पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Tuesday, April 6, 2010

मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा कानून के उल्लंघन पर रोक

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून के उल्लंघन के मामले में राजधानी की एक छात्रा के फेल होने पर स्कूल से निष्कासन पर रोक लगा दी है और उसकी पढाई जारी रखने का निर्देश जारी किया है।
न्यायमूर्ति कै लाश गंभीर ने आज इस मामले की सुनवाई करते हुए यह स्थगनादेश जारी किया है। गौरतलब है कि दिल्ली के राजनिवास इलाके में स्थित सेंट जेबियर सीनियर सेकेंडरी स्कूल ने छठी कक्षा की छात्रा सुमन भाटी को फेल होने पर स्कूल से निकाल दिया था। सुश्री भाटी के पिता नरेश भाटी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में शनिवार को एक याचिका दाखिल कर अदालत से इस मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगायी थी। उनकी दलील थी कि स्कूल का यह निर्णय एक अप्रैल से देश में लागू हुए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून का सरासर उल्लंघन है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने एक अप्रैल को इस कानून के कारगर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने की राज्यों से अपील की थी। लेकिन इसके तीन दिन के भीतर ही अदालत के सामने यह मामला सामने लाया गया कि देश की राजधानी दिल्ली में इस कानून का सरासर उल्लंघन कर एक छात्रा को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया गया। श्री भाटी के वकील अशोक अग्रवाल ने बताया कि न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर ने सुमन भाटी के फेल होन पर सेंट जेबियर स्कूल से निकाले जाने के फैसले पर रोक लगा दी है और स्कूल प्रशान को निर्देश दिया है कि वह उस छात्रा को कल से स्कूल में पढाई जारी रहने दे। श्री नरेश भाटी ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि स्कूल का फैसला संविधान की धारा 226 तथा मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 एवं संविधान के अनुच्छेद 38 21 एवं 21..ए एवं दिल्ली स्कूल शिक्षा कानून का उल्लंघन है। श्री अग्रवाल ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब सरकार लडकियों को आगे बढाने. उन्हें स्कूल में प्रोत्साहित करने की नीति और कानून बना रही है. एक स्कूल छठी कक्षा की छात्रो को स्कूल से बाहर कर उसके भविष्य तथा करियर को बिगाडने में लगा है।

दिनाकरन नहीं मानेंगे सु्प्रीम कोर्ट की 'सलाह'

भ्रष्टाचार और जमीन हड़पने के आरोप में महाभियोग का सामना कर रहे कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनकरन ने सुप्रीम कोर्ट कोलीजियम की सलाह ठुकरा दी है। कोलीजियम ने उन्हें अवकाश पर जाने की सलाह दी थी। लेकिन, वह सामान्य दिनों की तरह सोमवार को भी प्रशासनिक काम करते दिखे। उन्होंने छुट्टी पर जाने का कोई संकेत भी नहीं दिया है।

इससे विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है। वह हाई कोर्ट में बतौर मुख्य न्यायाधीश काम कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली कोलीजियम दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मदन बी. लोकुर को कर्नाटक भेज रही है। वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने इस बाबत कहा, दिनकरन कोलीजियम की सलाह मानने से इन्कार कर सकते हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तभी प्रभार ले सकते हैं जब दिनकरन अवकाश पर जाएं।

59 वर्षीय दिनकरन हालांकि गत वर्ष दिसंबर से ही न्यायिक मामलों की सुनवाई नहीं कर रहे हैं। राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने पिछले साल दिसंबर में दिनकरन के खिलाफ भ्रष्टाचार, जमीन कब्जाने और न्यायिक पद के दुरुपयोग के आरोप में महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी तरक्की पहले ही रोक दी थी। महाभियोग में उनके खिलाफ लगाए गए आरोप में आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति रखने का भी आरोप है। इसके अलावा उन पर पत्‍‌नी और दो बेटियों के नाम से गलत ढंग से आवास बोर्ड के पांच भूखंड लेने के आरोप हैं। दिनकरन ने हालांकि सभी आरोपों का खंडन किया है। उनका दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में उनकी प्रोन्नति रोकने के लिए ही उन पर ये आरोप लगाए गए।

जोधपुर डेयरीकर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष करने पर रोक

जोधपुर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने डेयरी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 58 वर्ष से बढ़ा कर 60 वर्ष करने पर रोक लगा दी है। यह रोक मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला व न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी की खंडपीठ ने सोमवार को पश्चिमी राजस्थान दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ की ओर से दायर अपील पर लगाई है।

अपीलार्थी की ओर से अधिवक्ता राजेश जोशी ने एकल पीठ द्वारा 25 फरवरी 2010 को पारित निर्णय को चुनौती देते हुए कहा कि पश्चिमी राजस्थान दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ राजस्थान को-ऑपरेटिव डेयरी फैडरेशन (आरसीडीएफ) से पृथक एक रजिस्टर्ड सहकारी संस्था है।

ऐसे में आरसीडीएफ के महाप्रबंधक द्वारा पारित सेवानिवृत्ति संबंधी प्रस्ताव उस पर बाध्यकारी नहीं हैं। अपील में यह भी कहा गया कि आरसीडीएफ का सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने से संबंधित प्रस्ताव सिर्फ ड्राफ्टेड ही था। साथ ही जोधपुर जिला दुग्ध उत्पादक कर्मचारी रेगुलेशन के नियम 19 के तहत सेवानिवृत्ति आयु 58 वर्ष ही है। इन नियमों में बिना संशोधन किए सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना नियम विरुद्ध है।

Monday, April 5, 2010

दिल्ली सरकार पड़ोसियों के झगड़े तीन महिने में सुलझाएगी

अगर पड़ोसी सताए या फिर कोई चेक बाउंस हो जाए तो कोर्ट या थाने के चक्कर काटने की बजाए सीधे दिल्ली सरकार के पास जाएं। दिल्ली सरकार पड़ोसियों के झगड़े सुलझाएगी। न केवल छोटे-मोटे झगड़े बल्कि संपत्ति विवाद, वित्तीय लेन-देन यहां तक कि दंपती विवाद भी उठाए जा सकेंगे।  सरकार का दावा है कि उनकी अदालत में उठाए गए प्रत्येक मामले को महज 3 दिन से 3 माह के बीच सुलझा लिया जाएगा। सरकार के समक्ष आपको अपने मामले की पैरवी करनी होगी। पैरवी पर आने वाला सारा खर्च मुकदमे का फैसला आने के बाद देना होगा। दरअसल सरकार दिल्ली में डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन सोसायटी नामक मंच का गठन करने जा रही है।


सोसायटी का काम दिल्लीवासियों का आपसी विवाद सुलझाना होगा। दिल्ली के मुख्य सचिव व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राकेश मेहता सोयायटी के चेयरमैन हैं। दिल्ली के सभी १क् जिलों में इस प्रकार की एक-एक सोसायटी गठित की जाएगी। जिसमें स्थानीय अधिकारी, अदालत से जुड़े विशेषज्ञ व स्थानीय नुमांइदे शामिल होंगे।

सभी  सोसायटियों के चेयरमैन मुख्यसचिव ही रहेंगे। मुख्यसचिव राकेश मेहता के मुताबिक दिल्ली की अदालतों पर बढ़ते दबाव व दीवानी विवादों के जल्द निपटारे के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है। मेहता ने बताया कि सोसायटी का पहला कार्यालय सबसे पहले पड़पड़गंज इलाके में शुरू होना है। इसके बाद जल्द ही दिल्ली के शेष क्षेत्रों में भी शुरुआत की जाएगी।

मंच की खासियत यह भी है कि यहां केवल दीवानी मामले ही उठाए जा सकते है। झगड़ा, चोरी, हत्या, बलात्कार, छेड़छाड़ या फिर किसी भी प्रकार का कोई अन्य फौजदारी मामला यहां नहीं सुना जाएगा। फौजदारी मामलों के लिए पीड़ित व्यक्ति को पहले की ही तरह पुलिस स्टेशन और फिर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।


छह लाख दीवानी मामले हैं लंबित


दिल्ली में दीवानी मामलों की भी भरमार है। एक सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट में इस समय 6 लाख दीवानी मामले लंबित हैं। इनमें कई तो ऐसे हैं, जिनमें कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी के कुत्ते से परेशान है तो किसी ने पड़ोसी के पेड़ पौधों की शिकायत की है। इस प्रकार के सभी मामले सरकार द्वारा गठित इस सोसायटी में उठाए जा सकेंगें। नव दंपतियों से जुड़े मामलों के लिए भी यहां विशेषज्ञ मौजूद होंगे। विशेषज्ञ विवाह के उपरांत ससुराल वालों या फिर पति-पत्नी के बीच उत्पन्न मतभेदों को दूर करने का प्रयास करेंगे।

अब ईमेल अकाउंट्स की भी वसीयत

ईमेल और उनमें सेव इन्फर्मेशन की अहमियत कितनी बढ़ती जा रही है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब लोग इनकी वसीयत भी करने लगे हैं। दिल्ली में एक शख्स ने अपने ईमेल अकाउंट्स और उनमें दर्ज डिजिटल सीक्रेट्स की वसीयत अपने बेटों के नाम कर दी है। राजधानी में शायद यह अपनी तरह का पहला मामला है।

उसकी डिजिटल विल के मुताबिक, जब यह वसीयत करने वाला इस दुनिया में नहीं रहेगा, तब उसके बेटे को एक पासवर्ड दिया जाएगा। जिसकी मदद से वह उसके इनबॉक्स में प्राइवेट ईमेल्स, पर्सनल फोटो, एल्बम्स, डॉक्युमेंट्स, विडियो क्लिप्स को एक्सेस कर सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट के ऐडवोकेट और साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने बताया कि यह वसीयत एक बिजनेसमैन ने की है, जिसका पेंट्स का कारोबार है। उसके कई ईमेल अकाउंट्स हैं। उसने हर अकाउंट के लिए नॉमिनी तय किए हैं।
 
दुग्गल के मुताबिक, एक अकाउंट में उसके आर्टिस्टिक वर्क हैं। दूसरे में ऑडियो रिकॉर्डिंग्स का कलेक्शन और तीसरे में ऑटो बायोग्रफी है। एक अन्य ईमेल अकाउंट में उसके कई राज हैं। वह नहीं चाहता कि ये चीजें उसकी मौत के साथ ही दफन हो जाएं, इसीलिए उसने अपने एक बेटे के नाम इसकी वसीयत कर दी है। उसे विश्वास है कि वह इनका दुरुपयोग नहीं करेगा। दुग्गल ने बताया कि डिजिटल विल का कंसेप्ट नया है।

विदेश में एक व्यक्ति ने अपने ईमेल अकाउंट्स की वसीयत अपनी बहन के नाम की है। उसकी इच्छा है कि बहन एक ब्लॉग बनाकर उसके अकाउंट्स में दर्ज जानकारियों को ऑनलाइन कर दे।

राजस्थान राज्य के पहले न्यायिक सेवा केंद्र का शुभारंभ

राजस्थान राज्य के पहले न्यायिक सेवा केंद्र का शुभारंभ शनिवार को यहां के जिला न्यायालय परिसर में हुआ। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश व राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष केएस राठौड़ ने इसका विधिवत उद्घाटन किया। न्यायिक सेवा केंद्र की स्थापना से अब अधीनस्थ अदालतों में लंबित दीवानी मुकदमों के स्टेटस की जानकारी शीघ्र मिल सकेगी। इसके लिए केंद्र में पांच कम्प्यूटर लगाए गए हैं जहां से वकील व पक्षकार निशुल्क जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

राज्य में इस तरह का यह पहला सूचना केंद्र है। इसमें मुकदमा संख्या, पक्षकारों या वकीलों के नाम से केस का स्टेटस सर्च किया जा सकेगा। उद्घाटन समारोह में न्यायाधीश राठौड़ ने कहा कि न्यायिक क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी का विकास हो रहा है। राज्य में सबसे पहले जोधपुर में ही अदालतों को कम्प्यूटरीकृत किया गया था।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए आपराधिक मामलों की सुनवाई करने से सरकारी खर्च में कटौती हुई। साथ ही पेशी पर कोर्ट में लाते समय मुलजिमों के भागने की घटनाओं में कमी आई है। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों व वकीलों को कम्प्यूटर विज्ञान व तकनीक सीखने की हिदायत देते हुए कहा कि इससे हाईटेक न्यायिक प्रणाली को विकसित करने में मदद मिलेगी। न्यायाधीश राठौड़ ने कहा कि आने वाले समय में दिल्ली की तर्ज पर यहां भी ई-कोर्ट की स्थापना होगी। इससे धीरे-धीरे संपूर्ण न्यायिक प्रणाली को पेपरलेस किया जा सकेगा।

जिला एवं सेशन न्यायाधीश के.एस. भटनागर ने सेवा केंद्र के बारे में जानकारी दी। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश डी.पी. शर्मा ने आभार व्यक्त किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट निहालचंद जैन ने कार्यक्रम का संचालन किया।

महंगाई के दौर में हर दिन कम से कम सौ रुपए पत्नी का हक-मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि महंगाई के दौर में पत्नी को गुजर बसर के लिए हर दिन कम से कम सौ रुपए चाहिए होते हैं। ऐसे में हर माह के भरण पोषण के लिए पति द्वारा पत्नी को तीन हजार रुपए अदा करना एकदम उचित है।

इस मत के साथ जस्टिस आरएस गर्ग और जस्टिस केएस चौहान की युगलपीठ ने याचिकाकर्ता पति को कहा है कि वह पत्नी द्वारा दिए गए आवेदन की तारीख से अब तक के भरण-पोषण की राशि 20 अप्रैल तक जमा कराए। साथ ही हर माह की दस तारीख तक वह पत्नी को गुजर-बसर की राशि कोर्ट के जरिए प्रदान करे।

प्रकरण के अनुसार कटनी के उमेश चंद्र का विवाह वर्ष 1991 में नरसिंहपुर में रहने वाली वंदना के साथ हुआ था। विवाह के बाद वंदना ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। वर्ष 2001 में हुए विवाद के बाद से उमेश के साथ उसका पुत्र और वंदना अपने मायके में अपनी पुत्री को लेकर रह रही है।

उमेश का कहना है कि उसके काफी प्रयासों के बाद भी वंदना उसके साथ नहीं रह रही, बल्कि मार्च 2009 में सीजेएम की कोर्ट में भरण पोषण के लिए अर्जी दायर की। इस अर्जी पर सीजेएम ने वंदना को हर माह पांच सौ रुपए देने कहा। बाद में जिला न्यायालय ने यह कहते हुए भरण-पोषण देने का आदेश निरस्त कर दिया कि वंदना बिना किसी कारण के अलग रह रही, इसलिए वह इस राशि को पाने की हकदार नहीं है। इसके बाद यह मामला हाईकोर्ट में दायर किया गया।


इस मामले पर हुई सुनवाई के दौरान वंदना की ओर से अधिवक्ता जेए शाह ने युगलपीठ को बताया कि उमेश को हर माह करीब साढ़े 11 हजार रुपए पगार के रूप में मिल रहे हैं, ऐसे में उनकी मुवक्किल को इतनी राशि मिलना ही चाहिए, जिससे वह अपना और अपनी बच्ची का गुजर-बसर कर सके।


उमेश की ओर से दलील दी गई कि उसे हर माह सिर्फ साढ़े 9 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है। इतनी कम राशि में उसे अपने पुत्र और वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना पड़ती है ऐसे में उमेश को मात्र दो हजार रुपए हर माह वंदना को देने के निर्देश दिए जाएं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद युगलपीठ ने महंगाई के दौर को देखते हुए वंदना को हर माह तीन हजार रुपए देने के आदेश उमेश को दिए। मामले का निराकरण करते हुए युगलपीठ ने इसके अलावा चार हजार रुपए की राशि वाद व्यय के रूप में वंदना को देने के आदेश भी उमेश को दिए।

हाईकोर्ट: पहली बार हुई नियमित केस की संडे को सुनवाई

आप केस की सुनवाई जल्दी चाहते हैं तो जज से संडे के दिन सुनवाई का आग्रह भी किया जा सकता है। जज और वकील दोनों तैयार हों तो फिर ये काम नामुमकिन नहीं। ऐसी ही एक मिसाल पेश करते हुए रविवार के दिन पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। हाईकोर्ट के इतिहास में यह दिन जस्टिस के कन्नन की तरफ से संडे को कोर्ट लगाकर सुनवाई करने के लिए जाना जाएगा। इससे पहले शनिवार को अवकाश के दिन हाईकोर्ट ने कई अहम केसों पर सुनवाई तो की है लेकिन रविवार को सुने जाने वाले केसों में यह पहला मामला रहेगा। 

Saturday, April 3, 2010

शादी से जुड़े मामले में एफआईआर के लिए सबूत जरूरी नहीं : उच्चतम न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि दूसरी शादी से जुड़े मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज कराने के दौरान असंतुष्ट पक्ष के लिए यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि विवाह की रस्म पूरी की गई है क्योंकि आरोप की सत्यता पर फैसला करना अदालत का काम है। न्यायालय ने कहा कि आपराधिक मामलों में अदालतें आरोप पत्र को अभियुक्त की सिर्फ इस दलील के आधार पर निरस्त नहीं कर सकतीं कि आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि आरोप पत्र को निरस्त करने के दौरान प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्रियों पर विचार किए जाने की आवश्यकता है।’’ न्यायमूर्ति डीके जैन और न्यायमूर्ति सी के प्रसाद की पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘‘सच्चाई या आरोपों के बारे में अन्य बातों पर इस चरण में गौर करना सही नहीं है क्योंकि यह हमेशा मुकदमे का मामला है। विवाह की आवश्यक रस्मों का आयोजन किया गया अथवा नहीं यह मुकदमे की सुनवाई का मामला है।’’

शीर्ष अदालत ने यह फैसला के नीलावाणी नाम की एक महिला की अपील को बरकरार रखने के दौरान दिया। उसने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसके तहत अदालत ने उसके पति एस के शिवकुमार के खिलाफ आईपीसी की धारा 406 (विश्वास हनन) और धारा 494 (दूसरी शादी) के तहत दायर आरोप पत्र को निरस्त कर दिया था। नीलावाणी के अनुसार उनकी शादी के बरकरार रहने के दौरान ही कुमार ने भारती नाम की दूसरी महिला से शादी की और उसके बच्चे के पिता बने।

उच्च न्यायालयों में 265 न्यायाधीशों की कमी

देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 265 न्यायाधीशों की कमी है और इसके चलते लंबित मुकदमों की संख्या 38 लाख से ज्यादा हो गई है। विधि मंत्रालय के पास मौजूद ताजा आंकडों के अनुसार देश के 21 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 895 है। महज 630 न्यायाधीश विभिन्न मामलों की सुनवाई कर रहे है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कामकाज काफी बुरी तरह प्रभावित है। यहां न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 160 है, जबकि 83 न्यायाधीशों की है। इस उच्च न्यायालय में स्थाई न्यायाधीशों के 30 ओर अतिरिक्त न्यायाधीशों के 53 पद रिक्त है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के 21-21 पद रिक्त है। कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 58 और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में इन पदों की स्वीकृत संख्या 68 है। गुजरात उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत पद 42 है जहां 24 न्यायाधीश ही है। शेष 18 पद रिक्त है। दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत पद 48 है। यहां तीन न्यायाधीशों की कमी है। सिçक्कम उच्च न्यायालय में स्वीकृति पदों की संख्या तीन है और एक पद रिक्त है। उच्तम न्यायालय की वेबसाइट के अनुसार, विभिन्न उच्च न्यायालयों में 38,74, 090 दीवानी और आपराधिक मुकदमें लंबित हैं।

Friday, April 2, 2010

एसएमएस से जान सकेंगे मुकदमे की स्थिति

राजस्थान उच्च न्यायालय भवन में किस कार्य दिवस पर कौन से कोर्ट रूम में कौन सा मुकदमा चल रहा है, इस आशय की जानकारी अब मोबाइल पर एसएमएस से मालूम की जा सकेगी। इसके लिए सॉफ्टवेयर तैयार कर लिया गया है। अगले सप्ताह तक इस तरह की जानकारी ऑन लाइन मिलने लगेगी।

राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मिलाप चंद भूत ने गुरुवार को हाईकोर्ट परिसर स्थित एमएम पारख लाइब्रेरी में संवाददाताओं को बताया कि अब हाईकोर्ट में सभी कोर्ट रूम के बाहर इलेक्ट्रोनिक डिस्प्ले लग गए हैं जिन्हें देख कर यह पता चल सकता है कि उस कोर्ट रूम में कौन सा मुकदमा चल रहा है।

अन्य कोर्ट रूम में जारी मुकदमों की जानकारी भी डिस्प्ले के माध्यम से पता चल सकती है। इससे वकीलों को कर्मचारियों से पूछताछ नहीं करनी पड़ेगी। उनका समय भी बचेगा। जिला न्यायालय में केन्द्रीय सूचना कक्ष तैयार किया गया है जो इस सप्ताह के अंत तक कार्य शुरू कर देगा।

130 लड़कियों के कातिल को सजा-ए-मौत

अमेरिका के रहने वाले रोडने एलकाला ने सिर्फ मजे के लिए 130 लड़कियों को मौत के घाट उतार दिया। हत्या करने से पहले वो इन लड़कियों के साथ बलात्कार भी करता। उसकी शिकार लड़कियों में से कई तो स्कूली लड़कियां भी थीं। 1979 से जेल में बंद इस शख्स को अब जाकर मौत की सजा सुनाई गई। लेकिन जब इसे सजा सुनाई जा रही थी, उस वक्त भी ये कातिल हंस रहा था। उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी।


66 साल का फोटोग्राफर रोडने एलकाला अमेरिका का सबसे खतरनाक सीरियल किलर। ये 1979 से जेल में बंद है। अब 31 सालों बाद अदालत ने इसे सजा-ए-मौत सुनाई है। इसने ऐसे घिनौने अपराधों को अंजाम दिया है जिसके लिए मौत की सजा भी कम ही लगेगी। 4 औरतों और 12 साल की एक लड़की की हत्या के आरोप में अदालत ने इसे मौत की सजा सुनाई।


रोडने को जहरीला इंजेक्शन लगाकर मौत के घाट उतार दिया जाएगा। पुलिस को शक है कि रोडने अब तक करीब 130 लड़कियों और औरतों की हत्या कर चुका है। पुलिस को रोडने के घर से इन लड़कियों की तस्वीरें मिलीं। ये सभी कई साल से लापता हैं।

जांचकर्ताओं के मुताबिक रोडने एक साइको किलर था। जिस लड़की को उसे अपना शिकार बनाना होता था, वो उसे फोटो खिंचवाने और मॉडल बनाने का लालच देता था। बाद में जब वो लड़की उसके पास आती, तो रोडने उसका गला दबाता। जब लड़की बेहोश होने लगती, तो वो उसे छोड़ देता। जब लड़की दोबारा पूरी तरह से होश में आ जाती, तो ये हत्यारा फिर से उसका गला दबाता और इसी तरह से तड़पा तड़पा कर हत्या कर देता।

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक रोडने को इस तरह से लड़कियों को तड़पते देखने में बेहद मजा आता था। मनोवैज्ञानिकों ने इस कातिल को जीनियस माना और इसका IQ लेवल 160 माना गया। रोडने अमेरिका के मशहूर टीवी रियलिटी शो THE BLIND DATE का विनर भी रह चुका है। लेकिन इस गेम शो में जिस लड़की ने रोडने को डेट पर जाने के लिए चुना, उसने बाद में अपनी ये डेट कैंसिल कर दी। उसके मुताबिक जब उसने रोडने से बात की तो वो बेहद डरावना और अजीब सा लगा।

रोडने के लॉकर से कई लड़कियों की न्यूड तस्वीरें भी बरामद हुईं। उसके शिकारों में स्कूली लड़कियों से लेकर 40 साल तक की महिलाएं शामिल हैं। ये सभी फोटोग्राफ 1977 से 1979 के बीच खींचे गए। रोडने ने कई महिलाओं की तस्वीरें उनकी हत्या करने के बाद खींची। पुलिस के मुताबिक उसने न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, लास एंजिल्स के साथ-साथ अमेरिका से बाहर की भी कई औरतों को अपना निशाना बनाया।

ट्रायल के दौरान रोडने हंसता और खिलखिलाता रहा। साथ ही अपने वकील से बातें भी करता रहा। अपने इन अपराधों के लिए 1979 से जेल में बंद कातिल रोडने को 30 सालों बाद अपने किए की सजा मिली।

सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान सरकार को झटका

सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को राजस्थान की पूववर्ती सरकार के कार्यकाल के मामलों की जांच के लिए गठित माथुर आयोग के पास विचाराधीन मामले लोकायुक्त को सौंपने के राजस्थान हाईकोर्ट के चार जनवरी के फैसले पर यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। माथुर आयोग व कांगे्रस से जवाब-तलब भी किया है। मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन व न्यायाधीश दीपक वर्मा की खण्डपीठ ने इस मामले की सुनवाई की।


राज्य सरकार की ओर से सालीसिटर जनरल गोपाल सुब्रहमण्यम व अभिषेक गुप्ता ने हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूर्व न्यायाधीश एन.एन. माथुर की अध्यक्षता में पूर्ववती सरकार पर लगे आरोपों की तथ्यात्मक जांच करवाने के कमेटी का गठन किया गया था, राज्य सरकार को ऎसा करने का पूरा अघिकार है। संविधान में तीनों अंगों के अलग-अलग दायित्व बताए हैं, इसलिए हाईकोर्ट को इस मामले में दखल का अघिकार ही नहीं था। सरकारी पक्ष ने हाई कोर्ट में याचिका को राजनीति से प्रेरित बताया। साथ ही, कहा कि हाईकोर्ट ने वह निर्णय दिया है, जिसकी जनहित याचिका में मांग ही नहीं की गई थी।

हाईकोर्ट ने सरकार को आयोग बनाने के लिए सक्षम माना और उसके गठन में कोई आपत्ति भी नहीं मानी, इसके बावजूद आयोग से काम छीनकर लोकायुक्त को देने का आदेश कर दिया, जबकि लोकायुक्त यह जांच करने में सक्षम ही नहीं है।

Thursday, April 1, 2010

आय से ज्यादा संपत्ति मामला: सुप्रीम कोर्ट से लालू को ब़डी राहत

राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को आय से अधिक संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट से गुरूवार को ब़डी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार को लालू के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करने का अधिकार नहीं है। देश के सर्वोच्चा कोर्ट के इस फैसले लालू के खिलाफ हाईकोर्ट में चल रहा यह मुकदमा अब खत्म हो जाएगा, वहीं यह राज्य के लिए एक ब़डा झटका होगा। चारा घोटाले के नाम से जाने जाने वाले इस मामले में निचली अदालत ने लालू यादव को बरी कर दिया था, लेकिन बिहार सरकार ने उस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। लालू ने राज्य सरकार की इस कार्रवाई को खत्म कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में लालू प्रसाद ने कहा था कि इस मामले की जांच सीबीआई कर रही थी, लिहाजा सीबीआई को ही यह अधिकार है कि वह निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे, मगर इस मामले में सीबीआई के बजाए बिहार सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। दूसरी ओर सीबीआई का कहना था कि लालू प्रसाद के खिलाफ कोई केस नहीं बनता इसलिए निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती नहीं देनी चाहिए। मगर राज्य सरकार सीबीआई की इस राय से सहमत नहीं हुई और उसने निचली अदालत के फैसले को यह कहते हुए चुनौती दी कि क्योंकि जिन पैसों की हेरा-फेरी की गई है, वह बिहार सरकार के हैं इसलिए निचली कोर्ट के फैसले कोे चुनौती देना उसका अधिकार है। लालू यादव पर आय से अधिक संपत्ति का यह मामला चारा घोटाला के नाम से चर्चित हुआ था, जिसमें पशुपालन विभाग कें करो़डों रूपए की हेरा-फेरी हुई थी।

आधा किलो शक्कर के लिए हत्या

शक्कर के बढ़ते दामों के बीच एक पिता ने अपनी बेटी को ही मौत के घाट उतार दिया। बेटी की गलती बस इतनी थी कि उससे आधा किलो शक्कर गिर गई थी। घटना जिले के कसरावद थाने की है। थाना प्रभारी एसएस उदावत के मुताबिक, 1 मार्च को अमलाथा के एक खेत से जली अवस्था में शव बरामद किया गया था।

जांच शुरू की गई, तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। दरअसल, कसरावद के सुभाष तड़वी ने 26 फरवरी को अपनी 9 वर्षीय बेटी रेशमा को 60 रूपए देकर शक्कर लेने के लिए भेजा था। अगली शाम को जब सुभाष ने बेटी से चाय बनाने के लिए कहा, तो उसने आधा किलो शक्कर रास्ते में गिरने की बात कही। इस बात से खफा सुभाष ने आवेश में आकर रेशमा को बुरी तरह पीटा, जिससे उसकी मौत हो गई।

लाश फूंककर मिटा दिया साक्ष्य
आरोपी पिता सुभाष ने बेटी को मौत के घाट उतारने के बाद उसकी लाश को भी ठिकाने लगा दिया। पुलिस के मुताबिक सुभाष ने रेशमा की लाश को शिवपालसिंह निवासी अमलाथा की खेत की मेड़ पर कपास की काठी रखकर आग लगा दी। अब आरोपी पिता पुलिस की गिरफ्त में है।

ऎसे हुई तफ्तीश
जांच अघिकारी उदावत ने बताया कि सुभाष अपने 6 वर्षीय बेटे लल्ला, बेटी रेशमा के साथ रहता था। जब कुछ दिन तक उसके साथ बेटी नजर नहीं आई, तो ग्रामीणों को संदेह हुआ और पुलिस को सूचना मिली। पुलिस ने सुभाष से पूछताछ की तो उसने जुर्म कबूल कर लिया।

चेहरे पर शिकन तक नहीं
पूछताछ में सुभाष के चेहरे पर शिकन तक नहीं देखी गई। महज आधा किलो शक्कर के लिए बेटी की जान लेने का उसे कतई मलाल नहीं था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर मंडलेश्वर न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे दो दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया।