पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Wednesday, January 20, 2010

थम्स अप में छिपकली, कंपनी पर हर्जाना


जिला उपभोक्ता फोरम इंदौर ने थम्स अप में छिपकली मिलने पर कंपनी को हर्जाना भुगतान का आदेश दिया। फैसला फोरम की अध्यक्ष सरोज महेंद्र जैन, सदस्य शोभा दुबे व भारती पोरवाल की तीन सदस्यीय पीठ ने सुनाया। वेदप्रकाश त्रिवेदी निवासी गोविंद कॉलोनी ने फोरम में परिवाद लगाकर कहा था कि उसने एमजी रोड स्थित दुकान से 24 मई 07 को थम्प अप ब्रांड के नाम से शीतलपेय खरीदा था। जैसे ही शीतलपेय की बोतल खोली उसमें छिपकलीनुमा जंतु दिखाई दिया। इससे परिवादी व उसका परिवार भयभीत हो गया।



परिवादी ने बोतल के फोटोग्राफ उतरवाए थे जो फोरम में पेश कर कहा कि यदि उसके परिजन उसका उपयोग कर लेते तो खतरनाक हादसा हो सकता था। परिवादी ने इसके लिए हिंदुस्तान कोकोकोला वेबरजेल, पीलूखेड़ी नरसिंहगढ़ (राजगढ़) एवं एव्हर बेस्ट बेकरी सेंटर को पक्षकार बनाकर 10 लाख का हर्जाना मांगा था। .



प्रकरण की सुनवाई में कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि विवादित बॉटल का परीक्षण कराया गया जिस पर बेच नंबर अंकित नहीं है। बॉटल का उपयोग निर्माण से छह माह की अवधि में किया जाना चाहिए था। दुकानदार की ओर से कहा गया कि उसे कंपनी की ओर से जो माल मिलता है उसका विक्रय करता है।
कंपनी ने सेवा में कमी की, दुकानदार ने नहीं



फोरम ने फैसले में लिखा कि लेबोरेटरी की रिपोर्ट पर विश्वास नहीं किया जा सकता। सीलबंद पेय पदार्थ में 10 से 15 मिलीमीटर का इन्सेक्ट पाया गया जो कंपनी द्वारा की गई सेवा में कमी है। इसमें दुकानदार का दोष प्रकट नहीं होता। अत: कंपनी परिवादी को मानसिक संत्रास के रूप में पांच हजार रुपए आठ प्रतिशत ब्याज सहित एवं परिवाद व्यय के एक हजार रुपए का भुगतान करे।

Tuesday, January 19, 2010

नेटवर्किन्ग वेबसाइट पर प्रोफाइल को सबूत माना कोर्ट ने।


एक व्यक्ति को अपनी इंटरनेट प्रोफाइल पर अपनी कंपनियों का उल्लेख करना महंगा पड़ गया। व्यक्ति की पत्नी ने इसी प्रोफाइल का उपयोग गुजारे भत्ते दावे के मुकदमे में सबूत के तौर पर किया। इसके बाद अदालत ने पति को अपनी पत्नी को 15,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते निचली अदालत के एक आदेश को कायम रखते हुए यह आदेश दिया। मुकदमे के मुताबिक पत्नी ने तलाक की अपनी लंबित याचिका के तहत अपने पति से गुजारे भत्ते की मांग की थी। पत्नी ने पारिवारिक अदालत में सबूतों के तौर पर पति की सोशल नेटवर्किनग वेबसाइट की प्रोफाइल पेश की थी, जिनमें उसे चार फर्म्स और कई वाहनों का मालिक बताया गया था।

निचली अदालत ने इस जानकारी को सबूतों के तौर पर स्वीकार करते हुए पति को अपनी पत्नी को 15 हजार रुपये प्रति महीने का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। पति के वकील ने इसे हाई कोर्ट उच्च में चुनौती देते हुए कहा था कि प्रोफाइल का उपयोग सबूत के तौर पर नहीं हो सकता। पारिवारिक अदालत के आदेश को निरस्त करने से इनकार करते हुए हाई कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया।

सिखों को हिंदुओं से अलग करने संबंधी याचिका खारिज।


सुप्रीम कोर्ट ने सिख समुदाय में पैदा होने वाले व्यक्ति को हिंदू विवाह कानून के तहत जन्म प्रमाण पत्र जारी करने से संबंधित जनहित याचिका पर कोई आदेश जारी करने से इन्कार कर दिया है। याचिका में कहा गया था कि इसकी वजह से दुनिया भर के आप्रवासन अधिकारियों को यह बताना कठिन हो जाता है कि यह समुदाय हिंदुओं से अलग है। याचिका में अदालत से सिख समुदाय को हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे से बाहर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 25 में संशोधन के निर्देश देने का आग्रह किया गया था।

मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सोमवार को वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा, विदेश में विशेषकर आप्रवासन अधिकारियों को यह समझा पाना बहुत कठिन हो जाता है कि सिख समुदाय को जन्म प्रमाण पत्र तो हिंदू विवाह कानून के तहत दिए जाते हैं लेकिन धार्मिक दृष्टि से यह समुदाय हिंदुओं से अलग है। रोहतगी जोगिंदर सिंह सेठी नामक सिख द्वारा दायर जनहित याचिका की पैरवी कर रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि हालांकि वह इस याचिका में उठाए गए मुद्दे से सहमत है। लेकिन इस पर विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला है। पीठ ने कहा, हम जानते हैं कि लोगों को समझाना बहुत कठिन है लेकिन हम कोई निर्देश जारी नहीं कर सकते।

उल्लेखनीय है कि न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाले आयोग ने बौद्ध, जैन और सिख धर्मावलंबियों को हिंदू विवाह कानून से अलग करने की संस्तुति की थी। इस याचिका के जरिए इन वेंकटचलैया आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए सरकार को निर्देश देने की भी मांग की गई थी।

Monday, January 18, 2010

भारत में कानून की पहली ई-किताब


भारत में पहली बार कानून की एक किताब डिजिटल फार्म में वायरलेस ई-बुक किंडल में लांच की गई है। किंडल किताब की तरह दिखने वाली छोटी सी डिवाइस है। इस छोटे से उपकरण में 1500 किताबें डाउनलोड कर सहेजी जा सकती हैं और कभी भी, कहीं भी पढ़ी जा सकती हैं।

रविवार को यहां कानून की जिस किताब को डिजिटल फार्म में लांच किया गया, उसका नाम 'द कोड आफ सिविल प्रोसिजर 1908' है। किताब के लेखक अनुपम और मोनिका श्रीवास्तव हैं। किताब का लोकार्पण दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश मदन बी. लोकुर और ए.के. सिकरी ने किया।

भारतीयों पर नस्ली हमले में पहली सजा।


आस्ट्रेलिया की एक अदालत ने शुक्रवार को त्वरित कार्रवाई करते हुए एक भारतीय टैक्सी चालक पर हमला करने वाले आस्ट्रेलियाई नागरिक को तीन महीने कैद की सजा सुनाई। यह फैसला घटना के कुछ ही घंटों के भीतर हो गया।

बैलारट, पश्चिमी विक्टोरिया के पॉल जॉन ब्रोगडन [48] ने रात शराब के नशे में भारतीय टैक्सी चालक सतीश थातिपामुला [24] को गालियां दीं और उस पर हमला किया। उसने भारतीय को जान से मारने की धमकी दी और उसके वाहन को तोड़ दिया।

पुलिस ने आज सुबह ब्रोगडन को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जहां घटना के कुछ ही घंटे बाद उसे तीन महीने कैद की सजा सुना दी गई। मारपीट करने वाले ब्रोगडन का मानना था कि भारतीय चालक उसे गलत रास्ते पर ले गया।

मामले के अनुसार, ब्रोगडन ने भारतीय चालक से कहा कि जब तुम मुझे उतारोगे तो मैं तुम्हें मार दूंगा। तेरी मां..मैं तुम्हें मार दूंगा, यू इंडियन बास्टर्ड। उसने सतीश पर हमला भी किया। हालांकि उसे ज्यादा चोट नहीं आई।

ब्रोगडन के वकील फिलिप लिंच ने कहा कि उसके मुवक्किल ने अत्यधिक शराब पी ली थी, इसलिए वह रात की घटना को याद नहीं कर सकता।

सजा सुनाते हुए मजिस्ट्रेट ने कहा, समुदाय को मूल्यवान सेवा दे रहे लोगों के खिलाफ नस्लवाद और हिंसा की घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।

अदालत में बयां किए गए घटनाक्रम के अनुसार ब्रोगडन ने एक शराब पार्टी में शामिल होने के बाद गत रात स्थानीय समयानुसार तड़के लगभग दो बजे एक टैक्सी किराए पर ली। पार्टी में उसने कुछ नशीली गोलियां भी खाई।

पुलिस प्रवक्ता ने बताया कि आस्ट्रेलियाई नागरिक जब गालियां देने लगा तो भारतीय चालक ने तड़के लगभग सवा दो बजे एक सर्विस स्टेशन में शरण ली, लेकिन शराबी यात्री ने उसका पीछा किया और उस पर हमला किया।

ब्रोगडन ने भारतीय पर हमला करने के साथ ही सर्विस स्टेशन पर पेट्रोल भर रहे एक अन्य व्यक्ति पर भी हमला किया।

मजिस्ट्रेट ने शराब पीने की लत के बारे में कहा, हमारे समुदाय में शराब हिंसा पैदा कर रही है जो वास्तव में खतरनाक स्थिति है।

इस दौरान अदालत को पता चला कि ब्रोगडन शराब से संबंधित एक मामले में पहले भी दोषी ठहराया जा चुका है।

लिंच ने कहा कि ब्रोगडन डरा हुआ था और उसने अपने को जेल भेजे जाने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि उनका मुवक्किल मामले में जल्द निपटारा चाहता था और ऐसा कर मजिस्ट्रेट अत्यंत खुश थे।

इस बीच, ताजा घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आस्ट्रेलिया में फेडरेशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स के प्रवक्ता गौतम गुप्ता ने कहा कि मैं इस मुद्दे को सरकार द्वारा गंभीरता से लिए जाने और नए घृणा अपराध अधिनियम को पूर्ण प्रभाव के साथ लागू करने की उम्मीद कर रहा हूं।

आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। हाल ही में 21 वर्षीय छात्र नितिन गर्ग की यहां अज्ञात हमलावरों ने चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी थी। न्यू साउथ वेल्स में भी पिछले महीने एक अन्य भारतीय युवक रणजोध सिंह को मार दिया गया था।

आस्ट्रेलिया में वर्ष 2009 में भारतीयों पर लगभग 100 हमले हुए, जबकि 2008 में हमलों की 17 घटनाएं हुई थीं। बुधवार को आग लगाकर एक अ‌र्द्ध निर्मित गुरुद्वारे को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया।

इन हमलों से भारत-आस्ट्रेलिया संबंधों पर असर पड़ रहा है। कैनबरा का कहना है कि सभी हमले नस्लवाद से प्रेरित नहीं हैं।

अब न्यायालय आपके द्वार योजना।


अब आपको न्याय के लिए न्यायालय जाने की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी बल्कि आपको न्याय आपके घर के दरवाजे पर ही मिलेगा। लंबित मुकदमों में कमी लाने के लिए संभवतया पहली बार, महाराष्ट्र में मोबाइल कोर्ट शुरू किया जा रहा है। इस योजना से जु़डे अधिकारियों ने बताया कि मोटर दुर्घटना दावों सहित दीवानी व क्षतिपूर्ति संबंधी छोटे मामलों की सुनवाई के लिए यह मोबाइल वैन एक माह तक जिलों में जाकर प्रमुख कस्बों में शिविर लगाकर मुकदमों की सुनवाई करेगी और तुरंत फैसला सुनाएगी। राज्य विधि सेवा प्राधिकरण इस योजना की शुरूआत कर रहा है। प्राधिकरण के संरक्षक एवं कार्यकारी अध्यक्ष, बाम्बे हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश जे एन पटेल यहां मुम्ब्रा में कल इस कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे। ठाणे जिला विधि सहायता सेवाओं के प्रभारी अधिकारी त्रिम्बक कोचेवाड के अनुसार शुरू में प्रत्येक दिन करीब 195 मामलों की सुनवाई होगी।

पिता ऊंची जाति का तो संतान को आरक्षण नहीं-गुजरात हाईकोर्ट


गुजरात हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि ऊंची जाति के पिता और अनुसूचित जनजाति की मां के संबंध से पैदा हुए बच्चे को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
मुख्य न्यायाधीश एस.जे. मुखोपाध्याय और न्यायाधीश ए.एस. दवे की पीठ ने हाल ही में रमेश नेका नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला दिया। नेका ने हाईकोर्ट की एकल पीठ के फैसले को चुनौती दी थी। एकल पीठ के न्यायाधीश ने यह जानने के बाद कि उसके पिता ऊंची जाति के हैं, उसका जाति प्रमाणपत्र रद्द करने के पंचमहल जिले के अधिकारियों के आदेश को सही ठहराया था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, भारत के संविधान के तहत यह पहले से तय है कि कोई भी व्यक्ति जिसे अगड़ी जाति में पैदा होने के कारण जीवन की शुरूआत में लाभ मिला वह गोद लेने से, शादी करने से या धर्म परिवर्तन करने से आरक्षण का लाभ पाने के योग्य नहीं हो जाता। अदालत ने आगे कहा कि अपीलकर्ता नेका अगड़ी जाति के पिता की संतान है। हिंदू नियम के अनुसार, उन्हें इनकी जाति पिता से मिली न कि अनुसूचित जनजाति की इनकी मां से। इस वजह से अपीलकर्ता को उस दौर से नहीं गुजरना पड़ा जिसे अनुसूचित जाति या जनजाति के लोग झेलते हैं।
नेका ने कहा था कि उसका लालन पालन जनजातीय समाज में हुआ क्योंकि आदिवासी लड़की से शादी के बाद उसके पिता को समाज से निकाल दिया गया था। अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया।

Thursday, January 14, 2010

1984 के दिल्ली दंगे : सज्जन कुमार पर दो मामलों में चार्जशीट

दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों से संबंधित दो मामलों में सीबीआई ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार के खिलाफ यहां मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेटन की अदालत में बुधवार को आरोप-पत्र दाखिल किए। ये दो मामले सुल्तानपुरी और दिल्ली कैंट पुलिस थानों में दर्ज थे। गौरतलब है कि ये मामले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भ़डके दंगों में दोनों इलाकों में सात और पांच लोगों के मारे जाने के संबंध में दर्ज किए गए थे। इसके अलावा मंगोलपुरी पुलिस थाने में दर्ज एक अन्य मामले में मामला बंद करने की रिपोर्ट पेश की। इस मामले में एक व्यक्ति मारा गया था। दोनों आरोप-पत्रों में बाहरी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से पूर्व कांग्रेसी सांसद सज्जन कुमार को हत्या तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए के तहत विभिन्न वर्गो के बीच आपसी दुश्मनी को बढ़ावा देने का आरोपी ठहराया गया है।


सुल्तानपुरी मामले में सज्जन कुमार सहित पांच जबकि दिल्ली कैंट मामले में आठ लोग आरोपी हैं। मुख्य मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने आरोप-पत्रों के साथ ही मामला बंद करने संबंधी रिपोर्ट को क़डकडडूमा कोर्ट ने अतिरिक्त मुख्य मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत के लिए मार्क कर दिया। इस पर क़डकडडूमा कोर्ट में सोमवार को विचार किया जाएगा। तीनों मामले न्यायाधीश जीटी नानावती आयोग की सिफारिश पर दर्ज किए गए थे, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भ़डके सिख विरोधी दंगों का कारण बनने वाली घटनाओं की जांच की थी। इन दंगों में सज्जन कुमार की कथित संलिप्तता के लिए नानावती आयोग द्वारा उन्हें दोषी ठहराए जाने के बाद आम जनता के असंतोष के चलते कांग्रेस पार्टी ने उनका नाम पिछले आम चुनाव से वापस ले लिया था। जगदीश टाइटलर इस मामले में एक अन्य प्रमुख कांग्रेसी नेता थे जिनके खिलाफ आयोग ने आपराधिक मामला चलाए जाने की सिफारिश की थी। टाइटलर के खिलाफ मामला बंद करने की सीबीआई की रिपोर्ट क़डकडडूमा की एक विशेष अदालत में लंबित है।

हाईकोर्ट का फैसला चीफ जस्टिस का पद सूचना के अधिकार कानून के दायरे में, सुप्रीम कोर्ट अपील करेगा।


दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि चीफ जस्टिस (सीजेआई) का पद सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आता है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता किसी जज का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उसे सौंपी गई जिम्मेदारी है। 
मुख्य न्यायाधीश ए. पी. शाह और जस्टिस विक्रमजीत सेन व एस. मुरलीधर की तीन सदस्यीय बेंच का 88 पन्नों का यह फैसला चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन के लिए एक निजी धक्के के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने आरटीआई ऐक्ट के तहत जजों से संबंधित संपत्ति के ब्यौरे मांगे जाने का विरोध किया था।
दिल्ली हाई कोर्ट की इस तीन सदस्यीय बेंच ने सुप्रीम कोर्ट की यह दलील खारिज कर दी कि चीफ जस्टिस के पद को आरटीआई ऐक्ट के दायरे में लाने से न्यायिक स्वतंत्रता बाधित होगी। बेंच ने फैसला दिया कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का दफ्तर आरटीआई के दायरे में आता है। इसका मतलब यह हुआ कि जजों को आरटीआई के तहत संपत्ति का ब्यौरा देना होगा।

गौरतलब है कि 2 अक्तूबर 2009 हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का दफ्तर आरटीआई के दायरे में आता है और इस तरह जजों की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इसको सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्री ने दिल्ली हाई कोर्ट की स्पेशल बेंच के सामने चुनौती दी थी, जिसे मंगलवार को स्पेशल बेंच ने खारिज कर दिया है।

हाई कोर्ट की स्पेशल बेंच के सामने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल ने दलील दी थी कि जजों ने संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने का जो प्रस्ताव दिया था वह बाध्यकारी नहीं है। उसके लिए कानूनी तौर पर उन्हें बाध्य नहीं किया जा सकता। उक्त प्रस्ताव सेल्फ रेग्युलेशन के लिए था। जजों को पब्लिक स्क्रूटनी के अंदर नहीं लाया जा सकता और अगर ऐसा किया जाता है तो इससे न्यायिक व्यवस्था के स्वतंत्रता और उसके कामकाज में दखल होने लगेगा।
उच्चतम न्यायालय ने प्रधान न्यायाधीश के पद को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के आज के फैसले को चुनौती देने का निर्णय किया है। शीर्ष अदालत से सूचना लेने संबंधी नवंबर २००७ में शुरू हुई कानूनी लड़ाई के और लंबा खिंचने की संभावना है क्योंकि उच्चतम न्यायालय के पंजीयक ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने का निर्णय किया है।

फर्जी विश्र्वविद्यालयों पर केंद्र अंकुश लगाए-उच्चतम न्यायालय


उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह ऐसे शैक्षणिक संस्थाओं पर अंकुश लगाए जो फर्जीवाड़े को बढ़ावा दे रहे हैं। न्यायमूर्ति दलवीर भण्डारी और न्यायमूर्ति एके पटनायक की खण्डपीठ ने स्थानीय अधिवक्तञ विप्लव शर्मा द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि इन फर्जी शिक्षण संस्थाओं के कारण जिन छात्रों का भविष्य खराब होता है उसकी भरपाई तो किसी भी तरह के मुआवजे से नहीं हो सकती है।
सालीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि डीम्ड विश्र्वविद्यालयों से संबंधित प्रो. पीएम टंडन की अध्यक्षता में गठित स्तरीय समिति की रिपोर्ट और इस पर की गई कार्रवाई का विवरण पेश करने के लिए उन्हें एक सप्ताह का समय और चाहिए। इस विवाद के तूल पकडऩे पर केंद्र सरकार ने गत वर्ष ३१ जुलाई को अदालत को सूचित किया था कि डीम्ड विश्र्वविद्यालयों की बढ़ती संख्या को लेकर उठे विवाद पर एक उच्च स्तरीय समिति विचार कर रही है। रिपोर्ट सरकार को सितंबर से मिल गई थी।
अदालत ने कहा कि यह महसूस किया जा सकता है कि विश्र्वविद्यालयों से सम्बद्ध होने का दावा करके हजारों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे इन फर्जी कॉलेजों की गतिविधियां कितनी चिंताजनक हैं।

Monday, January 11, 2010

आंध्र के दो टीवी पत्रकार न्यायिक हिरासत में


आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर राजशेखर रेड्डी की मौत को षडयंत्र बताने वाली रिपोर्ट प्रसारित करने के मामले में दो वरिष्ठ पत्रकारों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. गुरुवार को यह रिपोर्ट दिखाए जाने के बाद तेलुगू टीवी चैनल टीवी-5 के एक्सीक्यूटिव एडीटर ब्रह्मानंद रेड्डी और इनपुट एडीटर पी वेंकटकृष्णा को आंध्र प्रदेश की सीआईडी ने गिरफ़्तार कर लिया था. शनिवार को उन्हें सिकंदराबाद की एक अदालत में पेश किया गया. अदालत ने दोनों वरिष्ठ टीवी पत्रकारों को 22 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में रखे जाने का आदेश दिया है. उन्हें चंचलगुडा जेल में रखा जाएगा.

इस बीच सूत्रों के मुताबिक 11 जनवरी को दोनों की ज़मानत याचिका पर सुनवाई होगी. ये मामला तब सुर्खियों में आया था जब वाईएसआर की एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई थी. टीवी-5 चैनल ने इस मामले में गुरुवार को एक रिपोर्ट चलाई थी जिसमें दुर्घटना के पीछे अंबानी बंधुओं की कथित साज़िश बताई गई थी. हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए थे वाईएसआर अंबानी बंधुओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी और रिपोर्ट का खंडन किया था. हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए थे वाईएसआर लेकिन रिपोर्ट के प्रसारित होने के बाद वाईएसआर के समर्थकों में रोष फैल गया. उन्होंने मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के आंध्र प्रदेश में फैले विभिन्न व्यापारिक प्रतिष्ठानों को अपने गुस्से का निशाना बना डाला था.

सीआईडी की जांच टीम ने चैनल से इस रिपोर्ट के फुटेज का टेप भी ज़ब्त किया जिसमें एक विदेशी वेबसाइट के हवाले से कहा गया था कि वाईएसआर एक बड़े षडयंत्र का शिकार हुए थे. पुलिस ने वैसे इस मामले में तीन तेलुगु टीवी चैनलों के खिलाफ़ लोगों के एक हिस्से में वैमनस्य फैलाने के आरोप में स्यू मोटो मामले दर्ज किए थे. इसमें टीवी-5 के अलावा एनटीवी और साक्षी टीवी भी शामिल हैं. दिलचस्प बात ये है कि इसके मालिक राजशेखर रेड्डी के ही बेटे और कांग्रेस सांसद वाईएस जगमोहन रेड्डी हैं. सीआईडी ने शनिवार शाम साक्षी टीवी के बंजारा हिल्स ऑफ़िस से भी कम्प्यूटर हार्ड डिस्क और कुछ सीडी अपने क़ब्ज़े में कर ली थी.

गरीब मां की मदद को पसीजा इंसाफ की देवी का दिल


आर्थिक तौर पर कमजोर एक महिला की सहायता के लिए हाई कोर्ट ने एमसीडी को निर्देश दिया है कि वह उक्त महिला को अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) के तहत राशन कार्ड जारी करे ताकि महिला वहां से अनाज ले सके। महिला ने इसी महीने एक बच्चे को जन्म दिया है और वह पोषण के अभाव में बच्चे को दूध तक नहीं पिला पा रही है।

अपने अंतरिम आदेश में जस्टिस एस. मुरलीधर ने एमसीडी से कहा है कि वह सुनिश्चित करे कि मां और बच्चे को सही मेडिकल सुविधा मिले और उन्हें इलाज में कोई दिक्कत न हो। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि एक एंबुलेंस की व्यवस्था करें ताकि जब भी इलाज के लिए उक्त महिला जी. बी. पंत अस्पताल में जाए तो कोई दिक्कत न हो।

इस बीच मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र के वकील ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि वह दिल्ली सरकार के संबंधित विभाग को इस बाबत निर्देश जारी करेंगे कि वह महिला फातिमा को नैशनल मैटरनिटी बेनिफिट स्कीम के तहत 500 रुपये का भुगतान करें। अदालत ने निर्देश दिया कि अगर उक्त महिला को रुपये नहीं मिले तो अगली सुनवाई के दौरान 13 जनवरी को दिल्ली सरकार के हेल्थ सेक्रेटरी और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के जॉइंट सेक्रेटरी अदालत में पेश हों।

फातिमा ने अपनी मां के जरिये अदालत में अर्जी दाखिल की थी। अर्जी में कहा गया था कि बार-बार अनुरोध करने के बाद भी एमसीडी राशन कार्ड उपलब्ध कराने में फेल रही है। अर्जी में कहा गया कि एमसीडी के जंगपुरा स्थित मैटरनिटी होम में फातिमा ने इसी महीने बच्चे को जन्म दिया उसके बाद फातिमा की मां ने एमसीडी के सामने राशन कार्ड के लिए अप्लाई किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ फिर उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

प्री-पीजी परीक्षा वैध : राजस्थान हाईकोर्ट


राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित स्नात्तकोत्तर पूर्व परीझा प्री-पी जी परीक्षा-2010 के प्रावधानों को वैध करार दिया है। न्यायमूर्ति एमएन भंडारी ने डॉ. राजेन्द्र एवं 31 अन्य चिकित्सकों की याचिकाओं को निरस्त करते हुए आज यह आदेश दिया। मामले के अनुसार विश्वविद्यालय ने राजस्थान स्वास्थ्य केन्द्र विश्वविद्यालय की एमबीबीएस परीझा उत्तीर्ण छात्र को ही प्री पी जी परीक्षा में सम्मिलित होने के योग्य माना था।
याचिकाकर्ताओं का कथन था कि वे राजस्थान के मूल निवासी हैं तथा उन्होंने एमबीबीएस परीझा राजस्थान से बाहर के अन्य राज्यों से उत्तीर्ण की है। अत: मूल निवासी होने के नाते वे परीझाओं में बैठने की पात्रता रखते है। उनकों परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया जाना संविधान के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है।
राजस्थान विश्वविद्यालय के अधिवक्ता डॉ. वाईसी शर्मा ने तर्क दिया कि देश की शीर्ष अदालत ने डॉ. नेहा शर्मा के मामले में यह निर्णय दिया है कि विश्वविद्यालय राजस्थान से एमबीबीएस परीक्षा उत्तीर्ण विघार्थियों को प्री पीजी परीक्षा में बैठने के नियम बना सकती है। इसके तहत आध्यादेश 379 ई में संशोधन करते हुए विश्वविद्यालय में सिर्फ राजस्थान विश्वविद्यालय राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय से एमबीबीएस परीझा उत्तीर्ण अभ्यार्थियों को ही प्री पीजी परीक्षा में शामिल होने का पात्र माना है। विश्वविद्यालय द्वारा श्रेष्ठ एवं दझ डॉक्टरों को प्री पीजी में प्रवेश लेने के लिए आध्यादेश 379 ई में संशोधन किया गया है। यह संशोधन पूर्णतया वैधानिक है। इनके तर्कों से सहमति जताते हुये न्यायालय ने संशोधन को पूर्णतया वैध करार दे दिया।

Saturday, January 9, 2010

अवयस्क मुस्लिम लड़की की देखभाल का हक पिता को ना होकर महिला रिश्तेदारो को


मुस्लिम कानून के तहत मां की मौत या उसके तलाक के बाद अवयस्क लड़की के देखभाल का हक उसकी महिला रिश्तेदारों को मिलता है। भले ही पिता बच्ची की देखभाल करने में सक्षम हों, लेकिन यह अधिकार उन्हें नहीं दिया जा सकता।पिता यदि अपनी पुत्री की गार्जियनशिप (संरक्षण का अधिकार) चाहते हों तो उन्हें गार्जियन एंड वार्डस एक्ट 1890 की धारा 7, 9 व 17 के तहत दावा करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। शीर्ष कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मुस्लिम लड़कियों की देखभाल का अंतरिम अधिकार उसकी महिला रिश्तेदारों का है। इनमें उसकी दादी, नानी, चाची, मामी, सगी बहनें, पिता की दादी, बहन की पुत्री शामिल हैं।

शीर्ष कोर्ट ने अपने आदेश में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। यह मामला अतहर हुसैन नामक व्यक्ति का है, जिसने अपनी 13-वर्षीय पुत्री आतिया की कस्टडी का दावा किया था। आतिया की मां की 2007 में हड्डियों के कैंसर से मौत हो गई थी। यह मामला फैमिली कोर्ट से होते हुए शीर्ष कोर्ट तक पहुंचा था।

पितृत्व मामले में एनडी तिवारी को अदालत का नोटिस


दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने शुक्रवार को आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी को नोटिसभेजकर पितृत्व अधिकार संबंधी मामले में जवाब पेश करने को कहा है।
इससे पहले रोहित शेखर नाम के इस युवक का वह याचिका हाईकोर्ट ने एकलपीठ ने खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने खुद को तिवारी का बेटा होने का दावा किया था।
रोहित शर्मा कांग्रेस की पूर्व कार्यकर्ता अज्ज्वला शर्मा ने याचिका में खुद को तिवारी का पुत्र घोषित करने की मांग की थी। तिवारी के इससे इनकार करने पर उज्ज्वला ने दावा किया था कि वयोवृद्ध राजनीतिज्ञ तिवारी ही उनके पुत्र के पिता हैं और उनकी इच्छा पर ही रोहित को जन्म दिया गया था। इस संबंध में उज्ज्वला ने हाईकोर्ट में लिखित बयान पेश किया था। रोहित ने इसकी पुष्टि के लिए उसका एवं तिवारी का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की थी, लेकिन तिवारी इसके लिए तैयार नहीं हुए थे।