पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Tuesday, March 30, 2010

महावीर चक्र विजेता को नहीं दी पेंशन, सेना पर जुर्माना

महावीर चक्र से सम्मानित निशक्त हवलदार को पेंशन नहीं देने पर सैन्य अधिकरण की क्षेत्रीय पीठ जयपुर ने सेना पर 30 हजार रुपए जुर्माना किया है। साथ ही तीन महीने में बकाया निशक्तता पेंशन 9 प्रतिशत ब्याज सहित अदा करने के आदेश दिए हैं।

अधिकरण ने सोमवार को दिग्रेन्द्र कुमार की प्रार्थना पर ये आदेश दिए। आदेश में कहा कि सेना के अफसरों का व्यवहार अमानवीय है। ऐसे मामलों में अफसरों को संवेदनापूर्ण व्यवहार करना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। युद्ध में घायल होने से प्रार्थी 80 फीसदी निशक्त हो गया, इसके बावजूद उसे पेंशन के लिए परेशान किया गया।

दिग्रेन्द्र कुमार सेना में हवलदार के पद पर तैनात थे। कारगिल युद्ध के दौरान 1999 में उन्होंने ऑपरेशन विजय में भाग लिया। घायल होने पर भी कर्तव्य पालन करते हुए उन्होंने दुश्मन को खदेड़ कर टोलोलींग चौकी पर कब्जा कर लिया। इस साहस के लिए उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
 
मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 80 प्रतिशत निशक्त माना और जुलाई 05 में उनकी प्रार्थना पर उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया गया। सेना ने यह कहते हुए निशक्तता पेंशन देने से इनकार कर दिया कि उन्होंने स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति ली है। दिग्रेन्द्र ने पेंशन के लिए कई बार सैन्य व पेंशन मुख्यालय से मांग की, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।

ऑनर किलिंग मामले में पाँच को फांसी,एक को उम्रकैद

हरियाणा में मनोज-बबली हत्याकांड के 5 दोषियों को फांसी और एक को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। कोर्ट ने 25 मार्च को ही इन लोगों को दोषी करार दिया था। करनाल के सत्न न्यायालय ने इस मामले में तथाकथित खाप नेता गंगा राज और बबली के पांच परिजनों को कत्ल का कसूरवार ठहराया था। कोर्ट ने सोमवार को बयान दर्ज करने के बाद सुनवाई मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी थी।

पिछले गुरूवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए करनाल सेशन कोर्ट ने छह लोगों को मनोज और बबली की हत्या का दोषी करार दिया था। कोर्ट का ये फैसला तालिबानी फरमान सुनाने वाली हरिय़ाणा की खाप पंचायत के मुंह पर तमाचे की तरह है। वहीं इस फैसले के बाद मनोज की बूढ़ी मां को न्याय मिल गया है।

अतिरिक्त जिला एवं सत्न जज वानी गोपाल शर्मा ने इस मामले में पांच अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाने के अलावा छठे अभियुक्त को भी  उम्र कैद की सज़ा सुनाई। अदालत ने जिन लोगों को मृत्यु दंड की सज़ा सुनाई है वे सभी बबली के सम्बंधी हैं। इस मामले में उसके भाई सुरेश ,चाचा राजेंद्र मामा बारू राम चचेरे भाई सतीश और गुरदेव को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है।     इस मामले में अदालत ने खाप पंचायत के मुखिया गंगा राज को उम्र कैद की सज़ा तथा सातवें अभियुक्त  मनदीप सिंह को मनोज(23) और बबली(19) के अपहरण तथा हत्या की साजिश में शामिल होने के लिए सात वर्ष कैद की सज़ा सुनाई।

कैथल जिले के करोडन गांव के मनोज ने लगभग तीन साल पहले बबली के घरवालों की इच्छा के खिलाफ उससे शादी की थी। दोनों के समान गोत्न का होने के कारण खाप पंचायत ने इस विवाह का विरोध किया और मनोज के परिवार के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा की थी।

शादी के बाद करनाल में जा बसे मनोज और बबली की 15 जून 2007 को हत्या कर दी गई । अपराध में इस्तेमाल किए गए वाहन के चालक मनदीप सिंह के खिलाफ अपहरण और साजिश में शामिल होने का अभियोग लगाया गया है।

आज जिन सात लोगों को सज़ा सुनाई गई उन्हें अदालत ने गत 25 मार्च को ही इस मामले में दोषी करार देते हुए सज़ा सुनाने के लिए 29 मार्च की तारीख तय की थी। न्यायालय में कल अभियोजन और बचाव पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत आज  तक के लिये स्थगित कर दी गयी थी।

उल्लेखनीय है कि कैथल जिले के करोड़ा गांव के मनोज और बबली ने 18 मई 2007 को विवाह कर लिया था वे दोनो एक ही गोत्न के थे जिसका गांव में काफी विरोध हुआ था, बाद में बबली के परिजनों और उनके समर्थकों ने जून 2007 को मनोज और बबली की कथित तौर पर हत्या कर दी थी। इनके शव बाद में 23 जून को बरवाला ब्रांच नहर से बरामद हुए थे।  लगभग तीन वर्ष तक चले इस मामले में लगभग 50 सुनवाइयां हुईं तथा इस दौरान 40 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए गए।

Sunday, March 28, 2010

अदालती नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद : रेड्डी

कांग्रेस के विधि प्रकोष्ठ की ओर से आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला ‘कानून, न्याय और आम आदमी’ में यूं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक ने अपने भाषण में न्यायिक सुधारों की वकालत की। लेकिन केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी ने न्यायपालिका में उच्च पदों पर नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद का मसला उठाकर सबको चौंका दिया।

रेड्डी ने पार्टी फोरम पर दो-टूक लहजे में नियुक्ति प्रक्रिया की खामियां गिनाईं और इसमें सुधार की दरकार बताया। उन्होंने कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूं कि न्यायपालिका में उच्च पदों पर नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के उच्च स्तर पर होने वाली नियुक्तियों पर सवाल उठते रहते हैं और भाई-भतीजावाद तथा पक्षपात के आरोप भी लगते हैं। उन्होंने कहा कि मैं नहीं कह रहा हूं कि सभी आरोप सही हैं लेकिन मौजूदा सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। उन्होंने ये सभी सवाल उठाते हुए कहा कि यह मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं। कई अन्य वक्ताओं ने रेड्डी की ओर से उठाए गए सवालों का परोक्ष तरीके से समर्थन किया।

मौके पर मौजूद अटार्नी जनरल जीई वाहनवती ने रेड्डी के सवालों के जवाब में कहा कि यहां मौजूदा बहुत से लोगों की यह भावना सामने आई है कि जजों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया पर पुनर्विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह संवेदनशील मसला है और मैं आश्वत करता हूं कि इस मुद्दे को हम उतनी ही गंभीरता से ले रहे हैं जितना यह वाकई में है।

रेड्डी ने पूरे भाषण में न्यायिक सुधारों के मसले को जोर-शोर से उठाया। लेकिन मजे की बात यह रही कि इसी सम्मेलन में कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने कांग्रेस से जुड़े वकीलों के लिए राष्ट्रीय डाटा तैयार करने की जरूरत बताकर एक नई बहस को जन्म दे दिया। उन्होंने कहा कि हम उन्हें अलग-अलग फील्ड में प्रशिक्षण दे सकते हैं और उन्हें जुडिशियरी की मुख्य धारा में लाया जा सकता है। मोइली के इस बयान के भी अलग-अलग मतलब निकाले जा रहे हैं। सम्मेलन में मोइली और रेड्डी के बयानों के बीच विरोधाभास को लेकर भी गुपचुप सुगबुगाहट देखने को मिली। हालांकि बाद में कांग्रेस विधि प्रकोष्ठ के चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह पार्टी का फोरम है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन इसी उद्देश्य से रखा गया था कि पार्टी के नेता और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपनी बात अपने लोगों के बीच खुलकर रख सकें।

सीवी में गलत जानकारी देने पर जेल

इंग्लैंड में डेवन तट पर स्थित लाइमाउथ में एक महिला को सीवी में गलत जानकारी देने पर 6 माह की जेल की सजा सुनाई गई है। रियानन मैके ने न केवल दो ए-लेवल होने का दावा किया बल्कि फर्जी रेफरेंस भी दिए। वह बायो-डाटा में गलत जानकारी देने के अपराध में जेल भेजी जाने वाली पहली महिला बन गई है।

उनतीस वर्षीय मैके ने गलत जानकारी देकर एनएचएस ट्रस्ट में प्रशासक की 23,000 पाउंड सालाना की पगार वाली नौकरी हासिल कर ली थी जहां वह मई 2008 से लेकर पिछले अक्टूबर तक करीब डेढ़ साल काम करती रही।

क्या किया : अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि नौकरी के लिए दो ए-लेवल होना जरूरी था। मैके ने नौकरी की पात्रता पूरी करने के लिए दो ए-लेवल होने का दावा सीवी में किया जो कि उसके पास नहींे थे और अपने पति का नाम ही रेफरेंस में देते हुए सिफारिश कर दी। उसने यह भी कबूल किया कि वह 11 अन्य मामलों में ऐसा ही कर चुकी है।

इसके अलावा मैके ने रॉयल नेवी में सोनर आपरेटर की अपनी पिछली नौकरी से डिस्चार्ज का सर्टिफिकेट भी तैयार कर लिया। उसके काम को देखते हुए संदेह पैदा हुआ और एनएचएस ट्रस्ट में अधिकारियों द्वारा सख्ती किए जाने पर उसने सच्चई कबूल कर ली। मैके के वकील ने हालांकि दलील दी कि दुर्घटना के बाद से वह अवसाद और तनाव से गुजर रही है। नेवी छोड़ने के बाद उसने कई जगह अर्जी दी लेकिन नाकामी हाथ आई। तब उसने अपने सीवी को भारी-भरकम बनाना शुरू किया और उसको कतई अंदाजा नहीं था कि ऐसा करने पर वह जेल जा सकती है।

पिछले साल एनएचएस में ही नौकरी हासिल करने के लिए अपनी योग्यता के बारे में गलत जानकारी देने को लेकर ली व्हाइटहेड नामक 44 साल के व्यक्ति को तीन माह की सजा हुई थी।

19 फीसदी ने दी गलत जानकारी --वनपोलडॉटकाम के 2000 कर्मचारियों पर किए गए सर्वे के मुताबिक हर पांच में से एक कर्मचारी सीवी में गलत जानकारी देता है। 19 फीसदी से ज्यादा ने माना कि उन्होंने योग्यता को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने रद्द किए अपने ही चीफ जस्टिस के आदेश

कर्नाटक हाईकोर्ट ने जमीन पर अतिक्रमण के आरोपों का सामना कर रहे अपने चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन के तीन सर्कुलरों को रद्द कर दिया है। पिछले साल 29 दिसंबर को उन्होंने ये सकरुलर जारी किए थे।

जमीन पर कब्जा करने के आरोपों में घिरने के बाद से दिनाकरन सुनवाई नहीं कर रहे हैं। उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही भी शुरू की गई है। जस्टिस एन कुमार और जस्टिस श्रीनिवासगौडा की डिवीजन बेंच ने हाईकोर्ट के चपरासी एमएस पुजारी की याचिका को स्वीकारते हुए शुक्रवार को इस संबंध में फैसला दिया।

बेंच ने चीफ जस्टिस के अधिकारों को चुनौती देने वाली हाईकोर्ट कर्मचारियों और अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक अधिकारियों की याचिकाओं को सिंगल बेंच को सुनवाई के लिए सौंपने के निर्देश दिए हैं।

फैसले का असर: सर्कुलर रद्द करने के फैसले से उत्तर कर्नाटक के वादियों के लिए सीधे मुख्य बेंच में मामला पेश करने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा जो कि वे पहले नहीं कर सकते थे। पहले सकरुलर के अनुसार कोर्ट कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों द्वारा चीफ जस्टिस के आदेशों को चुनौती देने वाले मामलों की सुनवाई हाल क्रमांक-1 को सौंपी जाती थी। यहीं चीफ जस्टिस बैठते हैं। बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि सकरुलर से ऐसी स्थिति बन गई थी कि चीफ जस्टिस ही उस मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें कि वे वादी भी थे। एक साथ कोई वादी और जज नहीं हो सकता।

क्या था रद्द हुए सर्कुलर में :
1. चीफ जस्टिस को अपने प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ हाईक ोर्ट कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों के आवेदनों की सुनवाई का अधिकार,
2. चीफ जस्टिस को यह तय करने का अधिकार कि कौन सा मामला कौन सी बेंच सुनेगी,
3. तीसरे सकरुलर में कोर्ट रजिस्ट्री को मध्यस्थता संबंधी सभी आवेदन विविध याचिका के रूप में सूचीबद्ध करने के निर्देश थे।

Friday, March 26, 2010

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ जनहित याचिका

‘विवाह पूर्व यौन संबंध और बिना विवाह के साथ-साथ रहना (लिव इन रिलेशनशिप) अपराध नहीं माना जा सकता। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार भगवान कृष्ण और राधा भी साथ-साथ रहते थे।’ इस टिप्पणी पर मप्र हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में गुरुवार को चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन, जस्टिस दीपक वर्मा व जस्टिस बीएस चव्हाण की तीन सदस्यीय खंडपीठ के खिलाफ एक जनहित याचिका लगाकर कहा गया कि यह टिप्पणी वापस ली जानी चाहिए।



हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की उक्त तीन सदस्यीय खंडपीठ ने दक्षिण भारत की अभिनेत्री खुशबू की याचिकाओं की सुनवाई में उक्त टिप्पणी की थी। इस पर आनंद ट्रस्ट के ट्रस्टी सत्यपाल आनंद ने गुरुवार को मप्र हाई कोर्ट इंदौर में जनहित याचिका पेश कर कहा कि इस उदाहरण व टिप्पणी से देश के करोड़ों लोगों को ठेस पहुंची है। इससे कानून व्यवस्था और देश के हालात बिगड़ सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को इस मामले पर दोबारा सुनवाई कर अपने शब्द वापस लेना चाहिए। न्यायाधीश संविधान के ज्ञाता होते हैं धार्मिक ग्रंथों के नहीं इसलिए उन्हें ऐसी टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।



टेलीग्राम से भेजी याचिका


श्री आनंद ने बताया गुरुवार दोपहर में उन्होंने याचिका हाई कोर्ट इंदौर में पेश की। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से संबद्ध था इसलिए बाद में उन्होंने हाई कोर्ट के पते पर टेलीग्राम के जरिए भी याचिका भेजी।


क्या है मामला

दक्षिण भारत की सिने तारिका खुशबू ने वर्ष 2005 में एक साक्षात्कार में कहा था कि विवाह पूर्व युवक-युवकी के साथ रहना और यौन संबंध अनुचित नहीं है। साक्षात्कार कई पत्रिकाओं में छपा था। इस पर उनके खिलाफ मद्रास के न्यायालय में 22 आपराधिक प्रकरण लगाए गए थे। मद्रास हाई कोर्ट में खुशबू ने वर्ष 2008 में अपने खिलाफ दायर प्रकरणों को समाप्त करने के लिए आवेदन दिया जो खारिज हो गया। इस पर अभिनेत्री ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा है।

‘भ्रष्ट’ नेताओं की जांच को नहीं कहेगा सुप्रीम कोर्ट

आय से अधिक संपत्ति के मामले में सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग के खिलाफ जांच का निर्देश देने से इंकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि भ्रष्टाचार का सामना कर रहे नेताओं के खिलाफ वह जांच का निर्देश नहीं दे सकता।

प्रधान न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि अगर अदालत मामला चलाने का निर्देश देती है तो यह आरोपी के खिलाफ 'गंभीर पूर्वाग्रह' का कारण बन सकता है।

अदालत ने याचिका दायर करने वाले सिक्किम विधानसभा के विपक्ष के नेता कुंगामीना लेपचा से कहा कि अगर मुख्यमंत्री के खिलाफ उनकी कोई मांग है तो वे जांच एजेंसी से संपर्क करें।

Thursday, March 25, 2010

पुलिस से सूचना मांगी तो लाद दिए केस

कुछ भी करो लेकिन पुलिस वालों से पंगा मत लो। यही कह रहे हैं कुछ वर्दीवाले बीकानेर में। यही वजह है कि राजस्थान के बीकानेर में पुलिस वालों ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वाले एक शख्स का जीना हराम कर दिया। राज्य सरकार ने पूरे मामले की जांच कराने का फैसला किया है। गृह मंत्री शांति धारीवाल ने कहा कि अगर अधिकारी दोषी पाए गए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

पुलिस ने महज एक महीने में इस शख्स के खिलाफ आठ मुकदमें ठोक दिए। इस शख्स के दफ्तर पर ताला जड़ दिया। सारा सामान उठा ले गए। उसकी गाड़ी को घर से उठाकर थाने में ले जाकर पटक दिया। गोवर्धन सिंह नाम के इस शख्स की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने सूचना के अधिकार के तहत जिले के एसपी से कुछ जानकारी मांग ली थी। बस इसके बाद से ही गोवर्धन सिंह पर पुलिस का ये कहर टूट पड़ा।

गोवर्धन सिंह अब तक सूचना के अधिकार के तहत सरकारी और गैर सरकारी विभागों में सौ से ज्यादा भ्रष्टाचार के मामलों का खुलासा कर चुके हैं। 18 फरवरी को इन्होंने सूचना के अधिकार के तहत बीकानेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सतीशचंद्र जांगिड़ समेत कुछ पुलिसकर्मियों की एसीआर का प्रॉपर्टी स्टेटमेंट और केस डायरी की कॉपी मांगी। प्रथम अपील अधिकारी बीकानेर के एसपी राघवेंद्र सुहासा ने अपील को खारिज कर दिया। एसपी की इस कोशिश को गलत मानते हुए राज्य सूचना आयोग ने उनके खिलाफ कार्रवाई को लिखा।


इस पर पुलिस ने पुरानी तारीख में दस्तावेज सूचना आयोग को भिजवा दिया। गोवर्धन पुलिस की उस करतूत के खिलाफ अदालत में गए। अदालत ने बीकानेर एसपी राघवेंद्र सुहासा और एएसपी सतीश चंद्र जांगिड़ के खिलाफ 22 फरवरी को मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए। आखिरकार चार मार्च को बीकानेर के कोटगेट थाना में एसपी और एएसपी के खिलाफ धारा 420 और 120बी में मुकदमा दर्ज हो गया। बस इसी के बाद से गोवर्धन की जिंदगी नर्क बन गई।


12 फरवरी को गोवर्धन के खिलाफ पुलिस ने पहला मुकदमा दर्ज किया धारा 384 में। शांता प्रसाद शर्मा ने एफआईआर में गोवर्धन पर करोड़ों की जायदाद पर इनकम टैक्स जमा न कराने का आरोप लगाया और गोर्वधन पर गुंडा एक्ट लगाकर गिरफ्तारी की मांग की। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। 12 फरवरी को ही दूसरा मुकदमा धारा 384, 353 और 504 में दर्ज किया गया।


इस मुकदमे में बीकानेर इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रिंसिपल ने आरोप लगाया कि गोवर्धन सिंह ने सूचनाएं मांगने के नाम पर धमकाया, गालीगलौच की और पैसों की मांग की। 16 फरवरी को तीसरा मुकदमा दर्ज हुआ। बीकानेर के सहायक वाणिज्यक कर अधिकारी कुंदनमल बोहरा ने मुकदमे में आरोप लगाया कि आरोपी गोवर्धन सिंह ने 2008 में उसके खिलाफ झूठी शिकायतें कीं और उससे पैसे की मांग की।

इसी तरह 21 फरवरी को चौथा, 25 फरवरी को पांचवां, 26 फरवरी को छठा और 03 मार्च को सातवां मुकदमा दर्ज किया। पुलिस ने गोवर्धन ही नहीं उनके वकील भाई हनुमान सिंह को भी पुलिस ने सात मामलों में मुलजिम बना दिया। एक मामला तो आठ रुपये गबन का है। आरोप लगाया गया है कि उन्होंने आरटीआई के तरह सूचनाएं मांगी थीं तो उन्हें कुछ पेज ज्यादा दे दिए गए जिससे सरकार को आठ रुपये का नुकसान हुआ। उनकी गाड़ी को चोरी की गाड़ी बताकर क्रेन की मदद से घर से उठा लिया गया। घरवालों ने कागज दिखाए तो उन्हें कोर्ट जाने को कहा गया।

आंध्र प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी

आंध्र प्रदेश में पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने आज हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसके तहत इस आरक्षण को रद्द कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने ये मामला संविधान पीठ को सौंप दिया है जो इस मसले पर अंतिम फैसला करेगा।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार को बड़ी राहत दी है। गुरुवार को उसने फरवरी में दिए गए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले के अमल पर रोक लगा दी, जिसमें पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण देने के फैसले को रद्द कर दिया गया था। यानी सरकार द्वारा चिन्हित मुसलमानों की 14 पिछड़ी जातियों को शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में चार प्रतिशत आरक्षण मिलना जारी रहेगा। सरकार ने 2007 में ये आरक्षण नीति लागू की थी। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने ये मामला संविधान पीठ को सौंप दिया है, जो इस मसले पर आखिरी फैसला सुनाएगा। संविधान पीठ अगस्त से इस मामले की सुनवाई शुरू करेगा।

2007 में जारी एक अधिसूचना के जरिए आंध्र सरकार ने मुसलमानों की पिछड़ी जातियों को चार प्रतिशत आरक्षण दिया था। लेकिन इससे क्रीमी लेयर को अलग रखा गया था। इसमें मुसलमानों की दस अगड़ी जातियों को छोड़कर सभी को लाभ मिल रहा था। लेकिन हाईकोर्ट ने फरवरी में ये आरक्षण रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। लेकिन सरकार की दलील है कि आरक्षण सिर्फ पिछड़ी जातियों को दिया जा रहा है ना कि पूरे मुसलमानों को।

जाहिर है कि आंध्र प्रदेश के मुसलमान सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत कर रहे हैं। इस मसले पर फैसला करने वाले तीन सदस्यीय पीठ में शामिल मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने कहा है कि ये सच है कि मुसलमानों में पिछड़ी जातियां हैं जो शैक्षिक और सामाजिक तौर पर पिछड़ी हैं। अगर हम इन जातियों को चिन्हित करने के लिए सर्वे कराने लगे तो बरसों बीत जाएंगे। और उन्हें आरक्षण का लाभ कभी नहीं मिल पाएगा। जो भी पिछड़े हैं उन्हें आरक्षण जरूर मिलना चाहिए।

Tuesday, March 23, 2010

मुस्लिम महिला विवाह आयु पर विचार करेगा बंबई उच्च न्यायालय

बंबई उच्च न्यायालय मुस्लिम लड़कियों की शादी की आयु के मुद्दे पर विचार करेगा क्योंकि मुसिलम पर्सनल लॉ और बाल विवाह निषेध कानून के बीच इस मामले में परस्पर विरोध है। यह मामला उच्च न्यायालय के समक्ष उठा है तथा अदालत ने आज अतिरिक्त सालिसिटर जनरल को नोटिस जारी किया। वह इस मामले में केन्द्र सरकार का प्रतिनिधित्व करेंगे। यह मुद्दा 15 वर्ष की एक लड़की के विवाह योग्य होने के मामले में उठा है।
याचिकाकर्ता द्वारा बाल विवाह निरोधक अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के बाद यह नोटिस जारी किया गया। याचिका में कहा गया है कि यह अधिनियम धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करता है। न्यायमूर्ति डी भोसले और न्यायमूर्ति ए आर जोशी की पीठ ने 15 साल की लड़की को 29 मार्च को अदालत में पेश करने को कहा ताकि न्यायाधीश उससे पूछताछ कर सकें। लड़की की मां जाकिया बेगम ने जनवरी में उस वक्त उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जब बाल कल्याण समिति के कहने पर पुलिस ने लड़की को अपनी हिरासत में ले लिया था।

आरएएस नियुक्ति पर हो दो माह में फैसला-सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राजस्थान हाईकोर्ट से राजस्थान प्रशासनिक सेवा में स्केलिंग से सम्बन्धित याचिका का दो माह में फैसला करने को कहा है। इस याचिका में आरएएस में स्केलिंग का मुद्दा उठाया गया है, जिस पर हाईकोर्ट ने नियुक्ति पर रोक लगा रखी है।

आरपीएससी की ओर से सोलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम व राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि इससे आरपीएससी से परिणाम घोषित होने व अन्य औपचारिकता पूरी होने के बावजूद सफल अभ्यर्थियो की नियुक्ति नहीं हो रही है और राज्य प्रशासनिक सेवा के 713 पद खाली पड़े हैं।

न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी और एस.एस. निज्जर की खंडपीठ ने विभिन्न पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट से कहा कि इस मामले से सम्बन्धित समादेश याचिका का 2 महीने में निस्तारण किया जाए। यह याचिका 24 असफल अभ्यर्थियों की ओर से दायर की हुई है।

बिना ड्राइविंग लाइसेंस वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार करें- राजस्थान हाई कोर्ट

राजस्थान हाई कोर्ट ने राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम में कंडक्टरों की भर्ती के लिए ड्राइविंग लाइसेंस की अनिवार्यता के मामले में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह बिना लाइसेंस वाले याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर भी विचार करे। साथ ही हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब तलब किया है। न्यायाधीश आर.एस.चौहान ने यह अंतरिम आदेश शिवराम जाट व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में परिवहन विभाग के उस आदेश को चुनौती दी गई जिसमें कंडक्टर की भर्ती के लिए भारी वाहन चलाने का लाइसेंस मांगा गया था।

विवाहपूर्व यौन सम्बन्ध और सहजीवन अपराध नही-उच्चतम न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने विवाहपूर्व यौन सम्बन्धों और सहजीवन की वकालत करने वाले लोगों के माफिक व्यवस्था देते हुए कहा कि किसी महिला और पुरुष के बगैर शादी किए एक साथ रहने को अपराध नहीं माना जा सकता।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सहजीवन या विवाहपूर्व यौन सम्बन्धों पर रोक के लिए कोई कानून नहीं है। न्यायालय ने यह व्यवस्था दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुशबू की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान अपना फैसला सुरक्षित करते हुए दी है।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने कहा, ‘दो बालिग लोगों का एक साथ रहना आखिर कौन सा गुनाह है। क्या यह कोई अपराध है? एक साथ रहना कोई गुनाह नहीं है। यह कोई अपराध नहीं हो सकता।’ न्यायालय ने कहा कि यहां तक कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान कृष्ण और राधा भी साथ-साथ रहते थे।

अब समय पर अदालत पहुंचेंगे ‘जज साहब’

राजधानी की पांचों जिला अदालतों में अब जज साहबों को समय से पहुंचना होगा। कोर्ट में देरी से पहुंचने और किसी काम का बहाना बनाकर जल्दी चले जाने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। दिल्ली हाईकोर्ट ने जजों की लेटलतीफी पर लगाम कस दी है।

हाईकोर्ट के सख्त रवैये के बाद दिल्ली के जिला जज (प्रथम) ने पांचों जिला अदालतों के लिए एक परिपत्र जारी किया है, जिसमें सभी जजों को खास हिदायत दी हई है कि वह सुबह १क् बजे तक अदालत पहुंचे और शाम पांच बजे से पहले वापस न जाएं। अगर ऐसा नहीं होगा तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

जजों के रोजाना देरी से सीट पर बैठने और जल्द वापस चले जाने से जनता को होनी वाली परेशानियों को कम करने और मामलों की सुनवाई प्रभावित होने के चलते यह कदम उठाया गया है। जिला जज (प्रथम) जीपी मित्तल ने कड़कडडूमा, तीस हजारी, पटियाला हाऊस, रोहिणी एवं द्वारका जिला अदालतों के जजों के लिए परिपत्र जारी किया है।

जिसमें खास तौर पर सभी जजों को हिदायत दी गई है कि सभी न्यायिक अधिकारी समय की महत्ता को समझें। दिल्ली हाईकोर्ट इस बात को लेकर गंभीर है कि दिल्ली की निचली अदालतों के जज समय से कोर्ट में अपनी सीट पर नहीं बैठते हैं और समय से पहले ही वापस चले जाते हैं।

जिला जज ने सभी जजों को निर्देश दिए हैं कि वह सुबह ठीक 10 बजे तक अदालत पहुंचकर अपनी सीट पर बैठ जाएं और शाम पांच बजे से पहले अदालत से न जाएं। ऐसा न होने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। परिपत्र को जिला जज द्वितीय से लेकर नौ तक सभी के पास भेज दिया गया है। और इस आदेश का सख्ती से पालन करने के आदेश दिए गए हैं। तीस हजारी कोर्ट में बैठने वाले मध्य जिले के सभी न्यायिक अधिकारियों को इस आदेश का पालन करने की खास हिदायत दी गई है।

घरेलू हिंसा कानून का लाभ 2006 से पहले भी- दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में उन महिलाओं को बड़ी राहत दी है, जो 2006 में घरेलू हिंसा कानून के अमल में आने से पहले से ही पीड़ित हैं। सोमवार को दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि 2006 से पहले ही पति की प्रताड़नाओं के कारण उससे अलग रह रहीं विवाहित महिलाओं को भी इसके दायरे में माना जाएगा।

जस्टिस वीके जैन ने यह फैसला सविता भनोत की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में सविता ने निचली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। सविता का कहना था कि निचली कोर्ट ने उसे सिर्फ इसलिए राहत नहीं दी, क्योंकि वह 2006 से पहले ही अपने पति ले. कर्नल (रिटा.) वीडी भनोत से अलग रह रही थीं। निचली कोर्ट ने पहले तो सविता को प्रतिमाह 10 हजार रुपए का गुजारा भत्ता और ससुराल में रहने की इजाजत देने का फैसला सुनाया था। लेकिन पति की अपील के बाद फैसला बदल दिया।

देर भी है अंधेर भी हैं।

आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस वीवी राव ने न्यायपालिका में ई-गवर्नेस को लेकर पढ़े गए अपने पर्चे में जब यह धमाका किया कि देश के सभी छोटे-बड़े न्यायालयों में लगभग 3 करोड़ 12 लाख 8 हज़ार मामले लंबित पड़े हैं, तो सबके कान खड़े होना लाजिमी था।
राव ने यह आशंका भी ज़ाहिर की है कि जजों के मौजूदा संख्याबल के हिसाब से इन मामलों को निबटाने में भारतीय न्याय व्यवस्था को 320 वर्ष लग जाएंगे! इधर तीन माह के भीतर लंबित मामलों की सूची में 14 लाख प्रकरणों का इजाफ़ा हो गया है।
देश के जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 2.72 करोड़ से अधिक, उच्च न्यायालयों में 40 लाख से अधिक तथा सर्वोच्च न्यायालय में 55 हज़ार से ज्यादा मामले लटके पड़े हैं। 2009 में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस केजी बालाकृष्णन ने कहा था कि लंबित मामलों के शीघ्र निबटारे के लिए न्यायालयों के पास ‘कोई जादू की छड़ी’ नहीं है।  बहरहाल, न्याय व्यवस्था की कछुआ चाल, अदालतों में फाइलों के लगे ढेर, कई पीढ़ियों तक चलने वाले मुकदमे आख़िर किसे न्याय दे सकते हैं? न्यायशास्त्र का एक मौलिक सिद्धांत है कि जो फ़ैसला सुनाया गया है, उससे न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए। लेकिन स्थिति क्या है? दिल्ली हाईकोर्ट ने माना है कि 2007-08 के दौरान उसके सामने 3,32,141 प्रकरण आए,जिनमें से हर प्रकरण की सुनवाई का समय महज 4 मिनट 55 सेकंड बैठता है।
इतना ही नहीं, राजकोष पर हर मिनट की सुनवाई का बोझ 6,327 रुपए पड़ा। इनमें 600 से ज्यादा ऐसे मामले हैं, जो 20 वर्ष से अधिक पुराने हैं। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में तो सभी मामले निबटाते-निबटाते पूरी सदी लग सकती है! ऐसे में अपने साथ न्याय होते देखने के लिए कितने लोग बच पाएंगे, इसका अंदाज़ लगाया जा सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट की पिछली सालाना रपट कहती है कि यूपी का इलाहाबाद हाईकोर्ट अगर साल के 365 दिन रोजाना 8 घंटे काम करे, तो भी उसे अपने यहां लंबित 9,49,437 मामले निबटाने में 27 सालों से अधिक समय लग जाएगा। वह भी तब,जब इस बीच उसके सामने कोई नया मामला पेश न किया जाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील आईबी सिंह कहते हैं, ‘क़ानून मंत्रालय समय-समय पर इस संकट से जूझने के लिए ‘न्याय आपके द्वार’ जैसी विभिन्न योजनाओं और मैकेनिÊम की घोषणा करता रहता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही है।’ ऐसे में कल्पना कीजिए सन् 1984 से न्याय की बाट जोह रहे उन सिख परिवारों की, जिनके अपने निविदाएं जला दिए गए थे।

सोचिए भोपाल गैस कांड के पीड़ितों की दुर्दशा के बारे में, जिनकी पीढ़ियां शारीरिक और मानसिक रूप से विकृत कर दी गई हैं। ये लोग उचित मुआवजे के लिए बीते 26 वर्षो से न्याय की देहरी पर टकटकी लगाए बैठे हैं। 28 फरवरी, 2002 को शुरू हुए गुजरात दंगों की सुनवाई आज आठ बरसों बाद क़ानूनी दांव-पेंच में ही उलझी हुई है। ऐसे कई उदाहरण हैं।
ख़तरनाक से ख़तरनाक आतंकवादियों की सुनवाई भी हमारे देश में अनंतकाल तक चलती रहती है। आतंकी अहमद उमर सईद शेख़ अपने आक़ा अजहर मसूद के साथ पांच साल तक भारत की न्यायिक हिरासत में था। 26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई आतंकी हमले में गिऱफ्तार आतंकी अजमल कसाब की सुनवाई अभी चल ही रही है।
अमेरिकी न्यायाधीश वेंडेल होम्स ने कहा था, ‘देरी के ज़रिए न्याय देने से इंकार करना क़ानून का सबसे बड़ा मज़ाक है।’ लेकिन भारत में यह सिर्फ़ क़ानून के मज़ाक तक ही सीमित नहीं है, बल्कि न्याय में देरी के ज़रिए देश की समूची न्यायप्रणाली का ही गला घोंटा जा रहा है।
इसका नतीजा यह हुआ है कि लोगों का क़ानून-व्यवस्था से विश्वास उठ रहा है, वे अपने मामले ख़ुद निबटाने लगे हैं और विभिन्न आपराधिक सिंडीकेटों का उदय हुआ है। एशियन लीगल रिसोर्स सेंटर (एएलआरसी) की भी यही राय है- ‘विलंबित न्याय प्रदान करने वाली प्रणाली भारत में क़ानून के राज को खत्म कर रही है।’

अटके मामलों वाले अव्वल प्रदेश

हाईकोर्टो में लंबित मामलों वाले शीर्ष पांच प्रदेश ये हैं- उत्तरप्रदेश 9,35,425; तमिलनाडु 4,62,009; महाराष्ट्र 3,39,921; पश्चिम बंगाल 3,06,253; पंजाब एवं हरियाणा 2,47,115 मामले (31/03/09 तक के आंकड़े, स्रोत: सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया )।जिला अदालतों में लंबित मामलों वाले शीर्ष पांच प्रदेश ये हैं- उत्तरप्रदेश 52,36,738; महाराष्ट्र 41,33,272; पश्चिम बंगाल 24,62,430; गुजरात 22,42,686; बिहार 14,22,580 (31/03/09 तक के आंकड़े, स्रोत: सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया)।

दस लाख पर साढ़े दस

आज अगर हम दूसरे देशों की तुलना में अपनी आबादी को न्याय देने के लिए उपलब्ध जजों की तुलना करें, तो बड़ी दुखद तस्वीर उभरती है। प्रति 10 लाख आबादी पर अमेरिका में जहां 135 जज उपलब्ध हैं, वहीं इतनी ही आबादी के लिए भारत में मात्र 10.5 जज ही हैं।

कनाडा में यह संख्या 75.2, ब्रिटेन में 50.8, ऑस्ट्रेलिया में 57.7 तथा हंगरी जैसे देश में 70 है। अगर भारत में लंबित कुल मुकदमों को जजों की संख्या से बांटा जाए, तो हर जज पर 2147 मुकदमे बैठते हैं। इसमें एक दिलचस्प तथ्य यह है कि बढ़ती शिक्षा और जागरूकता के चलते अदालतों में नए मुकदमें दर्ज होने की रफ़्तार और संख्या दोनों बढ़ी है।



केरल में जहां शिक्षा दर अधिक है, वहां हर साल प्रति एक हज़ार की आबादी पर 28 केस अधिक दर्ज हुए हैं, जबकि कम शिक्षा दर वाले राज्य बिहार में यह संख्या महज 3 है। इसका अर्थ यह हुआ कि जैसे-जैसे शिक्षा की दर बढ़ेगी मुकदमों में और इजाफा होगा। तब सोचिए कि हर 10 लाख आबादी को भारत में न्याय देने के लिए कितने जज मिल सकेंगे?



तिस पर भ्रष्ट ज्यादा ....
एक सवाल यह भी उठता है कि क्या जजों की संख्या बढ़ाने मात्र से लोगों को न्याय मिलना शुरू हो जाएगा? लंबित मामले आनन-फानन निबटा दिए जाएंगे? इसका जवाब हमें भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसपी भरूचा की इस टिप्पणी में खोजना चाहिए, जो उन्होंने अपने कार्यकाल में ही दी थी, ‘बीस प्रतिशत जजों का चरित्र संदेहास्पद है।’

उनसे पहले भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एमएन वेंकटचलैया ने कहा था, ‘मैं ऐसे 90 जजों को जानता हूँ, जो दारू और दावत के लिए वकीलों के घर शाम को जा धमकते हैं। मैं ऐसे जजों को भी जानता हूँ, जो लालच और अवैध लाभ के लिए विदेशी दूतावासों के दरवाज़ों पर दस्तक देते घूमते हैं।’

देश के एक और सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा (1997-98) ने कहा था, ‘निश्चित रूप से यहां भ्रष्टाचार हर स्तर पर फैला हुआ है। अदालत और अदालती प्रणाली से जुड़े लोग भी तो समाज से ही आते हैं। कोई जज ‘सफल भ्रष्ट’ तब तक नहीं हो सकता, जब तक उसके भ्रष्टाचार को वकीलों का सक्रिय सहयोग न हो।’

पूर्व मुख्य न्यायाधीश वायके सभरवाल (2005-07) ने झूठी एवं सारहीन मुकदमेबाजी को निरुत्साहित करने पर जोर दिया था। इंडियन ज्यूडिशियरी के पितामह कहे जाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्णअय्यर की राय में न्यायपालिका में पारदर्शिता एवं जवाबदेही लाने का एक ही उपाय है..और वह है जजों की नियुक्ति, उनके प्रदर्शन पर नज़र रखने तथा उनके खिलाफ़ कार्रवाई करने के लिए एक अलग आयोग गठित करना।
सरकारी बोझ के मारे

हमारी यह धारणा ग़लत है कि न्यायालयों में चल रहे सबसे अधिक मामले आपराधिक हैं। वास्तविकता यह है कि 60 फ़ीसदी लंबित मामले सरकारी हैं। कई मामलों में तो वादी-प्रतिवादी राज्य या केंद्र सरकार ही हैं। सबसे ज्यादा लंबित मामले कर विभाग, गृह, वित्त, उद्योग, खदान-पेट्रोलियम, वन, पीएचईडी, शिक्षा, पंचायती राज, परिवहन और राजस्व विभाग सहित कुल 19 विभागों के हैं। सरकार के खिलाफ़ सबसे ज्यादा मामले टैक्स से जुड़े हैं। इसमें पहल करते हुए महाराष्ट्र सरकार के क़ानून मंत्रालय ने ऐसे लंबित मामले वापस लेने के लिए एडवोकेट जनरल रवि कदम की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का निर्णय लिया है।

महाराष्ट्र के क़ानून एवं न्याय राज्यमंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि ऐसे लगभग 95 प्रतिशत मामले राज्य सरकार से जुड़े हैं। पाटिल के मुताबिक़, अगर इन मामलों को प्रशासनिक स्तर पर निबटा लिया जाता है,तो समूचे महाराष्ट्र के लगभग 30 प्रतिशत लंबित मामले अपने आप छंट जाएंगे।

Monday, March 22, 2010

गवाहों को धमकाना नहीं होगा बर्दाश्त

‘गवाहों को धमकाना, उनसे जोर-जबरदस्ती और उन्हें अपने पक्ष में कर लेने जैसे मामलों ने भारत में आपराधिक न्याय विधान पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। इन पर जनता की निगाहें हैं। आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलता समाज में कानून के क्षरण और अराजकता को जन्म देगी, जिससे कानून और नियम कारगर नहीं रह जाएंगे। दोषी ने भी कई बार कानून को अपने हाथों में लिया है।’ यह कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें अदालत ने जितेंद्र उर्फ कल्ला को जीवन भर के कठोर कारावास की सजा सुनाते हुए प्रमुखता से रखीं।

रोहिणी की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. कामिनी लॉ ने वर्ष १९९९ में अनिल भडाना एवं केएल नैयर हत्याकांड को अंजाम देने वाले जितेंद्र उर्फ कल्ला को सजा सुनाने से पहले कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर गौर किया। अदालत ने कल्ला के आपराधिक इतिहास, मामले के दौरान गवाहों को डराने-धमकाने एवं पुलिस कस्टडी से भी फरार होने को गंभीरता से लिया। यहां तक की दिल्ली एवं हरियाणा में उसके द्वारा गई  वारदातों को भी कोर्ट ने अपने फैसले में शामिल किया।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ‘हमारा आपराधिक न्याय तंत्र वैज्ञानिक सबूतों तथा चश्मदीद गवाहों पर निर्भर करता है। चश्मदीद गवाह को सबसे अहम सबूत माना जाता है। पिछले कुछ मामलों पर नजर डाली जाए तो आरोपित हरसंभव प्रयास कर खुद को बरी कराना चाहता है। बरी होने में सफल होने के बाद वह गवाहों को धमकाने से लेकर अन्य सभी उपाय करता है। चाहे फिर गवाह को मौत के घाट ही क्यों न उतारना हो।

ऐसी घटनाओं के लगातार सामने आने से शायद ही कोई इस ढहते हुए न्यायिक तंत्र पर विश्वास करे। समय की जरूरत को देखते हुए हर उस व्यक्ति पर शिकंजा कसना जरूरी है, जो न्यायिक प्रकिया को उलटने या उसके खिलाफ जाने की कोशिश करता है। आरोपियों द्वारा उठाए गए ऐसे गैरकानूनी कदमों के चलते समाज में राष्ट्र की न्यायिक प्रकिया पर अविश्वास फैलता है और उनकी सोच भी बदलती है। गवाहों के खिलाफ किया गया कोई भी अपराध जरा भी बर्दाश्त न किया जाए।’

सेक्स मैसेज करने पर दो को जेल

दुबई में तीन भारतीयों को फोन पर सेक्स मैसेज भेजने के लिए तीन महीने की जेल की सजा दी गई। प्राप्त खबरों के अनुसार इनमें से दो अमीरात एयरलॉइन के कर्मचारी हैं। दुबई के अखबार दे नेशनल के अनुसार इनमें से एक 47 वर्षीय केबिन क्रू सर्विस सुपरवॉइजर हैं और दूसरी 42 वर्षीय फ्लाइट एटेंडेंट है। हालांकि अभी तक इनकी पहचान की पुष्टि नही हो की गई है। कोर्ट में 16 मार्च को जारी किए गए दस्तावेजों के अनुसार इन दोनों को तीन माह की सजा सुनाई गई।

इससे पहले दिसंबर में कोर्ट ने इन दोनों को 6 माह की सजा और देश छोड़ने के लिए कहा था। अब इनकी सजा को कम करके तीन माह कर दिया गया है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई ठोस सुबूत नही है कि दोनें के बीच सेक्स संबंध हो।

कोर्ट में यह साबित हो गया था कि दोनें नें एक दूसरे को सेक्स मैसेज भेजे। दुबई में शादी से बाहर सेक्स संबंध रखना अपराध है इसलिए उनके मैसेज भेजने को अपराध करने के प्रति प्रतिबद्धता माना गया और उन्हें इसके लिए सजा सुनाई गई। कोर्ट ने कहा कि टेक्सट मैसेज पढ़कर यह आभास होता है कि दोनों अपराध कर सकते थे।
यह मामला कोर्ट में उस वक्त आया था जब फ्लाइट अटेंडेंट के पति ने पिछले साल मार्च में उसपर सुपरवाईजर के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगाते हुए मामला दायर किया था। फ्लाइट एटेंडेंट का अपने पति से 2007 से तलाक को लेकर विवाद चल रहा है।

बाद में महिला के पति ने कोर्ट में कहा था कि उसके सेक्स मैसेज साबित करते हैं कि उसके अवैध संबंध थे। उसके पति का यह भी मत था कि महिला को मिले सेक्स मैसेज इसलाम की तौहीन हैं।

2008 में टेलीकॉम कंपनी ने कोर्ट में महीला के मैसेज उपलब्ध करा दिए थे। बाद में महिला ने कहा कि फ्लाइट सुपरवाइजर ने उसकी बहन को यह मैसेज किए थे। बाद में फ्लाइट सुपरवाइजर ने महिला से किसी भी प्रकार के संबंधों से इंकार करते हुए कहा कि उसका तो पिछले चार साल से उसकी बहन से अफेयर है।

अभियोजन पक्ष के वकीलों की दलील थी की सुपरवाइजर झूठ बोल रहा है और कोर्ट ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया। महिला की 25 वर्षीय बहन को भी तीन माह कि सजा सुनाई गई है। इससे पहले निचली अदालत ने महिला की बहन को भी तीन माह की सजा और देश छोड़ने का आदेश दिया था। कोर्ट ने महिला की बहन को दिए गए देश छोड़ने के आदेश को भी रद्द कर दिया हैं।

Sunday, March 21, 2010

21 न्यायिक अफसरों को मिलेगी अनिवार्य सेवानिवृत्ति

राजस्थान हाईकोर्ट  की पूर्ण पीठ ने सरकार से न्यायिक सेवा के 21 अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने की अनुशंसा की है। मुख्य न्यायाधीश जगदीशचन्द्र भल्ला की अध्यक्षता में शनिवार को मुख्यपीठ में हुई बैठक में न्यायिक सेवा से जुड़े कई अन्य निर्णय भी लिए गए।

सूत्रों के अनुसार अनिवार्य सेवानिवृत्ति के 21 मामलों में 18 राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा के व 3 राजस्थान न्यायिक सेवा के हैं। दो अधिकारियों के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के प्रार्थना पत्र को मंजूरी दे दी है। वरिष्ठ अधिवक्ता बनाने की प्रक्रिया तय करने के साथ ही आरएचजेएस के रिक्त पदों में से 36 पद वकीलों से तथा शेष पदोन्नति से भरने का फैसला भी किया गया।

मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला ने न्यायिक अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति के सदस्य न्यायाधीश प्रकाश टाटिया, केएस राठौड़, दिलीपसिंह, जेआर गोयल व तत्कालीन न्यायाधीश एचआर पंवार शामिल थे।

इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में 23 न्यायिक अधिकारियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सिफारिश की थी। लेकिन २३ अधिकारियों में शामिल उच्च न्यायिक सेवा के दो अधिकारियों ने पूर्णपीठ की बैठक से पहले ही वीआरएस का आवेदन कर दिया। एडवर्स एसीआर कमेटी की रिपोर्ट को मंजूरी दी गई है।

Friday, March 19, 2010

डिसलेक्सिक को एग्जाम में कैलकुलेटर की अनुमति नहीं

उच्चतम न्यायालय ने डिसलेक्सिया से पीड़ित एक छात्र को परीक्षा में कैलकुलेटर के इस्तेमाल की इजाजत देने से आज इनकार कर दिया. मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने डीएवी स्कूल चंडीगढ़ के छात्र परांजय जैन को परीक्षा में कैलकुलेटर के इस्तेमाल की इजाजत देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उसने ऐसे ही मामले में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसइ) की अपील पर बम्बई उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर रोक लगा रखी है. बम्बई उच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में इस रोग से पीड़ित कुछ विद्यार्थियों को यह सुविधा उपलब्ध कराने की अनुमति दी थी. बाद में उच्चतम न्यायालय ने सीबीएसइ की अपील पर उच्च न्यायालय के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी. याचिकाकर्ता ने बम्बई उच्च न्यायालय के फ़ैसले को आधार बनाते हुए तत्काल राहत की मांग की थी.

कैपिटेशन फीस वसूलने पर रोक लगाने के लिए कैबिनेट ने अहम विधेयक को अपनी मंजूरी दी।

प्राइवेट कॉलेजों और इंस्टिट्यूट्स में छात्रों से एडमिशन के लिए वसूली जाने वाली कैपिटेशन फीस के चलन को रोकने के लिए कैबिनेट ने शुक्रवार को अहम विधेयक को अपनी मंजूरी दे दी। तकनीकी एवं चिकित्सा शिक्षा संस्थानों एवं यूनिवर्सिटियों में अनुचित आचरण को प्रतिबंधित करने वाले इस विधेयक को अब संसद में पेश किया जाएगा। विधेयक में कैपिटेशन फीस वसूलने पर रोक लगाने की सख्त व्यवस्थाएं की गई हैं।

विधेयक में कैपिटेशन फीस लेने वाले और गुणवत्ता शिक्षा प्रदान करने के वायदे से हटने वाले संस्थानों पर 50 लाख रुपये तक का जुर्माने का प्रावधान है। दोषी कॉलेज प्रशासकों को तीन साल तक की जेल हो सकती है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार यह विधेयक हायर एजुकेशन की क्वॉलिटी को बनाए रखने और उसमें सुधार लाने के लिए शिक्षा क्षेत्र में मील की पत्थर साबित होगा। मंत्रालय के अधिकारियों को कहना है कि पिछले काफी समय से देश भर में तकनीकी व चिकित्सा शिक्षण संस्थानों में कैपिटेशन फीस वसूलने का चलन है। उन्होंने कहा कि ऐसे शिक्षण संस्थानों की संख्या भी कम नहीं है जो छात्रों से कैपिटेशन फील लेने के बावजूद क्वॉलिटी एजुकेशन नहीं देते।शिक्षण संस्थानों में योग्य फैकल्टी की भी कमी रही है।

विधेयक में ऐसे अनुचित आचरण को अपराध की संगीनता के आधार पर आपराधिक या दीवानी मामले की श्रेणी में रखा जाएगा। दीवानी मामलों की सुनवाई सामान्य अदालतों में न होकर शैक्षिक ट्रिब्यूनल में होगी। इन टिब्यूनलों का अलग से गठन होगा। ये शैक्षिक मामलों से जुड़े उल्लंघनों की सुनवाई करेंगे।

मंत्रालय ने शैक्षिक न्यायाधिकरण विधेयक का ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया है। इसमें छात्रों के उत्पीड़न या शिक्षण कार्य में गड़बड़ी सहित हर तरह के विवादों का निपटान करने के लिए ट्रिब्यूनल स्थापित करने का प्रावधान है। आपराधिक मामलों की सुनवाई सामान्य अदालतों में ही होगी। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार यदि कोई शिक्षण संस्थान अपने प्रॉसपेक्टस में छात्रों से किए गए वायदे पूरा नहीं करता तो ऐसे चलन को आपराधिक मामलों की श्रेणी में रखा जाएगा।

कैबिनेट ने तकनीकी एवं चिकित्सा शिक्षा संस्थानों और यूनिवर्सिटियों में अनुचित आचरण प्रतिबंध विधेयक 2010 के साथ ही शैक्षिक सुधारों सम्बद्ध दो विधेयकों को मंजूरी दी। एक विधेयक शैक्षिक संस्थानों के विवादों के निपटान के लिए शैक्षिक न्यायाधिकरणों के गठन से सम्बद्ध है जबकि दूसरा राष्ट्रीय मान्यता एजेंसी की स्थापना से जुड़ा है। इन्हें भी अब संसद में पेश किया जाएगा। मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि विधेयक में अपराध की गम्भीरता के आधार पर दंड का प्रावधान है। यदि एक या दो छात्रों से कैपिटेशन फीस वसूलने के इक्का दुक्का मामले प्रकाश में आते हैं तो यह दीवानी मामला बनेगा। ऐसे मामलों में शिक्षण संस्थान पर जुर्माना लगाया जाएगा। कैबिनेट ने देश में अलग से नैशनल पुलिस यूनिवर्सिटी की स्थापना के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया है। कैबिनेट ने इसे काफी खर्चीला बताते हुए खारिज कर दिया।

पुलिस की गिरफ्त में वकील

इंदौर में फर्जी जमानतें करवाने वाले रैकेट के मुखिया एक वकील को क्राइम ब्रांच ने गुरुवार को एमजी रोड पुलिस की मदद से गिरफ्तार किया। उसके पास से तहसीलदार की फर्जी साइन व सील लगी खाली भू-ऋण पुस्तिकाएं भी मिलीं।

इनके आधार पर वह गरीब तबके के लोगों को 200-200 रुपए देकर नकली जमानतदार बना देता था। उसका साथ देने वाले तीन एजेंटों को भी पुलिस ने पकड़ा। पुलिस को ऐसे 56 आरोपियों की सूची मिली है जिन्हें वकील ने फर्जी जमानतदारों के जरिए छुड़वाया है।

एसपी मकरंद देउस्कर को शिकायतें मिल रही थीं कि जमानत पर रिहा होने के बाद आरोपी पेशी पर नहीं आ रहे हैं। जमानतदार के नाम-पते भी फर्जी निकलते। पता चला कोर्ट में एक रैकेट सक्रिय है, जो फर्जी जमानतें करवाता है।

श्री देउस्कर ने एडिशनल एसपी क्राइम अरविंद तिवारी व डीएसपी जितेंद्र सिंह को रैकेट पकड़ने का जिम्मा सौंपा। श्री सिंह ने एसआई अनिलसिंह चौहान की टीम के गणोश पाटिल व बलराम तोमर को तलाश में भेजा। पता चला यह रैकेट वकील राजेंद्रकुमार वर्मा चला रहा है। गुरुवार शाम वह कोर्ट से निकला, क्राइम ब्रांच ने एमजी रोड पुलिस की मदद से पत्थर गोदाम रोड पर पकड़ लिया।

हर दिन 15 फर्जी जमानतें

डीएसपी जितेंद्र सिंह ने बताया राजेंद्र वर्मा पांच सालों से फर्जी जमानतें करा रहा है। वह हर दिन करीब 15 फर्जी जमानतें कराता था। उसने पार्टी लाने के लिए एजेंट रखे थे। ऐसे ही तीन एजेंट धर्मेद्र पिता लक्ष्मीनारायण शर्मा निवासी परदेशीपुरा,भागचंद पिता छोटेलाल निवासी पाटनीपुरा तथा हरिओम पिता नंदूलाल चंद्रवंशी निवासी पोलायकलां, शाजापुर को भी पकड़ा गया।

फर्जी जमानत कराने की फीस जमानत राशि की दस प्रतिशत रकम रहती थी। जैसे दस हजार की जमानत की फीस एक हजार रुपए होती थी। इसमें पांच सौ वह रखता था और बदले में फर्जी साइन व सील से तैयार भू-ऋण पुस्तिका बनाकर देता था।


दो सौ रु. फर्जी जमानतदार को मिलते थे। सौ रुपए वह वकील लेता था जो कोर्ट में जमानतदार को पेश करता तथा सौ रु. एजेंट को मिलते थे। शेष सौ रुपए ऊपरी खर्च के रहते थे। एजेंटों ने भी फर्जी जमानतदार दस-दस लड़कों की टीम तैयार कर रखी थी। उन्हें लॉजों में रखता था।

ऐसे होती थी धोखाधड़ी

डीएसपी के मुताबिक भू-ऋण पुस्तिका पर तहसीलदार के साइन व सील होने के साथ संबंधित व्यक्ति की संपत्ति का ब्योरा रहता है। ऐसे में जज संतुष्ट हो जाते हैं। राजेंद्र वर्मा भू-ऋण पुस्तिका के ऊपरी कवर की फोटोकॉपी तथा अंदर के खाली पन्नों की अलग से फोटो कॉपी कराकर नकली पुस्तिका बनाकर जमानतदार का फोटो व साइन कराता। मन से उसकी जमीन व मकान का ब्योरा लिख तहसीलदार की सील व साइन कर देता। पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। अन्य लोगों की भी तलाश जारी है।

डीएसपी ने बताया आरोपी एजेंटों में शाजापुर के हरिओम को दस साल पहले फर्जी जमानत देने पर रुपए मिले थे। यह काम इतना पसंद आया कि वह फर्जी जमानत के धंधे में लग गया। वह दस सालों से इंदौर की एक लॉज में रह रहा था।

सड़कों पर अब जुगाड़ नहीं - राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने क्षमता से ज्यादा सवारी, चारा, रूई या अन्य सामग्री भरे वाहनों को रोकने तथा "जुगाड़" वाहनों को जब्त करनेनिर्देश दिए हैं। साथ ही, क्षमता से अधिक भरे वाहनों के मामले में मुख्य सचिव के जरिए राज्य सरकार, प्रमुख गृह व परिवहन सचिव, पुलिस महानिदेशक व सभी जिलों के कलक्टर, एसपी और आरटीओ-डीटीओ से दो अपे्रल तक जवाब मांगा है। न्यायाधीश के.एस. राठौड़ व न्यायाधीश महेशचन्द्र शर्मा की खण्डपीठ ने मोरल नदी (सवाईमाधोपुर) बस हादसा प्रकरण के बारे में राजस्थान पत्रिका सहित अन्य समाचार पत्रों की खबरों के आधार पर स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लेकर इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज करते हुए गुरूवार को यह कार्रवाई की। न्यायालय ने 15 मार्च को तड़के सड़क दुर्घटना में छात्र-छात्राओं की मौत पर संवेदना प्रकट की।

अदालत ने कहा कि इस दर्दनाक हादसे के बारे में 16 मार्च को प्रकाशित खबरों ने झकझोर दिया। खबरों के मुताबिक क्षमता से ज्यादा चारे से भरे जुगाड़ ने लगभग पूरे पुल को घेर रखा था, इसके कारण देहरादून-मसूरी व वृंदावन से शैक्षणिक भ्रमण से छात्र-छात्राओं को वापस झालावाड़ ले जा रही बस के नियंत्रन खोने से हादसा हुआ। इस क्षेत्र सहित पूरे प्रदेश में जुगाड़, ट्रक, ट्रेक्टर व अन्य वाहनों में बाहर तक चारा भरा त्रिपाल लटकता रहता है, जिससे सड़क घिरी रहती है।

इसके कारण दूसरे वाहनों को कुछ भी दिखाई नहीं देता और वाहन दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। ऎसे भी मामले सामने आए हैं, जिनमें चारे में आग लगने से वाहन खाक हो जाते हैं और यातायात बुरी तरह प्रभावित होता है। अगली सुनवाई दो अपे्रल को होगी।

सवाईमाधोपुर के पास मोरल नदी पर हुए इस हादसे में मरने वाले अधिकतर छात्र-छात्रा 19 से 22 वर्ष के थे। इन बच्चों के परिजनों की हालत आज कल्पना से परे होगी। विद्यार्थी देश का भविष्य होते हैं। ऎसे में इस तरह के हादसों को रोकने का समय आ गया है, इन हादसों को रोकने के लिए पुलिस के साथ परिवहन अधिकारियों को कदम उठाने होंगे।

Tuesday, March 16, 2010

अब 'बलात्कार' नहीं, 'यौन उत्पीड़न'

भारत सरकार ने 150 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता [आईपीसी] में संशोधन का फैसला किया। इसके मुताबिक आईपीसी से 'बलात्कार' शब्द को हटा दिया जाएगा। इसकी जगह 'यौन उत्पीड़न' शब्द का इस्तेमाल होगा ताकि यौन अपराधों से पीड़ित महिलाओं और पुरुषों को समान रूप से कानून का लाभ मिल सके। उधर, सोमवार को लोक सभा में अपराध प्रक्रिया संहिता [सीआरपीसी] में संशोधन विधेयक पेश किया गया जिसके मुताबिक गंभीर मामलों में पुलिस को इस बात का भी ब्यौरा देना होगा कि उसने आरोपी की गिरफ्तारी क्यों नहीं की।

गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के बताया कि आईपीसी में संशोधन के लिए विधेयक एक पखवाड़े में तैयार कर लिया जाएगा। इसके बाद इसका मसौदा मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाएगा। आईपीसी की धारा 375 मेंइस प्रस्तावित बदलाव के बाद महिलाओं, पुरुषों औच् बच्चों के साथ होने वाले सभी तरह के यौन अपराधों को समान श्रेणी का माना जाएगा। साथ ही अपराधी और पीड़ित के साथ किसी तरह लिंग भेद नहीं होगा।

उधर, लोकसभा में सीआरपीसी संशोधन विधेयक पेश किया गया।  इसके मुताबिक सीआरपीसी की धारा पांच की उपधारा एक के आधार पर पुलिस को अब लिखित में यह जानकारी देनी होगी कि उसने किसी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया तो क्यों? और किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया तो किस आधार पर? गृह मंत्रालय के अधिकारी के मुताबिक इस संशोधन का फायदा गरीब और अमीर आरोपियों के बीच होने वाले भेद-भाव को दूर करने में मिल सकेगा। अब तक ज्यादातर मामलों में आरोपी के गरीब होने पर पुलिस उसे तुरंत गिरफ्तार कर लेती है। जबकि अमीर आरोपी के मामले में ऐसा कदम उठाने से बचती है।

पति के जिंदा होने का सबूत देने पर रिहाई।

पति की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा भुगत रही महिला को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से सुनवाई अधीन अपील का फैसला होने तक जमानत पर रिहा करने के आदेश जारी किए हैं। महिला की रिहाई तब संभव हो पाई है जब हाई कोर्ट के पास उक्त महिला के पति के जिंदा होने का मामला आया है।

जिले के थाना बरेटा में दर्ज मामला नंबर १६७, तिथी २५ नवंबर २००५ को भादंसं की धारा ३०२,२०१ के तहत महिला को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दर्ज मामले के मुताबिक जिले के गांव अकबपुर खुडाल निवासी रोशनी कौर पत्नी दर्शन सिंह, गुरतेज सिंह पुत्र सुखिंदर सिंह व जगतार सिंह पुत्र करनैल सिंह को रोशनी के पति दर्शन सिंह की हत्या कर उसका शव को नहर में फेंकने के मामले में नामजद कर गिरफ्तार किया था। मामले की सुनवाई के बाद अतिरिक्त जिला सैशन जज जे एस भाटिया की अदालत की ओर से ३० मई २००९ को सुनाए फैसले में आजीवन कारावास व जुर्माना किया था। कोर्ट के उक्त फैसले के बाद रोशनी कौर ने पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। हाईकोर्ट मे अपील नंबर ६३५ डीबी ऑफ २००९ मे बचाव पक्ष के वकील भानु प्रताप सिंह ने मृतक करार दिए दर्शन सिंह के जीवित होने के दिए सबूतों के बाद 9 मार्च को हाईकोर्ट के जस्टिस मेहताब सिंह गिल, जस्टिस अरविन्द कुमार की खंडपीठ की ओर से उक्त अपील के फैसले तक रोशनी कौर को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही एसएस भिंडर सीनियर अतिरिक्त एडवोकेट जनरल पंजाब को दर्शन सिंह के जीवित होने की जांच के आदेश देते हुए मामले की सुनवाई १८ मार्च का दिन तय किया है। उधर, एसएसपी हरदयाल सिंह मान ने संपर्क करने पर बताया कि मामले की गहनता से जांच होगी व किसी भी प्रकार की कोताही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

डीएवी को देना होगा 10 करोड़ रुपये मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने डबवाली अग्निकांड मामले में डीएवी स्कूल मैनेजमेंट कमेटी को 10 करोड़ रुपए मुआवजे के लिए जमा करने का आदेश दिया है। 1995 में डबवाली के डीएवी स्कूल के सालाना समारोह में आग लगने से 400 मासूमों की मौत हो गई थी। डीएवी स्कूल को ये रकम एडिशनल सिविल जज के पास 6 हफ्ते में जमा करनी होगी।

गौरतलब है कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने गर्ग कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर कुल 33 करोड़ रुपये का मुआवजा तय किया था। इसमें से 55 फीसदी रकम डीएवी को देनी थी लेकिन डीएवी प्रबंधन रकम चुकाने से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट चला गया जबकि प्रदेश सरकार ने अपने हिस्से के 16 करोड़ रुपये जमा करा दिए।

आज सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले की सुनवाई करते हुए डीएवी प्रबंधन को आदेश दिया कि वो छह हफ्ते के भीतर 10 करोड़ रुपये जमा कराए। अग्निकांड पीड़ित संघ के प्रवक्ता विनोद बांसल ने आरोप लगाया कि डीएवी प्रबंधन शुरू से ही टालमटोल की रणनीति अपना रहा है। यही वजह है कि उन्हें न्याय मिलने में 15 साल लग गए।

सामान्य वर्ग से अधिक अंक लाने पर ओ0बी0सी0 अभ्यर्थी को नियुक्ति का आदेश।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने वर्ष 2003 में जारी नर्स ग्रेड द्वितीय पदों की भत्र्ती के मामले में योग्यताधारी महिला अभ्यर्थी की याचिका स्वीकार कर उसे तीन महीने में नियुक्ति दिए जाने के आदेश दिए हैं।

मामले के अनुसार सुमन पूनिया निवासी झुंझुनूं ने अधिवक्ता संजय महला के जरिए उच्च न्यायालय में रिट प्रस्तुत की। रिट में बताया गया कि वर्ष 2003 में उसने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग, राजस्थान जयपुर की ओर से जारी भर्ती  विज्ञापन में आवेदन किया था।

उसके महिला (ओबीसी) में 61.46 फीसदी अंक आने तथा सामान्य महिला में कट ऑफ मार्क्‍स 60 फीसदी होने के बावजूद भी नियुक्ति से वंचित कर दिया। इस पर उच्च न्यायालय ने सचिव व निदेशक चिकित्स व स्वास्थ्य विभाग से जवाब-तलब किया।

अधिवक्ता महला ने अन्य नजीरों के साथ उच्चतम न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण संबंधी प्रतिपादित सिद्धांत के आधार पर प्रार्थी को नियुक्ति दिए जाने की प्रार्थना की। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधिपति मोहम्मद रफीक ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग राजस्थान को इस महिला अभ्यर्थी को बीच के अंतराल के लाभों के साथ तीन महीने में नियुक्ति दिए जाने के आदेश दिए हैं।

Sunday, March 14, 2010

कानूनविदों ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की आलोचना की

अहमदाबाद में शुक्रवार को पूर्व न्यायाधीशों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक हुई, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरोध में एक प्रस्ताव पारित किया गया। यह बैठक हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी. यू. मेहता के आवास पर बुलाई गई थी।

उल्लेखनीय है कि सूचना का अधिकार कानून के तहत न्यायाधीशों को संपत्ति सार्वजनिक करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने चुनौती दी है जिसकी सुनवाई अब सर्वोच्च न्यायालय में ही होगी।

वरिष्ठ वकील गिरीश पटेल ने शनिवार को कहा कि तीन सदस्यीय समिति इस मुद्दे पर आगे की रणनीति तय करेगी। समिति में पूर्व न्यायाधीश आर. ए. मेहता, कानन ध्रुव और गिरीश पटेल शामिल हैं।

जल्द ही में उत्तरप्रदेश घर बैठे खरीदें जमीन-जायदाद

जमीन-जायदाद की खरीद-फरोख्त में जल्द ही बिचौलियों से छुटकारा मिल सकेगा। अब घर बैठे लोग बैनामा करा सकेंगे। इस दिशा में प्रयास तेज हो गये हैं। ऑन लाइन रजिस्ट्री का अगला कदम इसी माह शुरू हो जायेगा। कम्प्यूटर इंटरनेट से लेकर कार्यालयों तक रजिस्ट्री का नया प्रोफार्मा उपलब्ध होगा। उपभोक्ता निर्धारित फार्म भरकर जमीन-जायदाद का क्रय-विक्रय कर सकेंगे। उन्हें न तो किसी वकील की जरूरत पड़ेगी और न ही लाइसेंसधारक बैनामा लेखकों का सहारा लेना पड़ेगा। हर प्रकार के बिचौलियों का सिस्टम खत्म हो जायेगा।

नये स्टाम्प एक्ट के लागू होते ही डिजिटल सिग्नेचर (हस्ताक्षर) के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का क्रय और विक्रय कर सकेगा। घर बैठे रजिस्ट्री की सुविधा उपलब्ध हो जायेगी। उम्मीद जतायी जा रही है कि इंटरनेट पर प्रोफार्मा उपलब्ध कराने के बाद विभाग का अगला कदम पूर्ण रूप से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का होगा। इसके लिए प्रदेश सरकार का स्टाम्प एवं निबंधन विभाग तैयारी में जुटा है।

प्रदेश में कुल 353 रजिस्ट्री दफ्तर हैं। जिनमें 106 दफ्तर कम्प्यूटराइज्ड किये जा चुके हैं। इसी माह 40-45 और नये दफ्तरों में कम्प्यूटर लग जायेंगे। मेरठ और लखनऊ मण्डल के सभी तहसील स्तरों में भी स्थित निबंधन कार्यालयों में कम्प्यूटर नेटवर्क रन करने लगेगा। इस संदर्भ में इसी माह आगरा में कार्यशाला भी आयोजित होने जा रही है।

विभागीय स्तर पर रजिस्ट्री को दो संवर्गो में बांटा गया है। करीब 80 फीसदी रजिस्ट्री आर्डिनरी अर्थात साधारण रजिस्ट्री संवर्ग में आती है। जबकि दूसरे संवर्ग में टेक्निकल रजिस्ट्री शामिल है जिसमें बैंक के लोन वगैरह पक्ष भी शामिल रहते हैं। ऑन लाइन रजिस्ट्री के तहत इस पहलू पर भी ध्यान दिया जा रहा है। तैयार हो रहे नये साफ्टवेयर के जरिए दोनों प्रकार के बैनामों को आच्छादित किया जा सकेगा। नये साफ्टवेयर में निर्धारित मोहल्लों के सरकिट रेट कैलकुलेटेड होकर सामने आ सकेंगे और संबन्धित व्यक्ति डिजिटल सिग्नेचर के साथ साथ ऑन लाइन जमीन-जायदाद की खरीद-फरोख्त की सुविधाओं का लाभ उठा सकेगा। उसे न तो दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ेंगे और न ही कि बिचौलियों को किसी प्रकार की घूस वगैरह देनी पड़ेगी।

अविवाहित व्यक्ति का दत्तक पुत्र या पुत्री अनुकंपा नियुक्ति की हकदार नहीं -सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी अविवाहित व्यक्ति का दत्तक पुत्र या पुत्री अनुकंपा नियुक्ति पाने का तब हकदार नहीं है जब वैधानिक नियम इस तरह की नियुक्तियों को विशेष तौर पर रोकते हों। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति एके पटनायक की पीठ ने अपने एक आदेश में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक एसबीआई को मृतक सतीश साहू की दत्तक पुत्री श्वेता साहू को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने के निर्देश दिए गए थे।
इस मामले में एसबीआई ने दो मार्च, 2001 को श्वेता साहू को अनुकंपा आधार पर नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था क्योंकि उपबंध तीन (एफ) के तहत इस तरह की नियुक्ति की अनुमति नहीं है।
इस उपबंध के मुताबिक, अविवाहित कर्मचारियों की दत्तक पुत्रियां अनुकंपा आधार पर नियुक्ति के उद्देश्य से आश्रितों की परिभाषा के दायरे में नहीं आतीं। सिर्फ अविवाहित कर्मचारियों के भाइयों और बहनों को ही आश्रित माना जाता है।
बहरहाल, इस नियम में एक छूट यह है कि विवाहित कर्मचारी के मामले में ''आश्रित'' की परिभाषा में दत्तक पुत्र या पुत्री शामिल रहती है और उनकी नियुक्ति पर विचार किया जा सकता है।
श्वेता ने इस नियम को असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे चुनौती दी थी। हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश ने उनकी अर्जी खारिज कर दी थी, पर खंडपीठ ने एसबीआई को अनुकंपा आधार पर उन्हें नियुक्ति देने के बारे में विचार करने को कहा था। इसके बाद एसबीआई ने वकील संजय कपूर के जरिए शीर्ष अदालत में अपील की थी।

Thursday, March 11, 2010

उच्च न्यायालय ने आईपीएल-3 को स्थगित करने से किया इंकार

मद्रास उच्च न्यायालय ने 10वीं और 12वीं की परीक्षा को देखते हुए इंडियन प्रीमियर लीग के तीसरे टूर्नामेंट को स्थगित करने से इंकार कर दिया और इस मामले में केंद्र सरकार को फैसला करने को कहा। आईपीएल शुक्रवार से मुंबई में शुरु होना है।
    
फिल्म निर्माता हेनरी की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश एचएल गोखले और न्यायमूर्ति वी धनपाल की खंडपीठ ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि केंद्रीय खेल मंत्रालय और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस पर जल्द से जल्द फैसला करेगा।

वसुंधरा सहित 15 के खिलाफ अनुसंधान कार्रवाई पर रोक

राजस्थान हाई कोर्ट ने दीनदयाल ट्रस्ट मामले में राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित 15 जनों के खिलाफ निचली कोर्ट के आदेश पर कोर्ट फीस नहीं लगाने के मामले में बनीपार्क थाने में दर्ज एफआईआर की अनुसंधान कार्रवाई पर रोक लगा दी है। साथ ही राज्य सरकार व परिवादी श्रीगंगानगर निवासी श्रीकृष्ण कुक्कड़ को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। न्यायाधीश आर.एस.राठौड़ ने यह अंतरिम आदेश गुरुवार को विधायक अशोक परनामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

याचिका में कहा कि कुक्कड़ की ओर से दर्ज कराई एफआईआर वसुंधरा व अन्य को बदनाम करने व तंग करने के लिए दर्ज कराई है। इसलिए इस एफआईआर पर की जाने वाली अनुसंधान की कार्रवाई पर रोक लगाई जाकर इसे निरस्त किया जाए। न्यायाधीश ने याचिका पर सुनवाई करते हुए अनुसंधान कार्रवाई पर रोक लगा दी।

जजों की जांच के लिए बनेगा कानून

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टो के जजों की जांच के लिए कानून बनाए जाने की संभावना है। सरकार जजों के खिलाफ शिकायत की जांच प्रक्रिया तय करने के लिए एक विस्तृत कानून बनाने के बारे में सोच रही है। यह जानकारी विधि एवं न्याय मंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने गुरूवार को लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में दी।
उन्होंने बताया कि सरकार इस तरह के मामलों की जांच की प्रक्रिया तय करने के लिए एक विस्तृत विधेयक लाने पर विचार कर रही है। उन्होंने बताया कि 1990 में हुए मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में न्यायिक जवाबदेही के मसले पर विचार विमर्श हुआ था। इसमें बनी सहमति के आधार पर भारत के मुख्य न्यायाधीश ने न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जांच की प्रक्रिया की व्यवस्था की थी। मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टो के जजों के खिलाफ शिकायत की जांच के बारे में फैसला संबंधित अदालत के मुख्य न्यायाधीश न्यायपालिका के हितों को ध्यान में रखते हुए अपने विवेक से करते हैं।

उडीसा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति का नोटिस


गत जनवरी में कालाहांडी के जिला न्यायाधीश के रुप में पदावनत किए गए उडीसा उच्च न्यायालय के पूर्व अतिरिक्त न्यायाधीश एल के मिश्रा को जबरन सेवानिवृत्ति का नोटिस थमा दिया गया है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि न्यायमूर्ति मिश्रा ने उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ की ओर से कटक स्थित उनके निवास पर कल भेजे गए इस नोटिस को स्वीकार करने से मना कर दिया। न्यायमूर्ति मिश्रा और एक अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी के पटेल को 17 जनवरी 2008 को दो वर्षों के लिए उच्च न्यायालय के अतिरिक्ति न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया था।
हालांकि  उच्च न्यायालय के अतिरिक्ति न्यायाधीश के रुप में सेवा विस्तार मिलने या स्थानीय न्यायाधीश के रुप में न्यायमूर्ति मिश्रा की नियुक्ति की पुष्टि के सिलसिले में कोई सूचना नहीं मिलने के बाद उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने उन्हें फिर से जिला न्यायाधीश के रुप में वापस भेज दिया था। जबकि दूसरी ओर न्यायमूर्ति पटेल को उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किए जाने संबंधी सूचना मिलने पर गत 14 जनवरी को उन्हें शपथ दिलाई गई थी। हालांकि उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने न्यायमूर्ति मिश्रा को 17 जनवरी 2010 को उनके गृह कैडर में वापस भेजते हुए कालाहांडी का जिला न्यायाधीश नियुक्त किया था लेकिन उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया और एक महीने की छुट्टी पर चले गए जिसे बाद में उन्होंने और एक महीने के लिए बढा लिया।
उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने न्यायमूर्ति मिश्रा के कामकाज पर विचार विमर्श करने के लिए हाल में बैठक की और न्यायिक सेवा में उनके प्रदर्शन को देखते हुए तथा कालाहांडी के जिला न्यायाधीश के रुप में पदभार ग्रहण नहीं करने पर उन्हें जबरन सेवानिवृत्ति देने का फैसला किया। पूर्ण पीठ की अनुशंसा को राज्यपाल एम सी भंडारे की मंजूरी के लिए भेज दिया गया था क्योंकि राज्यपाल ही जिला न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि पूर्ण पीठ की सिफारिश पर राज्यपाल की मुहर लगने के बाद न्यायमूर्ति मिश्रा को कल रात नोटिस थमा दिया गया। उच्च न्यायालय ने इससे पहले न्यायमूर्ति मिश्रा को उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के तौर पर मुहैया कराई गई सभी सुविधाएं वापस ले ली थी क्योंकि उन्हें जिला न्यायाधीश के रुप में पहले ही पदावनत कर दिया गया है।

भारतीय अदालतें अनिवासियों के विवाद नहीं निपटा सकतीं -दिल्ली उच्च न्यायालय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को आदेश दिया है कि भारतीय अदालतें भारत में पैदा हुए विदेशी नागरिकों के पारिवारिक विवादों के बारे में कोई निर्णय नहीं दे सकतीं।

न्यायमूर्ति एस.एन.धींगरा ने एक निचली अदालत के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक भारतीय मूल की अमेरिकी पत्नी को इस बात की अनुमति दी गई थी कि जब भी वह अपने परिजनों से मिलने भारत आए, वह अपने बच्चों को अपने कब्जे में ले सकती है।

धींगरा ने कहा कि निचली अदालत ने अपने न्याय क्षेत्र का अतिक्रमण किया है।

उन्होंने कहा, "मैं मानता हूं कि जिला न्यायाधीश ने बच्चों को हासिल करने के लिए मां की ओर से दायर याचिका को स्वीकार कर और बच्चों का अभिभावक नियुक्त कर अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है।"

Monday, March 8, 2010

बाज आए राज, नहीं तो होगी कार्रवाई: उच्चतम न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे से आज कहा कि यदि वह नफरत फैलाने वाला भाषण देने से बाज नहीं आए तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी।

ठाकरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में लगातार मुकदमे हो रहे हैं।

रोहतगी ने न्यायालय से मांग की कि वह उत्तर भारतीयों के खिलाफ भाषण को लेकर ठाकरे के खिलाफ पटना, जमशेदपुर और मध्य प्रदेश के एक स्थान पर दायर मुकदमों की सुनवाई दिल्ली की किसी अदालत में कराई जाए।


लेकिन न्यायमूर्ति बालाकृष्णन ने कहा कि ठाकरे यदि उत्तर भारतीयों के खिलाफ इसी तरह बयान देते रहे तो उनके खिलाफ मुकदमे तो दायर होंगे ही। उन्होंने कहा कि ठाकरे इस तरह के बयान देने से बाज आएं, नहीं तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण को लेकर मनसे प्रमुख के खिलाफ दायर कुछ मुकदमों को पिछले दिनों दिल्ली की तीस हजारी अदालत में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। लेकिन ठाकरे कुछ अन्य मुकदमों को भी स्थानांतरित करने की गुहार न्यायालय से कर रहे हैं।

उनके खिलाफ महाराष्ट्र की विभिन्न अदालतों में 73 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं

सूचना का अधिकार विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी

सुप्रीम कोर्ट ने आज मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के दफ्तर को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के कानून के दायरे में लाने वाले दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है।

चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन द्वारा अपने सभी न्यायाधीशों से सलाह के बाद कोर्ट की ओर से दाखिल की गई याचिका में कहा गया है कि सीजेआई दफ्तर की सूचनाएं बेहद संवेदनशील होती हैं और इनका खुलासा होने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंच सकता है।

इस याचिका को तकरीबन एक महीने पहले ही तैयार कर लिया गया था। एडवोकेट देवदत्त कामत ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की तरफ से इसे दाखिल किया है। एटॉर्नी जनरल जीई वहनवाती इसकी पैरवी करेंगे।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने गत महीने 12 जनवरी को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश का ऑफिस भी सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे में आता है।

Friday, March 5, 2010

पंजाब में शपथपत्र की अनिवार्यता से छृटटी

पंजाब में अब शपथपत्र(एफिडेविट) केवल कानूनी केसों में ही लगाने होंगे। पानी, बिजली का कनेक्शन लेने, आवासीय, कंडी क्षेत्र का वासी होने, अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति का लाभ लेने के लिए एफिडेविट की जरूरत नहीं रहेगी। अपनी फोटो लगाकर खुद ही अटेस्ट करके काम चलाया जा सकेगा। न पटवारी,न नोटरी और न ही मजिस्ट्रेट से तस्दीक करवाने के लिए दलालों को पैसे देने की जरूरत होगी।

पंजाब रिफॉर्म्स आयोग की रिपोर्ट की इस सिफारिश को एक अप्रैल से लागू करने के लिए राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी है। मुख्य सचिव एससी अग्रवाल की ओर से जारी की गई अधिसूचना में कहा गया है कि एफिडेविट को बनवाने, प्रमाणित करवाने आदि को लेकर लोगों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं । यह अधिसूचना सभी विभाग प्रमुखों, डिप्टी कमिश्नरों को भेजकर कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाए एक अप्रैल 2010 से लागू करने से पहले सभी तरह की तैयारियां कर ली जाएं।



अधिसूचना के अनुसार अब भर्ती या दाखिले के लिए दिए जाने वाले प्रमाण पत्र भी किसी राजपत्रित अधिकारी से तस्दीक करवाने की जरूरत नहीं है। अब तक सभी शैक्षणिक संस्थाएं दाखिले के लिए और सरकारी नौकरियों के लिए आवेदकों से अपनी योग्यता साबित करने के लिए प्रमाणपत्रों की तस्दीकशुदा कापियां लेते हैं जिसे मजिस्ट्रेट से तस्दीक करवाने की जरूरत पड़ती है। जबकि सरकार ने अब प्रावधान किया है कि 1 अप्रैल से सभी शिक्षा संस्थान दाखिले और रोजगार देने के लिए स्वयं तस्दीक वाले प्रमाण पत्र ही लें। चुने जाने पर ही विद्यार्थियों से उनके मूल प्रमाण पत्र मंगवाएं। मुख्य सचिव ने सभी उच्च शिक्षा,मेडिकल शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के विभाग प्रमुखों से यह सुनिश्चित करने को भी कहा है कि नए शैक्षणिक सत्र मंे इस बात की जानकारी संस्थान अपने प्रॉस्पेक्ट में दे दें ताकि विद्यार्थियों को परेशानी न हो।

काबिलेगौर है कि उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने डिलिवरी सिस्टम को सुधारने के लिए डॉ प्रमोद कुमार की अध्यक्षता में आठ जनवरी 2009 को गवर्नेस रिफार्म्स कमीशन का गठन किया था। कमीशन ने दो हिस्सों में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। रिपोर्ट को लागू करने के लिए मुख्य सचिव एससी अग्रवाल की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया है।

भारतीय सेना में पहली बार किसी महिला अधिकारी कोर्ट मार्शल

भारतीय सेना में पहली बार किसी महिला अधिकारी को भ्रष्टाचार का दोषी ठहराते हुए एक साल सश्रम कैद की सजा सुनाई गई है। आर्मी कोर्ट ने मेजर डिंपल सिंगल को भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता और प्रोफेशनल मिसकंडक्ट का दोषी ठहराया है। इसके साथ ही उन्हें सेना से भी बर्खास्त कर दिया गया है।

चार साल तक चले जनरल कोर्ट मार्शल (जीसीएम)के बाद बुधवार देर रात मेजर डिंपल सिंगला को दोषी पाया गया। कोर्ट मार्शल की सुनवाई कर्नल संजीव जोस ने की।

मेजर डिंपल सिंगला आर्मी के जज एडवोकेट जनरल (जैग) में 1997 में कमीशन अधिकारी बनी थीं। उनके खिलाफ 2007 में ही सुनवाई शुरू हो गई थी लेकिन अलग-अलग कारणों से यह टलती रही। उन पर आरोप था कि उन्होंने एक वकील से 10 हजार की रिश्वत ली, जो कोर्ट मार्शल का सामना कर रहे एक सैन्य अधिकारी की पैरवी कर रहा था। मेजर सिंगल को कोर्ट मार्शल में कई आरोपियों को फायदा पहुंचाने और जांच के दौरान फैसले को प्रभावित करने का भी दोषी पाया गया।

आरोप लगने के बाद वेस्टर्न कमांड के चंडीमंदिर स्थित हेडक्वॉर्टर ने मेजर डिंपल सिंगला के खिलाफ कोर्ट ऑफ इन्क्वॉयरी के आदेश दिए थे। समरी ऑफ एविडेंस के बाद साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट मार्शल शुरू हुआ। इस बीच सिंगला पर जीएसएम ट्रायल में शामिल न होने का भी आरोप लगा। पिछले साल 28 दिसंबर को मेजर सिंगला के हॉस्पिटल में एडमिट हो जाने की वजह से जीएसएम की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी थी। लेकिन उसके अगले ही दिन वह हॉस्पिटल से बिना डिस्चार्ज हुए ही गायब हो गईं और उन्होंने इसकी सूचना भी किसी को नहीं दी। इसके बाद मेजर सिंगला खिलाफ अरेस्ट वॉरंट जारी हो गया और सेना के अधिकारियों ने उनके घर पर छापे भी मारे लेकिन वह हाथ नहीं आईं।

इस बीच डिंपल सिंगला ने इंडियन आर्म्ड फोर्सेज ट्राइब्यूनल की चंडीगढ़ बेच के सामने अपील दायर कर दी कि वह जीसीएम की कार्यवाही का सामना करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उन्हें गिरफ्तार न किया जाए। हालांकि ट्राइब्यूनल ने उनकी अपील को खारिज कर दिया और एक फरवरी से पहले जीसीएम में पेश होने का निर्देश दिया।

वकील बनकर कोर्ट परिसर में आरोपी को भूना

अंबाला (हरियाणा) की एक स्थानीय कोर्ट में वकीलों के वेश में आए तीन लोगों ने अंधाधुंध गोलियां बरसा कर एक अपराधी को हत्या कर दी और फरार हो गए। राकेश उर्फ बॉबी नाम का यह अपराधी सुनवाई के बाद कोर्ट से बाहर आ रहा था, उसी दौरान तीन अज्ञात लोगों ने गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक हमलावर तीन थे और वे वकीलों की ड्रेस पहन रखी थी। उन्होंने अचानक बॉबी पर हमला कर दिया। गोली उसकी पीठ और गर्दन में लगी। पुलिस ने तुरन्त उसे समीप के एक अस्पताल में भर्ती कराया जहां उसने दम तो़ड दिया। पुलिस ने मामला दर्ज कर हमलावरों की तलाश शुरू कर दी है। बॉबी को हत्या के एक मामले में अदालत के न्यायिक दंडाधिकारी के सामने पेश करने के लिए लाया गया था।

आरोपी मांग सकता है प्राथमिकी की प्रति

बांबे हाईकोर्ट ने एक ऐसा नियमन दिया है, जो किसी भी आरोपी को पुलिस की मनमानी या अत्याचार सेबचाने के लिहाज से अहम है। अदालत ने कहा है कि कोई आरोपी गिरफ्तारी के वक्त चाहे तो अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी की प्रति मांग सकता है और पुलिस को उसे वह मुहैया कराना होगा।

यह नियमन बांबे हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत के आवेदन की सुनवाई के दौरान दी। पुणे के मुहम्मद खालिद शेख [25 वर्ष] ने जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोपों के मामले में अग्रिम जमानत की मांग की थी। शेख ने कहा कि रिमांड की अवधि में उसे अपने बचाव के लिए प्राथमिकी की प्रति पाना जरूरी है। सामान्य तौर पर गिरफ्तारी के बाद आरोपी को जिस मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है वह मजिस्ट्रेट ही प्राथमिकी की प्रति दे सकता है। लेकिन न्यायाधीश डी.जी. कार्णिक ने कहा कि यदि मांग की जाए तो पुलिस अधिकारी को भी गिरफ्तारी के समय प्राथमिकी की प्रति देनी होगी।

शेख ने बहस में कहा कि अपराध दंड संहिता के तहत मजिस्ट्रेट को प्राथमिकी की प्रति देने का अधिकार है और यह निर्विवाद सच है कि प्राथमिकी सार्वजनिक दस्तावेज है। शेख ने कहा कि भारतीय साक्ष्य कानून 1872 की धारा 76 के तहत सरकारी अधिकारी ऐसे किसी सार्वजनिक दस्तावेज की प्रमाणित प्रति उस व्यक्ति को दे सकता है जो उसे देखना चाहे। अभियोजन पक्ष ने इस दलील का यह कहते हुए विरोध किया कि इसी तर्क के आधार पर आरोपी रिमांड के समय गवाहों के बयान की मांग भी कर सकता है। अदालत ने कहा कि आरोपी रिमांड के दौरान गवाह के बयान की प्रति पाने का हक नहीं है।

Wednesday, March 3, 2010

अब फैसले में देरी नहीं कर सकेंगे जज

उच्च न्यायिक सेवाओं में जवाबदेही और मानक स्थापित करने के लिए सरकार नया विधेयक लाने जा रही है। इसके तहत न्यायाधीशों को किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद तीन महीने के अंदर निर्णय सुनाना होगा। यही नहीं, विधेयक में साफ कहा गया है कि न्यायाधीश चुनाव नहीं लड़ सकते, किसी क्लब या संगठन के सदस्य नहीं हो सकते और किसी ऐसी कंपनी के मामले की सुनवाई नहीं कर सकते, जिसके शेयर उनके पास हैं।

कानून मंत्रालय के प्रस्तावित न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक 2010 का उद्देश्य न्यायिक सेवाओं में मानक स्थापित करना तथा ऐसी प्रणाली बनाना है जिससे सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ दु‌र्व्यवहार एवं अयोग्यता की शिकायतों को दूर किया जा सके।

इस विधेयक में न्यायाधीशों की संपत्ति और दायित्वों की घोषणा का भी प्रावधान किया गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद वर्तमान बजट सत्र के दौरान ही इसे संसद के समक्ष पेश किए जाने की संभावना है।

प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि बहस पूरी होने के तीन महीने की समय-सीमा के अंदर न्यायाधीश को अपना निर्णय देना होगा। विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि उच्च न्यायिक सेवाओं के सदस्यों को अपने न्यायिक कार्य के दौरान निष्पक्ष रहना चाहिए और उनके द्वारा दिए गए निर्णय धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान से प्रभावित नहीं होने चाहिएं।

विधेयक के अन्य दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि न्यायाधीश चुनाव नहीं लड़ सकते। वे किसी क्लब या संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। बार काउंसिल के किसी सदस्य के साथ घनिष्ठता नहीं बढ़ा सकते। अपने संबंधियों के अलावा और किसी से उपहार या आतिथ्य नहीं स्वीकार कर सकते और उन कंपनियों के मामलों की सुनवाई नहीं कर सकते जिनके शेयर उनके पास हैं।

प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि न्यायाधीश को अपने किसी निर्णय के संबंध में मीडिया को साक्षात्कार नहीं देना चाहिए। इसके अलावा न्यायाधीशों को राजनीतिक मसलों पर किसी सार्वजनिक बहस में भाग नहीं लेना चाहिए।

न्यायाधीशों द्वारा न्यायिक मानकों को गिराने वाले किसी भी कदम को 'दु‌र्व्यवहार' माना जाएगा और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

न्यायाधीशों के विरुद्ध दु‌र्व्यवहार या भ्रष्टाचार की शिकायत को तीन न्यायाधीशों की जांच समिति के समक्ष पेश किया जाएगा। जांच समिति यदि न्यायाधीश के खिलाफ किसी शिकायत को वाजिब पाती है तो उसे न्यायिक निगरानी समिति के पास भेजा जाएगा। यह समिति मामले की जांच कर जांच रिपोर्ट को राष्ट्रपति के पास उक्त न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई के लिए भेजेगी।

राज्यसभा के सभापति के रूप में उप राष्ट्रपति न्यायिक निगरानी समिति की संभवत: अध्यक्षता करेंगे। इस समिति के अन्य सदस्यों में भारत के प्रधान न्यायाधीश [सीजेआई], सीजेआई द्वारा नामांकित हाईकोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए दो नामचीन विधिवेत्ता शामिल होंगे।

भारत के सभी 21 हाईकोर्ट में एक-एक जांच समिति का गठन किया जाएगा। विधेयक के मुताबिक न्यायाधीश के दु‌र्व्यवहार के अनुसार उसे चेतावनी, फटकार या प्रतिबंध की सजा दी जा सकती है। लेकिन यदि न्यायिक मानकों के उल्लंघन की प्रकृति गंभीर है तो उसके खिलाफ महाभियोग लगाया जा सकेगा। यह विधेयक न्यायाधीश जांच कानून 1968 का स्थान लेगा।

Monday, March 1, 2010

दत्तक पुत्र को नौकरी पाने का अधिकार- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि गोद लिए हुए पुत्र को उसके पिता की जगह नौकरी पाने का अधिकार है। जस्टिस एसके अग्निहोत्री की सिंगल बेंच ने एसईसीएल से कहा है कि याचिकाकर्ता को नौकरी देने पर विचार किया जाए।
कोरिया जिले का चिरमिरी निवासी सोमनाथ सिंह की एसईसीएल में कार्यरत रहने के दौरान मौत हो गई थी। उसके गोद लिए हुए पुत्र रविंद्र सिंह ने नौकरी के लिए आवेदन किया लेकिन विभाग ने सगा बेटा न होने के आधार पर उसे नौकरी नहीं दी।

इसके खिलाफ उसने वकील अशोक कुमार शुक्ला के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि नेशनल कोल वेजेस एग्रीमेंट के तहत दत्तक पुत्र को नौकरी पाने का अधिकार है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने तर्को से सहमत होकर याचिकाकर्ता को उपयुक्त पद पर नौकरी देने के लिए विचार करने को कहा है।

छात्राओं की फीस वापस करो- मप्र हाईकोर्ट

तीन छात्राओं से चार-चार लाख रुपए फीस लेकर वापस न करने वाले एक निजी मेडिकल कॉलेज को मप्र हाईकोर्ट ने फटकार लगाई है। कॉलेज को फीस वापस करने के निर्देश के साथ ही कोर्ट ने तीन सप्ताह में जवाब तलब किया है।
इंदौर के इंडेक्स मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने वाली तीन छात्राओं ने बाद में शासकीय मेडिकल कॉलेज, सागर में सीटें उपलब्ध होने पर उसमें प्रवेश ले लिया था। कॉलेज ने अब तक इन छात्राओं की फीस वापस नहीं की है।

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एससी सिन्हो की युगलपीठ ने मामले की सुनवाई की। छात्राओं शोभा पाटीदार, दीपिका थोहाड़े और नयना गोठिया ने कोर्ट में अपील की थी। छात्राओं के अधिवक्ता सिद्धार्थ गुप्ता ने बताया कॉलेज प्रबंधन ने छात्राओं से प्रवेश के समय पूरी फीस 2.80 लाख रुपए और बैंक गारंटी सहित करीब चार-चार लाख रुपए जमा कराए थे। कई बार आवेदन करने के बाद भी कॉलेज फीस वापस करने में आनाकानी कर रहा था।