पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Tuesday, September 22, 2009

पुलिस वालों के घरों में सबसे ज्यादा बिजली चोरी।


दिल्ली में बिजली चोरी न केवल आम कॉलोनियों बल्कि वीआईपी कॉलोनियों और पुलिस कॉलोनियों में भी बड़े पैमाने पर होती है। हालांकि बिजली चोरों को पकड़ने के लिए बिजली कंपनी बीएसईएस वीआईपी कॉलोनियों में भी छापे मारती है, बावजूद इसके बिजली चोरी बदस्तूर जारी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि कानून व्यवस्था लागू करने का जिम्मा जिन लोगों के पास है, उन्हीं के घरों में धड़ल्ले से बिजली चोरी होती है।

बिजली कंपनी बीएसईएस के 490 इलाकों में बड़े पैमाने पर बिजली की चोरी होती है। इनमें न सिर्फ पूर्वी दिल्ली का सीलमपुर, कोंडली व सीमापुरी, पश्चिमी दिल्ली का मुंडका, नजफगढ़ शामिल हैं, बल्कि दक्षिण दिल्ली की वीआईपी कॉलोनियों और अनेक पुलिस कॉलोनियों में भी बड़े पैमाने पर बिजली चोरी होती है। कंपनी के प्रवक्ता का कहना है कि नियमानुसार सभी कॉलोनियों में बिजली चोरी की रोकथाम के लिए एंफोर्समेंट टीम छापा मारती है।

इसके बावजूद इन इलाकों में भी लोग बिजली चोरी करते हैं। हालांकि अब तक कहा जाता था कि बिजली की सर्वाधिक चोरी पूर्वी दिल्ली में होती हैं। लेकिन आंकड़ों से ज्ञात होता है कि सर्वाधिक बिजली चोरी उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में होती है। पश्चिमी दिल्ली के झुलझुली गांव में तो 85 फीसदी तक बिजली चोरी की जानकारी मिली है। इसके अलावा झरौंदा गांव में 70 फीसदी, खेरा डाबर में 70 फीसदी और मुंडका गांव में 55 फीसदी तक बिजली चोरी होती है।

नेहरू प्लेस, निजामुद्दीन, सरिता विहार जैसे पॉश इलाकों में भी 40 से 60 फीसदी तक बिजली की चोरी होती है। इनके अलावा दक्षिणी दिल्ली स्थित पुलिस कॉलोनी में 30 फीसदी, द्वारका के सैनिक नगर में 35 फीसदी, जनकपुरी क्षेत्र के मायापुरी पुलिस स्टेशन में 31 फीसदी, राजौरी गार्डन में 50 फीसदी और शकरपुर स्थित पुलिस क्वार्टर में 45 फीसदी तक बिजली चोरी की जाती है। ज्ञात हो कि बीएसईएस कंपनी द्वारा राजधानी के दो-तिहाई हिस्से में बिजली की आपूर्ति की जाती है और इनमें से 450 कॉलोनियों में बड़े पैमाने पर बिजली चोरी की जाती है। आंकड़ों में सबसे ज्यादा बिजली चोरी नजफगढ़ क्षेत्र में होती है। यहां के 46 इलाकों में बड़े पैमाने पर बिजली चोरी की जा रही है।

Monday, September 21, 2009

आरसीए अध्यक्ष को गद्दी से उतारा।


राजस्थान क्रिकेट संघ (आरसीए) के अध्यक्ष संजय दीक्षित को पूर्व अध्यक्ष ललित मोदी के समर्थन वाले विरोधी खेमे ने आज यहां एक नाटकीय घटनाक्रम में अविश्वास प्रस्ताव पारित कर उनके पद से हटा दिया।
 मोदी के इस वर्ष के शुरू में हुए आरसीए अध्यक्ष पद के चुनाव में दीक्षित के हाथों शिकस्त झेलने के बाद से ही संगठन के दोनों गुटों में जबर्दस्त खींचतान चल रही थी। विरोधी खेमे में किशोर रूंगटा, पूर्व सचिव सुभाष जोशी, अशोक ओहरी और पूर्व उपाध्यक्ष विमल सोनी शामिल हैं।
 पूर्व सचिव जोशी ने इस घटना का विवरण देते हुए बताया कि संगठन की वार्षिक आम बैठक में श्रीगंगानगर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष महमूद अब्दी ने दीक्षित के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जिसे २० सदस्यीय सदन ने स्वीकार कर लिया।  उन्होंने कहा, चूंकि बहुमत का दीक्षित में विश्वास नहीं रह गया था इसलिए उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, अब उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आर एस लाहौटी की निगरानी में अध्यक्ष पद के लिए ताजा चुनाव होगा। जोशी ने बताया कि दीक्षित को पद से हटाने के साथ ही उनके द्वारा २९ मार्च को अपना प्रभार संभालने के बाद से लिए गए सभी फैसले रद्द कर दिए गए हैं जिनमें विभिन्न समितियों का गठन और विमल राय सोनी तथा शमशेर ङ्क्षसह का निलंबन भी शामिल है। दीक्षित ने एक दिन पहले ही सोनी और शमशेर को संगठन के खिलाफ बयानबाजी का आरोप लगाते हुए निलंबित कर दिया था।
 जोशी ने बताया कि उपाध्यक्ष राजेन्द्र राठौड़ २४ सितंबर को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड  की वार्षिक  आम बैठक में आरसीए का प्रतिनिधित्व करेंगे जबकि गिरिराज सांड्या सचिव का कामकाज देखेंगे।
 अध्यक्ष पद से हटाए जाने के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दीक्षित ने कहा कि यह पूरी तरह असंवैधानिक है और उन्हें हटाने के लिए जिला संघों को पैसे का लालच भी दिया गया।

एक बेटी के होते दूसरी बेटी अडॉप्ट कर सकेंगे।


एक बेटी के होते हुए दूसरी बेटी अडॉप्ट करना चाह रहे हिंदुओं की राह में अब हिंदू पर्सनल लॉ नहीं आएगा। इस कानून में अभी तक समान जेंडर में अडॉप्शन की मनाही थी। यानी जिसका पहले से बेटा है उसे बेटा अडॉप्ट करने की इजाजत नहीं थी। पर इस सप्ताह बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में इस व्यवस्था को गलत ठहराया।
जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि अदालतों को चाहिए कि वे पर्सनल लॉ और सेक्युलर कानून के बीच सामंजस्य बैठाएं। उन्होंने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट-2000 हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटिनेंस एक्ट (हामा) पर भी लागू होता है। हामा अडॉप्शन पर पाबंदियां लगाता है, जबकि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट-2000 एक सेक्युलर लॉ है जो छोड़ दिए गए बच्चों का अडॉप्शन के जरिए रिहैबिलिटेशन की इजाजत देता है।

हाई कोर्ट के फैसले से मुंबई बेस्ड एक एक्टर कपल को भी राहत मिलेगी। यह कपल खुद को गोद ली हुई एक बच्ची के लीगल पैरंट्स घोषित करने की मांग कर रहा है। उन्होंने बच्ची को चार साल पहले जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत गोद लिया था। इस कपल की दो साल की बेटी भी है। 2005 में जब उन्होंने एक साल की बेघर बच्ची को अपनाया तो अदालत ने भी उन्हें इसकी इजाजत दी थी।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस कपल के मामले को काफी गंभीरता से लिया क्योंकि यह एक ऐसा मसला था जो लोगों को अडॉप्शन के लिए आगे आने से रोकता था। उन्होंने अडॉप्शन कानूनों और संविधान पर गौर किया और यह फैसला दिया कि अडॉप्शन जीने के अधिकार से जुड़ा है। सबसे बड़ी बात कि यह छोटे बच्चों की आजादी और प्रतिष्ठा का सवाल है। वैसे भी नागरिक समाज में स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा सबसे जरूरी चीजें हैं।

क्या कहता है हिंदू अडॉप्शन एक्ट
54 साल पुराना यह कानून एक बेटे वाले पैरंट्स को दूसरा बेटा या एक बेटी के माता-पिता को दूसरी बेटी अडॉप्ट करने से रोकता है। खासकर बेटी के अडॉप्शन को इसमें बेटे की तुलना में ज्यादा सख्त बनाया गया है। अडॉप्शन चाह रहे पैरंट्स का हिंदू बेटा या पोता नहीं होना चाहिए। यहां तक कि पोते का बेटा भी नहीं होना चाहिए। बॉम्बे हाई कोर्ट पहला ऐसा कोर्ट है जिसने दो विवादित कानूनी प्रावधानों की व्याख्या की है।

अनुष्का शंकर का 'ब्लैकमेलर' न्यायिक हिरासत में।



मशहूर सितार वादक पंडित रविशंकर की बेटी अनुष्का को ब्लैकमेल करने के आरोप में मुंबई के एक व्यवसायी को गिरफ़्तार किया गया है। जुनैद ख़ान के पास अनुष्का की कथित रूप से तस्वीरें थीं जिसके ज़रिए वह उन्हें 'ब्लैकमेल' कर रहा था।
29 साल के जुनैद ख़ान ठाणे का रहने वाला है और उसने अनुष्का शंकर के ईमेल एकाउंट को कथित रूप से हैक करने के बाद उनकी तस्वीरों को हासिल कर लिया था। पुलिस के मुताबिक़ जुनैद अनुष्का को धमकी दे रहा था कि अगर उसे पैसे नहीं दिए गए तो वह उन तस्वीरों को सार्वजनिक कर देगा।

पुलिस का दावा है कि जुनैद अनुष्का से एक लाख डॉलर की मांग कर रहा था। अनुष्का शंकर के प्रवक्ता का कहना है कि मामले की जांच जारी है इसलिए अनुष्का इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती हैं।

माना जाता है कि जुनैद ख़ान अनुष्का को काफ़ी समय से जानता था और कॉन्सर्ट (संगीत समारोहों) में भी उनका पीछा कर रहा था। पुलिस का कहना है कि जुनैद ने अनुष्का को धमकी भरे ईमेल और मोबाइल पर एसएमएस भेजने शुरू कर दिए थे और वह उनसे पैसे की मांग कर रहा था।

पहली बार ईमेल और एसएमएस दुबई से भेजा गया था। पंडित रविशंकर ने अपनी रिपोर्ट में लिखवाया था कि अनुष्का ने दिल्ली में अपना लैपटॉप ठीक होने के लिए दिया था और उन्हें शक़ है कि उसी दौरान अनुष्का की तस्वीरें चुराई गईं।

पुलिस ने अनुष्का को धमकी दिए जाने के 'सबूत' इंटरनेट प्रोटोकोल एड्रेस और जीपीआरएस कनेक्शन की जांच करने के बाद इकठ्ठे किए हैं. पुलिस का कहना है कि जुनैद को मुंबई में गिरफ़्तार किया गया।

पंडित रविशंकर ने अगस्त महीने में एक रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 28 साल की उनकी बेटी अनुष्का शंकर को कोई व्यक्ति ब्लैकमेल कर रहा है। जुनैद को गिरफ़्तार करने के बाद कोर्ट में उसकी पेशी हुई और अब उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।

क्षमा याचिकाओं पर अविलंब फैसला करे सरकारः सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फांसी की सजा पाए लोगों की दया याचिका पर बहुत ज्यादा देरी किए बिना फैसला करना सरकार का कर्त्तव्य है। कोर्ट ने कहा कि दया याचिकाओं पर कदम आगे बढ़ाने में सरकार की नाकामी उन लोगों प्रति नाइंसाफी जैसी है, जिनकी फांसी की सजा उम्रकैद में तब्दील हो सकती है। अपनी पुरानी व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर फांसी की सजा पर अमल या दया याचिकाओं के निपटारे में सरकार की ओर से काफी देरी हो तो कैदी को अपनी फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कराने का अधिकार है, नहीं तो यह अनुच्छेद 21 (स्वतंत्रता के अधिकार) का उल्लंघन होगा।

मध्य प्रदेश के मनसा जिले में पत्नी और पांच बच्चों की हत्या के दोषी पाए गए जगदीश नामक शख्स की मौत की सजा को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने 1971 में विवियन रॉड्रिक बनाम पश्चिम बंगाल के केस में कहा था, हमें ऐसा लगता है कि केस के निपटारे में बेहद देरी के कारण अपीलकर्ता खुद उम्रकैद की कमतर सजा पाने लायक हो जाएगा। ताजा मामले में कोर्ट ने कहा कि पहले दी गई यह व्यवस्था आज राष्ट्रपति के पास पेंडिंग 26 दया याचिकाओं को देखते हुए बेहद प्रासंगिक हो गई है। इनमें कुछ मामलों में तो अदालतों ने एक दशक से ज्यादा समय पहले फांसी की सजा सुना रखी है।

जस्टिस एच. एस. बेदी और जे. एम. पांचाल की बेंच ने फैसले में कहा,' हम संबंधित सरकारों को इन वैधानिक व संवैधानिक प्रावधानों के प्रति उनकी जिम्मेदारियां याद दिलाना चाहते हैं।'

Saturday, September 19, 2009

माया सरकार को फिर फटकार।


इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने करोडों रूपए के बहुचर्चित ताज कॉरीडोर घोटाला मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर शुक्रवार को उप्र. की मुख्यमंत्री मायावती और कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को नोटिस जारी कर दिया। न्यायाघीश प्रदीपकांत एवं न्यायाघीश सबीहुलहसनैन की बेंच ने यह आदेश अनुपमा सिंह, कमलेश वर्मा व अन्य की जनहित याचिकाओं पर पारित किया। इन याचिकाओं में सीबीआई अदालत के पांच जून 2007 के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसके तहत मुख्यमंत्री मायावती एवं कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ ताज कॉरीडोर मामले में कार्रवाई समाप्त कर दी गई थी। गौरतलब है कि इस मामले में तीन जून 2007 को राज्यपाल टीवी राजेश्वर ने मायावती एवं सिद्दीकी के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देने से इनकार कर दिया था। मामले में याचिकाकर्ताओं के अघिवक्ता सीबी पांडे ने बताया कि याचियों का कहना था कि पांच जून 2007 को सीबीआई की विशेषअदालत का आदेश कानून की मंशा के खिलाफ है।

जस्टिस पी. डी. दीनाकरन मुद्दे पर नहीं हुआ फैसला


कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पी. डी. दीनाकरन के प्रमोशन की सिफारिश संबंधी मसले पर शुक्रवार को हुई सुप्रीम कोर्ट के सिलेक्शन पैनल (कोलेजियम) की बैठक बेनतीजा रही। बेतहाशा संपत्ति रखने के आरोपों से घिरे दीनाकरन के प्रमोशन की सिफारिश की समीक्षा करने की मांग की गई थी पर कोलेजियम इस बारे में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाया।

चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन के ऑफिस से उनके निवास के बाहर इंतजार कर रहे पत्रकारों के लिए भेजी गई मौखिक सूचना में कहा गया कि इस मसले पर कोई फैसला नहीं किया गया है। चीफ जस्टिस के अधिकारी ने बताया कि मुझे मीडिया को यह बताने को कहा गया है कि कोलेजियम की बैठक में दीनाकरन मुद्दे पर कोई फैसला नहीं किया गया।

इससे पहले बालाकृष्णन की अध्यक्षता में हुई बैठक 35 से 40 मिनट तक चली थी। चीफ जस्टिस और सिलेक्शन पैनल के चार अन्य सदस्यों जस्टिस बी. एन. अग्रवाल, एस. एच. कपाडि़या, तरुण चटर्जी और अल्तमस कबीर ने दीनाकरन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। दीनाकरन के खिलाफ बार के सीनियर सदस्यों ने कानून के तहत अनुमति से ज्यादा संपत्ति रखने का आरोप लगाया है। बार असोसिएशन दीनाकरन को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए जाने संबंधी चयन मंडल की सिफारिश का विरोध कर रहा है।

उधर, दीनाकरन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच दो जाने माने न्यायविदों पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और संविधान विशेषज्ञ अनिल दीवान ने इस मसले पर कर्नाटक के लोकायुक्त से जांच कराने का सुझाव दिया है। इन दोनों ने शुक्रवार को कानून मंत्री एम. वीरप्पा मोइली से मुलाकात कर इस मसले पर अपना मत दिया था। एक अन्य विकल्प यह रखा गया कि चूंकि दीनाकरन सुप्रीम कोर्ट के जजों मार्कंडेय काटजू और ए. के. गांगुली के तहत काम कर चुके हैं इसलिए कोलेजियम उनकी राय जरूर ले।
स्रोत

Friday, September 18, 2009

जस्टिस दिनकरन से खंडपीठ की अध्यक्षता न करने का अनुरोध

कर्नाटक बार एसोसिएशन (केबीए) ने गुरुवार को अपनी एक विशेष बैठक में प्रस्ताव पारित करके यह मांग रखी कि उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी डी दिनकर तब तक अदालती कार्रवाई में भाग न लें जब तक वह आय से अधिक संपत्ति जमा करने के आरोपों से बरी नहीं हो जाते।

केबीए की बैठक में यह भी मांग रखी गई कि सभी न्यायाधीश अपनी संपत्ति की घोषणा करें। बैठक में यह भी कहा गया कि बार के सदस्यों को यदि न्यायमूर्ति दिनकर के खिलाफ कोई लिखित शिकायत हो तो उसे मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास भेजा जाएगा।

वरिष्ठ वकीलों ने न्यायमूर्ति दिनकर के खिलाफ भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति जमा करने के आरोप होने के बावजूद उन्हें उच्चतम न्यायालय में पदोन्नति देने पर रोष जताया। इस बैठक में कर्नाटक महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष प्रमिला नेसार्गी ने न्यायमूर्ति दिनकर के इस्तीफा की मांग की जबकि बार के अन्य सदस्यों ने उनकी अदालत का तब तक बहिष्कार करने का सुझाव दिया जब तक वह अपने ऊपर लगे आरोपों से बरी नहीं हो जाते।

राजस्थान में ग्राम न्यायालय खोलने की तैयारी

राज्य में गांवों में रहने वाले लोगों को घर के निकट ही न्याय की सुविधा दिलाने के लिए राज्य में 248 ग्राम न्यायालय खोलने की तैयारी की जा रही है। इससे युवाओं के लिए जहां प्रदेश में 2500 से 3000 प्रत्यक्ष नौकरियों का रास्ता खुलेगा, वहीं, कानून की डिग्री वाले 10 हजार से ज्यादा युवाओं के लिए ये कोर्ट उपयोगी साबित होंगे। हर पंचायत स्तर पर खोले जाने वाले इन न्यायालयों में से पहले चरण में हरेक जिले में एक एक के हिसाब से 33 न्यायालय खोले जा सकते हैं। यह संख्या 50 तक भी जा सकती है। ये न्यायालय खोलने में केंद्र आर्थिक सहयोग करेगा, लेकिन इसकी मात्रा कम होने के कारण राज्य सरकार अभी असमंजस की स्थिति में हैं। हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से इस संबंध में राज्य सरकार को भेजे गए प्रस्ताव और खर्च का परीक्षण कर लिया गया है। इस मामले में अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री के स्तर पर होना हैं। राज्य में अभी 237 पंचायत समितियां है और 9 पंचायत समितियां नई बनी हैं। एक या दो स्थानों पर एक से अधिक ग्राम न्यायालय हो सकते हैं।
गांव के लोगों को छोटे मोटे मामलों के लिए शहर या बड़े कस्बे में स्थित कोर्ट में आना पड़ता है। इनसे मुक्ति दिलाने और अनावश्यक खर्चो से बचाने तथा अन्य न्यायालयों में लम्बित प्रकरणों में कमी के लिए ऐसे न्यायालय की अवधारणा को प्रोत्साहित किया गया है। जिन पंचायत मुख्यालय पर पहले से कोई कोर्ट है, फिर भी ऐसे नए न्यायालय खोले जाएंगे।
 
ग्राम न्यायालयों का स्तर प्रथम श्रेणी मुंसिफ मजिस्ट्रेट के समकक्ष होगा। इनमें कम सजा वाली धाराओं से जुड़े और छोटे मोटे दीवानी और फौजदारी मामलों की सुनवाई की जा सकेगी। गंभीर मामले पूर्ववत पहले से कार्यरत कोर्टो में चलेंगे।
इन न्यायालयों की स्थापना में करीब एक सौ करोड़ रुपए का खर्च आ सकता है। एक न्यायालय की स्थापना पर अनावर्तक खर्च करीब 20.80 लाख रुपए का हो सकता है, इसमें से 18 लाख रुपए केंद्र सरकार वहन करेगी। यह खर्च एक बार होगा। इसी प्रकार आवर्तक खर्च प्रतिवर्ष 17 लाख रुपए होगा। इसमें से केंद्र 3 लाख रुपए प्रतिवर्ष वहन करेगी और वो भी तीन साल तक, इसके बाद राज्य सरकार को ही भुगतना होगा। ग्राम न्यायालयों में लगाए जाने वाले मजिस्ट्रेटों और अन्य स्टाफ के लिए नई भर्ती होगी। इनमें आरजेएस पद के लिए आरपीएससी के माध्यम से भर्ती की जा सकती है।
 

हाई कोर्ट ने आरपीएमटी में फर्जी परीक्षार्थियों के शामिल होने के मामले की जांच आईजी को सौंपी


राजस्थान हाई कोर्ट ने आरपीएमटी-2009 में फर्जी परीक्षार्थियों के शामिल होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए इसकी जांच पुलिस महानिरीक्षक (कार्मिक) पी.के.सिंह को सौंपी है। हाई कोर्ट ने उन्हें निर्देश दिया कि वे परीक्षा में हुए फर्जीवाड़े में शामिल रैकेट की गहनता से जांच के लिए विशेष जांच टीम गठित करें, जिसमें राज्य फोंरेंसिक लेबोरेट्री का एक हस्तलिखित विशेषज्ञ भी शामिल हो।
यह आदेश न्यायाधीश आर.एस.राठौड़ ने सीकर निवासी झाबरमल जाट की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। न्यायाधीश ने जांच कमेटी को निर्देश दिया कि वह उन लोगों का भी पता लगाए, जिन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर परीक्षाओं के आयोजन कराने में सहयोग दिया। न्यायाधीश ने कहा कि ये लोग भी इस रैकेट को सहयोग देने के लिए जिम्मेदार हैं। हाई कोर्ट ने टीम को निर्देश दिया कि वह 29 सितंबर को अपनी रिपोर्ट पेश करे।
याचिकाकर्ता की वकील अनुराधा सोनी ने बताया कि पिछली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने स्वीकार किया था कि आरपीएमटी परीक्षा में फर्जी तरीके से प्रवेश हुआ है। जांच के लिए गठित कमेटी के सामने कुछ फर्जी परीक्षार्थियों के मामले आए हैं। इनमें से पांच विद्यार्थियों के अंगूठे के निशान लेकर उसे राज्य के स्टेट क्राइम ब्यूरो को भेजा गया है। तीन विद्यार्थियों के खिलाफ विश्वविद्यालय ने अशोक नगर थाने में मुकदमा भी दर्ज कराया था। उन्होंने कहा कि परीक्षा में बड़े पैमाने पर फर्जी परीक्षार्थियों बैठे थे। इसलिए मामले की गंभीरता से जांच कराई जाए।

राजस्थान महिला आरक्षण पर रोक

राजस्थान उच्च न्यायालय ने राजस्थान नगर पालिका विधेयक एवं अधिनियम 2009 में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में महिलाओं के आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका में आदेश दिया कि सरकार आरक्षण की प्रक्रिया को तो जारी रख सकती है लेकिन अदालत की अनुमति के बिना इसे अंतिम रप नही दे सकती !
मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला एवं न्यायमूर्ति मनीष भंडारी की खंडपीठ ने यह आदेश आज प्रार्थी मोहम्मद कलीम तथा अन्य की याचिका की सुनवाई के बाद दिए !
याचिकाकर्ता ने राजस्थान नगर पालिका विधेयक एवं अधिनियम 2009 के सैक्शन.6. एवं .7. जिसके तहत पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत पद आरक्षित कर दिए है याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 15 के खिलाफ है1 याचिका में कहा गया कि नगर पालिका अधिनियम 1959 की धारा 9 में आरक्षण चार वर्गो में बांटा गया है जिसमें अनुसूचित जाति ,जनजाति, अन्य पिछडा वर्ग एवं महिला शामिल है अब सरकार के इस नये संशोधित विधेयक से आरक्षण का आंकडा 75 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा, जबकि उच्चतम न्यायालय के निर्णयानुसार आरक्षण पचास प्रतिशत से अधिक नही होना चाहिये1मामले को सुनवाई के बाद न्यायालय ने मुख्य सचिव, स्वायत शासन सचिव , सीकर के जिला कलेक्टर , नगर परिषद सीकर के अध्यक्ष से जवाब तलब किया है !

उद्योगपति राहुल बजाज पर देशद्रोह का केस

दिल्ली  की एक कोर्ट में उद्योगपति और राज्यसभा सांसद राहुल बजाज के खिलाफ देशद्रोह का एक मामला दायर किया गया है। उन पर आरोप है कि बजाज समूह के बीमा कारोबार की पार्टनर कम्पनी बजाज आलियांज ने अपनी वेबसाइट पर जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान और अरूणाचल को चीन का हिस्सा दिखाया था। दिल्ली प्रदेश नेशनल पैंथर्स पार्टी के सदस्य संजय सचदेव और अन्य ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट गीतांजलि गोयल की कोर्ट में अर्जी पेश कर राहुल बजाज पर देशद्रोह का मुकदमा चलाए जाने की मांग की है। बजाज के बीमा बिजनस पार्टनर अलायंज के पोर्टल पर यह नक्शा दिखाया गया था। दूसरी ओर राहुल बजाज का कहना है कि उसे मामले से उनका कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि यह नक्शा आलियांज की वेबसाइट पर ता। एक महीने पहले जब इस गलती की ओर इशारा किया गया तो कंपनी ने अपनी भूल सुधार ली थी। मजिस्ट्रेट ने इस मामले की सुनवाई की तारीख 24 सितंबर तय की है।

पहली ही सुनवाई में फैसला?

भारत में अक्सर न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति की शिकायत की जाती हैं लेकिन एक न्यायालय ने पहली ही सुनवाई में मुलजिम को सजा देकर त्वरित न्याय देने का रिकार्ड कायम कर दिया है। 
बुधवार को न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम, ऊना अबीरा वासू की अदालत ने चोरी की कोशिश के आरोप में पकडे़ गए अभियुक्त को सुनवाई के पहले ही दिन सजा सुना दी। अदालत ने गवाहों के बयान और जांच अधिकारी की गवाही के बाद अभियुक्त सत्य नारायण पुत्र ईश्वर चंद निवासी उन्नावा, तहसील पुंडरी जिला कैथल, हरियाणा को चार महीने की सजा सुनाई। 
अदालत ने उस पर दो हजार रुपये का जुर्माना भी ठोंका। जुर्माना अदा न करने पर दोषी को एक माह के अतिरिक्त कारावास की सजा सुनाई गई। जिला उपन्यायवादी डीके चौधरी ने बताया, अभियुक्त के खिलाफ स्थानीय विकास नगर मोहल्ले के वार्ड-4 निवासी अरविंद कुमार ने चोरी की कोशिश करने की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने अभियुक्त को मौके पर ही पकड़ लिया था।
अरविंद के मुताबिक वह 21 मई 2009 को घर के नजदीक ही एक प्लाट में अपने बेटे का जन्मदिन मना रहे थे। करीब रात एक बजे उन्हें किसी काम से घर आना पड़ा। आकर देखा तो सत्य नारायण घर में घुसकर चोरी का प्रयास कर रहा था। इस मामले में अदालत ने पहली ही सुनवाई में सत्य नारायण को सजा देकर जिले में त्वरित न्याय देने का रिकार्ड कायम कर दिया है।

राज्यपालों के कार्यकाल पर सुनवाई,सवाल सामान्य असर दूरगामी।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने बुधवार को इस विवादास्पद मुद्दे की सुनवाई शुरू कर दी, जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या केंद्र में सत्ता परिवर्तन के साथ राज्यपालों को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाना उचित है। चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन की अगुवाई वाली पांच जजों की बेंच ने सुनवाई शुरू करने से पहले कहा, ‘यह सवाल साधारण है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। इसका कई अन्य संवैधानिक पदों पर असर पड़ता है।’

निरंकुशता नहीं : बहस की शुरुआत करते हुए पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी ने कहा कि राज्यपालों को हटाने के मामले में केंद्र सरकार निरंकुशता नहीं बरत सकती। उन्होंने बेंच से कहा कि राज्यपालों को उनका कार्यकाल पूरा करने देने की संरक्षित व्यवस्था होनी चाहिए।

कार्यकाल पूरा करने दें : सोराबजी ने कहा कि इस मामले में केंद्र अपनी मर्जी से कदम नहीं उठा सकता। उसे राज्यपालों को अपना पांच वर्षीय कार्यकाल पूरा करने का मौका देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वे यह बात मामले के गुण-दोषों के आधार पर नहीं, बल्कि राज्यपाल पद के संवैधानिक पक्ष को स्पष्ट करने के लिए कह रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट में यह मुद्दा 2004 से लंबित है, जब तत्कालीन भाजपा सांसद बीपी सिंघल ने उत्तरप्रदेश, गुजरात, हरियाणा और उड़ीसा के राज्यपालों को हटाए जाने को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। उस समय की यूपीए सरकार ने इन राज्यपालों को हटाया था। इसमें कहा गया था कि केंद्र की सलाह पर राष्ट्रपति राज्यपाल को संविधान के मुताबिक उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले हटा नहीं सकते।  सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने बुधवार को उस सवाल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें यह पूछा गया था कि साल के शुरुआती संसद सत्र को क्या उसका पहला सत्र माना जाए। आरपीआई (आठवले धड़ा) के नेता रामदास आठवले ने इस संबंध में याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उन्होंने जनवरी 2004 के संसद सत्र को शीतकालीन सत्र का ही हिस्सा माना था, जबकि शीतकालीन सत्र 23 दिसंबर 2003 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था। आठवले का कहना है कि एक बार स्थगित हो जाने के बाद नए साल में संसद सत्र को निरंतर नहीं माना जा सकता। चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय बेंच ने बुधवार को इस मसले पर आधे घंटे से कुछ अधिक समय की बहस के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।

Wednesday, September 16, 2009

राजीव हत्याकांड:नलिनी की याचिका पर सरकार को नोटिस

मद्रास उच्च न्यायालय ने राजीव गांधी हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रही नलिनी की एक याचिका पर तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया है। नलिनी ने याचिका में समय पूर्व रिहाई की मांग की थी।
न्यायमूर्ति पी. ज्योतिमणि ने नोटिस जारी किया, जिस पर दो सप्ताह में जवाब आना चाहिए।
नलिनी ने अपनी याचिका में कहा था कि सीआरपीसी की धारा 433 (ए) के तहत समय पूर्व रिहाई के लिए उसे 14 साल की कैद पूरी करने की जरूरत है। वह वेल्लूर जेल में 18 साल से अधिक समय कैद में काट चुकी है। उसने दलील दी कि 18 जून 2005 के बाद से वह समय पूर्व रिहाई की हकदार है।
नलिनी ने कहा कि वर्ष 2007 में समय पूर्व रिहाई के लिए जारी नामों की सूची में उसका नाम नहीं था।, जिसके बाद उसने राज्य सरकार से उसके नाम पर विचार करने का अनुरोध किया। हालांकि इसे खारिज कर दिया गया। तब उसने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की। उच्च न्यायालय ने 24 सितंबर 2008 को अपने आदेश में सरकार को उसके अनुरोध पर पुन: विचार करने को कहा।
नलिनी ने कहा कि उस आदेश को एक साल हो चुका है और सरकार ने अभी तक नया सलाहकार बोर्ड गठित नहीं किया है और उसकी समय पूर्व रिहाई की याचिका पर कोई फैसला नहीं किया है। नलिनी और तीन अन्य को पहले मौत की सजा सुनायी गयी थी।
उसने दलील दी कि राज्यपाल ने उसकी क्षमादान की एक याचिका को स्वीकार कर लिया था। 24 अप्रैल 2000 को राज्य सरकार ने एक आदेश जारी कर उसकी मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया।
उसने मांग की है कि सरकार को कानून के मुताबिक एक सलाहकार बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया जाए और उसकी समय पूर्व रिहाई के लिए फैसला लिया जाए।