पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Tuesday, December 15, 2009

नकली दूध-मावा बनाने वाले दो लोगों को उम्रकैद।


एडीजे कोर्ट संख्या 21 बुलंदशहर  न्यायालय ने यूरिया मिलाकर दूध और मावा बनाने वाले दो लोगों को आजीवन कारावास व 50-50 हजार का अर्थदंड दिया है।

अपर जिला शासकीय अधिवक्ता प्रताप सिंह अंबा के अनुसार एसओ गुलावठी आदिल रसीद ने 20 फरवरी 2008 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि रात्रि गश्त के दौरान उन्होंने सूचना पर ओमी कुम्हार के घेर में छापा मारकर मौके से ओमप्रकाश व किशोर कुमार को पकड़ लिया था। इनके पास से भारी मात्रा व यूरिया और नकली दूध-मावा बनाने में प्रयुक्त किया जा रहा कच्चा माल बरामद हुआ था। चार कुंतल नकली दूध और मावा भी बरामद हुआ। पुलिस ने दोनों आरोपियों के विरुद्ध आईपीसी की धारा 272 व 273 के अभियोग दर्ज किया।  एडीजे कोर्ट संख्या 21 महेश नौटियाल ने सुनवाई में आरोपों को सही पाया। न्यायाधीश ने ओमी उर्फ ओमप्रकाश और किशोर कुमार को कठोर आजीवन कारावास और पचास-पचास हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है।

नकली दूध-मावा बनाने के आरोपियों को सजा तत्कालीन एसओ आदिल रसीद द्वारा की गई कार्रवाई के कारण ही संभव हो सकी। आदिल रसीद ने अभियोग को खाद्य अपमिश्रण की धाराओं में दर्ज करने की बजाय आईपीसी की धाराओं में दर्ज किया था। यदि मामला खाद्य अपमिश्रण की धाराओं में दर्ज किया गया होता तो आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जाता। इसके साथ ही उनको नमूनों का कोड बताया जाता। इसके अलावा खाद्य अपमिश्रण मामले में अभियोग की पैरवी शासकीय अधिवक्ता के स्थान पर खाद्य निरीक्षक करते। ऐसे में सजा मिलने की संभावना काफी कम हो जाती हैं।

Monday, December 14, 2009

आरटीआई ऐक्ट के दायरे से बाहर हैं निर्वाचित प्रतिनिधि


केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने एक अहम फैसले में कहा है कि सांसद, विधायक और स्थानीय निकायों के सदस्यों सहित निर्वाचित प्रतिनिधि निजी तौर पर सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे से बाहर हैं।
आयोग ने हालांकि यह साफ कर दिया कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की गतिविधियों से जुड़ी सूचनाएं उन निकायों जैसे संसद, राज्य विधानसभा या स्थानीय निकायों से प्राप्त की जा सकती है जिसके वे सदस्य हैं।

इससे संबंधित कई याचिकाओं की संयुक्त सुनवाई करते हुए मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला और शैलेश गांधी की खंडपीठ ने कहा कि हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि सांसद, विधायक, पार्षद और पंचायतों के सदस्यों को अपने आप में पब्लिक अथॉरिटी नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद जिन संगठनों और समितियों के प्रति वे संविधान के तहत अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं, वास्तव में उन्हें पब्लिक अथॉरिटी के रूप में परिभाषित किया गया है। आवेदकों ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी सहित कई निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किए गए कार्यों के बारे में जानकारी मांगी थी।

पैसेवालों के पैतरों से नाराज हुआ हाईकोर्ट


दिल्ली हाईकोर्ट ने पैसेवालों द्वारा निचली अदालत का दरवाजा खटखटाए बिना सीधे उच्च न्यायालय में चले आने की आदत को दीवानी मामलों के बढ़ते बोझ का प्रमुख कारण बताया है।

न्यायाधीश एस. एन. धींगरा ने आईटी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट द्वारा दायर किए गए कॉपीराइट उल्लंघन के चार दीवानी मुकदमों पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। जस्टिस धींगरा ने ओरिजनल ज्यूरिस्डिक्शन बेंगलूरु, चंडीगढ़, हैदराबाद और मुंबई में होने के बावजूद महज प्रतिवादियों को परेशान करने के लिए दिल्ली में मुकदमा दायर करने पर माइक्रोसॉफ्ट को आठ लाख रुपए अदालत में जमा करने को कहा। अदालत की जांच में माइक्रोसॉफ्ट के आरोप गलत पाए जाने पर प्रतिवादियों को दो-दो लाख रुपए दे दिए जाएंगे।

जस्टिस धींगरा ने बढ़ते दीवानी मामलों पर चिंता जताते हुए कहा ‘पैसे वाले पक्षकारों को अपनी पसंद की अदालत चुनने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।’

केंद्र ने रामसेतु मुद्दे पर मांगा डेढ़ साल का वक्त


केंद्र सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना को पूरा करने के सिलसिले में रामसेतु को हटाने के स्थान पर वैकल्पिक मार्ग ढूढ़ने के लिए उच्चतम न्यायालय से 18 महीने का समय मांगा है।

न्यायालय में दर्ज नए हलफनामा में केंद्र सरकार ने कहा कि रामसेतु को नष्ट होने से बचाने के लिए वैकल्पिक मार्ग अपनाया जाए या नहीं, इस पर कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले इसका पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के आकलन के वास्ते और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए और समय चाहिए। न्यायालय इस मामले पर सोमवार को सुनवाई करेगा।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सेतुसमुद्रम के लिए कुछ अन्य मार्गों को अपनाने की संभावना पर विचार करने के लिए पहले ही पर्यावरणविद् डॉ. आरके पचौरी की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित कर दी है।

दरअसल दुनियाभर के हिंदुओं की मान्यता है कि 35 किलोमीटर इस रामसेतु का निर्माण भगवान राम ने राक्षसराज रावण के कब्जे से पत्नी सीता को छुड़ाने के वास्ते श्रीलंका पहुंचने के लिए किया था। इस पुल को एडम्स ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल करके इस आधार पर सेतुसमुद्रम परियोजना को रद्द करने की मांग की है कि इस संबंध में कोई भी वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया और तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम के कुछ मंत्रियों का इसमें वाणिज्यिक स्वार्थ निहित है।

उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और वह प्रधानमंत्री द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। उसने पहले ही सरकार को चल रही इस परियोजना के दौरान रामसेतु को नुकसान के खिलाफ चेताया है।

वकील को खुदकुशी के लिए मजबूर करने के आरोपी पुलिसकर्मियों के गिरफ्तारी वारंट पर फैसला आज


वकील अमित यादव को खुदकुशी के लिए मजबूर करने के आरोपी पुलिसकर्मियों के गिरफ्तारी वारंट सोमवार को जारी हो सकते हैं। कोर्ट ने सीआईडी सीबी के आठ दिसंबर को पेश प्रार्थना-पत्र पर फैसले की तारीख 14 दिसंबर नियत की थी।

जानकारी के अनुसार, यादव को खुदकुशी के लिए मजबूर करने के मामले में फरार चल रहे सीआई ओमप्रकाश वर्मा, थानेदार किशनसिंह नरूका व सिपाही मोतीलाल चौधरी के गिरफ्तारी वारंट प्राप्त करने के लिए आठ दिसंबर को अदालत में प्रार्थना-पत्र पेश किया था, लेकिन कोर्ट से वारंट जारी नहीं हो पाए थे। अदालत ने सीआईडी सीबी को 14 दिसंबर को केस से संबंधित पत्रावली पेश करने के आदेश दिए थे। सोमवार को पत्रावली पेश करने के बाद कोर्ट प्रार्थना-पत्र पर फैसला देगी।

Saturday, December 12, 2009

दिनकरन के खिलाफ महाभियोग 14 को


भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी डी दिनकरन के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए राज्यसभा के 66 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन को आगामी सोमवार को उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को सौंपा जाएगा।
उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए संबंधित ज्ञापन पर राज्यसभा के कम से कम 50 या लोकसभा के कम से कम १क्क् सांसदों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। न्यायमूर्ति दिनकरन के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 50 और वाम दलों के कुछ सांसदों ने संबंधित ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।
राज्यसभा ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्न सेन के खिलाफ महाभियोग लाने की पहल पहले से ही शुरू कर रखी है। न्यायमूर्ति सेन पर वकालत के पेशे से जुडे होने के दौरान गैरकानूनी तरीके से धन अर्जित करने का आरोप है।
भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे जस्टिस दिनकरन के मामले को लेकर देश के जानेमाने न्यायविदों ने जजों की नियुक्ती की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। जस्टिस दिनकरन की सर्वोच्च न्यायलय में नियुक्ती फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस पी डी दिनकरन की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति न हो इस मुहिम में अब देश के जाने माने न्याविद भी जुट गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश जे एस वर्मा और लोक सभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी समेत कई न्यायविदों ने मुहिम तेज कर दी है। दिल्ली में एक सेमीनार में जमा हुए न्यायविदों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कोलिजयम को जस्टिस दिनकरन का नाम सर्वोच्च न्यायलय में नियुक्ती के लिए नहीं भेजना चाहिए था क्योंकि उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। और अब जबकि जस्टिस दिनकरन पर ज़मीन घोटाले के आरोपों की चर्चा आम हो चुकी है तो सुप्रीम कोर्ट कोलिजयम को उनका नाम वापस ले लेना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने इस वर्ष अगस्त में न्यायमूर्ति सेन के खिलाफ महाभियोग चलाने की सिफारिश प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह से की थी।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बी सुदर्शन रेड्डी के नेतृत्व वाली समिति पहले से ही न्यायमूर्ति सेन के खिलाफ जांच कार्य कर रही है। न्यायमूर्ति सेन ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से इनकार कर दिया था।

न्याय मिलने में देरी के खिलाफ लोग विदोह कर देंगे : मुख्य न्यायाधीश


भारत के प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने शनिवार को चेताया कि लंबित मामलों के निपटारे में अत्यधिक देरी के कारण लोग विद्रोह करने को मजबूर होंगे और इससे न्यायिक प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी।

प्रधान न्यायाधीश ने निचली अदालतों की संख्या को दोगुना करके 35000 हजार करने की पुरजोर वकालत की। बालाकृष्णन ने एक सम्मेलन में कहा कि हम इतने अधिक समय तक लंबित मामलों को बनाए रखना वहन नहीं कर सकते। लोग विद्रोह कर देंगे तो व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हालांकि लोगों का न्यायपालिका में विश्वास है और लोगों को लगता है कि उन्हें आज या कल या इससे आगे न्याय मिलेगा लेकिन वह कितना इंतजार कर सकते हैं। न्यायमूर्ति बालाकृष्णन ने कहा कि इतनी अधिक देरी किसी भी स्थिति में नहीं होनी चाहिए। इसमें कमी लाई जानी चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश ने इसके लिए अदालतों की कम संख्या और न्यायाधीशों के रिक्त पदों को इसके लिए जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि देश में अदालतों की संख्या पर्याप्त नहीं है और निचली अदालतों में जहां न्यायाधीशों के 16000 पद है, वहीं 2000 पद रिक्त हैं। उन्होंने कहा कि देश में निचली अदालतों की संख्या लगभग 16000 हजार है और इसे बढ़ाकर 35,000 किया जाना चाहिए।

जांच में सहयोग नहीं करने पर मेडिकल कालेज की मान्यता निरस्त करने की हाईकोर्ट की धमकी।


राजस्थान हाईकोर्ट ने आरपीएमटी परीक्षा-- 09 में फर्जी परीक्षार्थियों के मामले में चल रही पुलिस जांच में महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज के सहयोग नहीं करने पर नाराजगी जताई है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह कॉलेज प्रशासन को 15 दिन का नोटिस दे। इसके बावजूद भी यदि कॉलेज सहयोग नहीं करे तो उसकी मान्यता निरस्त करदें। न्यायाधीश गोपाल कृष्ण व्यास ने यह निर्देश याचिकाकर्ता झाबरमल जाट की याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान अनुसंधान टीम डीएसपी रामसिंह ने कोर्ट को बताया कि मामले में जांच के लिए और समय चाहिए। न्यायाधीश ने पूछा कि ऐसा क्यों, तो उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज प्रशासन जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। इस पर न्यायाधीश ने कहा किऐसे कॉलेज जो कि शिक्षा में स्तरहीनता को दुरुस्त करने की कार्रवाई में सहयोग नहीं कर रहे हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है। न्यायाधीश ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह कॉलेज प्रशासन को 15 दिन का नोटिस जारी कर कार्रवाई में सहयोग नहंी करने का कारण पूछें, यदि वे इसके बाद भी सहयोग नहंी करें तो कॉलेज की मान्यता रद्द करदें।

पंचायतों में आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा न हो-राजस्थान हाईकोर्ट


राजस्थान हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव के लिए समानान्तर (क्षितिज) आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय करते हुए राज्य सरकार, झुंझुनूं कलक्टर व जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से चार सप्ताह में जवाब-तलब किया है। साथ ही, कहा कि पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण प्रक्रिया भले ही जारी रहे, लेकिन उसे अदालत की मंजूरी बिना अंतिम रूप नहीं दिया जाए।  न्यायाधीश आर.सी. गांधी व महेश भगवती की खण्डपीठ ने झुंझुनूं जिले के सीताराम शर्मा की याचिका पर यह अंतरिम आदेश दिया। प्रार्थीपक्ष की ओर से न्यायालय को बताया गया कि सरकार ने पंचायत राज कानून में संशोधन कर महिला आरक्षण 33 से बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया है और 21 से 35 वर्ष तक के युवाओं को भी सीट आरक्षित की हैं। झुंझुनूं जिला परिषद व कुछ पंचायत समितियों का हवाला देकर बताया कि इस बढ़ोतरी से कुल आरक्षण 77.14 फीसदी से अधिक हो गया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय कर चुका है। आरक्षण में इस बढ़ोतरी का कोई तार्किक कारण भी नहीं बताया गया है। इस आरक्षण के बाद अधिकारी- कर्मचारी जनता पर हावी हो जाएंगे।
आरक्षण बढ़ोतरी के लिए संशोधन को असंवैधानिक करार दिया जाए। पंचायतों में जाति, लिंग व आयु के आधार पर कुल आरक्षण 50 फीसदी से अधिक करने व महिलाओं को श्रेणीवार 50 फीसदी आरक्षण पर पाबंदी लगाई जाए, याचिका पर निर्णय होने तक पंचायत चुनाव में नए पंचायत राज कानून पर अमल नहीं किया जाए।
शहरी निकाय आरक्षण के मामले से सम्बंघित 17 सितम्बर 09 का अंतरिम आदेश इस मामले में भी लागू किया जाए। राज्य सरकार की ओर से मुख्य सचिव, पंचायत राज सचिव, झुंझुनूं कलक्टर व झुंझुनूं जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चार सप्ताह में जवाब दें।


तेलंगाना मामले में वकील आपस में उलझे


आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के परिसर में शुक्रवार को उस समय तनाव की स्थिति पैदा हो गई जब पृथक तेलंगाना राज्य के गठन के मसले पर वकीलों के दो समूह उलझ गए। न्यायालय मे विवाद उस समय ख़डा हुआ जब वकीलों के दोनों समूहों में बहसबाजी तेज हो गई। एक समूह तेलंगाना के गठन के प्रस्ताव का विरोध कर रहा था और इसी समूह की झडप तेलंगाना समर्थक वकीलों से हुई।
आंध्र उच्च न्यायालय का परिसर "जय तेलंगाना" और "जय आंध्र" के नारों से गुंज उठा। इसके बाद दोनों समूहों में मारपीट शुरू हो गई। इस झ़डप में कुछ वकीलों को चोटे आई। पुलिस ने दखल देते हुए स्थिति पर काबू पाया। न्यायालय के मुख्य द्वार को बंद कर दिया गया ताकि कोई बाहरी दाखिल न हो सके। गौरतलब है कि तेलंगाना राज्य के गठन के समर्थन में चल 11 दिनों के विरोध प्रदर्शन में इस क्षेत्र के वकीलों ने भी भाग लिया था।

मंजूनाथ के हत्यारे को अब फांसी नहीं उम्रकैद की सजा


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चार साल पहले मारे गए इंडियन आयल कॉर्पोरेशन के अधिकारी मंजूनाथ की हत्या के लिए दोषी पाए गए मोनू मित्तल की फांसी की सज़ा को आजीवन कारावास में बदल दिया है और दो अन्य लोगों को रिहा करने के आदेश दिए हैं. कर्नाटक निवासी मंजूनाथ शणमुघम इंडियन आयल कॉर्पोरेशन के सेल्स मैनेजर थे. अब से चार साल पहले उत्तर प्रदेश के लखीमपुरखीरी में उनकी हत्या हो गई थी.

मंजूनाथ आईआईएम लखनऊ के छात्र रहे थे. आईआईएम के छात्रों और मीडिया ने मंजूनाथ की हत्या के मामले को तब काफी उछाला था और कहा गया था कि उनकी ईमानदारी के कारण उनकी जान गई थी. मंजुनाथ ने लखीमपुर खीरी में एक पेट्रोल पम्प पर मिलावटी तेल बेचे जाने का पर्दाफाश किया था.इस पेट्रोल पम्प के मालिक का नाम पवन कुमार मित्तल उर्फ़ मोनू मित्तल था. मंजूनाथ की हत्या 19 नवम्बर 2005 को गोली मारकर तब कर दी गयी थी जब वो मिलावटी पेट्रोल का नमूना लेने पेट्रोल पंप पहुंचे थे. सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसे उदाहरण पहले से मौजूद हैं कि जिन्हें उम्रक़ैद की सज़ा मिली हो और अगर उसकी तामील न हुई हो और काफी वक़्त गुज़र गया हो तो उसे उम्र क़ैद की सज़ा में बदल दिया जाता है क्यूंकि तबतक दोषी व्यक्ति काफी मानसिक प्रताड़ना भुगत चुका होता है.

मंजूनाथ की हत्या के अभियुक्तों ने मंजुनाथ के शव को कार के पीछे की सीट पर रखा और अपने दो सहयोगियों से कहा कि वो इसे सीतापुर की नहर में ठिकाने लगा दें लेकिन इससे पहले कि वो ऐसा कर पाएं, उनके दुर्भाग्य से उधर से पुलिस की गाड़ी गुज़री जो उस वक़्त तड़के गश्त लगा रही थी. उसे देखकर अभियुक्तों के हाव भाव बदल गए और वो भागने की फ़िराक में लग गए जिसके बाद पुलिस की गाड़ी ने उनका पीछाकर उन्हें शव के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया.

इस मामले में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ 15 फ़रवरी, 2009 को चार्जशीट दायर किया गया  अदालत ने तब अपने फैसले में मोनू मित्तल को फांसी की सज़ा सुनाई थी जबकि उनके दूसरे सहयोगियों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.

नियमानुसार फांसी की सज़ा की पुष्टि हाईकोर्ट द्वारा होती है. हाईकोर्ट ने अब मुख्य अभियुक्त मोनू मित्तल की फांसी की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया है. पीड़ित परिवार और मंजूनाथ ट्रस्ट के वकील आईबी सिंह का कहना है कि अदालत के फ़ैसले में यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के ऐसे दूसरे मामलों में फैसलों के अनुकूल है.

आई बी सिंह ने कहा कि " सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसे उदाहरण पहले से मौजूद हैं कि जिन्हें उम्र क़ैद की सज़ा मिली हो और अगर उसकी तामील न हुई हो और काफी वक़्त गुज़र गया हो तो उसे उम्रक़ैद की सज़ा में बदल दिया जाता है क्यूंकि तब तक दोषी व्यक्ति काफी मानसिक प्रताड़ना भुगत चुका होता है."

अदालत ने इस मामले में दो और अभियुक्तों को बरी कर दिया है. मंजुनाथ के परिवारवालों का कहना है कि वो इस फ़ैसले से संतुष्ट हैं.

Thursday, December 10, 2009

आसाराम बापू की प्राथमिकी रद्द करने की याचिका खारिज


गुजरात उच्च न्यायालय ने आध्यात्मिक गुरु आसाराम बापू की उस याचिका को आज खारिज कर दिया जिसमें उन पर हत्या के प्रयास के आरोप में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की गई थी !
न्यायाधीश अकील कुरैशी ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि गोलीबारी की घटना हुई थी जिसका मुकदमा बनता है और न्यायालय पुलिस को इसकी जांच से रोक नहीं सकता !
पुलिस ने आसाराम बापू के आश्रम के पूर्व सचिव राजू चांडक की शिकायत पर आसाराम बापू और दो अन्य लोगों के खिलाफ धारा 307. 120 बी. 154 और उपधारा 25.1. के तहत मामला दर्ज किया था1 चांडक को पांच दिसम्बर की रात साबरमती इलाके में गोली मारी गई थी1 उन्होंने अगले दिन आध्यात्मिक गुरु के खिलाफ मामला दर्ज कराया था !
चांडक ने आश्रम के दो छात्रों दीपक और अभिषेक की मौत के मामले में आसाराम बापू के खिलाफ बयान दिया था !  इन दोनों छात्रों के शव उनके लापता होने के एक दिन बाद आश्रम के नजदीक साबरमती नदी में मिले थे !  इसके बाद आश्रम में कथित तांत्रिक गतिविधियों की खबरें सामने आईं जिसके बाद लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए !
आसाराम बापू के वकील बी एम गुप्ता ने प्राथमिकी रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि चांडक की ईमानदारी संदेहजनक है क्योंकि उनसे आश्रम की सम्पत्ति हड़पने की कोशिश की थी ! उन्होंने कहा कि चांडक की हत्या की साजिश रचने में आसाराम बापू की संलिप्तता के कोई सबूत नहीं हैं !
सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि चांडक की हत्या की साजिश रची गई थी और पुलिस को इसकी जांच करने से नहीं रोका जाना चाहिए ! उन्होंने कहा कि चांडक ने आश्रम में छात्रों की मौत के मामले की जांच कर रहे डी के त्रिवेदी आयोग के समक्ष आसाराम बापू और आश्रम के अन्य अधिकारियों के खिलाफ गवाही दी थी1 इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चांडक पर हमले की साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता और इसलिए प्राथमिकी रद्द करने की याचिका को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए !

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा वेश्यावृत्ति रोक नहीं सकते तो उसे मंजूरी क्यों नहीं देते?


वेश्यावृत्ति रोक नहीं सकते तो उसे कानूनी मंजूरी क्यों नहीं देते? सुप्रीम कोर्ट ने ये अहम सवाल केंद्र सरकार से पूछा है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि तमाम बंदिशों के बाद भी वेश्यावृत्ति पर रोक नहीं लग पा रही। चाइल्ड ट्रैफिकिंग से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत का ये नजरिया सामने आया। हालांकि सुप्रीमकोर्ट की इस टिप्पणी पर दो अलग-अलग राय है। कुछ लोगों की राय में वैधानिक मान्यता इसका समाधान नहीं है।

अदालत ने कहा कि आप इसे दुनिया का सबसे पुराना पेशा मानते हैं। इसलिए अगर कानून के जरिए इसे रोकना संभव नहीं तो इसे कानूनी मंजूरी ही दे दो। इस तरह कम से कम इस धंधे पर निगरानी तो रखी जा सकेगी। सेक्स वर्कर्स को पुनर्वास और चिकित्सकीय सुविधा देना आसान होगा। अदालत की इस टिप्पणी पर सॉलिसीटर जनरल ने भरोस दिलाया कि इस पर गौर किया जाएगा।

अदालत में ये बहस बचपन बचाओ आंदोलन की याचिका पर चल रही थी। सुनवाई के दौरान चाइल्ड सेक्स वर्कर्स का जिक्र आया और बहस इस दिशा में मुड़ गई। हालांकि एक बड़ा तबका इस धंधे को कानूनी मंजूरी दिए जाने के खिलाफ है।

आपराधिक छवि वालों को पुलिस में नौकरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने अपराधिक मामलों में लिप्त पाए जाने वाले व्यक्तियों को राजस्थान पुलिस विभाग में कांस्टेबल सहित किसी भी पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्य करार दिया है और इस संबंध में राजस्थान सरकार द्वारा 1995 में जारी किए गए परिपत्र को वैध माना है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को यह महत्वपूर्ण फैसला राजस्थान राज्य बनाम मोहम्मद सलीम सिविल अपील मामले पर दिया। उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार ने 24 अप्रेल, 1995 को एक परिपत्र जारी कर उपद्रव और अन्य आपराधिक मामलों में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में लिप्त व्यक्तियों को पुलिस विभाग में नियुक्ति के लिए अयोग्य करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को उपर्युक्त मामले में अंतिम सुनवाई कर भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 324, 325, 326, 302, 307 के अंतर्गत आपराधिक मामलों में लिप्त व्यक्तियों को पुलिस विभाग में कांस्टेबल सहित किसी भी पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्य ठहराने संबंधी राजस्थान सरकार के परिपत्र को वैध माना। इस मामले में राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता डॉ. मनीष सिंघवी ने पैरवी की।

Monday, December 7, 2009

कॉजलिस्ट पर सीजे का ही नियंत्रण रहेगा-राजस्थान उच्च न्यायालय


राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला व न्यायाधीश प्रकाश टाटिया की खण्डपीठ ने निर्धारित किया है कि उच्च न्यायालय में मुकदमों की सुनवाई के लिए बनने वाली कॉजलिस्ट पर मुख्य न्यायाधीश का ही नियंत्रण रहेगा। न्यायालय में मुकदमों को लिस्ट में लगाने सम्बंधी आदेश अन्य न्यायाधीश पारित नहीं कर सकता।

इसके साथ ही खण्डपीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट मुख्यपीठ बचाओ संघर्ष समिति व दोनों हाईकोर्ट बार एसोसिएशनों की ओर से दायर विशेष अपीलों को स्वीकार करते हुए इस सम्बंध में एकलपीठ द्वारा 17 अगस्त 09 को पारित आदेश को अपास्त कर दिया। उच्च न्यायालय की एकलपीठ ने हर माह के अंतिम कार्य दिवस पर मुख्यपीठ में होने वाली हडताल के दिन मुख्यपीठ में मुकदमों की कॉजलिस्ट आम दिनों की तरह नहीं बनाए जाने को लेकर उच्च न्यायालय प्रशासन से जवाब तलब किया था। एकलपीठ के आदेश के विरूद्ध बार एसोसिएशनों की ओर से अलग-अलग विशेष अपीलें दायर की गई थी।