पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Thursday, September 2, 2010

कंपनी विधेयक में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश शामिल होंगे: खुर्शीद

केंद्र सरकार प्रस्तावित कंपनी विधेयक में भोपाल गैस त्रासदी के मामले में दायर सुधार याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को शामिल करेगी। कंपनी मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद ने गुरूवार को कहा, ""सीबीआई द्वारा भोपाल गैस त्रासदी के मामले में दायर सुधार याचिका पर सर्वोच्चा न्यायालय जो भी निर्देश देगा उन्हें इस विधेयक में शामिल किया जाएगा। निदेशकों की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए हमें निर्देश की जरूरत है।"" 
कंपनी सचिवों के 38वें राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, ""मैं नहीं जानता कि इसमें कितना समय लगेगा लेकिन जब तक यह मामला सर्वोच्चा न्यायालय में है हम इंतजार करेंगे।"" उन्होंने कहा कि 1984 की भोपाल गैस त्रासदी में मारे गए 5,295 लोगों और प्रभावित हुए 5,68,292 लोगों के मामले में कई चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि घटना के 26 साल बाद सर्वोच्चा न्यायालय सुधार याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सीबीआई ने दो अगस्त को 1996 में आए न्यायालय के फैसले की समीक्षा करने की मांग करते हुए सुधार याचिका दायर की थी। सर्वोच्चा न्यायालय के उस वक्त के निर्णय के कारण यूनियन कार्बाइड इंडिया के पूर्व अध्यक्ष केशव महिन्द्रा सहित सात आरोपियों पर गैर इरादतन हत्या का मामला हटाकर लापरवाही से मौत के आरोप लगाए गए थे। भोपाल की निचली अदालत में सात जून को हुए फैसले में सातों आरोपियों को दो-दो साल की सजा सुनाई गई थी। बाद में इन सभी को जमानत मिल गई। गैर इरादतन हत्या के मामले में अधिकतम सजा 10 साल की सजा का प्रावधान है।

महिला ने सड़क पर क्यों दिया बच्ची को जन्म?

नई दिल्ली  में  एक महिला ने बच्ची को जन्म दिया और इस दौरान वह चल बसी। हाई कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। दिल्ली  हाई कोर्ट ने सरकार से इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है कि तमाम योजनाओं के बावजूद गर्भवती महिला को सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं भर्ती किया गया। अदालत ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज में इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने इस मामले में दिल्ली सरकार से हलफनामा दायर कर 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है।

कनॉट प्लेस इलाके में जुलाई के आखिरी सप्ताह में एक महिला ने शंकर रोड पर एक बच्ची को जन्म दिया और इस दौरान वह चल बसी। वहां रीतू नामक युवती ने उस बच्ची को सहारा दिया और उसे अपने घर ले गई लेकिन इसी बीच किसी ने इस घटना के बारे में पुलिस को खबर दी और पुलिस ने उस बच्ची को चाइल्ड होम के हवाले कर दिया। वहीं रीतू ने इस बच्ची को गोद लेने की इच्छा जताई। इस बारे में आई मीडिया रिपोर्ट पर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने संज्ञान लिया और दिल्ली सरकार, चाइल्ड होम के डायरेक्टर और उन डॉक्टरों को बुलाया जिसने बच्ची का इलाज किया था।

हाई कोर्ट के निर्देश के बाद ये लोग अदालत में पेश हुए। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि तमाम स्कीम के बावजूद गर्भवती महिला को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया और आखिर में उसे सड़क पर ही बच्ची को जन्म देना पड़ा। मामले की सुनवाई के दौरान बच्ची को इलाज करने वाले डॉक्टर ने बताया कि बच्ची को सेप्टिसेमिया हो गया था लेकिन उसकी स्थिति ठीक होने के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि बच्ची के पैदा होने के बाद उसे सहारा देने वाली युवती रितू उसे गोद लेना चाहती है। इस पर चाइल्ड होम की डायरेक्टर ने कहा कि गोद लेने की एक प्रक्रिया होती है और उसके लिए गाइड लाइंस को देखना पड़ता है और लोगों की लंबी लाइन लगी हुई है। हाई कोर्ट को बताया गया कि रितू व उनकी रिश्तेदार अधिकार से वहां मिलने जाती हैं इस कारण वहां के नियम कायदा का उल्लंघन हो रहा है। रितू की ओर से पेश उनकी रिश्तेदार ने कहा कि रितू को बच्ची के साथ भावनात्मक लगाव है और इस कारण उसे मिलने से नहीं रोका जाए साथ ही वह गोद लेने के लिए भी तैयार है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि हफ्ते में 3 बार 45 मिनट के लिए रितू को बच्ची से मिलने दिया जाए।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि कई सरकारी अस्पताल हैं बावजूद इसके प्रेग्नेंट महिला को भर्ती नहीं किया गया और वह अपनी बच्ची को सड़क पर पैदा करने के लिए मजबूर हुई। यह गंभीर विषय है। हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास ऐसी तमाम महिलाओं व बच्चों के लिए योजनाएं हैं ये तमाम योजनाएं लागू भी है फिर भी बच्चे फुटपाथ पर पैदा होने के लिए मजबूर हो रहे हैं। यह सरकार की ड्यूटी है कि वह देखे कि गर्भवती महिलाओं के लिए लागू स्कीम के तहत कोई भी सरकारी अस्पताल उन्हें भर्ती करने से मना नहीं करे। अगली सुनवाई 20 अक्टूबर को होगी।

WIFE मतलब रांग इनवाइटेड फॉर एवर -पटना उच्च न्यायालय

पटना  उच्च न्यायालय ने चुटकी लेते याचिकाकर्ता से कहा- अपनी पत्‍‌नी से हर मर्द परेशान ही रहता है।.. खुशी मनाइये और संभव हो तो मिठाई भी बांटिये। हाईकोर्ट ने वाइफ की परिभाषा इस तरह की- रांग इनवाइटेड फॉर एवर। पराए मर्द के साथ चली गई अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए पति की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत की यह टिप्पणी कोर्ट परिसर में खासी चर्चा में रही। आखिरकार याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी वापस नहीं मिल सकी। जोधपुर में तैनात आर्मी में लांस नायक मलय कुमार की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को वापस करते हुए हाइकोर्ट ने उन्हें किसी सक्षम न्यायालय की शरण में जाने का निर्देश दिया। अदालत ने उन्हें निचली अदालत में जाने की छूट देते हुए पत्नी को वापस कराने में असमर्थता जाहिर की। याचिका में मूलत: जहानाबाद (बिहार) के मकदूमपुर थाना के सुमेरा गांव वासी लांसनायक ने अदालत के सामने अपनी व्यथा रखी। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसकी शादी 2003 में अनुराधा के साथ हुई। शुरू में सब कुछ ठीक रहा।

Wednesday, September 1, 2010

अदालत का सुझाव, सट्टे को करें 'वैध'

दिल्ली की अदालत ने देश में क्रिकेट और अन्य खेलों में सट्टे को कानूनी रूप से मान्यता देने का सुझाव दिया है। अदालत का मानना है कि पुलिस इसको रोकने में असफल रही है तथा अवैध गतिविधियों से बड़ी संख्या में बेहिसाब राशि की कमाई को आतंकी गतिविधियों और ड्रग तस्करी में लगाया जा रहा है।

अदालत ने कहा कि सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता देने से सरकार को न सिर्फ धन के स्थानान्तरण का पता लगाने में मदद मिलेगी बल्कि इससे उसको राजस्व भी मिलेगा जिसका उपयोग सार्वजनिक कल्याण में किया जा सकता है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेश शर्मा ने कहा, ‘यह देखने के लिए दैवीय शक्ति नहीं चाहिए कि क्रिकेट और अन्य खेलों में सट्टा खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। इससे होने वाली अथाह कमाई को ड्रग तस्करी और आतंकवादी गतिविधियों में लगाया जाता है।’ उन्होंने कहा, ‘अब समय आ गया है जबकि हमारी विधायिका को सट्टेबाजी को वैध करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए जिससे काफी कमाई भी होगी। इससे आम आदमी की कई जरूरतों को पूरा किया जा सकता है और संगठित अपराध के लाभप्रद व्यवसाय को रोका जा सकता है।’ अदालत ने मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पिछले साल इंडियन प्रीमियर लीग के मैचों में 20 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक की धनराशि का सट्टा लगा।

अदालत ने यह टिप्पणी प्रशांत कुमार मलिक और विक्की ग्रोवर की याचिका को सुनवाई के लिये मंजूरी देने के दौरान की। इन दोनों को सट्टेबाजी का दोषी पाया गया है।

शरद पवार को सुप्रीम कोर्ट की लताड़

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को फटकारते हुए कहा है कि अनाज मुफ्त बांटने की बात सलाह नहीं थी, बाकायदा आदेश था. पवार ने हाल ही में कोर्ट के इस आदेश को सलाह बताते हुए मानने से इनकार कर दिया था.

अदालत खाद्यान्न की बर्बादी से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है. पिछली सुनवाई पर अदालत ने कहा था कि सरकार को गोदामों में अनाज को सड़ने के लिए छोड़ने के बजाए इसे गरीबों में बांट देना चाहिए. पवार ने इसे कोर्ट की सलाह बताते हुए इसे मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्रीय मजबूरियों के कारण अनाज को मुफ्त में बांटना मुमकिन नहीं है.

न्यायाधीश दलवीर भंडारी और न्यायाधीश दीपक वर्मा की खंडपीठ ने मीडिया रिपोर्टों के हवाले से पवार के बयान को खारिज कर दिया. अदालत ने सरकारी वकील को कहा "मंत्री को बता दें कि उन्हें अनाज का मुफ्त वितरण करना होगा. यह सलाह नहीं आदेश था."

अदालत ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए सरकार को गरीबी रेखा से नीचे और इससे ऊपर रहने वालों का तथा अंत्योदय अन्न योजना के लाभार्थियों का नए सिरे से सर्वेक्षण कराने को कहा था ताकि इससे प्राप्त नए आंकड़ों की मदद से पांच साल के भीतर भारत को भूख मुक्त बनाया जा सके.

अदालत ने सरकार को इस दिशा में तत्काल कारगर कदम उठाने को कहा है ताकि खाद्यान्न की बर्बादी को रोका जा सके. खंडपीठ ने गरीबी रेखा से ऊपर रहने वालों को सब्सिडी पर अनाज देने की सरकार की नीति पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा कि सरकार अपनी योजना का दायरा बढ़ाने के लिए ऐसा कर रही है, तब तो इसकी सीमा तीन लाख रुपये करनी चाहिए.

Monday, August 30, 2010

गलती चाहे यात्री की हो, रेलवे को भरना होगा हर्जाना

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई रेल यात्री अपनी गलती या लापरवाही से भी ट्रेन से गिरकर मरता है तो रेलवे का यह दायित्व है कि वह उसके परिजनों को मुआवजा दे।

न्यायमूर्ति आफताब आलम और आरएम लोढ़ा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस आदेश को दरकिनार कर दिया कि रेलवे उस स्थिति में मुआवजा देने को बाध्य नहीं है यदि कोई यात्री अपनी गलती से रेल से गिरकर मर जाए।

पीठ ने कहा कि हमारा विचार है कि उच्च न्यायालय का यह मानना त्रुटिपूर्ण है कि अपनी गलती से रेल से गिरकर जान गंवाने वाले यात्रियों के परिजनों को कानून की धारा 124 ए के तहत किसी तरह का मुआवजा हासिल करने का हक नहीं है।

पीठ ने कहा कि पहले रेलवे की बात करें तो उसका यह कहना पूरी तरह अनुमान पर आधारित है कि एम हफीज रेल के खुले दरवाजे के सामने लापरवाही से खड़े थे। इस बात को स्वीकार किया जा चुका है कि जिस समय वह ट्रेन से गिरे उस घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है इसलिए रेलवे की बात को साबित करने के लिए कोई सुबूत नहीं है।

न्यायमूर्ति आलम द्वारा लिखे गए आदेश में कहा गया कि अगर यह मान भी लें कि मरहूम अपनी लापरवाही से ट्रेन से गिरा, तब भी उसके परिजनों को कानून की धारा 124 ए के तहत मुआवजा मिलने पर कोई हरफ नहीं आता। न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ हफीज की पत्नी जमीला और उसके आश्रितों की तरफ से दाखिल की गई अपील को सही ठहराते हुए यह फैसला सुनाया।

रेलवे पंचाट ने हफीज के परिवार को दो लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने यह कहकर रेलवे को मुआवजे की जवाबदेही से बचा लिया था कि हफीज की मौत उसकी अपनी लापरवाही से ट्रेन से गिरने के कारण हुई।

Sunday, August 29, 2010

दोबारा नियुक्ति का अर्थ कर्मचारी पर लगा कदाचार का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ-गुजरात उच्च न्यायालय

गुजरात उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि किसी सरकारी कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति बिना शर्त होनी चाहिए तथा 'सभी उद्देश्यों के लिए' सेवा जारी माना जाना चाहिए। साथ ही इसका प्रभाव उसकी वरिष्ठता एवं पेंशन पर नहीं पड़ना चाहिए।

न्यायालय की खंडपीठ ने व्यवस्था दी कि किसी कर्मचारी की दोबारा नियुक्ति का अर्थ है कि उस पर लगा कदाचार का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ तथा कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति सामान्य तौर पर की गई।

मामले के अनुसार सूरत नगर निगम का कर्मचारी योगिन कुमार शुक्ला को विभागीय कार्यवाही के बाद 21 दिसंबर, 2002 को आदेश जारी कर सेवा से हटा दिया गया था।

शुक्ला ने स्थायी समिति में मामले को चुनौती दी, जिसने फैसला दिया कि उसकी पुनर्नियुक्ति बकाया वेतन के बिना की जानी चाहिए। लेकिन पेंशन एवं वरिष्ठता के उद्देश्य से उसकी सेवा जारी मानी जानी चाहिए। 

इस फैसले से असंतुष्ट शुक्ला ने राज्य के उच्च न्यायालय की शरण ली। एकल न्यायाधीश की पीठ ने मामला विलंब से आने के कारण उसकी याचिका खारिज कर दी थी।

उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश पर हालांकि कहा कि संविधान की धारा 226 के तहत याचिका तीन वर्षों के भीतर दायर की गई है, इसलिए इसे विलंब से आया मामला नहीं कहा जा सकता।

न्यायाधीश ए.एल. दवे एवं न्यायाधीश एस.आर. बह्मभट्ट की खंडपीठ ने कहा, ''एक बार जब कर्मचारी की दोबारा नियुक्ति का निर्णय ले लिया गया तो इसका अर्थ है कि उस पर लगा कदाचार का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ तथा कर्मचारी की पुनर्नियुक्ति सामान्य तौर पर की गई।''

जोधपुर में जुटेंगे वकीलों के नेता

राजस्व न्यायालयों को प्रशासनिक कार्यो से मुक्त करवाने तथा इनमें पीठासीन अधिकारी राजस्थान न्यायिक सेवा से नियुक्त करने के मुद्दे को लेकर राज्य की विभिन्न बार एसोसिएशन के पदाधिकारी रविवार को जोधपुर में विचार विमर्श करेंगे। राजस्थान उच्च न्यायालय परिसर स्थित एसोसिएशन भवन में सुबह 11 बजे होने वाली बैठक में राज्य के विभिन्न जिलों से अधिवक्ता संगठनों के पदाधिकारी भाग लेंगे।

राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन की मेजबानी में हो रही बैठक में इस मुद्दे पर विचार विमर्श के बाद प्रस्ताव पारित कर राज्य सरकार को भेजा जाएगा। एसोसिएशन के महासचिव करणसिंह राजपुरोहित ने बताया कि बैठक में हुए फैसले को क्रियान्वित करवाने की रूपरेखा भी तैयार की जाएगी।

सिख दंगों की जाँच दिखावटी-सीबीआई

सीबीआई ने शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि दिल्ली पुलिस के दंगा रोधी विशेष प्रकोष्ठ ने 1984 के सिख विरोधी दंगा मामलों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद सज्जन कुमार को वस्तुत: बचाने की खातिर दिखावटी जाँच और अभियोग चलाया। कुमार इस मामले में प्रमुख आरोपी हैं।

शीर्ष अदालत के समक्ष दायर हलफनामे में एजेंसी ने न्यायालय द्वारा 13 अगस्त को लगाई गई रोक को हटाने को कहा और दलील दी कि इसने कांग्रेस नेता के खिलाफ अभियोजन को गंभीर रूप से पक्षपातपूर्ण बनाया है।

न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने हलफनामे को ऑन रिकॉर्ड लेते हुए एजेंसी की अर्जी पर अंतिम सुनवाई की तारीख सात सितंबर को निर्धारित की। इस याचिका में सीबीआई ने दिल्ली छावनी थाने के तहत हुए दंगों के मामले में कुमार के खिलाफ अभियोग चलाने की माँग की है। इस दंगे में 60 लोग मारे गए थे।

दंगा पीड़ितों में से एक के वकील दुष्यंत दवे ने अदालत से इस आधार पर स्थगनादेश को हटाने की माँग की कि इससे हजारों लोगों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। इस पर पीठ ने कहा कि मिस्टर दवे कोई भी असंवेदनशील नहीं है।

Thursday, August 26, 2010

प्रोन्नति परीक्षा के दौरान नकल करते हुए पकड़े गये आंध्र प्रदेश के 5 न्यायाधीश निलंबित

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों को न्यायपालिका की तौहीनी करने के आरोप में बुधवार को निलंबित कर दिया गया। पांचों न्यायाधीशों को वारंगल जिले के आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज में एलएलएम की परीक्षा के दौरान नकल करते हुए मंगलवार को रंगे हाथों पकड़ लिया गया। उच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों की इस हरकत को गंभीरता से लिया।

ककाटिया विश्वविद्यालय के दूरवर्ती शिक्षा केंद्र द्वारा आयोजित की गई परीक्षा के दौरान निरीक्षकों के एक दस्ते ने न्यायाधीशों को पकड़ लिया। ये न्यायाधीश प्रोन्नति के लिए परीक्षा दे रहे थे।

उच्च न्यायालय ने ककाटिया विश्वविद्यालय को भी आदेश दिया है कि वह न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई करे और घटना पर एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंपे।

निलंबित किए गए न्यायाधीशों में रंगा रेड्डी के वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश के.अजीत सिम्हाराव, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (द्वितीय) विजयानंद, बापातला के वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश श्रीनिवास चारी, अनंतपुर के वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश एम.किश्तप्पा और वारंगल के कनिष्ठ सिविल न्यायाधीश हनुमंत राव शामिल हैं।

अदालत ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिया कि वह सभी न्यायाधीशों के खिलाफ कार्रवाई करे, क्योंकि इन्होंने कानून के पेशे को बदनाम किया है।

बिना सबूत पति को नहीं ठहराएं नपुंसक -गुजरात उच्च न्यायालय

गुजरात उच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि नपुंसकता के आधार तलाक लेने के लिए यह आवश्यक है कि इसे सिद्घ करने के लिए खास मेडिकल सबूत हों। न्यायाधीश जयंत पटेल और न्यायाधीश अभिलाष् कुमारी की खण्डपीठ ने उन आधारों को खारिज कर दिया जिनके आधार पर पारिवारिक अदालत ने फैसला दिया था।

भूकंप से प्रभावित पति और पत्नी से जुड़े एक मामले में पारिवारिक अदालत ने नपुंसकता और क्रूरता के आधार पर तालाक मंजूर किया था। न्यायालय ने इस फैसले को अस्वीकार कर दिया, लेकिन उसने त्याग देने और क्रूरता के आधार पर इसी अदालत के तलाक के आदेश को सही ठहराया।

राजस्थान में सिर्फ 361 बांग्लादेशी?

 राजस्थान में आखिर कितने अवैध बांग्लादेशी हैं? आपराधिक घटनाओं व राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में जब-तब अवैध बांग्लादेशियों का जिक्र होता है और लम्बे समय से इस समस्या पर चिन्ता व चर्चा होती रही है लेकिन प्रदेश में रह रहे अवैध बांग्लादेशियों की संख्या सुनेंगे तो आप चकरा जाएंगे। जी हां, विधानसभा सवाल पर सरकार का दिया जवाब सही मानें तो प्रदेश में मात्र 361 बांग्लादेशी ही अवैध रूप से रह रहे हैं। यह बात और है कि शहर की चौखटियों या कुछ कच्ची बस्तियों में इतने बांग्लादेशी आसानी से मिल जाएंगे।

वहीं पूर्व भाजपा सरकार ने अकेले जयपुर में ही इनकी संख्या पचास हजार बताई थी। भाजपा विधायक ओम बिड़ला के प्रश्न के जवाब में सरकार ने कहा है कि प्रदेश में 361 बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे हैं। इनमें से 125 को चिह्नित किया जा चुका है जबकि 236 बांग्लादेशी अभी संदिग्ध की श्रेणी में ही हैं। जवाब के अनुसार चिह्नित व संदिग्ध 340 बांग्लादेशी राजधानी जयपुर में हैं जबकि अजमेर में 12, उदयपुर में चार, डूंगरपुर, जोधपुर शहर, बीकानेर में एक-एक, श्रीगंगानगर में दो बांग्लादेशी रह रहे हैं।

प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से नियुक्ति अवैध घोषित

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में सर्व शिक्षा अभियान के तहत संचालित कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय में प्रतिवर्ष प्लेसमेंट एजेंसी द्वारा नियुक्ति प्रक्रिया को अवैध करार देते हुए राज्य सरकार को योजना के संचालन तक प्रार्थीगणों को सेवा में रखने के आदेश जारी किए हैं।

यह आदेश न्यायाधीश डॉ. विनीत कोठारी ने प्रार्थी कुलदीप कौर व 19 अन्य की याचिका पर सुनवाई के तहत दिए हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आरएस सलूजा ने कहा कि सरकार द्वारा हर साल किसी नई प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से नियुक्ति करना रॅपसार अधिनियम 1999 के विरुद्ध है। याचिका में यह भी कहा गया कि छह वर्ष से 14 वर्ष तक की बालिकाओं को शिक्षित करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है। यह एजेंसी सरकारी नियंत्रण में नहीं है तथा प्रतिभागी अभ्यर्थियों को छोड़ कर नियुक्तियां कर देती है, जिससे शिक्षण कार्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

लिपिकीय त्रुटि से किसी और को मिली जमानत

लिपिकीय त्रुटि से याचिका में गलत नाम का उल्लेख करने से फरार आरोपी को जमानत मिल गई। जेल में बंद मुख्य आरोपी की पत्नी ने जब विधिक सहायता प्रकोष्ठ के माध्यम से जमानत याचिका दायर की तो यह मामला सामने आया। जस्टिस धीरेंद्र मिश्रा ने मामले में वकील को नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया है।

बलात्कार के एक मामले में कोरबा निवासी नरेंद्र गुप्ता आरोपी था। उसने बिलासपुर हाईकोर्ट में वकील शैलेंद्र दुबे के माध्यम से जमानत याचिका दायर की थी। याचिका तैयार करने के दौरान लिपिकीय त्रुटि से नरेंद्र गुप्ता की जगह सह आरोपी सोनू कुमार उर्फ मुन्ना का नाम याचिकाकर्ता के तौर पर दर्ज हो गया।

उसे जेल में बंद बताया गया था, जबकि वह फरार था। कोर्ट ने याचिका में उल्लेखित तथ्यों के आधार पर लगभग चार महीने पहले सोनू की जमानत याचिका स्वीकार कर ली। इसी बीच जेल में बंद आरोपी नरेंद्र गुप्ता की पत्नी अर्चना गुप्ता ने लीगल एड के माध्यम से जमानत याचिका दायर की तो यह मामला सामने आया। इस पर बुधवार को सुनवाई के बाद कोर्ट ने वकील को नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है।

Monday, August 23, 2010

क्रूरता की कुछ घटनाएं भी तलाक का पर्याप्त आधार - दिल्ली हाइकोर्ट

दिल्ली हाइकोर्ट ने 21 साल से अपने पति से अलग रह रही एक महिला को तलाक की अनुमति देते हए कहा  जीवनसाथी द्वारा क्रूरता की कुछ घटनाएं भी तलाक का पर्याप्त आधार हो सकती है.

अदालत ने कहा  तलाक पाने की खातिर मानसिक या शारीरिक क्रूरता को साबित करने के लिए उत्पीड़न की हर घटना का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है. अदालत ने कहा  कभी-कभार जीवनसाथी द्वारा की गयी क्रूरता को साबित करने के लिए दो या तीन घटनाएं पर्याप्त होती हैं. कई बार मानसिक क्रूरता शारीरिक क्रूरता से ज्यादा कठोर होती है.

न्यायमूर्ति अरुणा सुरेश ने कहा  पक्ष के लिए आवश्यक नहीं है कि वह जीवनसाथी के आचरण को क्रूरता की श्रेणी में लाने के लिए हर घटना बतायें.

उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फ़ैसले को पलट दिया जिसमें, महिला की याचिका में अपने पति पर लगाये गये आरोपों को सामान्य प्रकृति का बताते हए तलाक की अनुमति नहीं दी गयी थी.महिला ने अलग रह रहे पति से तलाक की मांग करते हए कहा था कि उसने साथ रहने के दौरान कई बार उसे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी. इस जोड़े ने वर्ष 1974 में शादी रचायी थी.

महिला दिसंबर 1989 तक अपने पति के साथ रह रही थी. यह महिला इस उम्मीद में अपने पति के साथ रही कि शायद उसके व्यवहार में सुधार आ जाएं.