पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Friday, March 5, 2010

आरोपी मांग सकता है प्राथमिकी की प्रति

बांबे हाईकोर्ट ने एक ऐसा नियमन दिया है, जो किसी भी आरोपी को पुलिस की मनमानी या अत्याचार सेबचाने के लिहाज से अहम है। अदालत ने कहा है कि कोई आरोपी गिरफ्तारी के वक्त चाहे तो अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी की प्रति मांग सकता है और पुलिस को उसे वह मुहैया कराना होगा।

यह नियमन बांबे हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत के आवेदन की सुनवाई के दौरान दी। पुणे के मुहम्मद खालिद शेख [25 वर्ष] ने जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोपों के मामले में अग्रिम जमानत की मांग की थी। शेख ने कहा कि रिमांड की अवधि में उसे अपने बचाव के लिए प्राथमिकी की प्रति पाना जरूरी है। सामान्य तौर पर गिरफ्तारी के बाद आरोपी को जिस मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है वह मजिस्ट्रेट ही प्राथमिकी की प्रति दे सकता है। लेकिन न्यायाधीश डी.जी. कार्णिक ने कहा कि यदि मांग की जाए तो पुलिस अधिकारी को भी गिरफ्तारी के समय प्राथमिकी की प्रति देनी होगी।

शेख ने बहस में कहा कि अपराध दंड संहिता के तहत मजिस्ट्रेट को प्राथमिकी की प्रति देने का अधिकार है और यह निर्विवाद सच है कि प्राथमिकी सार्वजनिक दस्तावेज है। शेख ने कहा कि भारतीय साक्ष्य कानून 1872 की धारा 76 के तहत सरकारी अधिकारी ऐसे किसी सार्वजनिक दस्तावेज की प्रमाणित प्रति उस व्यक्ति को दे सकता है जो उसे देखना चाहे। अभियोजन पक्ष ने इस दलील का यह कहते हुए विरोध किया कि इसी तर्क के आधार पर आरोपी रिमांड के समय गवाहों के बयान की मांग भी कर सकता है। अदालत ने कहा कि आरोपी रिमांड के दौरान गवाह के बयान की प्रति पाने का हक नहीं है।

Wednesday, March 3, 2010

अब फैसले में देरी नहीं कर सकेंगे जज

उच्च न्यायिक सेवाओं में जवाबदेही और मानक स्थापित करने के लिए सरकार नया विधेयक लाने जा रही है। इसके तहत न्यायाधीशों को किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद तीन महीने के अंदर निर्णय सुनाना होगा। यही नहीं, विधेयक में साफ कहा गया है कि न्यायाधीश चुनाव नहीं लड़ सकते, किसी क्लब या संगठन के सदस्य नहीं हो सकते और किसी ऐसी कंपनी के मामले की सुनवाई नहीं कर सकते, जिसके शेयर उनके पास हैं।

कानून मंत्रालय के प्रस्तावित न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक 2010 का उद्देश्य न्यायिक सेवाओं में मानक स्थापित करना तथा ऐसी प्रणाली बनाना है जिससे सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ दु‌र्व्यवहार एवं अयोग्यता की शिकायतों को दूर किया जा सके।

इस विधेयक में न्यायाधीशों की संपत्ति और दायित्वों की घोषणा का भी प्रावधान किया गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद वर्तमान बजट सत्र के दौरान ही इसे संसद के समक्ष पेश किए जाने की संभावना है।

प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि बहस पूरी होने के तीन महीने की समय-सीमा के अंदर न्यायाधीश को अपना निर्णय देना होगा। विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि उच्च न्यायिक सेवाओं के सदस्यों को अपने न्यायिक कार्य के दौरान निष्पक्ष रहना चाहिए और उनके द्वारा दिए गए निर्णय धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान से प्रभावित नहीं होने चाहिएं।

विधेयक के अन्य दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि न्यायाधीश चुनाव नहीं लड़ सकते। वे किसी क्लब या संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। बार काउंसिल के किसी सदस्य के साथ घनिष्ठता नहीं बढ़ा सकते। अपने संबंधियों के अलावा और किसी से उपहार या आतिथ्य नहीं स्वीकार कर सकते और उन कंपनियों के मामलों की सुनवाई नहीं कर सकते जिनके शेयर उनके पास हैं।

प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि न्यायाधीश को अपने किसी निर्णय के संबंध में मीडिया को साक्षात्कार नहीं देना चाहिए। इसके अलावा न्यायाधीशों को राजनीतिक मसलों पर किसी सार्वजनिक बहस में भाग नहीं लेना चाहिए।

न्यायाधीशों द्वारा न्यायिक मानकों को गिराने वाले किसी भी कदम को 'दु‌र्व्यवहार' माना जाएगा और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

न्यायाधीशों के विरुद्ध दु‌र्व्यवहार या भ्रष्टाचार की शिकायत को तीन न्यायाधीशों की जांच समिति के समक्ष पेश किया जाएगा। जांच समिति यदि न्यायाधीश के खिलाफ किसी शिकायत को वाजिब पाती है तो उसे न्यायिक निगरानी समिति के पास भेजा जाएगा। यह समिति मामले की जांच कर जांच रिपोर्ट को राष्ट्रपति के पास उक्त न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई के लिए भेजेगी।

राज्यसभा के सभापति के रूप में उप राष्ट्रपति न्यायिक निगरानी समिति की संभवत: अध्यक्षता करेंगे। इस समिति के अन्य सदस्यों में भारत के प्रधान न्यायाधीश [सीजेआई], सीजेआई द्वारा नामांकित हाईकोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए दो नामचीन विधिवेत्ता शामिल होंगे।

भारत के सभी 21 हाईकोर्ट में एक-एक जांच समिति का गठन किया जाएगा। विधेयक के मुताबिक न्यायाधीश के दु‌र्व्यवहार के अनुसार उसे चेतावनी, फटकार या प्रतिबंध की सजा दी जा सकती है। लेकिन यदि न्यायिक मानकों के उल्लंघन की प्रकृति गंभीर है तो उसके खिलाफ महाभियोग लगाया जा सकेगा। यह विधेयक न्यायाधीश जांच कानून 1968 का स्थान लेगा।

Monday, March 1, 2010

दत्तक पुत्र को नौकरी पाने का अधिकार- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि गोद लिए हुए पुत्र को उसके पिता की जगह नौकरी पाने का अधिकार है। जस्टिस एसके अग्निहोत्री की सिंगल बेंच ने एसईसीएल से कहा है कि याचिकाकर्ता को नौकरी देने पर विचार किया जाए।
कोरिया जिले का चिरमिरी निवासी सोमनाथ सिंह की एसईसीएल में कार्यरत रहने के दौरान मौत हो गई थी। उसके गोद लिए हुए पुत्र रविंद्र सिंह ने नौकरी के लिए आवेदन किया लेकिन विभाग ने सगा बेटा न होने के आधार पर उसे नौकरी नहीं दी।

इसके खिलाफ उसने वकील अशोक कुमार शुक्ला के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि नेशनल कोल वेजेस एग्रीमेंट के तहत दत्तक पुत्र को नौकरी पाने का अधिकार है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने तर्को से सहमत होकर याचिकाकर्ता को उपयुक्त पद पर नौकरी देने के लिए विचार करने को कहा है।

छात्राओं की फीस वापस करो- मप्र हाईकोर्ट

तीन छात्राओं से चार-चार लाख रुपए फीस लेकर वापस न करने वाले एक निजी मेडिकल कॉलेज को मप्र हाईकोर्ट ने फटकार लगाई है। कॉलेज को फीस वापस करने के निर्देश के साथ ही कोर्ट ने तीन सप्ताह में जवाब तलब किया है।
इंदौर के इंडेक्स मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने वाली तीन छात्राओं ने बाद में शासकीय मेडिकल कॉलेज, सागर में सीटें उपलब्ध होने पर उसमें प्रवेश ले लिया था। कॉलेज ने अब तक इन छात्राओं की फीस वापस नहीं की है।

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एससी सिन्हो की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई की। छात्राओं शोभा पाटीदार, दीपिका थोहाड़े और नयना गोठिया ने कोर्ट में अपील की थी। छात्राओं के अधिवक्ता सिद्धार्थ गुप्ता ने बताया कॉलेज प्रबंधन ने छात्राओं से प्रवेश के समय पूरी फीस 2.80 लाख रुपए और बैंक गारंटी सहित करीब चार-चार लाख रुपए जमा कराए थे। कई बार आवेदन करने के बाद भी कॉलेज फीस वापस करने में आनाकानी कर रहा था।

Saturday, February 27, 2010

कोर्ट की कर्मचारी ने जज पर फेंकी चप्पल

आंध्र प्रदेश में गुरुवार को एक महिला कर्मचारी ने अदालत कक्ष में ही एक न्यायाधीश पर चप्पल फेंक दी। महिला ने उक्त न्यायाधीश पर अपने को अपमानित करने का आरोप लगाया है। पुलिस ने बताया कि परिवार अदालत में स्टेनोग्राफर के रूप में कार्यरत राधा रानी को चतुर्थ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश षणमुगम पर चप्पल फेंकने के लिए गिरफ्तार किया गया है।
 
राधा ने बताया कि पिछले सात महीनों से मानसिक रुप से परेशान और अपमानित होते रहने के कारण उसने न्यायाधीश पर चप्पल फेंकी थी। यह घटना गुरुवार को उस समय हुई जब न्यायाधीश ने इस बात के लिए महिला को फटकार लगाई कि वह चप्पल को बाहर क्यों नहीं रख कर आई और उसे चप्पल को अपने सिर पर रख लेना चाहिए। इसके बाद राधा रानी ने भरी अदालत में न्यायाधीश पर चप्पल फेंक दी।

न्यायाधीश ने इस घटना के बारे में कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

कसाब का आरोप, मेरे खाने में दवा मिलाते हैं

पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब ने विशेष अदालत से शिकायत की है कि जेल के अफसर उसे दवा मिला खाना दे रहे हैं, जिससे उसे चक्कर आते हैं। कसाब के इस आरोप पर जज एम. एल. तहलियानी ने उसे फटकार लगाते हुए कहा कि वह बार-बार इस तरह के बेबुनियाद आरोप न लगाए। कसाब ने कुछ दिन पहले भी ऐसा आरोप लगाया था।

कसाब के वकील के.पी. पवार ने भी पुष्टि की कि अभियुक्त ने ऐसी शिकायत की है, लेकिन अदालत ने उसके आरोपों को खारिज कर दिया। इससे पहले कसाब ने आरोप लगाया था कि अधिकारी उसे दवा मिला खाना दे रहे हैं, जिसके बाद जज ने कसाब को दिए जाने वाले खाने की जांच के लिए फरेंसिक लैबरेटरी में भेजा था। जांच में कसाब के दावे सही साबित नहीं हुए थे।

कसाब ने यह भी शिकायत की थी कि जेल के गार्ड टाइम पास करने के लिए उसे गाना गाने को कहते हैं लेकिन वह ऐसा नहीं करता। अभियुक्त ने यह भी आरोप लगाया कि गार्ड ने उससे यह भी पूछा कि क्या उसकी कोई गर्लफ्रेंड है, जिसके जवाब में उसने कहा कि मैंने लड़कों के स्कूल में पढ़ाई की है।

एक अन्य घटना में आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला है कि महाराष्ट्र सरकार ने कसाब को किसी भी हमले से बचाने के लिए ऑर्थर रोड सेंट्रल जेल में पांच करोड़ 24 लाख रुपये की लागत से हाई सिक्युरिटी वाले सेल का निर्माण किया है। सेल के बाहरी हिस्से को गोली और बम से सुरक्षित करने के लिए स्टील लगाई गई है। उसे सेल से सीधे कोर्ट तक ले जाने के लिए एक सुरंग का भी निर्माण किया गया है।

ग्रीष्मावकाश में एकल न्यायाधीश के आदेश के विरुद्ध स्पेशल अपील पोषणीय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तीन जजों की पूर्ण पीठ ने यह व्यवस्था दी है कि ग्रीष्मावकाश के दौरान एकल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध दो जजों के समक्ष स्पेशल अपील दाखिल की जा सकती है। यह फैसला पूर्ण पीठ के समक्ष संदर्भित किया गया था। यह फैसला न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति अरुण टण्डन व न्यायमूर्ति संजय मिश्रा की पूर्ण पीठ ने कुलदीप कुमार त्रिपाठी की स्पेशल अपील पर दिया है।

कहा गया कि अभी तक ग्रीष्मावकाश में एकल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध दो जजों के समक्ष स्पेशल अपील दायर करने पर मतैक्य नहीं था। एक न्यायिक व्यवस्था के अनुसार ग्रीष्मावकाश में एकल जज के पास दो जज की अधिकारिता रहती है। दूसरी न्यायिक व्यवस्था के अनुसार एकल न्यायाधीश के आदेश के विरुद्ध दो जजों के समक्ष ही स्पेशल अपील दाखिल हो सकती है। मुख्य स्थायी अधिवक्ता एमसी चतुर्वेदी ने पूर्णपीठ के समक्ष तर्क दिया कि हाईकोर्ट रूल्स के अनुसार ग्रीष्मावकाश में एकल न्यायाधीश एकल जज की अधिकारिता के तहत ही कार्य करते हैं। ऐसे में उनके हर आदेश को दो जजों के समक्ष स्पेशल अपील में चुनौती दी जा सकती है।

Thursday, February 25, 2010

वीआरएस आवेदन वापस लिया जा सकता है - मुंबई हाईकोर्ट

मुंबई हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) का आवेदन नियोक्ता की स्वीकृति से पहले वापस लिया जा सकता है। अदालत ने यह फैसला नागपुर स्थित यूको बैंक में कार्यरत मधुसूदन त्रिवेदी की याचिका पर सुनाया।
न्यायमूर्ति एस.ए.बोबदे और वसंती नाइक की खंडपीठ ने कहा कि हालांकि वीआरएस नियमों में यह व्यवस्था नहीं है,लेकिन आवेदन वापस लिया जा सकता है। त्रिवेदी ने बैंक की ओर से नवंबर 2000 में शुरू की योजना के तहत वीआरएस लेने के लिए आवेदन किया था। उन्होंने एक जनवरी 2001 को इसके लिए आवेदन किया।
याचिका में उन्होंने कहा कि आवेदन के समय उन्हें योजना के सभी प्रावधानों की जानकारी नहीं थी। बाद में जानकारी होने पर उन्होंने अपना आवेदन वापस लेना चाहा, लेकिन बैंक ने यह कह कर मना कर दिया कि नियमों के मुताबिक आवेदन वापस नहीं लिया जा सकता। इस फैसले के खिलाफ त्रिवेदी ने मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने पाया कि त्रिवेदी के आवेदन वापस लेने की मांग तक बैंक ने उसके आवेदन को स्वीकार नहीं किया था।

Wednesday, February 24, 2010

पारिवारिक अदालतों में एटॉर्नी शिरकत नहीं कर सकते-मुम्बई हाई कोर्ट

मुम्बई हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि पति-पत्नी के एटॉर्नी वैवाहिक विवाद के मामले में किसी पारिवारिक अदालत में उनकी ओर से न तो शामिल हो सकते हैं और न ही जिरह कर सकते हैं। न्यायाधीश रौशन दलवी ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि एटॉर्नी को किसी पार्टी की ओर से शामिल होने की इजाजत दी गई तो अदालत अयोग्य और अनघिकृत लोगों की ओर से संचालित होने लगेगी। नीलम शेवाले की ओर से दायर याचिका पर न्यायालय ने पिछले सप्ताह यह फैसला सुनाया है। याचिका में कहा गया था कि उनकी ओर से उनके एटॉर्नी को पेश होने की इजाजत दी जा सकती है, क्योंकि वह बीमार हैं, अंग्रेजी नहीं जानती हैं, पति की ओर से मानसिक रूप से प्रताडित की गई हैं और अदालती कार्यवाही के दौरान खड़ी नहीं रह सकतीं।

किरायेदार पर बिना वजह मामले को लंबा खींचने के लिये एक लाख का जुर्माना

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मकान मालिक के खिलाफ मुकदमे को 20 वर्षों से अधिक समय तक खींच कर उसे उसकी संपत्ति से वंचित रखने के दोषी किरायेदार पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है ।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश एस. एन. धींगरा ने बताया कि किरायेदार तरह. तरह के बहाने बनाकर परिसर खाली करने के आदेश का उल्लंघन करता रहा जिससे पता चलता है कि कोई व्यक्ति कानून के साथ कैसे सफलतापूर्वक खिलवाड कर सकता है और संपत्ति के मालिक को लंबे समय तक उसके फायदों से वंचित रख सकता है1 यह मामला दक्षिणी दिल्ली के कोटला मुबारकपुर में 500 वर्ग गज संपत्ति से संबंधित है ।
न्यायमूर्ति धींगरा ने कहा कि यह याचिका निचली अदालत.. उच्च न्यायालय या कार्यकारी अदालत और उच्चतम न्यायालय के सभी फैसलों को चुनौती देकर मामले को और अधिक लटकाने की कोशिश थी। न्यायालय ने उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय समेत सभी न्यायालयों में मुकदमा हार चुके किरायेदार एस. एस. गुप्ता की याचिका खारिज कर दी और उसे मकान मालिक हिम्मत सिंह के परिसर को खाली करने के निर्देश दिये हैं। गौरतलब है कि हिम्मत सिंह की वर्ष 1983 में मौत हो चुकी है ।
न्यायमूर्ति धींगरा ने इस याचिका को फर्जी और तथ्यों से परे बताते हुये इसे खारिज कर दिया तथा मामले को लंबा खींचने के लिये याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। उन्होंने निर्देश दिया है कि अगर किरायेदार यह जुर्माना अदा नहीं कर पाता है तो न्यायालय अपनी तरफ से यह रकम मकान मालिक को देगा !
संपत्ति के मालिक के वकील मंजीत सिंह अहलूवालिया ने बताया कि किरायेदार की 1983 के डिक्री आदेश को चुनौती देने वाली याचिका उच्चतम न्यायालय समेत सभी न्यायालयों से खारिज कर दी गयी थी। इसके बावजूद उसने मामले को लटकाने के लिये विभिन्न अदालतों में याचिका दायर कर रखी थी।

Tuesday, February 23, 2010

ब्लैंक चेक अचूक हथियार नहीं है बैंकों का - बॉम्बे हाई कोर्ट

लोन लेने वालों से बैंक अक्सर पोस्ट डेटेड ब्लैंक चेक मांगते हैं। यह चेक भुगतान की सिक्युरिटी के तौर पर लिया जाता है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर ऐसा चेक बाउंस हो जाए तो लोन लेने वाले पर निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट (एनआई) ऐक्ट के तहत क्रिमिनल केस नहीं चलाया जा सकता।

पिछले हफ्ते यह फैसला अहमदनगर जिले के रामकृष्णा अर्बन कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी की याचिका पर सुनाया गया। सोसाइटी ने राजेंद्र वर्मा नाम के शख्स को साल 2000 में 2 लाख रुपये का लोन दिया था। वर्मा ने भुगतान की सिक्युरिटी के नाम पर 10 ब्लैंक पोस्ट डेटेड चेक जारी किए। इनमें से जनवरी 2008 का एक चेक बाउंस हो गया। इसके बाद सोसाइटी ने वर्मा के खिलाफ शिकायत की। मैजिस्ट्रेट कोर्ट ने कहा कि वर्मा एनआई ऐक्ट के तहत दोषी नहीं हैं और उन्हें बरी कर दिया गया।

सोसाइटी ने हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच में अर्जी दाखिल की और सेशन कोर्ट में अपील दाखिल करने की इजाजत मांगी। जज ने अर्जी खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि एनआई ऐक्ट का मकसद चेक को वित्तीय माध्यम के तौर पर विश्वसनीयता दिलाना है, इसका मकसद लोन की जल्द और असरदार रिकवरी नहीं है। कानून बनाने वालों ने ऐसी कल्पना नहीं की होगी कि उधार देने वाले लोग या बैंक लोन देते या मंजूर करते वक्त सिक्युरिटी के रूप में ब्लैंक या पोस्ट डेटेड चेक लेंगे। फिर एनआई एक्ट के सेक्शन 138 के तहत मुकदमा चलाने और सजा दिलाने की धमकी देकर लोन का भुगतान मांगेंगे।

पर्दा इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं-सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की फोटो मतदाता सूची से बुर्का पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं का चित्र हटाए जाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि किसी को यह छूट प्रदान की गई तो लाखों लोग आवेदन लेकर खड़े हो जाएंगे, जिससे बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी। इससे पहले आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि पर्दे के रिवाज की न तो कोई कानूनी हैसियत है और न ही इसे इस्लाम का अभिन्न हिस्सा माना जा सकता है। आयोग की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा, हाईकोर्ट कह चुका है कि पर्दा इस्लाम धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है। उनकी इस दलील पर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, दो-तीन किताबों के निष्कर्ष पर यह बात नहीं कही जा सकती। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा, वे इस मुद्दे पर विचार नहीं कर रहे हैं कि पर्दा इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है कि नहीं। कोर्ट ने मामले की सुनवाई दो सप्ताह के लिए टालते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि वह स्वयं सोचकर बतायें कि ऐसा कौन सा आदेश पारित किया जा सकता है जो हर तरह से उचित हो। अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल मोहन जैन का कहना था कि याचिका में रखी मांग नहीं मानी जा सकती है। आयोग ने कहा, फोटो के दुरुपयोग को ध्यान में रखा गया है इसलिए सीडी में फोटो नहीं रखी जाती। कागजी प्रति सिर्फ चुनाव कराने वाले अधिकारियों व राजनैतिक दलों के एजेंटों को दी जाती हैं। याचिकाकर्ता का कहना था कि अफसरों को फोटो वाली मतदाता सूची देने पर उन्हें आपत्ति नहीं है लेकिन दलों के एजेंटों को फोटो वाली सूची न दी जाये क्योंकि उनके हाथ में आने से वे उसकी अनगिनत प्रतियां करवा सकते हैं और उससे मुस्लिम धर्म में आस्था रखने वाली पर्दानशीन महिलाओं को ऐतराज हो सकता ह

बलात्कार और हत्या के आरोपी को फांसी की सजा

किशोरी की बलात्कार के बाद हत्या के आरोपी युवक को मध्यप्रदेश के खंडवा के जिला न्यायालय ने मंगलवार को फांसी की सजा सुनाई।

अपर सत्र न्यायाधीश यू सी जैन ने एक साल पुराने इस प्रकरण में सुनवाई पूरी कर 22 वर्षीय राहुल राजपूत को दोषी करार देते हुए उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई। न्यायाधीश ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि राहुल ने निर्ममता पूर्वक किशोरी की हत्या की है और यह अपराध क्षमा योग्य नहीं है।

अभियोजन के अनुसार 20 फरवरी 2009 को खंडवा नगर के समीप भोजाखेड़ी गांव में एक खेत के समीप कुएं पर 18 वर्षीय किशोरी कपडे धोने के लिए गई थी। इसी दौरान आरोपी ने उसके साथ बलात्कार किया और बात खुलने के डर से उसकी पत्थर से कुचलकर हत्या कर दी थी।

माया की मूर्तियां लगाना चुनाव चिह्न संहिता का उल्लंघन है या नहीं, चुनाव आयोग तीन महीने के अंदर फैसला करें- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से बसपा के चुनाव चिह्न (हाथी) का दुरूपयोग किए जाने संबंधी शिकायतों पर तीन महीने के अंदर फैसला करने को कहा है।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थलों पर मुख्यमंत्री मायावती व हाथी की मूर्तियां लगाए जाने का विरोध करने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आयोग से यह अनुरोध किया। मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा व न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने वकील रविकांत की याचिका पर सुनवाई तीन महीने के लिए टाल दी।
इससे पहले रविकांत ने कहा कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने अभी तक याचिका पर अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। चुनाव आयोग की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि आयोग को ऐसी ही शिकायतों के कुछ और ज्ञापन मिले हैं। इसीलिए अभी तक जवाब नहीं दाखिल किया है। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए आयोग ने निर्णय किया है कि कोर्ट के रूख के मुताबिक ही काम करेगा। इस पर पीठ ने कहा कि आयोग तो स्वयं एक संवैधानिक संस्था है, वह ज्ञापनों पर निर्णय ले सकता है।
बसपा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश चंद्र मिश्रा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद चुनाव आयोग में शिकायत की गई है। बसपा चुनाव आयोग को अपना जवाब दे चुकी है। उन्होंने कहा कि हाथी की मूर्तियां चुनाव चिह्न नहीं हैं। वे हाथी स्वागत मुद्रा में हैं। राष्ट्रपति भवन से लेकर अक्षरधाम मंदिर तक में हाथियों की मूर्तियां लगी हैं तो क्या सब बसपा के चुनाव चिह्न मान लिए जाएंगे?
उत्तर प्रदेश सरकार की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने भी यही रूख अपनाते हुए कहा कि एक मामले में दो जगह सुनवाई नहीं हो सकती। कोर्ट इस याचिका को निपटा दे और चुनाव आयोग को फैसला करने दे। उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थलों पर मुख्यमंत्री की मूर्तियों को विरोध करते हुए रविकांत ने कहा कि सरकार ने हजारों करोड़ रूपये इस निर्माण में बर्बाद कर दिए हैं। यह महत्वपूर्ण मुद्दा है और कोर्ट को इस पर सुनवाई करनी चाहिए।
सतीश मिश्रा ने आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि करीब 450 योजनाएं कांग्रेस के नेताओं के नाम चल रही हैं। राजघाट पर महात्मा गांधी और अन्य नेताओं की समाधि पर खर्च हुआ। तीन मूर्ति भवन पर खर्च हुआ। इन सबका किसी ने कभी विरोध नहीं किया। रविकांत ने कहा कि उन्हें दलित नेताओं के स्मारकों पर कोई आपत्ति नहीं है। आपत्ति सिर्फ मुख्यमंत्री और बसपा के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों को लेकर है। उन्होंने ये मूर्तियां हटाए जाने और उन्हें लगाने पर हुआ खर्च बसपा से वसूले जाने की मांग की।

Friday, February 19, 2010

न्यायिक अधिकारी के रिवर्सन पर हाईकोर्ट की रोक

राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर खंडपीठ ने उच्च न्यायिक सेवा के एक अधिकारी को न्यायिक सेवा में लगाने के प्रकरण में स्टे देते हुए रजिस्ट्रार जनरल से स्पष्टïीकरण मांगा है। उच्च न्यायालय प्रशासन ने उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी एल.डी.किराड़ू को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर 28 जनवरी 2009 को लगाया था, जबकि किराड़ू अपर सेशन न्यायाधीश फास्ट टे्रक के पद पर कार्यरत थे। इस रिवर्सन के विरुद्ध किराड़ू ने उच्च न्यायालय जयपुर पीठ में याचिका दायर की थी। 
न्यायालय ने 15 जनवरी 2010 के अपने आदेश में रजिस्ट्रार जनरल को किराड़ू के सेवा संबंधी प्रकरण का अंतिम तौर पर निस्तारण कर एक माह में रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे लेकिन रजिस्ट्रार प्रशासन ने इस आदेश की पालना नहीं की, जिस पर खंडपीठ ने रजिस्ट्रार जनरल से स्पष्टïीकरण मांगा है। खंडपीठ ने यह पूछा है कि क्यों और किन परिस्थितियों में आदेश की पालना नहीं की गई। खंडपीठ ने साथ ही किराड़ू के रिवर्सन पर रोक लगा दी है। 
किराड़ू की ओर से अधिवक्ता संजीव प्रकाश शर्मा, रोशन भार्गव तथा उच्च न्यायालय की ओर से अधिवक्ता वी.एस.गुर्जर ने पैरवी की। गौरतलब है कि बीकानेर निवासी किराड़ू वर्तमान में जोधपुर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत हैं।