पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Tuesday, October 6, 2009

इंसाफ के मंदिरों में घूस का बोलबाला।


कहते हैं इंसाफ में देरी मतलब नाइंसाफी लेकिन हमारे देश में आम धारणा है किसी मामले का अदालत तक जाना यानि लंबे समय तक लटक जाना। एक अनुमान के मुताबिक देश भर में तीन करोड़ मुकदमे लटके पड़े हैं। जल्द इंसाफ न मिल पाने की तमाम वजहें हैं लेकिन एक चीज साफ है कि इंसाफ का मंदिर कही जाने वाली हमारी अदालतें भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हैं। IBN7 के लिए ए सी नील्सन के सर्वे में ये सच सामने आया है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक लोग अदालती कामकाज में घूस का सहारा लेते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट को औसतन एक केस की सुनवाई में लगते हैं 5 मिनट बावजूद इसके अदालत में लटके पड़े हैं दसियों हजार मामले। 600 मामले ऐसे हैं जो 20 साल से भी ज्यादा वक्त से लटके पड़े हैं। ये आंकड़े फरवरी 2009 में जारी रिपोर्ट के हैं। इस रिपोर्ट में जस्टिस ए पी शाह की टिप्पणी गौरतलब है। जस्टिस शाह का कहना है कि 2,300 क्रिमिनल केसों को निपटाने में लग जाएंगे कुल 466 साल।
ए सी नील्सन के सर्वे में एक अहम सवाल था कि क्या कभी किसी केस में आपका सामना अदालती प्रक्रिया से हुआ है। इस मामले में सबसे मुकदमेबाज साबित हुए झारखंड के लोग। यहां 27 फीसदी लोगों ने कोर्ट का सामना किया है। मध्यप्रदेश और गोवा भी 23 और 25 फीसदी के साथ उसके आसपास ही खड़े हैं।
दूसरा सवाल था कि क्या अदालत में अपना काम कराने के लिए आपको घूस देनी पड़ी? इस सवाल के जवाब में केरल और हिमाचल जैसे राज्यों की स्थिति सबसे अच्छी है जहां सिर्फ 17 फीसदी लोगों ने घूस देने की बात मानी। जबकि दिल्ली और पंजाब में लगता है घूस दिए बगैर बात ही नहीं बनती। 75 फीसदी लोगों ने घूस देने की बात कही है।
एक सवाल कोर्ट की दक्षता को लेकर भी पूछा गया यानि कितनी आसानी से, कितनी जल्दी अदालतों में निपटता है काम? इसके जवाब में त्रिपुरा के लोगों ने 100 फीसदी नंबर दिए। हिमाचल और गोवा को मिले हैं 67 फीसदी नंबर लेकिन मजे की बात ये कि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बाद भी हरियाणा की अदालतों को मिले हैं 48 फीसदी अंक।

वकीलों की अपील ठुकरा कोर्ट पहुंचे दिनाकरन


भूमि पर जबरन कब्जा करने के आरोपों का सामना कर रहे कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनकरन ने 16 दिन की छुट्टी से लौटने के बाद सोमवार को फिर अदालत में मामलों की सुनवाई की। स्थानीय अधिवक्ता संघ ने उनसे इन आरोपों से मुक्त होने तक अदालती कार्यवाही में शामिल नहीं होने का आहवान किया था।
सुनवाई के लिए बहुत कम मामले थे और न्यायमूर्ति दिनकरन एक घंटे तक अदालत में रहे। उन्होंने 16 दिन की छुट्टी के बाद फिर से काम शुरू किया और अदालत की कार्यवाही को पूरा किया तथा बाद में अपने चैंबर में चले गए। अदालती कार्यवाही बिना किसी विरोध के सुगमता से संपन्न हुई।
बेंगलूर अधिवक्ता संघ ने एक प्रस्ताव पारित कर न्यायमूर्ति दिनकरन से तब तक न्यायिक कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करने या उसमें शामिल नहीं होने के लिए कहा था, जब तक कि वे आरोपों से मुक्त नहीं हो जाते। खबरों के मुताबिक इसके बाद न्यायमूर्ति दिनकरन ने पीठ में बैठने में अनिच्छा जताई थी।
न्यायमूर्ति दिनकरन के उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत होने की खबरों के बाद से बेंगलूर और चेन्नई के वकीलों ने आरोप लगाया था कि उन्होंने भूमि चकबंदी कानून का उल्लंघन करते हुए तमिलनाडु में भूमि हासिल की थी। हालांकि इस मसले पर स्थानीय अधिवक्ता संघ बंट गया था। महाधिवक्ता अशोक हरनहल्ली ने अतिरिक्त महाधिवक्ता केएम नटराज और राज्य के सरकारी अभियोजक पाविन के साथ पिछले हफ्ते न्यायमूर्ति दिनकरन से मुलाकात की थी और उनसे अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था।
कर्नाटक राज्य बार काउंसिल ने दो अक्तूबर को प्रस्ताव पारित किया था और मामले को भारत के प्रधान न्यायाधीश एवं उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम को अग्रेषित करते हुए उनसे एक उचित फैसला करने की अपील की थी।

दिल्ली: सार्वजनिक जगहों पर शराब पीने पर 50000 रुपये तक का जुर्माना।


सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीना अब काफी महंगा साबित हो सकता है। खुले में शराब पीने वाले न केवल गिरफ्तार होंगे, बल्कि छह महीने की जेल भी हो सकती है। इतना ही नहीं, 50 हजार रुपये तक का जुर्माना भी भुगतना पड़ सकता है। ऐसा होगा नई आबकारी नीति के तहत, जिसे दिल्ली सरकार जल्द ही लागू करने जा रही है।
यह जानकारी सोमवार को दिल्ली के वित्त व आबकारी मंत्री डॉ अशोक वालिया ने दी। डॉ. वालिया का कहना है कि अवैध शराब बेचने के आरोपी व्यक्ति के लिए तुरंत जमानत का कोई प्रावधान नहीं रहेगा। इस नीति के कानून बनने के बाद शराब की दुकानों के आसपास, पार्क, फुटपाथ, सड़क आदि सभी सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीना एक बेहद संगीन जुर्म माना जाएगा। नए कानून के लागू होने पर पुलिस सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने वाले को गिरफ्तार करने के साथ ही उनपर जुर्माना कर सकेगी।

जुर्माना अधिकतम 50 हजार तक हो होगा। चालान कितने का कटे, यह मौका-ए-वारदात पर मौजूद पुलिस अधिकारी के विवेक व स्थिति पर निर्भर करेगा। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने दिल्ली वालों को अपनी खराब आदतें बदलने की सलाह दी थी। इसी कड़ी में अब दिल्ली सरकार लोगों की खुले में शराब पीने की आदत पर लगाम कसने की तैयारी में है। इसी साल दिल्ली के कुछ हिस्सों में शराब पीने से 29 लोगों की मौत हो गई थी।

इसके बाद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्ली की आबकारी नीति में बदलाव का फैसला लिया। अभी तक दिल्ली में करीब दो सौ साल पुराना पंजाब एक्साइज एक्ट लागू है। इसके तहत अवैध तरीके से शराब बेचने वालों व खुलेआम पीने-पिलाने वालों के खिलाफ किसी सख्त सजा का प्रावधान नहीं है। दिल्ली सरकार द्वारा तैयार की गई नई नीति में अवैध शराब बेचना एक गैर जमानती अपराध करार दिया गया है।
दरअसल, दिल्ली सरकार ने पिछले दिनों मंजूरी के लिए इस नीति का मसौदा केंद्र के पास भेजा था, जिसे केंद्र ने अपनी औपचारिक स्वीकृति दे दी है। अब सरकार इसे विधानसभा में रखेगी। विधानसभा में पारित होने के बाद यह मसौदा कानून की शक्ल ले लेगा। गौरतलब है कि दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए दिल्ली सरकार द्वारा बनाई गई इस नीति को केंद्र की मंजूरी मिलना जरूरी था। दिल्ली सरकार का कहना है कि वे विधानसभा के शीलकालीन सत्र में इस मसौदा को पास करवाने का प्रयास करेगें। देखा जाएग तो नई आबकारी नीति के कानून बनने में कोई अड़चन नही है। विपक्ष में बैठे भारतीय जनता पार्टी के नेता भी सरकार की इस नीति से सहमत है।

खराब आदतों को रोकने के लिए जुर्माना

पॉलीथीन का इस्तेमाल 1 लाख रु.

शराब का सेवन 50 हजार रु.

डेंगू की ब्रीडिंग 600 रु.

सिगरेट पीना 200 रु.

थूकना 100 रु.

मेट्रो में कूड़ा फैलाना 200 रु.

Monday, October 5, 2009

घूस लेने में पटवारी सबसे आगे।


पश्चिमी राजस्थान में काबिज सरकारी कारिंदों में घूस की काली कमाई से घर भरने की होड़ सी मची है। पिछले नौ महीनों में एसीबी ने जो कार्रवाई की उसमें सबसे ज्यादा पटवारी भ्रष्ट निकले हैं।  इसके बाद नंबर आता है पुलिस व बिजलीकर्मियों का। घूस लेने में बैंक, चिकित्सा व विभिन्न विभागों के बाबू भी पीछे नहीं रहे। हालांकि, जनता अभी भी कह रही है सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार तो पुलिस व स्थानीय निकायों में है। यहां हर छोटे काम के लिए घूस मांगी जाती है।

जालोर से सिरोही, पाली, बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, हनुमानगढ़, श्रींगगानगर व चूरू तक काली कमाई करने वाले 61 सरकारी कार्मिको को एसीबी ने पिछले नौ माह में रंगे हाथ घूस लेते दबोचा है, इनमें 21 पटवारी हैं। पुलिस व बिजली महकमे के आठ-आठ कर्मचारी भी इस अवधि में पैसे लेते पकड़ गए हैं।

घूस लेने वालों में राजस्थान प्रशासनिक सेवा का अधिकारी, बैंक का मैनेजर, डॉक्टर, इंजीनियरिंग कॉलेज का प्रोफेसर, अपर लोक अभियोजक, कृषि अधिकारी, डीएसपी और बिजली कंपनी के एक्सईएन, एईएन व जेईएन तक शामिल हैं। इस बार आश्चर्यजनक रूप से स्थानीय निकाय का कोई कर्मचारी अथवा अधिकारी अभी तक घूस लेते नहीं पकड़ा गया, जबकि भास्कर को ग्राउंड सर्वे में जनता ने बताया इनके कर्मचारी टॉप फाइव में शामिल हैं।

राजस्थान लोक सेवा आयोग के अधीनस्थ व मंत्रालयिक कर्मियों की भर्ती करने के अधिकार पर प्रश्न।


उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि अधीनस्थ व मंत्रालयिक कर्मियों की भर्ती के लिए अलग बोर्ड बनने के बावजूद यह कार्य राजस्थान लोक सेवा आयोग से क्यों कराया जा रहा है। न्यायालय ने जयपुर निवासी प्रहलाद शर्मा की जनहित याचिका पर यह आदेश दिया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एक साल में भी बोर्ड को काम नहीं मिलने पर आश्चर्य जताया है।

याचिका में कहा कि राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड का गठन 3 अक्टूबर,08 को हुआ, जिसे अधीनस्थ व मंत्रालयिक कर्मियों की भर्ती करने का अधिकार दिया। बोर्ड में अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति के बावजूद इसे काम नहीं सौंपा गया है, बोर्ड को स्टाफ व कार्यालय के लिए भवन भी नहीं मिला है। उधर, बोर्ड बनने के बावजूद राजस्थान लोक सेवा आयोग अधीनस्थ व मंत्रालयिक पदों के लिए अब भी भर्ती कर रहा है। बोर्ड के नियम बनने के बाद आयोग को इन भर्तियों का अधिकार ही नहीं है, ऎसे में बोर्ड बनने के बाद की गई भर्ती अवैधानिक हैं। याचिका में मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव व कार्मिक सचिव को पक्षकार बनाया गया है।

उच्चतम न्यायालय को कानून याद दिलाया।


सुप्रीम कोर्ट ने भले ही कई पब्लिक अथॉरिटीज़ को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई हो लेकिन अब उस पर आरटीआई ऐक्ट के तहत अपनी जिम्मेदारी पूरी न करने का आरोप लगा है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में ही एक पिटिशन दाखिल हुई है, जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को पार्टी बनाया गया है। पिटिशन की कॉपी एनबीटी के पास है।

आरटीआई ऐक्ट के सेक्शन 4(1)बी के तहत सभी पब्लिक अथॉरिटी के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी पावर, ड्यूटी, बजट, काम करने की प्रक्रिया सहित ऐसी सभी जानकारियां पब्लिक को बताएं, जिससे आम जनता आरटीआई का लाभ ले सके। इसके दायरे में सुप्रीम कोर्ट भी आता है। ऐक्ट लागू होने के 120 दिनों के भीतर यह हो जाने की बात ऐक्ट में है यानी इसकी डेडलाइन 12 अक्टूबर 2005 थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब तक ऐसी कोई जानकारी पब्लिक को नहीं बताई है।

सेक्शन 4(1)बी के तहत 16 कैटिगरी में यह जानकारी देनी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में केवल इन्फर्मेशन ऑफिसर और फर्स्ट अपीलेट अथॉरिटी के नाम और संपर्क की डिटेल दी गई है जबकि पीएमओ सहित कई हाई कोर्ट्स की वेबसाइटों में पूरी जानकारी दी गई है।

यूथ फॉर इक्वैलिटी ने जब आरटीआई के तहत सुप्रीम कोर्ट से एक सूचना मांगने का मन बनाया तो उन्हें पता चला कि ऐसी कोई जानकारी पब्लिक को नहीं बताई गई है कि वह किस तरह की सूचना आरटीआई के तहत मांग सकते हैं। यूथ फॉर इक्वैलिटी (वाईएफई) के सेक्रटरी जितेन जैन ने बताया कि हमने इस संबंध में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को पार्टी बनाकर एक पिटिशन दाखिल करनी चाही। लेकिन यह आश्चर्यजनक है कि कोई भी वकील इसे दाखिल करने को तैयार नहीं हुआ। तब हमने वाईएफई के प्रेजिडेंट डॉ. कौशल कांत मिश्रा को 'पिटिशनर इन पर्सन' बनाकर याचिका दायर की।

डॉ. कौशल ने बताया कि हमने 6 मार्च को कोर्ट रजिस्ट्री में पिटिशन फाइल की। इसके बाद उसमें 7 डिफेक्ट बताए गए, जिनमें से एक यह था कि सीजेआई को पार्टी क्यों बनाया गया है। हमने इसका जवाब दिया कि आरटीआई ऐक्ट के तहत सुप्रीम कोर्ट के लिए कंपीटेंट अथॉरिटी सीजेआई ही हैं। सभी डिफेक्ट के जवाब हमने 25 मार्च को जमा कर दिए थे। लेकिन अब तक न तो हमारे जवाब को रिजेक्ट किया है और न ही पिटिशन को सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया है।

Sunday, October 4, 2009

उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया !


उच्चतम न्यायालय ने मुख्य न्यायाधीश को सूचना के अधिकार के तहत लाने संबंधी दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने का निर्णय लिया है !
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एस रविंद्रन भट्ट ने दो सितंबर के अपने फैसले में व्यवस्था दी थी कि देश के मुख्य न्यायाधीश सूचना के अधिकार के तहत आते हैं इसलिए उच्चतम न्यायालय को एक माह के भीतर इस अधिकार के तहत जानकारी हासिल करने के इच्छुक सुभाष चंद्र अग्रवाल को मांगी गई सूचना उपलब्ध करानी चाहिए !
न्यायालय के आदेश की अवधि कल समाप्त हो चुकी है ! उच्च न्यायालय दशहरा अवकाश के कारण पांच अक्टूबर तक बंद है इसलिए उच्चतम न्यायालय के सेंट्रल पब्लिक इनफारमेशन आफिसर सोमवार को इस बारे में अपील दायर करेंगे !
श्री अग्रवाल ने सूचना मांगी थी कि कितने न्यायाधीशों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा दिया है ! इस पर जवाब दिया गया कि मुख्य न्यायाधीश संवैधानिक प्रमुख हैं इसलिए उनके बारे में सूचना के अधिकार के तहत सूचना नहीं दी जा सकती है !

मकानों में डॉक्टर, वकील सीए को भी आरक्षण।



राजस्थान आवासन मंडल,अजमेर की आवास योजनाओं में अब प्रोफेशनल अवैतनिक लोगों के लिए भी अलग से कोटा होगा। आवासन मंडल की आवासीय योजनाओं में वकीलों, सीए, निजी चिकित्सकों व राज्यकर्मियों के लिए पूर्व में अलग से आरक्षण नहीं था। गत 16 अगस्त की बैठक में मंडल ने इनके लिए 5 से 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया है।

संपत्ति निस्तारण विनियम 1970 के नियम 8 के तहत यह प्रावधान किया गया है। हालांकि कुछ वर्र्गो से मंडल को कई बार आवेदन ही नहीं मिलते।

अजमेर के वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट और डॉक्टर लंबे समय से सरकार से हाउसिंग बोर्ड के मकानों में आरक्षण की मांग कर रहे थे। नगर सुधार न्यास भूखंड आवंटित करता है लेकिन इसमें इन वर्र्गो के लिए अलग से कोई आरक्षण नहीं था। कमोबेश यही स्थिति राज्य कर्मचारियों की थी।

हत्या के आरोपी ने जज की ओर उछाला जूता।


सूरत जिला न्यायालय की त्वरित अदालत में शनिवार को हत्या के एक मामले में सुनवाई की अगली तारीख दिए जाने से नाराज अभियुक्त ने न्यायाधीश की ओर जूता उछाल दिया। इस घटना से अदालत परिसर में हड़कम्प मच गया। बाद में अभियुक्त द्वारा लिखित में क्षमा याचना करने पर न्यायाधीश ने उसे माफ कर दिया।

अभियुक्त धर्मेश राठौड़ के खिलाफ लम्बित हत्या के मामले की दोपहर में त्वरित न्यायालय के न्यायाधीश एम.एस. शेख की अदालत में सुनवाई थी। न्यायाधीश शेख ने गवाह हाजिर नहीं होने के कारण सुनवाई की अगली तारीख मुकर्रर की। यह सुनते ही अभियुक्त धर्मेश भड़क गया तथा उसने जल्द सुनवाई करने की बात कहते हुए अपना जूता उछाल दिया। अपनी ओर जूता आता देख न्यायाधीश शेख एक तरफ झुक गए। इस बीच,सुरक्षाकर्मियों ने धर्मेश को हिरासत में ले लिया।

Thursday, October 1, 2009

शाइनी जमानत पर रिहा।


बंबई उच्च न्यायालय ने नौकरानी से कथित तौर पर बलात्कार के मामले में अभिनेता शाइनी आहूजा को बुधवार जमानत दे दी। हालाँकि, अदालत ने उनसे मुकदमे की सुनवाई शुरू होने तक दिल्ली में ही रहने को कहा।
न्यायमूर्ति एपी देशपांडे ने 50 हजार रूपए के भुगतान पर अभिनेता को जमानत दी। साथ ही अदालत ने कहा कि वह दिल्ली में ही रहेंगे और नजदीकी थाने में नियमित तौर पर हाजिर होंगे। अदालत के एक सवाल पर अभिनेता के वकील ने कहा कि शाइनी दिल्ली के रहने वाले हैं और उन्हें वहाँ रहने की इजाजत दी जा सकती है। अदालत ने आदेश दिया कि शाइनी को मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही मुंबई आने की इजाजत दी जा सकती है।
अभिनेता से अपना पासपोर्ट सौंपने को कहा गया और साथ ही गवाहों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर प्रलोभन देने से बचने को कहा गया। उन्हें सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने की भी चेतावनी दी गई। अभिनेता को हालाँकि, 50 हजार रूपए के भुगतान पर जमानत दे दी गई लेकिन उन्हें इतने ही रकम की एक या दो जमानत राशि भी तीन हफ्ते की अवधि के भीतर जमा करनी होगी।
शाइनी को गत 15 जून को तब गिरफ्तार किया गया था जब उनकी नौकरानी ने ओशिवरा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि अभिनेता ने अपने आवास पर उससे बलात्कार किया। घटना के वक्त शाइनी की पत्नी और बच्चा घर पर नहीं थे। इससे पहले दो बार निचली अदालत ने शाइनी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
शाइनी की पत्नी ने उच्च न्यायालय के आदेश पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, मैं इस बात को सुनकर खुश हूं कि शाइनी को जमानत मिल गई है। हमारा न्यायिक व्यवस्था में पूरा विश्वास है।

उ. प्र. उच्च न्यायालय के आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय की रोक


उत्तर प्रदेश सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा, 2007 में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछडे वर्गों के लिए आरक्षण लागू करने के कारण परीक्षा परिणाम को निरस्त करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को निलंबित कर दिया।
उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर प्रधान न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पीठ ने उच्च न्यायालय के 30 अगस्त के फैसले पर अस्थाई रोक लगा दी।
राज्य सरकार की याचिका में कहा गया था कि उच्च न्यायालय के आदेश से न केवल उस वर्ष की राज्य सिविल सेवा परीक्षा महत्वहीन हो गई है बल्कि राज्य में अन्य नौकरियों के लिए हुई परीक्षओं के परिणामों की वैधानिकता पर भी संदेह पैदा हो गया।
धनंजय सिंह और अन्य की याचिका के आधार पर उच्च न्यायालय की अमिताव लाला और उमानाथ सिंह की खंडपीठ ने परिणाम निरस्त करने और एक महीने के भीतर नई परीक्षा आयोजित करने का आदेश दिया था।
उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक लगाने वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ में न्यायाधीश पी. सथासिवम और बी.एस.चौहान भी शामिल हैं। पीठ ने याचिकाकर्ताधनंजय और अन्य से राज्य सरकार की याचिका का जवाब चार सप्ताह के भीतर दाखिल करने को कहा।

तीन बार सांसद रहा विदेशी!


देश की लोक सभा में तीन बार असम से चुनकर आए लाटरी किंग मोनी कुमार सुब्बा भारत के नागरिक ही नहीं थे। यह बात केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने सुप्रीम कोर्ट में कही है। इतना ही नहीं, जांच ब्यूरो ने यह भी कहा कि राष्ट्रीयता के सम्बन्ध में उनके द्वारा पेश किए गए प्रपत्र फर्जी थे। इस आधार पर उनपर एक केस भी चलाया जाना चाहिए।
एक समाचार चैनल ने मई 2007 में खुलासा किया कि 51 वर्षीय सुब्बा मूलत: एक नेपाली नागरिक हैं जिनका नाम मोनी राज लिम्बो है। हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद वह जेल से भाग गए थे। 1973 में जेल से भागे लिम्बो फिर पकड़े नहीं जा सके।

पिछली साल अप्रेल में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जन्म का एक प्रमाणपत्र पेश किया जिसमें कहा गया था उनका जन्मस्थान देबग्राम है। चैनल ने अपनी छानबीन में पता लगाया कि प्रमाणपत्र ही फर्जी था।

12वीं लोस चुनाव के लिए पेश किए गए नामांकन पत्र में उन्होंने अपना जन्मस्थान तेजपुर और तिथि 16 मार्च 1951 लिखी। 14वीं लोस में उन्होंने जन्मस्थान दार्जिलिंग के देबग्राम और जन्मतिथि 16 मार्च 1958 लिखी। लोकसभा चुनाव में वह असम में कांग्रेस के सबसे धनी प्रत्याशी थे। नकदी, सम्पत्ति व निवेश में उनकी सम्पत्ति 60 करोड़ से अधिक थी।

थर्ड पार्टी पॉलिसी बेचने से इनकार नहीं कर सकेंगी बीमा कंपनियां।


आने वाले दिनों में साधारण बीमा कंपनियों को निश्चित संख्या में मोटर थर्ड पार्टी लाइबिलिटी पॉलिसी की बिक्री करनी पड़ सकती है। इसके लिए सरकार बीमा अधिनियम 1938 में संशोधन करने जा रही है। अभी साधारण बीमा कंपनियां थर्ड पार्टी पॉलिसी की बिक्री नहीं करना चाहती हैं। थर्ड पार्टी पॉलिसी बेचने से कंपनियों को नुकसान होता है, जिससे वे इसकी बिक्री नहीं करना चाहती हैं।

सरकार मौजूदा बीमा कानून में व्यापक सुधार करने जा रही है। कंपनियों के लिए थर्ड पार्टी की बिक्री अनिवार्य बनाना इसी सुधार कार्यक्रम का हिस्सा है। बीमा कानून में संशोधन के जरिए सरकार इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा मौजूदा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करना चाहती है। थर्ड पार्टी पॉलिसी की बिक्री अनिवार्य बना देने से वाहन रखने वाले लोगों को फायदा होगा। मोटर व्हीकल एक्ट के तहत वाहन का बीमा कराना अनिवार्य है। वाहन के मालिक को साधारण बीमा कंपनी से बीमा पॉलिसी खरीदनी पड़ती है। साधारण बीमा कंपनियां इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि इस संशोधन का उन पर क्या असर पड़ेगा। फिलहाल बीमा कंपनियों के लिए उनके कुल प्रीमियम का 7 फीसदी हिस्सा ग्रामीण इलाकों से जुटाना जरूरी है। अगर कोई बीमा कंपनी ऐसा करने में असफल होती है तो उस पर जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। हालांकि, बीमा उत्पादों के आधार पर किसी तरह की सीमा तय नहीं की गई है।

थर्ड पार्टी इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदने वाले व्यक्ति के वाहन से अगर सड़क दुर्घटना में कोई व्यक्ति घायल होता है तो पॉलिसी बेचने वाली बीमा कंपनी उस व्यक्ति के दावे का भुगतान करती है। हालांकि, यह पॉलिसी बीमा कंपनियों के लिए घाटे का सौदा साबित होती है। इसमें बीमा कंपनियों को प्रीमियम से हासिल रकम से ज्यादा रकम दावे के भुगतान के तौर पर चुकाना पड़ता है। यही वजह है कि अधिकतर बीमा कंपनियां इस पॉलिसी की बिक्री में दिलचस्पी नहीं लेती हैं। बीमा कंपनियों को ऐसी पॉलिसी बेचने से नुकसान होता है, क्योंकि व्यावसायिक वाहनों से होने वाले दुर्घटनाओं की संख्या ज्यादा है। वाहनों के लिए थर्ड पार्टी बीमा बेचने का असर किसी एक ही कंपनी पर न पड़े इसलिए बीमा कंपनियां इस तरह की पॉलिसी की बिक्री से हासिल रकम एक जगह जमा करने यानी पर सहमत हो गई हैं। इसी रकम से थर्ड पार्टी इंश्योरेंस के दावों का भुगतान किए जाने का प्रावधान है।

क्या है थर्ड पार्टी पॉलिसी

अगर कोई व्यक्ति अपनी गाड़ी के लिए थर्ड पार्टी पॉलिसी खरीदता है तो यह पॉलिसी गाड़ी से सड़क हादसे में घायल व्यक्ति के दावे का भुगतान करती है। बीमा कंपनियां इस पॉलिसी को बेचने में दिलचस्पी नहीं लेती हैं, क्योंकि इस तरह की पॉलिसी में उन्हें प्रीमियम से हासिल रकम से ज्यादा रकम दावे के भुगतान में चुकाना पड़ता है। हालांकि, बीमा एक्ट में संशोधन के बाद बीमा कंपनियों के लिए एक निश्चित संख्या में थर्ड पार्टी पॉलिसी बेचना अनिवार्य होगा।

जमकर नौकरिया बांटी थी लालू ने।


राजद नेता लालू प्रसाद यादव ने रेल मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान जमकर नौकरिया बांटी। उनके पांच साल के कार्यकाल में कुल 32 हजार 838 युवकों को चतुर्थ श्रेणी पदों पर सीधी नौकरी पाने का सुअवसर मिला। सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगे गये विवरण के आधार पर रेलवे बोर्ड के मुख्य जनसंपर्क व सूचना अधिकारी आर डी चौधरी ने यह जानकारी दी है। हालांकि राज्य स्तर पर इस तथ्य का सटीक आंकड़ा रेल मंत्रालय के पास भी उपलब्ध नहीं है कि विभिन्न प्रदेशों में कितने लोगों ने लालू की इस विशेष कृपा का लाभ उठाया।

स्थानीय भाजपा नेता व पिछले लोकसभा चुनाव में मेदिनीपुर से प्रत्याशी रहे प्रदीप कुमार पटनायक ने सूचना के अधिकार के तहत रेल मंत्रालय से यह जानना चाहा था कि पहली जुलाई, 2004 से पहली जुलाई, 2009 तक वर्गीय आधार पर कुल कितने लोगों की नियुक्ति की गई। उस दौरान राज्यों के आधार पर विभिन्न क्षेत्रीय रेलवे में कितने अभ्यर्थी नियुक्ति पाने में सफल रहे। चतुर्थ वर्गीय पदों पर सीधी नियुक्ति के लिए किन-किन अधिकारियों को अधिकृत किया गया था तथा चतुर्थ वर्गीय पदों पर सीधी नियुक्ति की योग्यता का आधार क्या था।

गौरतलब है कि मांगी गई सूचना पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल से संबंधित थी। इसके जवाब में मुख्य जनसंपर्क व सूचना अधिकारी चौधरी ने पटनायक को गत 11 सितंबर को लिखित जवाब में बताया कि पिछले पांच साल के कार्यकाल के दौरान कुल 32 हजार 838 लोगों को चतुर्थ वर्गीय पदों पर सीधी नियुक्ति दी गई। महकमे ने यह भी माना कि इस संबंध में राज्य स्तर पर हुई नियुक्ति का ब्यौरा मंत्रालय के पास उपलब्ध नहीं है।

आरआरबी के तहत पिछले पांच साल के दौरान तृतीय श्रेणी में हुई नियुक्ति की संख्या 96 हजार 739 बतायी गई है। इस संबंध में भी राज्य स्तर पर हुई नियुक्ति का विवरण देने में असमर्थता जताई गई है। नियुक्ति के पैनल के संबंध में बताया गया कि रिक्रूटमेंट विभाग के उप मुख्य कार्मिक अधिकारी क्षेत्रीय स्तर पर यह पैनल तैयार करते हैं। सूचना के अधिकार के तहत रेलवे बोर्ड से यह विवरण मांगने वाले पटनायक के अनुसार, वह जानना चाहते थे कि ऊंचे पदों पर आसीन लोग किस तरह अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर चतुर्थ श्रेणी पदों पर मनचाहे लोगों की नियुक्ति करवाते है। महकमे द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना की सत्यता पर संदेह व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि चतुर्थ वर्गीय पदों पर सीधी नियुक्ति का चलन बंद होना चाहिए तथा यह तय मानदंडों के आधार पर ही होना चाहिए, जिससे असंतोष की स्थिति उत्पन्न न हो सके।

50 हजार रुपये से ज्यादा के गिफ्ट पर देना होगा टैक्स


सरकार ने कर वसूली के नियमों में विद्यमान कमियों को दूर करते हुए उपहारस्वरूप मिलने वाली 50 हजार रूपए से अधिक की अचल सम्पत्ति अथवा अन्य सम्पत्ति को आयकर के दायरे में ले लिया है। उपहार पाने वाले को इस प्रकार की सम्पत्ति पर अब आयकर देना होगा।

वित्त मंत्रालय की विज्ञप्ति के मुताबिक आयकर अधिनियम 1961 में संशोधन किया गया है जो कि आज एक अक्टूबर 2009 से प्रभावी होगा। नए नियम के तहत किसी भी व्यक्ति अथवा हिन्दू अविभाजित परिवार को यदि 50 हजार रूपए से अधिक की अचल सम्पत्ति अथवा अन्य कोई सम्पत्ति उपहारस्वरूप मिलती है तो उसे उस पर आयकर देना होगा।

वर्ष 2010-11 की रिटर्न दाखिल करते समय उपहार मूल्य का पूरा ब्यौरा देना होगा। हालांकि मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सगे-सम्बन्धी अथवा ब्याह शादी के समय मिलने वाले उपहार अथवा उत्तराधिकार के रूप में मिलने वाली सम्पत्ति तथा स्थानीय निकाय और किसी कोष अथवा न्यास से मिलने वाले उपहार को इसके दायरे से अलग रखा गया है।

इससे पहले अप्रेल 2004 से 25 हजार रूपए से अधिक के नकद उपहार पर कर लगता था। इसके बाद अप्रेल 2006 से कानून में संशोधन कर इस राशि को बढ़ाकर 50 हजार रूपए कर दिया गया। पहली अप्रेल 2006 से 50 हजार रूपए से अधिक के सभी तरह के नकद उपहार कर के दायरे में थे लेकिन नकद राशि के अलावा सम्पत्ति अथवा अन्य रूप में मिलने वाले उपहारों को कर से छूट मिली हुई थी। ऎसे में नकद राशि के रूप में मिलने वाले उपहार भी इसका फायदा उठाते हुए कर भुगतान से बच जाते थे।