-मुक्की की। एसीबी ने महावीर नगर थाने में वहीं के सीआई व स्टाफ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है। इस मामले में सीआई को निलंबित कर दिया गया है और एएसआई व चार जवानों को लाइनहाजिर किया गया है। 
भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के एसपी पीपी टांक के अनुसार ट्रेप की कार्रवाई करते-करते काफी रात हो गई थी। कार्रवाई खत्म कर जब ब्यूरो के डीएसपी विशाल शर्मा व स्टाफ फरियादी यशवीर को साथ लेकर थाने से बाहर निकल रहे थे। उसी समय अचानक सीआई रामनारायण मीणा व वहां के स्टाफ ने यशवीर पर हमला कर दिया। उसकी जमकर पिटाई की। उसे बचाने का प्रयास करने पर ब्यूरो के स्टाफ के साथ धक्का-मुक्की कर दी। जैसे-तैसे सभी लोग बड़ी मुश्किल से बचकर वहां से निकल सके।
एसपी टांक ने इसकी जानकारी आईजी एसपी खड़गावत व सिटी एसपी भूपेन्द्र साहू को दी। सभी अधिकारियों ने घटना को गंभीरता से लिया और मुकदमा दर्ज कराने के आदेश दिए। शनिवार को इस मामले में डीएसपी विशाल शर्मा ने महावीर नगर थाने में सीआई रामनारायण मीणा, एएसआई जकीउद्दीन, हैडकांस्टेबल बाबूलाल पारेता, कांस्टेबल भूपाल सिंह, जवाहर लाल व किशन सिंह, ग्रामीण पुलिस में तैनात कांस्टेबल मुरारी लाल व अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ राजकार्य में बाधा और मारपीट का मुकदमा दर्ज कराया।

एसपी सिटी भूपेन्द्र साहू के अनुसार इस मामले में सीआई रामनारायण मीणा को निलंबित कर दिया गया है। जिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज हुआ है, उन्हें लाइन हाजिर कर दिया है। मामले की जांच डीएसपी द्वितीय आदर्श चौधरी को सौंपी गई है।

चुनाव आयोग ने ईवीएम मुद्दे पर मांगी आपत्तियां।


चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) से छेड़छाड़ का आरोप लगाने वाली संस्थाओं और राजनीतिक दलों से इसे बारे में अगले सप्ताह आयोग के समक्ष उपस्थित होकर विस्तृत जानकारी देने को कहा है।

ईवीएम के दुरूपयोग के बारे में विभिन्न लोगों ने कई उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में याचिकाएं दायर की थीं। उच्चतम न्यायालय ने गत 27 जुलाई को एक ऎसी ही याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं से कहा था कि वे चुनाव आयोग के समक्ष यह मामला उठाएं।

याचिकाकर्ताओं ने जब चुनाव आयोग से सम्पर्क किया, तो आयोग ने उनसे कहा कि वह यह प्रदर्शित करें कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ कैसे की जा सकती है। आयोग ने इस मौके पर तकनीकी विशेषज्ञों और ईवीएम उत्पादन करने वाली कम्पनियों के प्रतिनिधियों को भी बुलाया है। ईवीएम की सुरक्षा को लेकर चुनाव आयोग पूरी तरह से संतुष्ट है। फिर भी वह लोगों की आशंकाओं को दूर करने के लिए पूरी तरह प्रयासरत है

लंबे समय तक साथ रहने को विवाह माना जा सकता है- उच्चतम न्यायालय


उच्चतम न्यायालय ने एक फैसले में कहा है कि अगर एक पुरूष और एक महिला लंबे समय तक साथ रहते हैं और समाज उन्हें पति पत्नी के तौर पर स्वीकार करता है तो ऐसा माना जा सकता है कि उनकी शादी जायज है।
न्यायमूर्ति एसबी सिन्हा और न्यायमूर्ति साइरस जोसेफ की पीठ ने कहा कि एक पुरूष और एक महिला के लंबे समय तक साथ रहने और समाज द्वारा उन्हें पति पत्नी के तौर पर स्वीकार करने की प्रक्रिया ही लंबी होती है। अगर ऐसा होता है तो विवाह को जायज माना जा सकता है।
पीठ ने कहा कि जब विवाह की वैधता को लेकर विवाद उठते हैं तो अदालत न केवल अपने समक्ष पेश किए गए विभिन्न साक्ष्यों पर भरोसा कर सकती है बल्कि दोनों पक्षों के आचरण के आधार पर एक धारणा भी बना सकती है। पीठ ने यह आदेश चेल्लम्मा नामक महिला की अपील को खारिज करते हुए दिया। चेल्लम्मा ने एक महिला की अपने बेटे सुब्रमण्यम से शादी के दावे पर सवाल उठाया था। चेल्लम्मा के बेटे का देहांत हो चुका है।
विवाह से पहले सुब्रमण्यम ने अपनी मां को अपनी बीमा पालिसियों का नामिनी बनाया था। मृत्यु के बाद चेल्लम्मा ने बीमा पालिसियों के सभी लाभों पर दावा किया। उसने यह भी कहा कि दूसरी दावेदार तिलागा का उसके पुत्र से विवाह नहीं हुआ था क्योंकि इस बात के वैध सबूत नहीं हैं। बहरहाल, निचली अदालत ने चेल्लम्मा को बीमा राशि का केवल एक चौथाई हिस्सा दिया और शेष रकम तिलागा को दे दी। तिलागा के सुब्रमण्यम से विवाह को जज ने अदालत में पेश साक्ष्यों के आधार पर स्वीकार किया। चेल्लम्मा ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में अपील की जिसे खारिज कर दिया गया। बाद में उसने उच्चतम न्यायालय में अपील की। न्यायालय ने उसकी अपील खारिज करते हुए कहा कि सुब्रमण्यम और तिलागा के जायज विवाह को लेकर उठाया जा रहा सवाल वास्तव में तथ्यों को लेकर है।
न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामले में पत्नी ने सबूतों से साबित कर दिया है कि उसकी शादी सुब्रमण्यम के साथ हुई थी और वह दोनों तीन साल से भी अधिक समय तक साथ रहे थे। लेकिन चेल्लम्मा अपने आरोपों के पक्ष में पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाई। न्यायालय ने यह भी कहा कि नामिनी को उत्तराधिकारी के समकक्ष नहीं माना जा सकता।