पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Friday, October 30, 2009

गवाही के लिए अदालत में हाजिर न होने वाले एसपी तीन घंटे न्यायिक हिरासत में।


गिरफ्तारी वारन्ट एवं वेतन रोकने का आदेश होने के बावजूद गवाही के लिए अदालत में हाजिर न होने वाले बनारस के पुलिस अधीक्षक नगर विजय भूषण को गुरुवार को फास्ट ट्रैक कोर्ट के अपर सत्र न्यायाधीश राहुल कुमार ने तीन घंटे तक न्यायिक हिरासत में रखा। बाद में क्षमा याचना करने पर उन्हे अभिरक्षा से छोड़ा गया।

एसपी विजय भूषण जब एसटीएफ लखनऊ में थे तो उन्होंने 10 अगस्त 2005 की रात्रि में वेव सिनेमा के पास मुठभेड में मुन्ना उर्फ फिरोज तथा डा. अजय सक्सेना उर्फ अजय त्रिपाठी को गिरफ्तार किया था। इस मामले में वादी स्वयं विजय भूषण है। अदालत के समक्ष उन्होंने 27 जनवरी 2007 को गवाही दी थी परन्तु बचाव पक्ष ने जिरह नहीं की। 30 मई 2009 को पुन: बचाव पक्ष की अर्जी को मंजूर कर जिरह के लिए विजय भूषण को अदालत ने तलब किया।

30 मई के बाद से करीब एक दर्जन बार अदालत ने सख्त से सख्त आदेश पारित किए। नोटिस, गिरफ्तारी वारन्ट व वेतन रोकने के आदेश हुए जिनका पालन करने के लिए अदालत ने बनारस के पुलिस उपमहानिरीक्षक को भी कई पत्र लिखे। लेकिन हर बार पुलिस महानिरीक्षक ने अदालत को सूचित किया कि कानून व्यवस्था कायम रखने की जरूरतों के चलते अगली तिथि पर विजय भूषण को गवाही के लिए जरूर भेजा जाएगा।

अदालत ने अपने अन्तिम पत्र में डीआईजी बनारस को लिखा कि विजय भूषण के अदालत में न आने से मुकदमे की कार्यवाही नहीं हो पा रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि विजय भूषण वाराणसी की पूरी कानून व्यवस्था संभाले हुए हैं। यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने वाली है, जो उचित नहीं है। अदालत ने काफी समय विजय भूषण को न्यायिक अभिरक्षा में रखने के बाद उनके द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र पर वारन्ट निरस्त करने का आदेश पारित किया। इस आदेश के बाद मुकदमें की गवाही प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।

वकील ने किया कोर्ट को गुमराह।


जेल में बंद अभियुक्त की जमानत के लिए पेश अर्जी में तथ्य छुपा कर अदालत को गुमराह करने के मामले को गंभीरता से लेते हुए सेशन अदालत ने गुरुवार को एक वकील को नोटिस जारी किया है। मामला सेशन अदालत में वकील गणोश जोशी की ओर से अभियुक्त श्रीगंगानगर पुरानी आबादी निवासी हीरालाल पुत्र पन्नालाल की जमानत के लिए पेश की गई अर्जी से जुड़ा है। जोशी ने अर्जी में यह जानकारी नहीं अंकित की कि अभियुक्त की जमानत के लिए पहले सेशन और बाद में हाईकोर्ट में जमानत अर्जी लगाई गई थी, जो कि खारिज हो गईं। अदालत की कार्रवाई के दौरान ही हाईकोर्ट में पूर्व में अभियुक्त की खारिज की गई जमानत अर्जी के आदेश भी आ गए।

कार्यवाहक सेशन जज सुशीलकुमार बागड़ी ने आदेश में उल्लेख किया है कि पूर्व में लगाई गई जमानत अर्जी का हवाला नहीं देना व्यावसायिक दुराचरण के साथ अदालत को गुमराह करने की श्रेणी में आता है, क्यों नहीं इस मामले में बार कौंसिल को कार्रवाई के लिए चिट्ठी लिखी जाए। मालूम हो कि अभियुक्त हीरालाल एक मामले में 13 साल से फरार चल रहा था। उसे पुलिस ने इसी महीने गिरफ्तार कर जेल भेजा था।

जमीन हथियाने के मामले में घिरे दिनकरण।


तमिलनाडु के एक गांव के कुछ लोगों ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनकरण के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि उन्होंने सरकारी जमीन की घेराबंदी के लिए लगाई गई बाढ़ को हटा दिया है ताकि इस बात के "सबूत नष्ट" हो जाएं कि वह उनके कब्जे में है।

कावेरीराजापुरम गांव के शिकायतकर्ता 66 ग्रामीणों में से एक वीएम रमन ने बताया कि उन्होंने बुधवार को शिकायत दर्ज कराई। इसमें कहा गया है कि दिनकरण ने जमीन पर कब्जा कर लिया है और बाढ़ हटा दी है। इस बीच, पुलिस ने बताया कि नियम के तहत शिकायत दर्ज होने की रसीद ग्रामीणों को दी गई है। जांच की जाएगी। गांव वालों ने पुलिस से संरक्षण भी मांगा है। शिकायत की प्रति जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को भी भेजी गई है।

टिप्पणी से इनकार 

दिनकरण के खिलाफ जमीन हथियाने के आरोप के चलते तिरूवल्लूर जिले के कलेक्टर वी पलानीकुमार ने पहले एक रिपोर्ट भेजी थी । समझा जाता है कि उसमें कहा गया है कि केवल कावेरीराजापुरम में ही दिनकरण के पास तकरीबन 500 एकड़ जमीन है। दिनकरण ने इस मुद्दे पर बोलने से इनकार करते हुए चुप्पी साध रखी है।

सर्वोच्च न्यायालय का बाटला हाऊस एनकाउंटर की न्यायिक जांच से इंकार


सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष दिल्ली के जामिया नगर के बटला हाउस इलाके में हुई मुठभेड़ की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराने की मांग करने वाली याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। पुलिस के साथ हुई इस मुठभेड़ में दो युवकों की मौत हो गई थी।प्रधान न्यायधीश न्यायमूर्ति के. जी. बालाकृष्णन और न्यायधीश न्यायमर्ति पी. सथशिवम व न्यायमूर्ति बी. एस. चौहान की खंडपीठ ने यह कहते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया कि पुलिस पर फायरिंग करने वाले सशस्त्र युवक निर्दोष नहीं हो सकते।

गैर सरकारी संगठन 'ऐक्ट नाउ फॉर हारमनी एंड डेमोक्रेसी' (अनहद) की ओर से दायर इस याचिका में दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को भी चुनौती दी गई थी जिसमें इस मामले में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दी गई थी।

गौरतलब है कि 19 सितम्बर, 2008 को बटला हाउस में मुठभेड़ में दो संदिग्ध आतंकवादी मारे गए थे। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के निरीक्षक मोहन चंद शर्मा भी शहीद हो गए थे।

गरीबी कोई अपराध नहीं , भिखारियों की भी है दिल्लीः दिल्ली उच्च न्यायालय


हाई कोर्ट ने भिखारियों के मुद्दे पर दिल्ली सरकार के रुख की तुलना महाराष्ट्र में एमएनएस के रवैये से की है। दिल्ली सरकार की खिंचाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार राजधानी के भिखारियों को अपने राज्य में वापस लौट जाने के लिए कैसे दबाव डाल सकती है। हाई कोर्ट ने कहा कि यह तो वैसा ही है, जैसा कि एमएनएस मुंबई में रह रहे दूसरे राज्यों के लोगों के साथ कर रही है। हाई कोर्ट ने भिखारियों के साथ किए जाने वाले ऐसे बर्ताव को मानवता के खिलाफ बताया।

हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि गरीबी कोई अपराध नहीं है और भिखारियों को राजधानी छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। यह मानवता के खिलाफ है और अगर ऐसा होता है तो महाराष्ट्र में राज ठाकरे की अगुआई वाली पार्टी और दिल्ली सरकार में क्या अंतर रह जाएगा।

अदालत ने कहा कि विभिन्न राज्यों के भिखारियों के साथ ऐसा बर्ताव बंद होना चाहिए। हाई कोर्ट ने कहा कि यह काफी परेशान करने वाली बात है कि राजधानी में कई अपराधी आराम से रह रहे हैं, लेकिन जो कुछ लोग मांग कर गुजारा कर रहे हैं तो उन्हें बाहर निकालने की तैयारी है। गौरतलब है कि भीख मांगना बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बैगिंग एक्ट के तहत अपराध है।

इस मामले को अपराध की श्रेणी में रखने अथवा नहीं रखने के मामले में हाई कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से सलाह मांगी है। इस एक्ट के तहत पहली बार पकड़े गए अपराधी को तीन साल तक कैद हो सकती है, जबकि दूसरी बार पकड़े जाने पर 10 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है।

इस बाबत एक सामाजिक कार्यकर्ता ने हाई कोर्ट में अजीर् दाखिल कर कहा था कि भीख मांगने के लिए सजा देना सही नहीं है क्योंकि गरीबी कहीं से भी अपराध नहीं है। इस तरह एक्ट के वैधता को चुनौती भी दी गई है। अर्जी में कहा गया था कि भिखारियों के खिलाफ कार्रवाई के बजाय उनका पुनर्वास होना चाहिए। मुंबई बैगिंग एक्ट में संशोधन होना चाहिए क्योंकि भिखारी अगर भीख मांगते हैं तो वह मजबूरी में होता है। इस अर्जी पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से राय मांगी थी।

याचिका में कहा गया है कि मुंबई बैगिंग एक्ट में बदलाव की जरूरत है क्योंकि अगर कोई भीख मांगता है तो वह उसकी आथिर्क मजबूरी हो सकती है इसके लिए उसे सजा दिया जाना कहीं से भी ठीक नहीं है। इस पर दिल्ली सरकार ने अपने जवाब में सहमति जाहिर की थी कि भिखारियों का पुनर्वास किया जाना चाहिए। इस पर हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बाबत अपना सुझाव देने को कहा है। साथ ही सरकार से पूछा है कि फिलहाल राजधानी में कितनी संख्या में भिखारी हैं और उनके बच्चों की शिक्षा आदि के लिए क्या किया जा रहा है। मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने 9 नवंबर की तारीख तय की है।

Thursday, October 29, 2009

आपरेशन दुर्योधन के आरोपी सांसदों को जमानत।


दिल्ली की एक अदालत ने संसद में सवाल पूछने के एवज में धन लेने के मामले में संलिप्त सात सांसदों को बुधवार को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश राकेश सिद्धार्थ ने पूर्व सांसदों छत्रपाल सिंह लोढा, अन्ना साहेब एमके पाटिल, वाईजी महाजन, एनके कुशवाहा, लालचंद कोल, रामसेवक सिंह और सीपी सिंह को 25 हजार के मुचलके और इतनी ही अन्य राशि के अन्य मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया।

एक निजी चैनल के स्टिंग आपरेशन दुर्योधन के वर्ष 2005 में 11 सांसदों को संसद में सवाल पूछने के एवज में पैसे लेते हुए कैमरे में कैद कर लिया गया था। मामला प्रकाश में आने के बाद इन सभी को संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इनमें से दस सांसद लोकसभा के और एक सांसद राज्यसभा से था।

सेक्रटरी के लिए 'सेक्सी ऐड' देकर फंसा वकील


सेक्रटरी के लिए ऐसी ऐड ना तो आपने देखी होगी और ना ही सुनी होगी। शिकॉगो में भारतीय मूल के एक वकील ने सेक्रटरी के लिए अखबार में दिए ऐड में कहा था कि सेक्रटरी को काम के अलावा उसके और लॉ फर्म में उसके पार्टनर के साथ सेक्स भी करना होगा। इस मामले में वकील के खिलाफ जांच शुरू हो गई है और उसका वकालत का लाइसेंस तक रद्द हो सकता है।

ब्रिटिश अखबार सन् के मुताबिक वकील समीर चौहान शादीशुदा हैं और दो बच्चों का पिता है। उन्होंने सेक्रटरी के पोस्ट के लिए अप्लाई करने वाली युवतियों से बायोडाटा और फोटो के अलावा फिगर का ब्यौरा भी मांगा था। एक लड़की ने इसके लिए जब रुचि दिखाई तो जवाबी मेल में चौहान ने लिखा ऑफिस के काम के अलावा आपको हम दोनों पार्टनरों के साथ अकेले और कभी-कभी एक साथ सेक्स भी करना होगा। चौहान ने उससे यह भी कहा कि ऑफिस उसे उत्तेजक कपड़े पहनकर आने होंगे और कामुक अंदाज में बातचीत करनी होगी।

वकील की इस विश लिस्ट को जानने के बाद लड़की ने इंटरव्यू के लिए पहुंचने के बजाय अटॉर्नी रजिस्ट्रेशन ऐंड डिसिप्लिनरी कमिशन में शिकायत कर दी। एजेंसी अब पूरे मामले की जांच कर रही है और आरोप सही पाए गए तो समीर चौहान का वकालत करने का लाइसेंस तक रद्द हो सकता है।

Wednesday, October 28, 2009

आरजेएस परीक्षा में स्कैलिंग अवैध- राजस्थान हाईकोर्ट


राजस्थान हाई कोर्ट ने आरजेएस परीक्षा 2005 में स्कैलिंग प्रणाली को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत अवैधानिक मानते हुए उसे आरजेएस नियमों के विपरीत करार दिया है। न्यायाधीश प्रेम शंकर आसोपा एवं न्यायाधीश गुमान सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश मंगलवार को सरिता नौशाद एवं 17 अन्य की याचिकाओं का निस्तारण करते हुए दिया।

खंडपीठ ने आदेश में कहा है कि जिन याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों के रॉ मार्क्‍स (स्कैलिंग से पूर्व के मार्क्‍स) चयनित आरजेएस अभ्यर्थियों के प्राप्तांक से अधिक हैं उन्हें आरजेएस परीक्षा 08—09 में साक्षात्कार के लिए बुलाया जाए। साथ ही 2005 की परीक्षा में प्राप्त किए उनके प्राप्तांकों और साक्षात्कार के अंकों को मिलाकर मेरिट लिस्ट बनाई जाए। यदि वे मेरिट लिस्ट में उनकी श्रेणी के चयनित अभ्यर्थी से अधिक अंक लाएं तो वे नियुक्ति के पात्र माने जाएं और उन्हे नियुक्ति दी जाए।

इसके अलावा ऐसे अभ्यर्थी जिनके साक्षात्कार हो चुके हैं उनके रॉ मार्क्‍स (स्कैलिंग से पूर्व के मार्क्‍स) व साक्षात्कार के मार्क्‍स को जोड़ा जाए और यदि उनके अंक चयनित आरजेएस अभ्यर्थी से अधिक हों तो उन्हें और भविष्य में होने वाली रिक्तियों में नियुक्त किया जाए। आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि आरजेएस परीक्षा 08 की चयन व नियुक्ति प्रक्रिया याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के बाद ही की जाए। हाई कोर्ट ने आदेश में कहा कि पूर्व में चयनित आरजेएस को नौकरी करते हुए डेढ़ साल से ज्यादा समय हो गया है। इसलिए उन्हें उनके पदों से नहीं हटाया जाए। क्योंकि यदि उन्हें हटाया गया तो पूरी परीक्षा की पूरी प्रक्रिया ही डिस्टर्ब हो जाएगी।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता एस.पी.शर्मा ने बताया कि आरजेएस परीक्षा 05 में आरपीएससी ने स्कैलिंग की प्रणाली अपनाई। इस फार्मूले के कारण कई अभ्यर्थियों के अंकों को कम ज्यादा कर दिया गया। इससे कुछ अभ्यर्थी अधिक अंक लाने के बाद भी साक्षात्कार में शामिल नहीं हो पाए जबकि कुछ अभ्यर्थी साक्षात्कार देने के बाद भी नियुक्त नहीं हो सके। आरजेएस परीक्षा में इस प्रणाली को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाओं में कहा कि आरजेएस परीक्षा में स्कैलिंग की प्रणाली आरजेएस नियम 1955 का उल्लंघन है क्योंकि उसमें ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है और सभी परीक्षार्थी समान ही प्रoपत्र देते हैं।

जयपुर- रूल ऑफ लॉ सोसायटी के प्रदेश प्रतिनिधि नीलाम्बर झा के अनुसार न्यायिक सेवा में स्कैलिंग का विवाद कोई नया नहीं है। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में स्कैलिंग को लेकर सवाल खड़े किए थे।

वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने संजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश के मामले में न्यायिक सेवा में स्कै लिंग को जायज नहीं ठहराया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि न्यायिक सेवा की परीक्षा में सिर्फ एक विषय होता है, इसलिए स्कै लिंग ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि न्यायिक सेवा में माडरेशन किया जा सकता है। इसका तरीका क्या होगा, इसकी गाइड लाइन भी निर्णय में दी गई है।

Tuesday, October 27, 2009

पिता के पितृत्व से इंकार पर ही बच्चे का डीएनए परीक्षण।


उच्चतम न्यायालय ने आज एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा कि तलाक के मामले में किसी बच्चे के डीएनए परीक्षण के आदेश तब तक नहीं दिये जा सकते जब तक पति उसे अपना बच्चा नहीं होने का निश्चित आरोप नहीं लगाता।
दूसरे शब्दों में, बच्चे के असल माता-पिता का पता लगाने के लिये उसका डीएनए परीक्षण तभी किया जा सकता है जब पति यह निश्चित आरोप लगाए वह बच्चा किसी दूसरे आदमी का है। हालांकि वह इस बात को तलाक के आधार के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकता।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक सम्बन्ध होने के दौरान बच्चे का जन्म होने की स्थिति में उसकी वैधता की धारणा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि तलाक की अर्जी दायर होने के वक्त विवाह के दोनों पक्षों का एक दूसरे से जरूरी वास्ता था। खासकर तब जब पति इस बात को जोर देकर ना कहे कि उसकी पत्नी का बच्चा किसी दूसरे मर्द से अवैध सम्बन्धों का नतीजा है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरुण चटर्जी तथा न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा की पीठ ने अपने निर्णय में पति भरतराम द्वारा दायर याचिका पर बच्चे का डीएनए परीक्षण कराने के मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती देने वाली रामकन्या बाई द्वारा दायर अपील को बरकरार रखा।
उच्च न्यायालय ने पति द्वारा सत्र न्यायालय में तलाक के मुकदमे की कार्यवाही के दौरान बच्चे की वैधता पर सवाल नहीं उठाए जाने के बावजूद उसका डीएनए परीक्षण कराने का निर्देश दिया था।

बिना रिकॉर्ड 47 साल चला मुकदमा !


राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक मामले में 47 साल पुराने मुकदमें की कार्रवाई निरस्त कर दी है। अधिवक्ता अनूप ढंड ने बताया कि सन् 1962 में पुलिस थाना सीकर पर परिवादी निसार अहमद ने छह व्यक्तियों के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। न्यायालय में अधिवक्ता ढंड ने तर्क दिया कि मामला 47 वर्ष पहले दर्ज हुआ और अब इस मामले से संबंधित कोई भी एफआईआर, चार्जशीट अन्य दस्तावेज कहीं भी उपलब्ध नहीं है।

ऐसी स्थिति में अन्वीक्षा किया जाना संभव नहीं है। अधिवक्ता ढंड ने न्यायालय को बताया कि इन हालातों में मामला जारी रखना, प्रार्थी के मौलिक जीवन जीने के अधिकार का घोर उल्लंघन है। समस्त तर्को व तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायाधिपति करणीसिंह राठौड़ ने याचिका मंजूर कर अन्वीक्षा को प्रार्थी के मौलिक जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए 47 वर्ष पुराने मामले की कार्रवाई को निरस्त करने के आदेश पारित किए।

वकीलों के लिए प्रैक्टिस से पहले ट्रेनिंग पर विचार-वीरप्पा मोइली


आने वाले दिनों में विधि स्नातक कालेज से निकलते ही सीधे कोर्ट में वकालत शुरु नहीं कर पाएंगे। इसके लिए उन्हें पहले किसी वरिष्ठ अधिवक्ता के अंडर में एक साल की अप्रेंटिसशिप करना आवश्यक होगी। इसके बाद वह बार कौंसिल में पंजीकरण करा अदालतों में वकालत कर सकेंगे।

विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा है कि वह एडवोकेट एक्ट, 1961 में संशोधन करवाएंगे ताकि प्री रजिस्ट्रेशन अप्रेंटिसशिप के प्रावधान को बहाल किया जा सके। यह बात उन्होंने एक अंग्रेजी अखबार के संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कही। वैसे इस प्रावधान को बहाल करने की मांग सुप्रीम कोर्ट से ही आई है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज तथा मुख्य न्यायाधीश इन वेटिंग जस्टिस एसएच कपाड़िया ने कहा कि वैश्विक अर्थ व्यवस्था और प्रतिस्पर्धा के दौर में दक्ष प्रोफेशनलों की आवश्कता है।

वकीलों को अर्थ व्यवस्था, निवेश प्रणाली और वित्तीय मसलों की जानकारी होना आवश्यक है। क्योंकि ये चीजें हर क्षेत्र पर प्रभाव डाल रही हैं। लेकिन देखा जा रहा है कि कुछ वकीलों को छोड़कर अधिकतर वकील इससे वाकिफ नहीं हैं। उन्होंने बार कौंसिल से कहा कि वह वकालत की पढ़ाई में अर्थव्यवस्था के अध्याय भी जोड़े। आने वाले दस वर्ष इसी व्यवस्था को समर्पित हैं। इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था तरक्की करेगी और इससे जुड़े मुकदमे कोर्ट में आएंगे।

सरकार की छोटे-छोटे मुकदमें में सुप्रीम कोर्ट जाने की आदत पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार।


मुकदमों की संख्या कम करने के लिए आयोजित राष्ट्रीय विचार का सरकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। वह अब भी छोटे-मोटे केसों पर भारी खर्च कर उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक ले आती है। यही वजह है कि देश की अदालतों में लंबित तीन करोड़ मुकदमों में से 30 फीसदी हिस्सा सरकारों का है। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने इस पर काम करना शुरू कर दिया है।

सोमवार को एक मामले में उन्होंने एक चौकीदार को स्थायी करने के आदेश को चुनौती देने पर मध्य प्रदेश सरकार को खूब फटकार लगाई और अपील खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि सरकार बिना वहज की अपीलें करके कोर्ट का ही समय नष्ट नहीं करती बल्कि जनता का पैसा भी व्यर्थ ही बहाती हैं। उन्होंने कहा, ‘समय आ गया है कि ऐसे मुकदमों को हतोत्साहित किया जाए। हम ऐसे मुकदमों पर बिल्कुल सुनवाई नहीं करेंगे जिसमें सिर्फ एक व्यक्ति शामिल हो।

सरकार को कम से कम ऐसे केसों में अपीलें नही करनी चाहिए। यह एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (गरीब चौकीदार) को स्थायी करने का मामला है। वह 1991 से काम कर रहा है। उसे स्थायी न कर सरकार उसके मानवाधिकार का उल्लंघन भी कर रही है। क्योंकि वह सुप्रीम कोर्ट के स्तर तक अपने केस की पैरवी नहीं कर सकता है। यदि इस मामले में बड़ी संख्या में कर्मचारी शामिल होते तो बात समझ में आती लेकिन एक व्यक्ति के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट तक आ जाए यह गलत है।’ यह कह कर सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की एक चौकीदार को स्थायी करने के आदेश के खिलाफ की अपील खारिज कर दी।

क्यों न खत्म हो 2010 के बाद आरक्षण? - राजस्थान हाईकोर्ट


आरक्षण की नीति को 10 और वर्ष का विस्तार देने के लिए संविधान में हुए 109वें संशोधन को चुनौती देती एक याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार को केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दिया।
न्यायमूर्ति आरसी गांधी और न्यायमूर्ति जीएस सराफ की खंडपीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता अमरनाथ वैश्य की याचिका पर यह आदेश जारी किए। याचिकाकर्ता के वकील अरूणेश्वर गुप्ता के मुताबिक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण मुहैया कराने वाला संशोधन बीते 60 साल में इन जाति और वर्गों के कल्याण में दु:खद रूप से नाकाम रहा है।
उन्होंने कहा कि बीते 60 वर्ष में आरक्षण की कोई उपयोगिता नहीं रही है। आरक्षण नीति को शिक्षा तथा सेवा क्षेत्र में 10 जनवरी 2010 से अगले 10 वर्ष के लिए बढ़ाया जाना निरर्थक है। गुप्ता ने आरोप लगाया कि इस नीति से जातिगत टकराव भी पैदा हुआ है।

Saturday, October 24, 2009

पेंशन नहीं देने पर सचिव न्यायिक हिरासत में ।


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कोर्ट द्वारा पारित आदेश का पालन न करने एवं गलत शपथपत्र प्रस्तुत करने को गंभीरता से लेते हुए सिंचाई विभाग के सचिव एम.ए.ए. खान को कुछ समय के लिए न्यायिक हिरासत में लेने का मौखिक आदेश दिया। उन्हें सजा दिए जाने के मामले पर सुनवाई शनिवार को होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति डी. पी. सिंह ने सिंचाई विभाग में कार्यरत सहायक अभियन्ता की पत्नी कविता कुमार की अवमानना याचिका पर पारित किया।

याचिका के अनुसार, कविता का पति सिंचाई विभाग में सहायक इंजीनियर के पद पर कार्यरत था। उसके निधन के बाद जब पेंशन का भुगतान नहीं किया गया तब हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। कविता के अधिवक्ता को सुनने के बाद न्यायालय ने उन्हें पेंशन का ब्याज सहित भुगतान करने का निर्देश दिया था। विभाग की तरफ से पेंशन भुगतान को लेकर दाखिल अलग-अलग शपथपत्रों में अलग-अलग जानकारी दी गई थी एवं पूरी धनराशि का भुगतान नहीं किया गया। इसपर हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की गई थी। कोर्ट के आदेश पर सिंचाई विभाग के सचिव कोर्ट में उपस्थित थे। कुछ समय के लिए उन्हें न्यायिक हिरासत में ले लिया गया था। आगे की सुनवाई शनिवार को होगी।

अब तक के ऐसे मामले : इसके पूर्व भी न्यायालय ने अवमानना मामले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अनिरुद्ध पाण्डे एवं इलाहाबाद में शिक्षा विभाग में तत्कालीन डीडीआर श्रीमती माया निरंजन को भी सजा सुनाई थी। बाद में अपील पर इसी न्यायालय की खण्डपीठ ने उस आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा पूर्व में अवमानना मामले में कई वकीलों को भी सजा सुनाई जा चुकी है।

अब अत्याचारी गुरुजी की खैर नहीं।


स्कूलों में शिक्षकों के अत्याचार से छात्रों को बचाने के लिए अब शिकायत बॉक्स लगाए जाएंगे। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के फरमान पर अमल करते हुए दिल्ली शिक्षा निदेशालय ने सभी स्कूलों को आदेश दिया है कि वह अपने यहां शिकायत बॉक्स लगाएं, जिनकी मदद से छात्र अपनी शिकायत बिना किसी डर के कर सकें। शिक्षा निदेशालय ने अपने आदेश में साफ कर दिया है कि इस सुविधा के तहत छात्र को अपनी पहचान सार्वजनिक करने की कोई जरूरत नहीं होगी यानी अब अत्याचारी गुरुजी की खैर नहीं है।

शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी आदेश में स्कूल प्रमुखों को कहा गया है कि वह अपने यहां छात्रों को शिक्षकों द्वारा दिए जाने वाले दंड पर अंकुश लगाएं। इसके लिए न सिर्फ स्कूलों में नियमित तौर पर अभिभावकों के साथ बैठकर छात्र अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने की बात की जाए बल्कि छात्रों को भी उनके अधिकारों से अवगत कराया जाए।

इसके अलावा पीटीए सदस्यों, उपशिक्षा अधिकारी, शिक्षा अधिकारी, उपशिक्षा निदेशक के नाम व नंबर भी स्कूल के नोटिस बोर्ड पर सार्वजानिक किए जाएं ताकि शिकायत की प्रक्रिया और उसकी सुनवाई आसान हो सके। अतिरिक्त शिक्षा निदेशक (स्कूल) डॉ. सुनीता कौशिक के मुताबिक स्कूलों में शिक्षकों के अत्याचार से छात्रों को बचाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं जिनके तहत स्कूलों में छात्रों के प्रति होने वाली हिंसा से निपटने के उपाय स्पष्ट किए गए हैं। इन गाइडलाइन के तहत अव्वल तो शिक्षकों की शिकायत करने के लिए सुबह होने वाली प्रार्थना सभा में छात्रों को खुले तौर पर शिकायत का मौका दिया गया है।

ऐसा न करने वाले छात्र-छात्राओं के लिए पहचान गुप्त रखते हुए शिकायत करने के लिए बॉक्स का इंतजाम किया जा रहा है। डॉ. सुनीता कौशिक के अनुसार स्कूल प्रमुखों को कहा गया है कि वे अपनी बैठकों में शिक्षकों को इस बात से अवगत कराएं कि छात्रों के साथ गलत व्यवहार का क्या परिणाम हो सकता है।