पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Saturday, January 9, 2010

राज ठाकरे के खिलाफ भड़काऊ भाषण केस : अब दिल्ली में सुनवाई


उत्तर भारतीयों के बारे में भ़डकाऊ भाषणों को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे के खिलाफ बिहार व झारखंड में दर्ज सात मामलों को सुप्रीम कोर्ट ने आज दिल्ली की एक अदालत में स्थानांतरित करने का आदेश दिया। राज के खिलाफ ये मामले जनवरी 2000 के बाद दर्ज किए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट में आज इस मामले की सुनवाई के दौरान सभी पक्षों के वकीलों के सहमत हो जाने पर मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन व बीएस चौहान की बेंच ने राज के खिलाफ चल रहे सभी मामलों को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में स्थानांतरित करने के आदेश दिए। राज के खिलाफ ये मामले विभिन्न लोगों ने दर्ज कराए थे। इन सात मामलों में पांच झारखंड तथा दो बिहार मे दर्ज हुए थे। राज ने इन मामलों की सुनवाई एक जगह करने का आग्रह किया था।

राठौड़ की जमानत याचिका खारिज, कभी भी गिरफ्तारी


पंचकूला की एक स्थानीय अदालत ने रुचिका छेड़छाड़ और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दो नई प्राथमिकी दर्ज होने पर हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौड़ की अग्रिम जमानत याचिका नामंजूर कर दी है। इसके साथ ही राठौड़ के जल्द ही गिरफ्तारी की संभावना बढ़ गई है। इससे पहले अदालत ने शुक्रवार सुबहर जमानत याचिका पर सुनवाई दोपहर बाद तक के लिए टाल दी थी।

अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश संजीव जिन्दल ने गुरुवार को 67 वर्षीय राठौड़ की वकील पत्नी आभा तथा रुचिका गिरहोत्रा के पारिवारिक वकील पंकज भारद्वाज, आरोपी एएसआई सेवा सिंह के वकील अजय जैन तथा सरकारी वकील के तर्क सुनने के बाद अग्रिम जमानत याचिका पर फैसला शुक्रवार दोपहर बाद तक के लिए सुरक्षित रख लिया था।

दो नई प्राथमिकी दर्ज होने पर राठौड़ के अतिरिक्त एएसआई सेवा सिंह ने भी अग्रिम जमानत का आग्रह किया है, जिसने रुचिका के भाई आशु से संबंधित ऑटो चोरी के मामले की जांच की थी। ये दोनों नई प्राथमिकी रुचिका के पिता सुभाष चंद्र गिरहोत्रा तथा आशु ने हत्या की कोशिश, अवैध हिरासत में रखने तथा दस्तावेज में हेरफेर करने सहित विभिन्न शिकायतों में दर्ज कराई हैं।

आभा ने 29 दिसंबर को दर्ज दो मामलों में यह कहकर जमानत मांगी है कि पांच जनवरी को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत दर्ज तीसरी प्राथमिकी का निपटारा उच्चतम न्यायालय में पहले ही हो चुका है।

आरोपों के अनुसार हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौड़ ने 1990 में रुचिका के साथ छेड़छाड़ की थी और फिर उसके घरवालों को परेशान किया, जिससे तंग आकर रुचिका ने आत्महत्या कर ली।

रुचिका के पिता और भाई ने गत 29 दिसंबर को पोस्टमार्टम की प्रक्रिया और आशु को झूठे मामलों में फंसाने के आरोप में राठौड़ और अन्य के खिलाफ दो शिकायतें दर्ज कराईं। शिकायत में कहा गया कि चंडीगढ़ के सेक्टर-6 पुलिस थाना ने मौत के बाद की कार्यवाही पीजीआई चंडीगढ़ में कराई, जो हरियाणा पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, क्योंकि चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश है।

उल्लेखनीय है कि रुचिका ने 28 दिसंबर 1993 को जब आत्महत्या की कोशिश की तो उसे पीजीआई चंडीगढ़ ले जाया गया था, जहां अगले दिन उसकी मौत हो गई।

न्यायाधीशों के पूल की जरूरत-सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट महसूस करता है कि देश की अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों की कमी पूरी करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे और न्यायपालिका में सम्भावित रिक्त स्थानों को ध्यान में रखते हुए इसके लिए पहले से ही योग्य उम्मीदवारों का एक पूल तैयार करना होगा।
प्रधान न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की दो सदस्यीय खंडपीठ ने गुरूवार को न्यायिक व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए जनहित मंच नामक गैर सरकारी संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह विचार व्यक्त किए। इस याचिका पर अब 12 जनवरी को विचार किया जाएगा।
याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने टिप्पणी की कि अदालतों में लंबित मुकदमों के मद्देनजर देश को कम से कम 35 हजार न्यायाधीशों की आवश्यकता होगी और इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को समेकित प्रयास करने होंगे। केंद्र सरकार इस समस्या से निपटने के लिए 50 फीसदी आर्थिक बोझ वहन करने के लिए तैयार है लेकिन राज्य इससे अधिक मदद चाहते हैं।
जनहित मंच के वकील प्रशांत भूषण ने इस समस्या के समाधान के प्रति सरकार के रवैए की उदासीनता का जिक्र करते हुए कहा कि न्यायपालिका में रिक्त स्थानों पर शीघ्र नियुक्ति की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि देश में अदालतों और न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के बारे में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था और विधि आयोग की सिफारिशों के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। इस पर न्यायाधीशों ने कहा कि इस समय अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों के करीब 16 हजार पद हैं जिनमें से दो हजार से अधिक स्थान रिक्त हैं।
न्यायाधीशों की राय थी कि न्यायपालिका में रिक्त स्थानों का सिलसिला रोकने लिए सरकार को न्यायाधीशों के पद रिक्त होने से पहले ही पर्याप्त संख्या में नई नियुक्तियां करनी होंगी ताकि उन्हें समय रहते प्रशिक्षित करके नई जिम्मेदारी के लिए तैयार किया जा सके।

Thursday, January 7, 2010

इस्लाम की आलोचना हो सकती है, लेकिन दुर्भावनापूर्ण नहीं: कोर्ट


इस्लाम या किसी अन्य धर्म की आलोचना की जा सकती हैं,पर दुर्भावनापूर्ण आलोचना,जिसका मकसद सांप्रदायिक नफरत फैलाना और पूरे समुदाय को शरारतपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करता हो,की इजाजत नहीं है। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने बुधवार को यह बात कही।कुरानिक छंदों की व्याख्या करने से मना करते हुए कोर्ट ने हालांकि सलाह दी कि छंदे सहसंबद्ध होनी चाहिए और व्याख्या करते वक़्त इसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना चाहिए।
उच्च न्यायलय की एक पूर्ण पीठ ने यह फैसला वकील आर वी भसीन द्वारा लिखी पुस्तक इस्लाम-"ए कांसेप्ट ऑफ़ पोलिटिकल वर्ल्ड इन्वैसन बाय मुस्लिम्स"पर लगे प्रतिबन्ध पर सुनवायी के दौरान कहा साथ ही न्यायलय ने इस पुस्तक पर प्रतिबन्ध बरकरार रखा.

इस पुस्तक पर महाराष्ट्र सरकार ने साल 2007 में प्रतिबन्ध इस आधार पर लगा दिया था की इसमें इस्लाम के बारे अपमानजनक टिप्पणियां की गयी है और मुसलमानों की भावनाओं का अपमान करती है। भसीन ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन मानते हुए कोर्ट में चुनौती दी थी।

आईपीसी के प्रावधान भूलने के लिए हाईकोर्ट ने की निचली अदालत की खिंचाई


बांबे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आईपीसी के प्रावधानों का ध्यान नहीं रखने के लिए निचली अदालत के जज की खिंचाई की है। इस जज ने एक व्यक्ति को हत्या का दोषी ठहराया था, लेकिन उसे हल्की सजा दी थी। हाईकोर्ट ने कहा, ‘लगता है सुविज्ञ जज आईपीसी के सेक्शन 302 के प्रावधान भूल गए या उनकी उपेक्षा कर गए।’ कोर्ट ने कहा कि मुजरिम मोहम्मद अमानत अंसारी ने हत्या नहीं की बल्कि वह गैर इरादतन हत्या का दोषी है।  अंसारी पर एक दिसंबर 1998 को क्रिकेट खेल रहे बच्चों की गेंद को लेकर हुए झगड़े में उदय बागवे नामक बच्चे की हत्या का आरोप था। मुंबई स्थित सेशन कोर्ट ने उसे हत्या का दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष की कड़ी कैद की सजा सुनाई। इस फैसले को जब हाईकोर्ट में चुनौती दी गई तो जस्टिस जेएच भाटिया ने कहा, ‘परिस्थितियों को देखते हुए यह मानना असंभव है कि आरोपी का इरादा हत्या का था।’ हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आईपीसी के सेक्शन 302 के तहत केवल उम्रकैद या मौत की सजा दी जा सकती है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में अंसारी को गैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुए उसे 10 वर्ष जेल की सजा बरकरार रखी। कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि वह इतनी अवधि जेल में काट चुका है अत: उसे छोड़ दिया जाए।

राजस्थान न्यायिक सेवा भर्ती में अब महिलाओं को 30 फीसदी आरक्षण।


राजस्थान न्यायिक सेवा भर्ती में भी अब महिलाओं को अन्य राजकीय सेवाओं की तरह 30 फीसदी आरक्षण और आयु सीमा में छूट का लाभ मिलेगा। करीब सात साल से लम्बित नए न्यायिक सेवा नियमों को केबिनेट ने बुधवार को मंजूरी दे दी। इस निर्णय से अब राजस्थान न्यायिक सेवा व उच्चतर न्यायिक सेवा के एक ही नियम होंगे।

सूत्रों ने बताया कि नए न्यायिक सेवा नियमों में अनुसूचित जाति व जनजाति की खाली सीट तीन साल ही सुरक्षित रह सकेगी और आरक्षण 49 फीसदी से अधिक नहीं होगा। उच्च न्यायालय की वृहद पीठ ने सितम्बर 09 में नए आरजेएस नियमों के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग अभ्यर्थियों व महिलाओं को अधिकतम आयु सीमा में पांच साल की छूट देने व विधवा, परित्यक्ताओं के लिए अधिकतम आयु सीमा 45 साल करने की हरी झण्डी दे दी थी, जिसे भी केबिनेट ने मंजूरी दे दी।

चालीस साल तक के राज्य सरकार, पंचायत समिति, जिला परिषद या सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारी आरजेएस के लिए आवेदन कर सकेंगे। जितने साल आरजेएस की भर्ती नहीं होगी, अभ्यर्थियों को अधिकतम आयु सीमा में उतने साल की छूट मिलेगी। आयुसीमा गणना के बारे में भी बदलाव किया गया है। नए आरजेएस नियमों में अधिकारियों की भर्ती व पदोन्नति का कैलेण्डर तय कर दिया है।

पदोन्नति की व्यवस्था भी तय : आरएचजेएस के आधे पद आरजेएस में से पदोन्नति के आधार पर भरे जाएंगे, जिसके लिए अधिकारियों के फैसलों, उनकी एसीआर व डीजे की रिपोर्ट को देखा जाएगा। एक चौथाई पदों पर वकीलों की सीधी भर्ती की जाएगी तथा शेष एक चौथाई पदों के लिए पांच साल अनुभव वाले एसीजेएम की परीक्षा ली जाएगी। सूत्रों से जानकारी यह भी मिली है कि डीजे व एडीजे का कैडर भी अब 150 के बजाय 242 या 243 का होगा।

तलवार दंपति पर नारको की तलवार


सीबीआई की विशेष अदालत ने मंगलवार को आरुषि के माता-पिता का नारको टेस्ट कराने की अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि नारको से पहले तलवार दंपती का चिकित्सीय परीक्षण कराया जाए। डाक्टरों की सलाह के बाद ही टेस्ट कराया जाए।

नोएडा के बहुचर्चित आरुषि-हेमराज हत्याकांड में सीबीआई ने अदालत में डा. राजेश तलवार और उनकी पत्नी डा. नूपुर का नारको टेस्ट के लिए अर्जी दाखिल की थी। इसको लेकर सीबीआई की विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह की अदालत में सोमवार को सुनवाई हुई थी। सीबीआई ने कहा था कि मामले की पुन: जांच हो रही है और नारको किए जाने से निश्चित रूप से नए तथ्य आने की संभावना है। सूत्रों के अनुसार डा. तलवार दंपती की ओर से भी एक अर्जी अदालत में दाखिल की गई थी। जिसमें कहा गया था कि वे नारको के लिए तैयार हैं, लेकिन वे अस्थमा के मरीज हैं। इसलिए नारको से पूर्व उनका मेडिकल कराया जाए। कोर्ट ने मंगलवार तक के लिए फैसला सुरक्षित रख लिया था। मंगलवार को अदालत ने तलवार दंपती का नारको टेस्ट कराने की अनुमति दे दी।

ज्ञात हो कि नोएडा निवासी डा. राजेश तलवार की पुत्री आरुषि की उनके घर पर 15 मई, 2008 की रात्रि में हत्या कर दी गई थी। 17 मई को डा. तलवार के घरेलू नौकर हेमराज का शव भी घर की छत पर मिला था। एसटीएफ व नोएडा पुलिस ने आरुषि के पिता डा. राजेश तलवार को गिरफ्तार किया था। 29 मई को इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। सीबीआई ने इस मामले में दूसरे नौकर कृष्णा, राजकुमार व विजय मंडल को गिरफ्तार कर लिया था। 12 जुलाई 2008 को सीबीआई द्वारा 90 दिन तक डा. राजेश तलवार के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं किए जाने पर तकनीकी आधार पर अदालत ने उनको रिहा कर दिया था। बाद में इस प्रकरण की जांच पुन: कराने का निर्णय लिया गया। इसके लिए नई टीम का गठन किया गया।

कोटा के वकीलों की हड़ताल समाप्त


कोटा में राजस्थान हाईकोर्ट की बैंच की स्थापना को लेकर करीब चार माह से चल रही वकीलों की हड़ताल को आज समाप्त करने का निर्णय लिया गया। कोटा अभिभाषक परिषद की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी के कल शपथ ग्रहण के बाद आज बुलाई गई साधारण सभा की बैठक में बहुमत से करीब चार माह पुरानी हड़ताल समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके स्थान पर प्रत्येक शनिवार को कोटा के अभिभाषक विरोध प्रदर्शन करेंगे।

कोटा अभिभाषक परिषद की साधारण सभा की बैठक में लिए गए इस निर्णय के खिलाफ कुछ वकील उत्तेजित हो गए जिसके कारण कुछ समय के लिए बैठक में हंगामे की स्थिति बन गई लेकिन अन्त में बहुमत से लिए गए साधारण सभा के फैसले को ही मान्य ठहराया गया।

Tuesday, January 5, 2010

रुचिका केस में सिर्फ राठौड़ दोषी नहीं, जस्टिस डिलिवरी सिस्टम भी जिम्मेदार: हाई कोर्ट


पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने रुचिका गिरहोत्रा से छेड़छाड़ मामले में खुद संज्ञान लेते हुए न्याय व्यवस्था पर तीखी टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि रुचिका केस 'न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना' (जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड) का सबसे बड़ा उदाहरण है। कोर्ट का कहना था कि बड़े पुलिस अफसरों, नौकरशाहों और नेताओं के खिलाफ केसों को फास्ट ट्रैक पर लाने का वक्त आ गया है।

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि रुचिका मामले में देरी के लिए इससे जुड़े सभी पक्षों के अलावा जस्टिस डिलिवरी सिस्टम को भी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार, हरियाणा सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन को नोटिस जारी कर राजनेताओं, नौकरशाहों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ पेंडिंग केस की जानकारी कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया है। इसके लिए इन सरकारों को 12 जनवरी तक का समय दिया गया है। अपने आदेश में रविवार को जस्टिस रंजीत सिंह ने दोनों राज्यों और चंडीगढ़ के संबंधित गृह सचिवों से एसपी और इस लेवल से ऊपर के पुलिस अफसरों, आईएएस और पीसीएस अफसरों के खिलाफ पेंडिंग केस के बारे में पूछा है, क्योंकि अदालत न्याय देने में देरी का आरोप अपने ऊपर नहीं लेना चाहती है।

जस्टिस सिंह ने कहा कि मामले में इतनी देर से फैसला आने से बड़ी संख्या में नाराज लोग उन सभी को सजा देने की मांग कर रहे हैं, जिन्होंने इस मामले में कानून का उल्लंघन किया है। उन्होंने यहां तक कहा कि अदालतें खुद को इस आरोप से मुक्त नहीं मान सकतीं कि उनकी वजह से ऊंचे रसूख वाले लोगों ने सिस्टम का फायदा उठाते हुए जांच या ट्रायल में देरी करवाई। उन्होंने कहा कि हमेशा से कुछ ऐसे पुलिस अफसरों, कुछ राजनेताओं और ऊंचे पदों पर बैठे लोगों का नाम सुनने में आता है, जिन्होंने अपने खिलाफ मामले में जांच नहीं होने दी या मुकदमे को नतीजे तक नहीं पहुंचने दिया।

हाईकोर्ट ने माथुर आयोग को अवैध ठहराया


राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में पिछली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के समय कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए गठित माथुर आयोग को  अवैध ठहरा दिया तथा भ्रष्टाचार की समस्त जांच लोकायुक्त को भेजने के निर्देश दिए। न्यायाधीश आर. सी. गांधी एवं महेश भगवती की खण्डपीठ ने काशी पुरोहित तथा अन्य की जनहित याचिका पर यह फैसला दिया।

अधिवक्ता अभिनव शर्मा ने आयोग के गठन को संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ बताते हुए इस आयोग को रद्द करने की प्रार्थना की थी। अधिवक्ता का तर्क था कि राज्य सरकार ने राजनीतिक विद्वेषता के चलते इस आयोग का गठन किया है जबकि सरकार के पास पिछली भाजपा सरकार द्वारा भ्रष्टाचार करने के कोई ठोस एवं पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

इस पर न्यायालय ने यह कहते हुए जांच लोकायुक्त को सौंप दी कि राजनीतिक विद्वेष को चलने दिया और आयोग बनते रहे तो राज्य में अस्थिरता आ जाएगी। इसका प्रशासनिक स्तर पर भी दुष्प्रभाव पडेगा। ऎसे में इस आयोग को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है, वह भी तब जबकि सरकार के पास प्रारंभिक तौर पर भ्रष्टाचार के कोई सबूत नहीं है। सरकार कोई जांच कराना चाहती है तो किसी निष्पक्ष एजेंसी से कराए जो दोषी अधिकारियों को सजा दिला सके।

यौन अपराधों की सुनवाई अब दो महीने में

रूचिका छेड़छाड़ मामला सामने आने के बाद अपराध प्रक्रिया संहिता में नए संशोधनों के तहत अब बलात्कार समेत तमाम यौन अपराधों की सुनवाई यथासम्भव दो महीने के भीतर पूरी की जाएगी और सभी पक्षों को अदालत के आदेश के खिलाफ अपील का अघिकार होगा।


31 दिसम्बर की मध्यरात्रि से अपराध प्रक्रिया संहिता में प्रभावी संशोधन, शिकायतकर्ताओं के लिए बड़ी राहत साबित होंगे। संशोधनों पर गृह मंत्रालय से जारी बयान में कहा गया है कि पीडितों को अभियोजन में मदद के लिए अब वकील करने की अनुमति होगी। इसमें यह भी कहा गया है कि बलात्कार पीडित का बयान उसके घर में दर्ज किया जाएगा और कोई महिला पुलिस अघिकारी ही पीडित के माता-पिता या अभिभावक या सामाजिक कार्यकर्ता की मौजूदगी में बयान दर्ज करेगी।

संशोधनों के तहत बयानों को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॅानिक साधनों के जरिए भी दर्ज किया जाएगा। संशोधन में राज्य सरकारों से अपराध से पीडित व्यक्ति या उसके आश्रितों को मुआवजा देने के लिए योजना बनाने के लिए भी कहा गया है।
अपराध प्रक्रिया संहिता में वर्ष 2006 में संशोधन किया गया था लेकिन 31 दिसम्बर वर्ष 2009 से पहले संशोधन अघिनियम प्रभावी नहीं हुआ था। पुलिस अघिकारी द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अघिकार और स्थगन मंजूर करने या इससे इनकार करने के अदालत के अघिकार सम्बन्धी तीन प्रावधानों धारा 5, 6 और 21-बी को फिलहाल लागू नहीं किया गया है।

इन प्रावधानों पर कुछ आपत्तियां आईं थीं, इसलिए इन प्रावधानों को विघि आयोग के पास भेज दिया गया। विघि आयोग ने इस पर विचार-विमर्श करके अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट के आधार पर कैबिनेट ने एक संशोधन विधेयक को मंजूरी दी है। संसद के पिछले सत्र में इसे पेश नहीं किया जा सका था। उम्मीद है कि अब बजट सत्र में इसे पेश किया जाएगा।

राजस्थान में 45 ग्राम न्यायालय गठित


राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर पीसांगन (अजमेर), तिजारा एवं नैनवां (अलवर), बाड़मेर, अटरू (बारां), बासंवाड़ा एवं गढ़ी (बांसवाड़ा), रूपावास एवं कामां (भरतपुर), माण्डल एवं सुवाना (भीलवाड़ा), बीकानेर एवं कोलायत (बीकानेर), तालेड़ा (बूंदी), चित्तौड़गढ़ एवं भदेसर (चित्तौड़गढ़), राजगढ़ (चूरू), दौसा, बसेड़ी (धौलपुर), आसपुर एवं बिच्छीवाड़ा (डूंगरपुर), श्रीगंगानगर एवं अनूपगढ़ (श्रीगंगानगर), हनुमानगढ़, सांभर एवं बस्सी (जयपुर), सांचौर (जालौर), सांकड़ा (जैसलमेर), झालरापाटन (झालावाड़), नवलगढ़ (झुंझुनू), मंडोर एवं ओसियां (जोधपुर), हिण्डौन (करौली), खैराबाद एवं इटावा (कोटा), जायल (मेड़ता), रायपुर (पाली), प्रतापगढ़, रेलमगरा (राजसमन्द), गंगापुर सिटी (सवाई माधोपुर), पिपरली (सीकर), पिण्डवाड़ा (सिरोही), देवली (टोंक), उदयपुर एवं खैरवाड़ा (उदयपुर) में कुल 45 ग्राम न्यायालय गठित किए गए हैं। इनकी बैठक पंचायत समिति मुख्यालय में होगी।

जिला परिषद के किसी भी पंचायत समिति मुख्यालय को उच्च न्यायालय किसी ग्राम न्यायालय के लिए अतिरिक्त बैठक का स्थान अधिसूचित कर सकेगा और तब उस ग्राम न्यायालय को उस पंचायत समिति का भी क्षेत्रीय अधिकार होगा।

इन न्यायालयों के प्रभाव में आने पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजस्थान उच्च न्यायालय की अनुमति से ग्राम न्यायालय की क्षेत्राधिकारिता के वर्तमान में उनके अधीन अन्य न्यायालयों में लंबित सिविल एवं फौजदारी प्रकरणों का अंतरण ग्राम न्यायालयों में कर सकेंगे।

इन ग्राम न्यायालयों को दाण्डिक एवं दीवानी क्षेत्राधिकार दिया गया है, इन्हीं के समान प्रकरण में या उस हेतुक से उद्भुत होने वाले दाण्डिक या दीवानी प्रकरणों की सुनवाई के अधिकार से संबंधित सिविल न्यायालय (कनिष्ठ खण्ड) को वर्जित किया गया है।

इन ग्राम न्यायालयों में न्यायाधिकारी की नियुक्ति राजस्थान उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्य सरकार करेगी। न्यायाधिकारी की नियुक्ति एवं कार्यभार संभालने की तिथि से न्यायालय प्रभाव में आ जाएंगे।

अल्लाह शब्द पर सिर्फ मुस्लिमों का हक नहीं


कुआलालंपुर, मलेशिया की अदालत ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि ईसाई प्रकाशनों को भी ईश्वर के लिए 'अल्लाह' शब्द का इस्तेमाल करने का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने सरकार द्वारा देश के अल्पसंख्यकों के इस शब्द के प्रयोग पर लगाए प्रतिबंध को भी निरस्त कर दिया।

हाई कोर्ट ने यह आदेश गुरुवार को 'कैथोलिक वीकली हेराल्ड' अखबार की ओर से दायर मुकदमे की सुनवाई के बाद दिया। हेराल्ड को गृहमंत्रालय ने अल्लाह शब्द इस्तेमाल नहीं करने की शर्त पर अखबार प्रकाशित करने की अनुमति दी थी। सरकार की दलील थी कि गैर मुसलमानों के अल्लाह शब्द के प्रयोग करने से अशांति फैल सकती है।

सरकारी वकीलों ने कहा, इस फैसले के खिलाफ अपील करने से पहले वे गृह मंत्रालय के साथ विचार-विमर्श करेंगे। अदालत द्वारा अल्लाह शब्द के इस्तेमाल पर सरकारी प्रतिबंध को खत्म करने के बाद हेराल्ड इस शब्द का इस्तेमाल कर सकेगा। जज ने अपने आदेश में कहा है कि संविधान में इस्लाम को देश का धर्म बताया गया है, लेकिन यह गृह मंत्री को इस शब्द का इस्तेमाल प्रतिबंधित करने का अधिकार नहीं देता है। आवेदक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत अल्लाह शब्द का इस्तेमाल कर सकता है। पिछले साल 7 जनवरी को गृह मंत्रालय ने हेराल्ड के प्रकाशन की अनुमति अल्लाह शब्द इस्तेमाल न करने की शर्त पर दी थी। साथ ही मुख्य पृष्ठ पर लिमिटेड शब्द लिखने को कहा था। जिसका अर्थ था यह अखबार सिर्फ ईसाइयों के बीच वितरित होगा।

आत्महत्या की धमकी बन सकती है तलाक का आधार



मुंबई हाईकोर्ट ने आत्महत्या की कोशिश करना या फिर इसके लिए किसी को विवश करना भी एक अपराध के समान माना है।हाईकोर्ट ने  एक पारिवारिक कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी। फेमली कोर्ट ने इस मामले में महिला के पति  के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसमें यह आधार था कि पति अपनी पत्नी से तलाक इसलिए मांगा था कि वह बेहद गुस्सैल हैं उससे लड़ाई करती है और आत्महत्या करने की धमकी भी देती है। गौरतलब है कि पति और पत्नी दोनों पिछले 17 सालों से अलग रहते हैं।

हालांकि पुणे की एक फेमली कोर्ट ने 2002 में ही दोनों को तलाक की इजाजद दे दी थी जिसके आधार पर ही महिला ने हाईकोर्ट में अपील की थी। फेमली कोर्ट में महिला  ने यह माना था कि उसने पति से झगड़ा होने पर दो बार सुसाइड करने की कोशिश की थी।
हाईकोर्ट ने फेमली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए यह माना कि ऐसी स्थिति में दोनों एक दूसरे के साथ कभी भी नहीं रह सकते हैं ऐसे हालात में दोनों का अलग रहना ही ठीक है। जज एस.ए. बोब्दे और एस.जे.कथावाला ने बताया कि आत्महत्या के लिए धमकी देना या फिर इसके लिए उकसाना एक अपराध है।

रैगिंग मामला : मेडीकल कॉलेज के18 छात्र हिरासत में


मुंबई के केईएम मेडिकल कॉलेज के 18 छात्रों को पुलिस ने रैंगिग के मामलें में हिरासत में ले लिया है, और कल इन छात्रों को कोर्ट में पेश किया जाएगा। गौरतलब है कि कल केईएम मेडिकल कॉलेज के जूनियर छात्रों ने एंटी रैंगिग कमेटी के समक्ष वरिष्ठ छात्रों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। अपनी शिकायत में छात्रों ने कहा था कि कॉलेज के कुछ वरिष्ठ छात्रों ने जूनियर छात्रों की रैंगिग ली है और मानसिक और शारीरिक रुप से छात्रों को प्रताड़ित किया है।

एंटी रैंगिग कमेटी ने बाद में इस पूरे मामलें की जाच पड़ताल करने के बाद मेडिकल कॉलेज के 18 छात्रों को इस मामलें में दोषी पाया है और ये छात्र अब पुलिस की हिरासत में। सूचना के अनुसार इन छात्रों को कल अदालत में पेश किया जाएगा और इस पूरे मामलें की सुनवाई की जाएगी।