पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Saturday, January 8, 2011

बालाकृष्णन पद छोड़ें : बार एसोसिएशन

कोझीकोड बार एसोसिएशन ने शुक्रवार को यहां एक संकल्प पारित कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन को अपने पद से हटने और भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करने के लिए कहा।

एसोसिएशन के दो सदस्यों को छोड़ 100 से अधिक सदस्यों ने संकल्प का समर्थन किया। यह पहला मौका है जब बार एसोसिएशन ने एक पूर्व प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ संकल्प पारित किया है। एसोसिएशन ने यह कदम बालाकृष्णन के रिश्तेदारों की अकूत संपत्ति उजागर होने के बाद उठाया।

बालाकृष्णन के दामाद और युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता पी.वी. श्रीनिजीन और उनके अन्य रिश्तेदारों द्वारा अकूत सम्पत्ति बनाने पर पूर्व प्रधान न्यायाधीश का इस्तीफा मांगने वाले सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश वी.आर. कृष्णा अय्यर पहले व्यक्ति थे।

ज्ञात हो कि बालाकृष्णन के भाई के.जी. भास्करन जो केरल में विशेष सरकारी वकील हैं, वह भी जांच के दायरे में आ गए हैं। वह गत सोमवार से छुट्टी पर चले गए। एडवोकेट जनरल कार्यालय ने शुक्रवार को बताया कि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर अपना इस्तीफा भेज दिया।

केरल सरकार ने श्रीनिजीन द्वारा ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति जमा करने के मामले की जांच का आदेश दिया है। इस सप्ताह की शुरुआत में श्रीनिजिन ने युवा कांग्रेस को छोड़ दिया था।

त्रिशूर सतर्कता न्यायालय ने बुधवार को श्रीनिजिन और भास्करन के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के आरोप वाली याचिका को मंजूरी दी। न्यायालय इस मामले में 18 जनवरी को सुनवाई करेगा।

Sunday, January 2, 2011

आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों का हनन- उच्चतम न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार किया है कि 1976 में आपातकाल के समर्थन में दिये गये इसके फ़ैसले से देश में बडी संख्या में लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ.

न्यायमूर्ति आफ़ताब आलम और अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने एक फ़ैसले में कहा कि आपातकाल के दौरान एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले (1976) में पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ द्वारा मौलिक अधिकारों को निलंबित रखने का बहुमत से लिया गया फ़ैसला एक ‘‘भूल’’ थी.

अदालत ने एक व्यक्ित द्वारा एक ही परिवार के चार सदस्यों की हत्या के मामले में सुनवाई के दौरान यह बात कही. अदालत ने इस व्यक्ित की मौत की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया. पहले उच्चतम न्यायालय ने ही उसके मौत की सजा को बरकरार रखा था.

न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि एडीएम जबलपुर मामले में इस अदालत के बहुमत के फ़ैसले से देश में बडी संख्या में लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ.’’

न्यायाधीशों ने पांच मई 2009 के अपनी अदालत के फ़ैसले को ही दरकिनार कर दिया जिसमें इसने रामदेव चौहान उर्फ़ राजनाथ चौहान की मौत की सजा को बरकरार रखा था . चौहान ने आठ मार्च 1992 को भाबनी चरण दास और उनके परिवार के तीन लोगों की हत्या कर दी थी.

न्यायमूर्ति गांगुली ने फ़ैसले में लिखा, ‘‘इस अदालत द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले फ़ैसले भले ही विरल हों लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ऐसी स्थिति कभी नहीं आई.’’

Friday, December 24, 2010

दहेजलोभी मजिस्ट्रेट हंगामा करने और दुल्हन को चांटे मारने के मामले में बर्खास्त

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के शहडोल जिले में पदस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेट को अपनी शादी के दौरान बारात लेकर दुल्हन के घर पहुंचने के बाद दहेज में एक लाख रुपए और कार की मांग पूरी नहीं करने पर हंगामा करने और दुल्हन को चांटे मारने के मामले में बर्खास्त कर दिया है।

उच्च न्यायालय के सतर्कता पंजीयक के डी खान ने दूरभाष पर बताया कि इस मामले में राज्यपाल से आदेश प्राप्त होने के बाद आरोपी न्यायिक मजिस्ट्रेट इंदर सिंह मालवीय को गुरुवार को बर्खास्त कर दिया गया। इस मामले में देवास के पुलिस अधीक्षक ने उच्च न्यायालय को लगभग 20 दिन पहले उच्च न्यायालय को न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ शिकायत भेजी थी। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर न्यायालय के सतर्कता विभाग ने जांच शुरू की और इंदौर खंडपीठ के मुख्य सतर्कता प्रमुख और शहडोल जिला न्यायाधीश से रिपोर्ट मांगी थी। एक सप्ताह पहले सभी रिपोर्ट मिलने पर मुख्य न्यायाधीश और प्रशासनिक समिति के समक्ष यह मामला रखा गया था। कमेटी ने आरोपी मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी की अनुशंसा राज्य सरकार को भेज दी थी।

राज्यपाल कार्यालय से बुधवार को आरोपी मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी के आदेश उच्च न्यायालय को प्राप्त हुए और इस आदेश को गुरुवार को शहडोल में मजिस्ट्रेट इंदर सिंह को थमा दिए गए। दुल्हन मोनिका ने दहेज लोभी मजिस्ट्रेट इंदर सिंह के खिलाफ देवास के कोतवाली थाने में लिखित शिकायत की थी। पुलिस ने मौके पर पहुचंने के बाद मोनिका का मेडिकल कराया और आरोपी इंदर सिंह के खिलाफ मारपीट और दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया था।

आरोपी मजिस्ट्रेट गत दो दिसंबर को अपनी बारात लेकर देवास शहर के कोतवाली थाना क्षेत्र में मोनिका के घर गया था। बारात पहुंचने के बाद दूल्हा मजिस्ट्रेट ने दुल्हन के पिता से दहेज में एक लाख रुपए नगद और मारुति कार की मांग करने लगा। दुल्हन के पिता ने इस मांग को मानने से इन्कार करने पर आरोपी ने दुल्हन को चांटे मारे थे।

सेवानिवृत्ति की उम्र 60 साल करने पर रोक

राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने गुरुवार को उरमूल डेयरी बीकानेर के कर्मचारियों की सेवानिवृत्त 60 साल में करने पर रोक लगा दी है। अब उन्हें 58 साल की उम्र में ही सेवानिवृत्त किया जाएगा।

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 13 दिसंबर को एक आदेश जारी कर उरमूल डेयरी के कर्मचारियों को साठ साल में सेवानिवृत्त करने के आदेश दिए थे। इस पर उरमूल डेयरी ने सेवानिवृत्ति की उम्र साठ साल कर दी, फिर डेयरी ने अपने अधिवक्ता राजेश जोशी के मार्फत हाईकोर्ट की खंडपीड में विशेष अपील लगाई। इस अपील की गुरुवार को हाईकोर्ट की खंडपीठ के न्यायाधीश एएम सप्रे और सीएम तोतला ने सुनवाई की। दोनों न्यायाधीशों की खंडपीठ ने इस अपील पर अपना फैसला देते हुए एकल पीठ के उस निर्णय को अपास्त कर दिया, जिसमें सेवानिवृत्ति की उम्र 58 से 60 साल की गई थी। इस फैसले के बाद उरमूल डेयरी के कर्मचारियों को अब 58 साल की उम्र में सेवानिवृत्त किया जा सकेगा।

Sunday, December 19, 2010

आपराधिक मामलों में बयानों में मामूली फर्क की अनदेखी जायज-सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक मामलों में किसी अभियुक्त को दोषी ठहराते वक्त गवाहों के बयानों में मामूली अंतरों की उपेक्षा की जा सकती है।

न्यायमूर्ति एच एस बेदी और न्यायमूर्ति सी के प्रसाद की पीठ ने अपने एक फैसले में कहा कि सुनवाई के दौरान बड़ी संख्या में गवाह पेश किए जाते हैं और ऐसे में उनके बयानों में अंतर आना स्वाभावित है, इसके तहत किसी अभियुक्त को संदेह का लाभ दिए जाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

पीठ ने कहा कि ऐसे मामले में अभियोजन पक्ष के कई गवाह पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं और उनकी गवाही पर यकीन न करने की कोई वजह नहीं दिखती।

न्यायालय ने यह बात दहेज उत्पीड़न के मामले में दोषी करार दिए नंदयाला वेंकटरमन नामक एक शख्य की अपील खारिज करते हुए कही। आंध्र प्रदेश के कड़प्पा जिले में वेंकटरमन की पत्नी भवानी ने 10 अप्रैल, 1993 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी और इसी मामले में निचली अदालत ने उसे दोषी करार दिया था। बाद में आंधच् उच्च न्यायालय ने भी इस फैसले को सही ठहराया।

वेंकटरमन ने सुप्रीम कोर्ट में यह दावा करते हुए अपनी रिहाई की गुहार लगाई थी कि इस मामले के गवाहों के बयानों में अंतर है। न्यायालय उसकी इस दलील से सहमत नहीं हुआ और उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

दुष्कर्म का झूठा मामला, महिला पर मुकदमा

दिल्ली की एक अदालत ने हरियाणा के एक पुलिसकर्मी पर दुष्कर्म का झूठा आरोप लगाने वाली एक महिला, उसके पति एवं ससुर के खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश दिया है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लाउ ने पुलिस सब इंसपेक्टर तथा दो कांस्टेबलों को इस महिला के अपहरण और उसके साथ दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया है तथा आरोप लगाने वाली इस महिला और उसके दो रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक सुनवाई का आदेश दिया। यह महिला जहांगीरपुरी की रहने वाली है।

अदालत ने कहा कि महिला के ससुर ने दुष्कर्म की सारी कहानी गढ़ी क्योंकि हरियाणा पुलिस उसके खिलाफ विभिन्न आपराधिक मामलों की जाचं कर रही थी।

महिला ने आरोप लगाया कि सब इंसपेक्टर ओम प्रकाश और कांस्टेबल राकेश उर्फ पहलवान एवं टेक चंद ने 09 अप्रैल, 2004 को उसका और उसके पति का अपहरण कर लिया था और गुड़गांव के फिरोजपुर झिरका थाने में उसके साथ दुष्कर्म किया था। महिला के अनुसार हालांकि इन तीनों पुलिसकर्मियों ने उसे उसी दिन छोड़ दिया जबकि उसके पति निसार अहमद को 16 अप्रैल, 2004 तक हिरासत में रखा।

पत्र में राजा का नाम था: न्यायाधीश रघुपति

एक आपराधिक मामले में न्यायपालिका को प्रभावित करने के पूर्व दूरसंचार मंत्री राजा के कथित प्रयास को लेकर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। पूर्व न्यायधीश एस रघुपति ने दोहराया कि उनके पत्र में राजा का नाम था। उन्होंने कहा कि जो पत्र उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश एच एल गोखले को लिखा था, उसमें ए राजा का नाम था।

गौरतलब है कि एक वकील आपराधिक मामले में बंद आरोपी को जमानत दिलाने की सिफारिश लेकर न्यायाधीश के पास पहुंचा था और उसने इस संदर्भ में ए राजा का नाम लिया था, हालांकि न्यायाधीश ने ऐसा करने से मना भी कर दिया था।

उन्होंने तमिलनाडु और पुडुचेरी के बार कौंसिल के अध्यक्ष पद से वकील आर के चंद्रमोहन को निलंबित किए जाने संबंधी मद्रास उच्च न्यायालय खंडपीठ के आदेश में उस पत्र के कुछ अंश को जोड़े जाने का हवाला देते हुए संवाददाताओं से कहा कि वह उस आदेश में हमेशा से था। आपने उसे देखा है। यह खंडपीठ के आदेश में हमेशा से था।

वकीलों द्वारा दायर की गयी इस याचिका पर सुनवाई करते हुये खंडपीठ ने रघुपति के लिखे पत्र का कुछ अंश इसमें जोड़ा था जिसमें वकील चंद्रमोहन के उनके चैंबर में आने का उल्लेख था।

गौरतलब है कि वकील चंद्रमोहन ने पिछले साल न्यायाधीश के कमरे में प्रवेश कर अंक घोटाला में आरोपी एक पिता पुत्र को केंद्रीय दूर संचार मंत्री ए राजा का पारिवारिक मित्र बताकर उनकी अग्रिम जमानत याचिका पर विचार करने को कहा था।

न्याय के मंदिर में ईमान से भरा समझौता

मध्य प्रदेश के छतरपुर एडीजे कोर्ट में एक रोचक मामला सामने आया है। यहां एक जमीन विवाद के मामले में दोनों पक्षों के बीच केवल एक कसम खा लेने मात्र से समझौता हो गया। न्याय के मंदिर में ईमान से भरा यह समझौता चर्चा का विषय रहा।

वकील अनिल द्विवेदी ने बताया कि बेनीगंज में रहने वाली सलमा मकसूद पति मकसूद अहमद हाल निवासी भोपाल की जमीन ग्राम परा में स्थित थी। मुख्य रोड पर 1.748 हेक्टेयर क्षेत्र में स्थित यह जमीन बेचने के लिए सलमा मकसूद ने बगौता निवासी चतुर सिंह चंदेल को अधिकृत किया था। चतुर सिंह ने सलमा मकसूद को यह लालच दिया कि वह महंगे रेट पर

उसकी जमीन बिकवा देगा,बशर्ते वह उसके नाम जमीन का मुख्तारनामा लिख दे। चतुर सिंह ने मुख्तारनामा लिखवाने के बाद जमीन की पावर ऑफ अटॉर्नी भी अपने नाम करा ली थी। लेकिन बाद में चतुर सिंह ने उस जमीन को अपने परिवार की एक महिला के नाम कर दिया।

जब सलमा मकसूद को इस बारे में जानकारी लगी तो उन्होंने छतरपुर आकर पूरे मामले की जानकारी लेने के बाद एक सिविल केस जिला न्यायालय में पेश किया।

सुनवाई के दौरान एडीजे पीके शर्मा के सामने चतुर सिंह ने अपना पक्ष रखते हुए सलमा मकसूद के पति को ढाई लाख रुपए जमीन के एवज में देने की बात कही, लेकिन सलमा ने बताया कि उसे केवल 30 हजार रुपए ही दिए गए हैं।

इस पर चतुर सिंह ने कोर्ट में कहा कि यदि वादी पक्ष मस्जिद में जाकर अपने बच्चे की कसम खाकर यह कहे कि उसे विवादित जमीन के विक्रय के संबंध में ढाई लाख नहीं मिले हैं तो पूरी रकम देने को तैयार है। इस पर एडीजे ने वकील के माध्यम से तुरंत सलमा मकसूद को मस्जिद भेजकर कसम कराई। इसके बाद चतुर सिंह ढाई लाख रुपए देने को तैयार हो गया और कोर्ट में दोनों पक्षों ने राजीनामा लिखकर दे दिया।

Saturday, December 4, 2010

हाईकोर्ट ने जारी किया छुट्टियों का कैलेंडर



राजस्थान हाईकोर्ट ने अगले साल के लिए छुट्टियों का कैलेंडर जारी कर दिया है। कैलेंडर के अनुसार दीर्घकालीन अवकाश के तहत 1 जून से 28 जून तक गर्मियों की छुट्टियां रहेगी, जबकि 25 दिसंबर से 31 दिसंबर तक शीतकालीन अवकाश रहेगा।

छुट्टियों में सभी रविवार व द्वितीय शनिवार के अवकाश तो होंगे ही, पर्व अवकाश के रूप में 1 जनवरी को नूतन वर्ष दिवस, 26 जनवरी गणतंत्र दिवस, 16 फरवरी को बारावफात, 3 मार्च को महाशिवरात्रि, 19 से 21 मार्च तक होली, 5 अप्रैल को चेटीचंड, 12 अप्रैल को रामनवमी, 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती, 16 अप्रैल को महावीर जयंती, 4 जून को प्रताप जयंती, 13 अगस्त को रक्षा बंधन, 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस, 22 अगस्त को जन्माष्टमी, 31 अगस्त को ईदुलफितर, 28 सितंबर को नवरात्रा स्थापना, 2 अक्टूबर को गांधी जयंती, 3 से 7 अक्टूबर तक दशहरा, 24 से 28 अक्टूबर तक दीपावली, 7 नवंबर को ईदुल जुहा, 10 नवंबर को गुरु नानक जयंती, 6 दिसंबर को मोहर्रम व 25 दिसंबर को क्रिसमस का अवकाश रहेगा।


इसी तरह ऐच्छिक अवकाश के तहत 11 जनवरी को गुरु गोविंदसिंह जयंती, 22 अप्रैल को गुड फ्राइडे, 23 अप्रैल को ईस्टर सेटरडे, 6 मई को आखातीज, 17 मई को बुद्ध पूर्णिमा, 15 जुलाई को गुरु पूर्णिमा, 21 अगस्त को थदड़ी, 26 अगस्त को जुमातुल विदा, 1 सितंबर को गणोश चतुर्थी, 2 सितंबर को संवत्सरी, 19 सितंबर को अनंत चतुर्दशी व 20 दिसंबर को पाश्र्वनाथ जयंती शामिल किए हैं।

जुमातुल विदा, मोहर्रम, ईदुलजुहा, ईदुल फितर और बारावफात के अवकाश चंद्र दर्शन पर आधारित होंगे। कैलेंडर के मुताबिक 29 व 30 सितंबर तथा 1 अक्टूबर को कार्यालय का कार्य दिवस रहेगा। इसी तरह 26 मार्च, 24 सितंबर व 22 अक्टूबर को न्यायालय और कार्यालय दोनों का कार्य दिवस रहेगा।

गरीबों को नहीं मिल रहा न्याय : दिल्ली हाईकोर्ट

ना तो कोई आरोपी इस कारण छूटना चाहिए कि न्यायालय के पास अपील पर सुनवाई के लिए समय नहीं है और न ही इसके चलते कोई निर्दोष जेल में रहे। दहेज हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की। कहा, आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत है, ताकि समानता के संवैधानिक उद्देश्य को सार्थक बनाया जा सके। क्योंकि गरीबों को उच्च न्यायालयों में समय पर न्याय नहीं मिल पाता है और शक्तिशाली लोगों से जुड़े मामले ही चलते रहते हैं।

न्यायमूर्ति एस.एन. धींगरा ने दहेज हत्या व दहेज प्रताड़ना के मामले में एक सब्जी बेचने वाले परिवार से संबंध रखने वाली महिला रानी को बरी कर दिया। इस मामले में महिला के पति व बेटे की अपील पर सुनवाई करने के लिए उच्च न्यायालय के पास समय ही नहीं था, इसलिए बिना अपराध के ही उन्होंने इतने दिन जेल में बिता दिए कि अपील पर फैसला आने से पहले ही उनकी सजा पूरी हो गई थी।

निचली अदालत ने 13 अक्टूबर 2003 को रानी, उसके बेटे व पति को बहू जानकी को दहेज के लिए प्रताडि़त करने व हत्या के मामले में सात-सात साल के कारावास की सजा सुनाई थी। जिसे उन्होंने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

निचली अदालत की खिंचाई करते हुए कहा कि इस मामले में बिना पर्याप्त सबूतों के ही उनको सजा दे दी गई। न तो बचाव पक्ष ने अपनी भूमिका निभाई, और न पुलिस ने, न ही सरकारी वकील और न जज ने। तकनीकी तरह से मामले में सजा दे दी गई। जजों के पास अधिकार है कि वह गवाहों से सवाल पूछ कर सच्चाई जानने की कोशिश करें, परंतु ऐसा नहीं किया जा रहा है। गवाहों को वकीलों के भरोसे छोड़ दिया जाता है और जज बैठकर निगरानी का काम करते हैं। उनका यह व्यवहार गरीबों के लिए भारी पड़ जाता है, क्योंकि उनके पास अच्छे वकील नहीं होते हैं।

मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे जाहिर हो सके कि आरोपियों ने मृतका को प्रताड़ित किया था। अदालत ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली पुराने ढर्रे पर चल रही है जिसमें आरोपी को बोलने की अनुमति नहीं दी जाती है। जो कि इस तरह के मामलों में अदालत के सामने सच्चाई लाने से रोक देता है। गरीबी के कारण यह परिवार एक वकील भी नहीं नियुक्त कर पाया जिस कारण न तो गवाहों से जिरह हो पाई और न ही अपील के दौरान उसके पति व बेटे को जमानत मिली। रानी के बेटे का विवाह दिसंबर 2000 में जानकी से हुआ था। एक मार्च 2001 को जानकी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

विश्व विकलांग दिवस पर नि:शक्त को पहली ही सुनवाई पर फैसले का तोहफा

आमतौर पर अदालत में मुकदमे पर तारीख पर तारीख पड़ने की बात सुनने को मिलती है, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक नि:शक्त को पहली ही सुनवाई पर राहत देकर विश्व विकलांग दिवस का तोहफा दिया।

न्यायाधीश मोहम्मद रफीक ने मानसिंह की याचिका यह कार्यवाही की। प्रार्थी ने पीटीईटी के जरिए बीएड में दाखिले की पात्रता हासिल की थी , उसे कॉलेज भी आवंटित हो गया। फीस जमा कराने के बावजूद भरतपुर के महाराजा अग्रसेन टी.टी. महाविद्यालय ने उसे पाठ्यक्रम में शामिल करने से इनकार कर दिया।

प्रार्थीपक्ष के अनुसार कॉलेज प्रार्थी के दोनों पैरों से चलने-फिरने में अक्षम होने के कारण दाखिले से इनकार कर रहा है, जबकि वह पूरे सत्र कुर्सी या जमीन पर बैठकर पढ़ाई करने को तैयार है। प्रार्थी ने डीग के एमएजे गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की है। उसने बीएड के लिए आवंटित कॉलेज में फीस जमा कराने की रसीद भी दिखाई।

न्यायालय ने इसे नोटिस जारी किए बिना ही मंजूर कर लिया और कॉलेज को निर्देश दिया कि वह पाठ्यक्रम की पढ़ाई में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होने दे। साथ ही नि:शक्तजन सम्बन्धी कानून के तहत सभी आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराए।

Tuesday, November 2, 2010

ब्लूलाइन बसों पर लगे प्रतिबंध को कोर्ट की मंजूरी


दिल्ली उच्च न्यायालय ने ब्लूलाइन बसों को हटाने के राष्ट्रीय राजधानी की सरकार के फैसले पर सोमवार को रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि ब्लूलाइन संचालकों की रोजी रोटी से ज्यादा महत्वपूर्ण लोगों की जिंदगी है।

न्यायमूर्ति संजीव किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने बस संचालकों की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि ब्लूलाइन बसों पर रोक लगाने से उनकी रोजी रोटी छिन जाएगी। पीठ ने कहा कि उन लोगों के परिजनों की रोजी रोटी का क्या होगा जिन्होंने ब्लूलाइन बसों की वजह से अपनी जिंदगी खो दी।

अदालत ने दिल्ली सरकार द्वारा 27 अक्टूबर को राजधानी से ब्लूलाइन बसों के संचालन पर पूरी तरह से रोक लगाने संबंधी अधिसूचना पर स्थगनादेश देने से इंकार कर दिया। अदालत ने हालांकि संचालकों की फरियाद भी सुनने पर सहमति जताई और सरकार से जवाब दाखिल करने के लिए कहा। इस मामले पर अगली सुनवाई के लिए अगले वर्ष 10 जनवरी की तारीख मुकर्रर की गई है।

अदालत ने ब्लूलाइन बसों के संगठन की ओर से दाखिल याचिका पर यह आदेश दिया। इस याचिका में ब्लूलाइन बसों को बंद करने के दिल्ली सरकार के फैसले को चुनौती दी गई थी। उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना से स्वीकृति मिलने के बाद सरकार ने इन बसों को हटाने के लिए 27 अक्टूबर को अधिसूचना जारी की थी।

दिल्ली सरकार ने राजधानी में ब्लूलाइन बसें पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के लिए 14 दिसंबर की तारीख तय की है।

अब विदेशों से परीक्षा संचालन सीखेंगे राज्य आयोगों के अध्यक्ष

देश के राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष अब परीक्षा संचालन व अन्य व्यवस्थाओं की बेहतरीन प्रणाली सीखने के लिए विदेश यात्राएं करेंगे। यूपीएससी ने केन्द्र सरकार से इस संबंध में अनुमति प्राप्त कर ली है। मामले की जानकारी देते हुए नेशनल कान्फ्रेंस ऑफ चेयरपर्सन्स ऑफ पब्लिक सर्विस कमीशंस की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन व आन्ध्र प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. वाई वेंकटरामी रेड्डी ने बताया कि इसके लिए फिलहाल, छह देश चयनित किए गए हैं। इसमें इंग्लैंड, जापान, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका व कनाडा शामिल हैं।

डॉ. रेड्डी के अनुसार कुछ वर्ष पूर्व तक राज्य के आयोगों के अध्यक्षों को विदेश जाने की छूट थी। अब इसे वापस लागू किया जा रहा है। डॉ. रेड्डी ने बताया कि देश के सभी 28 आयोगों के अध्यक्ष हर वर्ष किसी न किसी राज्य में सम्मेलन आयोजित करते हैं। इसमें राज्य आयोगों में चल रही अच्छी प्रक्रियाओं को साझा करने के साथ ही विभिन्न समस्याओं पर भी चर्चा की जाती है। इसी क्रम में अगले साल जनवरी में महाराष्ट्र में कान्फ्रेंस आयोजित किया जाएगा। स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में आज इसके लिए एजेन्डा निर्धारित किया गया। उन्होने बताया कि अध्यक्षों व सदस्यों की सेवानिवृत्ति की आयु सीमा 62 साल से बढ़ा कर 65 साल करने की मांग पिछले कई वर्ष से की जा रही है। इसके लिए संविधान में संशोधन की जरूरत है। सरकार ने हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की आयु सीमा बढ़ा दी है। इसी क्रम में आयोगों के लिए भी आयु सीमा बढ़ाने की जरूरत है। बैठक में इसके साथ ही देश में आयोग के अध्यक्षों व सदस्यों के क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। यह सम्मेलन नेशनल कान्फ्रेंस से पहले आयोजित होंगे। उत्तरी राज्यों का सम्मेलन इस साल उत्तर प्रदेश में, दक्षिणी राज्यों का कर्नाटक में, पूर्वी राज्यों का बिहार में, पश्चिमी राज्यों का राजस्थान में व पूर्वोत्तर के राज्यों का सम्मेलन आसाम में आयोजित किया जाएगा। इनमें होने वाले निर्णयों की चर्चा नेशनल कान्फ्रेंस में की जाएगी। बैठक में उत्तर प्रदेश समेत कुल नौ राज्यों के लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष उपस्थित रहे। इनके साथ ही यूपीएससी के उप सचिव किशन लाल भी उपस्थित रहे।

राखी सावंत को कोर्ट में घसीटा

अक्सर विवाद में रहने वाली राखी सावंत एक बार फिर सुर्खियों में हैं। राखी सावंत का टीवी शो 'राखी का इंसाफ' कानूनी पचड़े में फंसता नजर आ रहा है। मुंबई के एक वकील को इस शो में राखी सावंत की अदाएं और उनका तौर तरीका नागवार गुजरा है। वकील सुशन कुंजुरमन ने बांबे हाई कोर्ट में इस बाबत एक जनहित याचिका दायर की है। सुशन का कहना है कि इस शो में राखी सावंत के तौर तरीके बेहद आपत्तिजनक हैं और इसमें न्यायपालिका का मखौल उड़ाया गया है।

वकील के मुताबिक इस शो में राखी सावंत जिस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करती हैं, वह कानून, न्याय, नियमों, जजों, पुलिस मशीनरी, वादी और उनके परिवार वालों, अदालत और महिलाओं के कल्याण के लिए बने संगठनों, सबके मान-सम्मान को ठेस पहुंचाती है।

सुशन ने शो पर तुरंत प्रतिबंध लगाए जाने की मांग की है। इस मामले की सुनवाई कुछ दिनों में शुरू होगी। इस कार्यक्रम के निर्माता को केस की कॉपी भेज दी गई है। हालांकि, निर्माता का कहना है कि उसे कोर्ट की ओर से भेजा गया कोई नोटिस नहीं मिला है।


कैसे करती हैं राखी 'इंसाफ'

एनडीटीवी इमेजिन पर प्रसारित होने वाले इस शो में राखी सावंत आम लोगों को बुलाकर उनकी समस्याएं सुनती हैं और फैसले सुनाती हैं। आम तौर पर इस शो में शामिल होने वाले लोग विवाहेत्तर संबंध, शराबी पति, सास-ससुर द्वारा प्रताड़ना और पत्नी को पीटने जैसी घरेलू लेकिन जटिल समस्याएं लेकर आते हैं। इस शो की एंकर राखी ने शो शुरू होने से पहले दावा किया था कि उनके पास ऐसी परेशानियों का हल है। राखी के मुताबिक उनका शो लोगों को कानूनी इंसाफ नहीं दिलाएगा। उनके मुताबिक यह शो उन लोगों के लिए है जो कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाए बिना अपनी घरेलू परेशानियों से निजात पाना चाहते हैं।

राखी के मुताबिक वे अपनी अनूठी स्टाइल, ईमानदारी, बिंदास रवैये और बहिर्मुखी स्वभाव के चलते लोगों की दिक्कतें दूर करेंगी। उनका यह भी कहना है कि वह अपने दिल से निकले उपायों से लोगों की मुश्किलें कम करती हैं। उनका यह भी कहना है कि वह पुलिस नहीं हैं। न ही उनके पास पढ़ाई-लिखाई की कोई डिग्री है। लेकिन राखी का कहना है कि उनके पास जीवन प्रबंधन की डिग्री है।

तलाक के लिए अदालत पहुंचीं आशा भोंसले की बहू

दिग्गज गायिका आशा भोंसले की बहू साजिदा उर्फ रमा भोसले ने क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए परिवार अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इस अदालत ने आशा के बेटे और संगीत निर्देशक हेमंत भोसले को अंतरिम गुजारा भत्ता के रूप में अपनी पत्नी साजिदा को 25 हजार रुपए प्रति माह देने का आदेश दिया।

बांद्रा में परिवार अदालत ने हाल में साजिदा की तलाक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। साजिदा ने आरोप लगाया था कि उसके साथ 1985 में शादी के बाद से बुरा बर्ताव हो रहा है।

पिछले वर्ष एयर इंडिया की विमान परिचायिका के पद से सेवानिवृत्त हुई साजिदा ने अपनी याचिका में प्रति माह पांच लाख रुपए के गुजारे भत्ते की मांग करते हुए कहा कि हेमंत ने मेरा अपमान किया और अंतत: वर्ष 2003 में एक ब्रिटिश महिला के लिए मुझे छोड़कर चला गया।

उन्होंने हालांकि अपनी सास आशा भोसले के खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाए हैं। साजिदा ने अपने पति पर संपत्ति बेचने संबंधी कई आरोप लगाए हैं।

उधर 61 वर्षीय हेमंत का कहना है कि साजिदा गुजारा भत्ता लेने की हकदार नहीं हैं क्योंकि वह पैसे कमा रही हैं और उनकी अच्छी खासी आमदनी है।

उन्होंने कहा कि उनके पास मुंबई में कोई संपत्ति नहीं है और पंचगनी बंगला उनकी मां आशा का है। हेमंत ने कहा कि उनके पास स्काटलैंड में संपत्ति है जिसका मालिकाना हक संयुक्त रूप से उनके और एक ब्रिटिश महिला के बीच है।