• वकील द्वारा खुदकुशी के मामले में चीफ जस्टिस कोर्ट में हंगामा।

    राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ में शुक्रवार को वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट के बाहर जमकर हंगामा किया। इससे मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला को सुनवाई छोड़कर अपने कक्ष में जाना पड़ा। वकीलों ने पुलिस प्रताड़ना से क्षुब्ध भीलवाड़ा के वकील अमित यादव द्वारा खुदकुशी किए जाने के विरोध में शुक्रवार को कार्य बहिष्कार का आह्वान किया था। शुक्रवार सुबह मुख्य न्यायाधीश ने जैसे ही सुनवाई शुरू की कुछ ही देर बाद उच्च न्यायालय के कुछ वकील हंगामा करते हुए वहां जयपुर/जोधपुर/अजमेर। राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ में शुक्रवार को वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट के बाहर जमकर हंगामा किया। इससे मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला को सुनवाई छोड़कर अपने कक्ष में जाना पड़ा। वकीलों ने पुलिस प्रताड़ना से क्षुब्ध भीलवाड़ा के वकील अमित यादव द्वारा खुदकुशी किए जाने के विरोध में शुक्रवार को कार्य बहिष्कार का आह्वान किया था। शुक्रवार सुबह मुख्य न्यायाधीश ने जैसे ही सुनवाई शुरू की कुछ ही देर बाद उच्च न्यायालय के कुछ वकील हंगामा करते हुए वहां पहंुच गए। वकीलों के उत्तेजित तेवरों को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में मौजूद एक वकील को बचाते हुए बाहर निकाला गया। उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने इस प्रकरण की न्यायिक जांच की मांग की है।

    पुलिस प्रताड़ना से क्षुब्ध भीलवाड़ा के वकील अमित यादव द्वारा खुदकुशी किए जाने के विरोध में राजस्थान उच्च न्यायालय की मुख्यपीठ जोधपुर और जयपुर पीठ से जुडे वकीलों ने आज न्यायिक कार्य का बहिष्कार किया। जोधपुर में वकीलों के न्यायिक कार्य के बहिष्कार से अदालतों में कामकाज ठप रहा। अजमेर में वकीलों की सभा में इस प्रकरण की भत्र्सना करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जांच की मांग की गई। पुलिस महानिरीक्षक द्वारा अजमेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार को जांच सौंपे जाने को सरकारी ढोंग करार दिया गया। सभा के बाद वकीलों के समूह ने अतिरिक्त संभागीय आयुक्त को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया। ज्ञापन में दोषी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी, परिजनों को 15 लाख का मुआवजा, मृतक की पत्नी को सरकारी नौकरी देने तथा न्यायिक जांच के साथ भविष्य में किसी वकील की गिरफ्तारी से पूर्व बार के अध्यक्ष से अनुमति लेने की मांग की गई है। राजस्व बार ने भी ज्ञापन सौंपा।

    धरना, बाजार बंद
    भीलवाडा में युवा वकील की रहस्यमय स्थिति में हुई मौत से गुस्साए वकीलों ने आज दूसरे दिन भी मृतक का पोस्टमार्टम नहीं होने दिया। घटना के विरोध में शहर के बाजार बंद रहे और वकीलों ने कोटा-भीलवाडा मार्ग जाम कर दिया। जिला बार एसोसिएशन के अधिवक्ता मृतक अमित यादव एडवोकेट के घर के बाहर धरने पर बैठे हैं तथा पुलिस को उसके घर के नजदीक भी नहीं जाने दिया जा रहा। अजमेर रेंज के महानिरीक्षक रामफल सिंह भीलवाड़ा में डेरा डाले हुए हैं लेकिन वकील समुदाय किसी की सुनने को तैयार नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता रवि डांगी ने बताया कि वकील पुलिस अधीक्षक पी. रामजी और उपाधीक्षक (सदर) रामकुमार कस्बां को भीलवाड़ा से हटाने तथा सीआई ओमप्रकाश वर्मा एवं चार अन्य पुलिस कर्मियों की भारतीय दंड संहिता की धारा 306 में गिरफ्तारी व मृतक परिवार को उचित मुआवजा दिए जाने की मांग कर रहे हैं।

    अजमेर के संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा भी आज भीलवाड़ा पहुंचे हैं। वह सम्पूर्ण घटनाक्रम की जानकारी लेकर इस मामले में सरकार तथा मुख्यमंत्री को अवगत कराएंगे। बार एसोसिएशन ने आज अचानक जनता से बाजारों को बंद रखने की अपील की। इस आह्वान के कुछ ही देर बाद सभी बाजार बंद हो गए। वकीलों ने आज भी न्यायालय का कामकाज ठप रखा। न्यायिक अधिकारी भी बार एसोसिएशन के आह्वान पर अदालतों में नहीं बैठे। गए। वकीलों के उत्तेजित तेवरों को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश की कोर्ट में मौजूद एक वकील को बचाते हुए बाहर निकाला गया। उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने इस प्रकरण की न्यायिक जांच की मांग की है।

    राज्य की अदालतों में बहिष्कार
    पुलिस प्रताड़ना से क्षुब्ध भीलवाड़ा के वकील अमित यादव द्वारा खुदकुशी किए जाने के विरोध में राजस्थान उच्च न्यायालय की मुख्यपीठ जोधपुर और जयपुर पीठ से जुडे वकीलों ने आज न्यायिक कार्य का बहिष्कार किया। जोधपुर में वकीलों के न्यायिक कार्य के बहिष्कार से अदालतों में कामकाज ठप रहा। अजमेर में वकीलों की सभा में इस प्रकरण की भत्र्सना करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जांच की मांग की गई। पुलिस महानिरीक्षक द्वारा अजमेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समीर कुमार को जांच सौंपे जाने को सरकारी ढोंग करार दिया गया। सभा के बाद वकीलों के समूह ने अतिरिक्त संभागीय आयुक्त को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन दिया। ज्ञापन में दोषी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी, परिजनों को 15 लाख का मुआवजा, मृतक की पत्नी को सरकारी नौकरी देने तथा न्यायिक जांच के साथ भविष्य में किसी वकील की गिरफ्तारी से पूर्व बार के अध्यक्ष से अनुमति लेने की मांग की गई है। राजस्व बार ने भी ज्ञापन सौंपा।

    भीलवाडा में धरना, बाजार बंद
    भीलवाडा में युवा वकील की रहस्यमय स्थिति में हुई मौत से गुस्साए वकीलों ने आज दूसरे दिन भी मृतक का पोस्टमार्टम नहीं होने दिया। घटना के विरोध में शहर के बाजार बंद रहे और वकीलों ने कोटा-भीलवाडा मार्ग जाम कर दिया। जिला बार एसोसिएशन के अधिवक्ता मृतक अमित यादव एडवोकेट के घर के बाहर धरने पर बैठे हैं तथा पुलिस को उसके घर के नजदीक भी नहीं जाने दिया जा रहा। अजमेर रेंज के महानिरीक्षक रामफल सिंह भीलवाड़ा में डेरा डाले हुए हैं लेकिन वकील समुदाय किसी की सुनने को तैयार नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता रवि डांगी ने बताया कि वकील पुलिस अधीक्षक पी. रामजी और उपाधीक्षक (सदर) रामकुमार कस्बां को भीलवाड़ा से हटाने तथा सीआई ओमप्रकाश वर्मा एवं चार अन्य पुलिस कर्मियों की भारतीय दंड संहिता की धारा 306 में गिरफ्तारी व मृतक परिवार को उचित मुआवजा दिए जाने की मांग कर रहे हैं।

    अजमेर के संभागीय आयुक्त अतुल शर्मा भी आज भीलवाड़ा पहुंचे हैं। वह सम्पूर्ण घटनाक्रम की जानकारी लेकर इस मामले में सरकार तथा मुख्यमंत्री को अवगत कराएंगे। बार एसोसिएशन ने आज अचानक जनता से बाजारों को बंद रखने की अपील की। इस आह्वान के कुछ ही देर बाद सभी बाजार बंद हो गए। वकीलों ने आज भी न्यायालय का कामकाज ठप रखा। न्यायिक अधिकारी भी बार एसोसिएशन के आह्वान पर अदालतों में नहीं बैठे।

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  • ‘दूसरी पत्नी’ भी अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त कर सकती है।।

    उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद यदि उसकी पहली पत्नी को कोई आपत्ति नहीं है तो उसकी दूसरी पत्नी को भी सरकारी नौकरी में अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार है। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक व्यक्ति एक शादी को निभाते हुए केवल एक ही पत्नी रख सकता है और दूसरी शादी आईपीसी की धारा 494 और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 के तहत अपराध होगी, जिसमें सात साल तक के कड़े कारावास की सजा दी जा सकती है।

    न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा की पीठ ने कर्नाटक सरकार की एक अपील को खारिज करते हुए कहा कि जब दोनों पत्नी राजी हो गई हैं तो आप आपत्ति करने वाले कौन होते हैं। यदि एक पत्नी अनुकंपना नियुक्ति चाहती है और दूसरी मुआवजे संबंधी लाभ चाहती है तो आपको क्या परेशानी है।

    पीठ ने राज्य सरकार द्वारा कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक निर्देश को चुनौती देते हुए दाखिल की गई याचिका पर आदेश जारी किया। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया था कि आर्म्ड रिजर्व फोर्स में हैड कांस्टेबल जी. हनुमंत गोड़ा की दूसरी पत्नी लक्ष्मी की नियुक्ति पर विचार किया जाए।

    दूसरी पत्नी लक्ष्मी की तरफ से वकील एम. कमरुद्दीन अदालत में आए। शीर्ष न्यायालय ने राज्य सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक शादी के दौरान किसी शख्स की दो पत्नियाँ नहीं हो सकतीं, इसलिए तथाकथित दूसरी पत्नी केवल पहली पत्नी के साथ सुलह करके नियुक्ति के अधिकार पर दावा नहीं कर सकती।

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  • लंबित मुकदमों में 65 फीसदी से ज्यादा मामले सरकार के खिलाफ।

    अगर आप यह सोच रहे हैं कि राजस्थान हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा मामले अपराधियों पर चल रहे हैं, तो खुद को अपडेट कर लें। हाई कोर्ट में दाखिल एक लाख 60 हजार मामलों में से लगभग साठ फीसदी यानी 97 हजार मामले सरकार के खिलाफ हैं। कई मामलों में तो वादी-प्रतिवादी राज्य सरकार ही है। यह हाल सिर्फ राजस्थान में ही नहीं, बल्कि कर्नाटक हाई कोर्ट में तो 65 फीसदी से ज्यादा मामले सरकार के खिलाफ हैं।

    हाई कोर्ट में राज्य सरकार से जुड़े सबसे ज्यादा मामले कर विभाग, गृह, वित्त, उद्योग, खान-पेट्रोलियम, वन, पीएचईडी, शिक्षा, पंचायतीराज, परिवहन और राजस्व विभाग सहित 19 विभागों के हैं। राजस्थान हाई कोर्ट में सरकार के खिलाफ सबसे ज्यादा मामले टैक्स से जुड़े हैं। हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील और रिटायर्ड जज अजय कुमार जैन की मानें तो हाई कोर्ट में अधिकांश सरकारी मामले अनुपयुक्त और अपारदर्शी कानून के कारण दायर होते हैं।

    सरकार के खिलाफ बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य के महाधिवक्ता ने सबसे ज्यादा केस वाले 19 विभागों की पहचान की है। विभागों के आपसी मामलों में अधिकांश मामले पेंशन नहीं मिलने, गलत ट्रांसफर करने, नियुक्ति में गड़बड़ी वाले होते हैं। राजस्थान हाई कोर्ट में वर्ष 1991 से 2002 के बीच लंबित मामलों में लगभग 30% की वृद्धि हुई है।
    वर्ष 1994 मे विधि मंत्रियों और विधि सचिवों की बैठक में इस बात का फैसला किया गया था कि सरकार व सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बीच के विवाद और एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के साथ होने वाले विवाद को न्यायालय या अधिकरणों में नहीं निपटाया जाएगा। इनका निपटारा दोनों पक्षों के बीच समझौता कराकर किया जाएगा। हकीकत यह है कि सरकार ऐसा नहीं कर पाई।

    देश की विभिन्न अदालतों में राज्य सरकार की ओर से दायर याचिकाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी नाराज है। पिछले सप्ताह ही राजस्थान सरकार की एक याचिका पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लताड़ लगाई है। कोर्ट का कहना है कि राज्य सरकारें बेमतलब याचिका दायर करने से बाज आएं। ये बात सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आरवी रवींद्रन और जस्टिस जीएस सिंघवी की बैंच ने गुरुवार को नगर विकास न्यास, बीकानेर की याचिका रद्द करते हुए कही।

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  • नाबालिग के विवाह करने पर उसे परीक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

    16 साल की उम्र में शादी करने वाले एक छात्र को हाईकोर्ट ने पीएससी की मुख्य परीक्षा में शामिल करने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस आरके गुप्ता की युगलपीठ ने छात्र की याचिका पर पीएससी के अध्यक्ष और उप नियंत्रक (परीक्षा) को नोटिस जारी करते हुए उसकी परीक्षा के परिणाम को इस मामले पर होने वाले फैसले के अधीन रखा है।

    सिंगरौली के बैढ़न थानान्तर्गत ग्राम गुढ़ीताल में रहने वाले रामगोपाल शाह की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि 16 साल की उम्र में उसकी शादी 22 मई 1990 को हुई थी। उसने पीएससी की परीक्षा दी, जिसकी प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसे मुख्य परीक्षा में शामिल होना था।

    विगत 26 अक्टूबर को उप नियंत्रक ने एक आदेश जारी करके आवेदक की उम्मीदवारी को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि उसने नाबालिग उम्र में शादी की है।

    आवेदक का कहना है कि जिस नियम के तहत उसकी उम्मीदवारी को निरस्त किया जा रहा, वह मार्च 2000 में अमल में आया, जबकि उसकी शादी वर्ष 1990 में हुई थी। ऐसे में उक्त प्रावधान को भूतलक्षी प्रभाव से नहीं माना जा सकता।


    याचिका पर आज हुई प्रारंभिक सुनवाई के दौरान आवेदक की ओर से अधिवक्ता राजेश दुबे द्वारा अपना पक्ष रखा गया। सुनवाई के बाद युगलपीठ ने अंतरिम राहत देते हुए मामले की अगली सुनवाई 30 नवम्बर को निर्धारित की है।

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  • पुलिस ज्यादती से तंग अधिवक्ता के फांसी मामले में हाईकोर्ट में आज कार्य बहिष्कार

    राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने भीलवाड़ा में पुलिस प्रताड़ना के कारण वकील के आत्महत्या करने के मामले को लेकर शुक्रवार को कार्य बहिष्कार की घोषणा की है। एसोसिएशन के अनुसार कार्य बहिष्कार के कारण शुक्रवार को उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ में वकील अदालतों में पैरवी करने नहीं जाएंगे। गिरफ्तारी की मांग: राजस्थान बार कौंसिल ने भीलवाड़ा के सम्बन्धित पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी की मांग की है। कौंसिल ने कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री से भी दखल का आग्रह किया है।

    कल भीलवाड़ा के सांगानेरी गेट इलाके में पुलिस ज्यादती से परेशान अधिवक्ता गुरूवार को उसके ही मकान में पंखे पर शव लटका मिला। इससे गुस्साए वकीलों ने सुभाष नगर थानाप्रभारी सहित कुछ पुलिस कर्मियों पर हत्या का आरोप लगाते हुए कोटा रोड जाम कर दिया। आरोपियों की गिरफ्तारी व पुलिस अधीक्षक को हटाने की मांग पर अड़े प्रदर्शनकारी मौके पर पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों के साथ धक्का-मुक्की पर उतर आए। उन्होंने अजमेर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक आर.पी. सिंह और जिला कलक्टर मंजू राजपाल को मृतक के घर से बाहर नहीं निकलने दिया।

    इस सम्बन्ध में आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर थानाप्रभारी ओमप्रकाश वर्मा, उप निरीक्षक किशनसिंह, सिपाही मोती, भूपेन्द्र सिंह और राजेश को निलम्बित किया गया है। आरोपियों की गिरफ्तारी, मुआवजा तथा मृतक की पत्नी को नौकरी दिलाने की मांग पर वकील अड़े हुए हैं। देर रात तक वकीलों ने शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल नहीं ले जाने दिया। उधर, घटना के विरोध में जोधपुर के वकीलों ने शुक्रवार को हड़ताल पर रहने की घोषणा की है। सांगानेरी गेट निवासी वकील अमित यादव (29) का शव सुबह नौ बजे कमरे में पंखे से लटका मिला।

    इससे गुस्साए वकीलों ने कोटा मार्ग पर जाम लगा दिया। करीब आठ घण्टे हंगामे के बाद शाम पांच बजे कमरा खोला गया। इसके बाद पोस्टमार्टम कराने से वकीलों ने इनकार कर दिया, जिसके चलते देर रात तक शव घर में ही रखा था।

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  • 44 डीएसपी की नियुक्तियां रद्द।

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पीएससी द्वारा वर्ष 2005 की परीक्षा के माध्यम से चयनित 44 डीएसपी की नियुक्ति निरस्त कर दी है। जस्टिस एसके अग्निहोत्री की सिंगल बेंच ने सोमवार को दिए फैसले में कहा कि पीएससी ने परीक्षा गलत नियमों के आधार पर ली है, इसलिए मेरिट लिस्ट के आधार पर नए सिरे से भर्ती प्रकिया की जाए।

    पीएससी ने वर्ष 2005 में प्रदेश में डीएसपी नियुक्त करने के लिए परीक्षा ली थी। इसके लिए तय आयुसीमा के नियम को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। इसमें याचिकाकर्ता अहिल्या मिश्रा, संदीप अग्रवाल व अन्य ने वकील प्रतीक शर्मा के माध्यम से याचिका दायर कर कहा कि जून 2005 में राज्य शासन ने पुलिस सेवा राजपत्रित भर्ती नियम में संशोधन किया था।

    इसके अनुसार आयु सीमा में संशोधन कर डीएसपी की परीक्षा के लिए न्यूनतम आयु 21 व अधिकतम 28 वर्ष तय की गई। महिलाओं को इसमें 10 वर्ष की छूट दी गई।

    यह नियम लागू होने के बाद पीएससी ने परीक्षा ली, लेकिन आयुसीमा संबंधी प्रावधानों का पालन नहीं किया। पीएससी ने पुराने नियम के अनुसार ही परीक्षा ले ली जिसमें आयु सीमा 21 से 25 साल थी और महिलाओं के लिए छूट का भी प्रावधान नहीं था।
    इस कारण मेरिट लिस्ट में ऊपर होने के बाद भी याचिकाकर्ताओं को डीएसपी के पद पर नियुक्ति नहीं मिल पाई। याचिकाकर्ताओं ने चयन सूची निरस्त कर मेरिट लिस्ट के आधार पर नए सिरे से नियुक्ति करने की मांग की थी। शासन ने कोर्ट को प्रस्तुत अपने जवाब में कहा था कि उसने पीएससी को नियम की जानकारी दे दी थी, फिर भी उसने गलत नियम के अनुसार परीक्षा ली। पिछली बार सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर दिया था।

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  • "ये चंदा कानून है" के लिए सब टीवी को नोटिस।

    सब टीवी पर धारावाहिक "ये चंदा कानून है" में न्यायपालिका के गलत चित्रण और आपत्तिजनक तरीके से प्रदर्शित करने को लेकर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने शनिवार को चैनल, आइडिया पिक्चर्स तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया हैं। वकील दीपांशु साहू द्वारा दायर याचिका की शनिवार को यहां सुनवाई करते हुए न्यायाधीश आर.एस. गर्ग एवं न्यायाधीश पी.के. जायसवाल की संयुक्त खण्डपीठ ने ये नोटिस जारी किए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस धारावाहिक में अदालत का गलत चित्रण किया गया हैं। उच्चा न्यायालय द्वारा जारी नोटिस में कहा गया है कि क्यों न उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला चलाया जाए। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से कहा गया है कि ऎसे धारावाहिको के प्रसारण पर नियंत्रण के लिए उसके पास क्या प्रावधान हैं।

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  • वकील बार काउंसिल के चुनावी कायदों से ही अनजान

    कानून के जानकार होने के बावजूद कई वकील अपनी नियामक संस्था बार काउंसिल के चुनावी कायदों से ही अनजान हैं। राजस्थान राज्य की ग्यारहवीं बार काउंसिल के लिए चल रही मतगणना में सामने आ रही वकीलों की खामियां देखकर तो यही लगता है।

    प्रदेश के छह सौ से ज्यादा अधिवक्ताओं ने तो 'पहली पसंद' का प्रत्याशी चयन करने में भी गडबडी कर दी है। कइयों ने एक से ज्यादा प्रत्याशियों के नाम के सामने पहली पसंद का अंक (1) लिख दिया, तो कुछ ने किसी को भी पहली प्राथमिकता नहीं दी। कुछ वकीलों ने मतपत्र पर दस्तखत, नाम या कोई टिप्पणी लिख दी। नतीजतन, पूरे राज्य में वकीलों के 679 मत तो फिजूल ही चले गए। यह संख्या हालांकि कुल मतों के अनुपात में खासी कम है, लेकिन इतने वोट हासिल करने वाला प्रत्याशी 110 उम्मीदवारों में 'टॉप-फाइव' की श्रेणी में आ सकता था।

    नहीं रखी गोपनीयता
    इतना ही नहीं, टोंक जिले के टोडारायसिंह में अधिकांश वकीलों के मत की गोपनीयता ही खत्म हो गई। दरअसल, बार काउंसिल के चुनाव नियमों (सेक्शन 23-24) के मुताबिक मतपत्र पर नाम, हस्ताक्षर या पहचान का कोई चिह्न अंकित नहीं होना चाहिए।

    बावजूद इसके यहां 42 में से 35 वकीलों के मतपत्रों पर उनका अधिवक्ता पंजीयन क्रमांक (एनरोलमेंट नम्बर) लिख दिया गया। मतगणना के दौरान जयपुर के उम्मीदवार रामावतार खण्डेलवाल ने लिखित आपत्ति व्यक्त कर इन्हें खारिज करने की मांग भी रखी, लेकिन टोडारायसिंह के पीठासीन अधिकारी से स्पष्टीकरण लेकर इन मतों को वैध मानने की अनुमति दे दी गई है।

    काउंसिल चुनाव में एक मतदाता ने पहली प्राथमिकता अंकित करने के बाद मतपत्र पर लिख दिया- 'अन्य सभी अयोग्य हैं।' वहीं एक अधिवक्ता ने किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं देने की टिप्पणी लिखी। मतपत्रों पर ऎसी ही कई टिप्पणियां लिखी पाई गई।

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  • छात्र की कराई निर्वस्त्र परेड, देना होगा एक लाख का मुआवज

    अपने सेवा काल के दौरान एक छात्र को निर्वस्त्र कर परेड कराना 65 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक पी सी गुप्ता को काफी महंगा पड़ा है। गुप्ता को 12 वर्ष पूर्व की अपनी इस करतूत के लिए अब पीड़ित छात्र को एक लाख रुपये का मुआवजा देना होगा।

    दिल्ली की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रतिभा रानी ने गुप्ता को मुआवजा देने का निर्देश दिया। हालांकि अदालत ने इस मामले में जेल की सजा काट रहे सेवानिवृत्त शिक्षक को अच्छे व्यवहार की शर्त पर दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि पर रिहा करने का निर्देश दिया। गुप्ता को इस मामले में निचली अदालत 19 मार्च, 2007 को ही सजा सुना चुकी है। गुप्ता को एक वर्ष कैद और ढाई हजार रुपये जुर्माना की सजा सुनाई गई थी। न्यायाधीश रानी ने सेवानिवृत्त शिक्षक गुप्ता की उस अपील को मंजूर कर लिया, जिसमें कैद व जुर्माने की सजा को चुनौती दी गई है।

    मामला 25 मई, 1997 का है। गुप्ता दिल्ली के एक राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक थे। उस दिन उन्होंने अपनी कक्षा के एक तेरह वर्षीय छात्र को स्कूल के तालाब में नहाते हुए पकड़ा था। क्लास छोड़कर छात्र द्वारा तालाब में नहाने की घटना से गुप्ता इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने पहले तो छात्र की जमकर पिटाई की। इसके बाद उसे घंटों तक कपड़ा नहीं पहनने दिया। पूरे दिन उक्त छात्र को स्कूल में निर्वस्त्र खड़े रखा था।

    जज रानी ने कहा कि अब तो गुप्ता सर्विस में भी नहीं है, इसलिए उनके द्वारा इस तरह के अपराध दोबारा करने की संभावना नहीं है। इस कारण उन्हें परिवीक्षा पर रिहा करने का आदेश दे रही हूं। अदालत का कहना था कि ऐसा कोई कारण नहीं दिख रहा है, जिससे परिवीक्षा अवधि पर गुप्ता की रिहाई रोकी जा सके। हालांकि जज रानी ने गुप्ता की हरकत की कड़े शब्दों में निंदा की। पीड़ित छात्र के वकील ने गुप्ता को परिवीक्षा पर रिहा करने का विरोध किया। लेकिन अदालत ने उनकी दलील नहीं मानी।

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  • वकीलों ने आईपीएस पुलिस अधिकारी को धुना

    सुप्रीम कोर्ट परसिर में वकीलों और उनके मुंशियों ने बुधवार को एक आईपीएस पुलिस अधिकारी की पिटाई कर दी। यह पुलिस अधिकारी महाराष्ट्र का है और दिल्ली में विशेष ट्रेनिंग पर आया हुआ है। लगभग एक घंटे के बवाल के बाद मामला तब शांत हुआ जब डीसीपी ने माफी मांगी।

    मामला तब शुरू हुआ जब आईपीएस अधिकारी संजय येलपुले सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश के लिए पास बनवाने के वास्ते लाइन में खड़े वकील के एक मुंशी से भिड़ गया। मुंशी लाइन तोड़कर आगे लग रहा था। डीसीपी स्तर के अधिकारी ने मुंशी को लाइन न तोड़ने को कहा लेकिन वह नहीं माना। इस पर उन्होंने उसे डपटा तो वह भी गुस्सा हो गया। इस पर संजय ने कहा कि जानते नहीं हो वह आईपीएस डीसीपी है और उसे उल्टा लटकवा देगा। यह कहकर उन्होंने मंशी के दो झापड़ रसीद कर दिए और पास खड़े सिपाही से कहा कि जरा उसे ‘समझाएं’। इसके बाद वह पास बनवा कर अंदर चले गए। मुंशी ने अन्य मुंशियों को बुलाया और डीसीपी का सुप्रीम कोर्ट के अंदर पीछा किया। डीसीपी किसी तरह जान बचाकर भाग रहा था कि उसी समय एक वकील ने उसे थप्पड़ जड़ दिया।

    आखिरकार संजय भाग कर सुप्रीम कोर्ट सुरक्षा कार्यालय में पहुंचा। 50 से ज्यादा मुंशी वहां भी पहुंच गए और नारे लगाने लगे। सुप्रीम कोर्ट मुंशी एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने मांग की मुंशी पर हमला करने के आरोप में डीसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। पुलिस के समझाने बुझाने पर मुंशी माफनामे पर मान गए। डीसीपी संजय ने उनसे लिखित रूप में बिना शर्त मांगी लेकिन मुंशी नहीं माने और कहा कि वह बाहर आकर सबके सामने माफी मांगें। संजय ने यही किया और तब जाकर मामला शांत हुआ।

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  • दूसरी शादी कर, पहली बीबी से पिटा बूढ़ा प्रोफेसर


    अपनी शिष्या से प्रेम-प्रसंग को लेकर बिहार का मटुकनाथ बेशक हाल ही में चर्चा मे आया हो, लेकिन दिल्ली के एक प्रोफेसर साहब तो करीब एक दशक पहले ही इस तरह की प्रेम कहानी को अंजाम दे चुके हैं। प्रोफेसर ने अपनी बेटी की उम्र की लड़की से दूसरी शादी की है। जिसके लिए प्रोफेसर महोदय सरेराह पहली पत्नी से पिटे भी। मगर इसे संयोग ही कहेंगे कि यह मामला उस समय चर्चा में नहीं आ पाया।

    9 साल पुराने इस मामले में पटियाला हाउस स्थित मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट वीना रानी की अदालत ने 61 वर्षीय सेवानिवृत प्रोफेसर के खिलाफ पहली पत्नी के जिंदा रहते दूसरा विवाह करने एवं पहली पत्नी के जमा पूंजी का गबन करने एवं आपराधिक साजिश रचने के इल्जाम में आरोप तय कर दिए हैं।

    आरोप-पत्र के मुताबिक प्रोफेसर राहुल(बदला हुआ नाम) की शादी उमा (बदला हुआ नाम) के साथ वर्ष 1985 में हुई थी। उमा को 7 जून 2000 को पता चला की प्रोफेसर साहब ने न सिर्फ 18 साल की एक लड़की से दूसरी शादी कर ली है, बल्कि दूसरे विवाह से उन्हें एक बेटा भी है। रिश्तों के बिखरने से हताश पहली पत्नी ने पति की दूसरी शादी और दूसरी शादी से जन्में बच्चे के जन्म से संबंधित साक्ष्य एकत्रित किए। एक मौका ऐसा भी आया जब उमा ने राहुल की जमकर धुनाई भी की। उमा का आरोप है कि दूसरी शादी से एक महीना पहले ही राहुल ने एचडीएफसी बैंक से करीब 8 लाख रुपए होम लोन लिया था। राहुल और उसकी दो बहनों ने मिलकर उसे डेढ़ लाख रुपये ऋण लेने के लिए उमा को मजबूर किया।

    पहली पत्नी द्वारा पेश सबूतों को अहम मानते हुए अदालत ने कहा है कि यह साबित होता है कि शिकायतकर्ता को पति की दूसरी शादी के बाद मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। अदालत ने राहुल के खिलाफ पहली पत्नी से धन और संपत्ति छीनने के लिए जालसाजी व धोखाधड़ी करने एवं उसकी दो बहनों के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने के इल्जाम के तहत आरोप तय किए हैं।

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  • कानून बनाने के हक पर विचार करेगी संविधान पीठ : सुप्रीम कोर्ट

    उच्चतम न्यायालय ने आज पांच सदस्यीय संविधान पीठ को इस बात पर विचार करने के लिए कहा कि क्या अदालतें कानून बना सकती हैं तथा ध्यान दिलाया कि ऊची कीमतों और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर आदेश देने के लिए अदालतों के पास विशेषज्ञता नहीं है।
    सर्वोच्च न्यायालय ने केरल विश्वविद्यालय से संबद्ध विभिन्न कालेजों के प्रधानाध्यापकों की याचिका के बाद छात्र संघ और उसके चुनाव संबंधित मामलों की सुनवाई करते हुए कहा कि कल, हम संसद को भंग नहीं कर सकते और यह नहीं कह सकते हैं कि हम संसद हैं और कानून बनाना शुरू कर देंगे। न्यायमूर्ति मार्कन्डेय काटजू और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने यह मुद्दा पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेज दिया कि क्या अदालत कानून बना एवं लागू कर सकती हैं जो विधायिका और कार्यपालिका के विशिष्ट अधिकार क्षेत्र में आता है।
    पीठ ने कहा कि आज ऊंची कीमतें और बड़े स्तर पर बेरोजगारी है। यह आवश्यक सामाजिक जरूरतें हैं। लेकिन क्या हम इन सरकार को आदेश दे सकते है लेकिन हमारे पास विशेषज्ञता नहीं है हालांकि हम भी उंची कीमतों के कारण प्रभावित हैं। न्यायाधीशों ने कहा कि न्यायपालिका के लिए विधायिका और कार्यपालिका के कामों को अपने हाथों में लेना ‘अनुचित' और ‘खतरनाक' होगा। उन्होंने कहा कि इन तीनों की अपनी विशिष्ट भूमिका है। पीठ ने आगाह किया कि न्यायाधीशों को नियंत्रण बरतना होगा। अन्यथा इससे भारी प्रतिक्रिया होगी। न्यायाधीशों ने शीर्ष न्यायालय के पूर्व में दिये गये उस आदेश पर आपत्ति जतायी कि जिसके तहत देश के कालेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव कराने के लिए दिशानिर्देश तय किये गये थे।
    उन्होंने कहा कि हम (अदालतें) विधायिका का कामकाज अपने हाथ में ले रहे हैं.. हां, कुछ अस्पष्ट क्षेत्र हैं.. हमारा मत हैं कि यह लोकतंत्र के लिए अनुचित और खतरनाक है। पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर संविधान पीठ द्वारा विचार करना जरूरी है क्योंकि इससे गंभीर संविधानिक महत्व के सवाल जुड़े हैं।
    संविधान पीठ जिन मुद्दों पर विचार करेगी, वे हैं ..क्या उच्चतम न्यायालय का 22 सितंबर को लिंगदोह समिति की रिपोर्ट का कार्यान्वयन करने के लिए दिया गया अंतरिम आदेश वैध था।
    .. दूसरा, क्या यह न्यायिक विधेयक के दायरे में आता है।
    .. तीसरा, क्या न्यायपालिका कानून बना सकती है और अगर हां, तो इसकी सीमा कहां तक है।
    .. चौथा, क्या न्यायपालिका ऐसे न्यायिक आदेश जारी करने के लिए सामाजिक समस्याओं का हवाला दे सकती है। शीर्ष न्यायालय की पीठ ने सालिसीटर जनरल और इस मामले में न्याय मित्र गोपाल सुब्रह्मण्यम की यह दलील खारिज कर दी कि ऐसे आदेश सामाजिक जरूरतें पूरी करने के लिए दिए जाते हैं। उच्चतम न्यायालय ने लिंगदोह समिति की सिफारिशों के आधार पर 22 सितंबर 2006 को महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव कराने के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए थे।
    इन दिशानिर्देशों में, छात्रसंघ चुनाव प्रचार के लिए प्रत्याशियों द्वारा अंधाधुंध व्यय किए जाने पर रोक, आयु सीमा और आपराधिक तत्वों को चुनाव लड़ने से रोकना शामिल था।
    पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर संविधान पीठ को विचार करने की जरूरत है क्योंकि इसमें गंभीर संवैधानिक सवाल शामिल है।

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  • बेझिझक करें भ्रष्ट अफसरों की शिकायत -पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट जज

    पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज सूर्यकांत का कहना है कि भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं और इसे मिटाने के लिए लोगों को व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़ने होंगे। विकासशील देशों में भ्रष्टाचार ज्यादा तेजी से पनप रहा है, इसका सीधा असर विकास पर भी पड़ता है।

    इसे रोकने के लिए हर व्यक्ति को जागरूक होना होगा। संवैधानिक अधिकारों की तरह संवैधानिक दायित्व भी इमानदारी से निभाने होंगे। सेक्टर-30 में सीबीआई चंडीगढ़ जोन की ओर से भ्रष्टाचार विषय पर आयोजित परिचर्चा में जस्टिस सूर्यकांत बतौर मुख्य महमान शरीक हुए।

    उन्होंने कहा कि अफसर यह ठान लें कि वे किसी के दबाव में काम नहीं करेंगे तो भ्रष्टाचार खुद ब खुद खत्म हो जाएगा। सीबीआई के जोनल हेड महेश अग्रवाल ने कहा कि आम कर्मचारियों की तो शिकायतें मिलती हैं, पर बड़े अफसरों के बारे में बहुत कम लोग सामने आते हैं। लोग भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के लिए बेझिझक आगे आएं। उनकी पहचान गुप्त रखी जाएगी।

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  • छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चार जजों को बर्खास्त किया।


    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अलग-अलग जिलों के चार सिविल जजों को राज्य शासन के विधि विभाग ने बर्खास्त कर दिया है। परिवीक्षा अवधि में कार्य संतोषजनक नहीं पाए जाने पर हाईकोर्ट ने शासन से इन जजों की बर्खास्तगी की अनुशंसा की थी। हाईकोर्ट के इंचार्ज रस्ट्रि।र जनरल द्वारा जारी आदेश के अनुसार कोरबा जिले के करतला में सिविल जज वर्ग-2 के पद पर पदस्थ सत्येन्द्र कुमार मिश्रा, बीजापुर जिला दक्षिण बस्तर में पदस्थ सिविल जज वर्ग-2 श्रीमती श्रद्धा आकाश श्रीवास्तव, जिला दुर्ग के नवागढ़ में पदस्थ सिविल जज वर्ग-2 यशपाल सिंह टंडन व जिला दुर्ग में पदस्थ सप्तम व्यवहार न्यायधीश वर्ग-2 कु. द्वारिका तिड़के को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है।

    परिवीक्षा अवधि में इनका कार्य संतोषजनक नहीं पाए जाने पर हाईकोर्ट ने राज्य शासन से इनके विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा की थी। इन सभी का चयन पीएससी द्वारा आयोजित सिविल जज की परीक्षा के माध्यम से हुआ था। प्रदेश में जजों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है। कार्रवाई की जानकारी हाईकोर्ट की वेबसाइट में भी प्रदर्शित कर दी गई है।

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  • दिनाकरन के खिलाफ वकीलों ने किया अदालतों का बहिष्कार।

    कर्नाटक के लगभग 60,000 वकीलों ने सोमवार को आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने तथा अवैध तरीके से जमीनों पर कब्जा जमाए रखने के कथित आरोपों का सामना कर रहे कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरन के विरोध में अदालती कार्रवाई का बहिष्कार किया।
    एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ बेंगलुरू' (एएबी) के महासचिव आर. राजन्ना ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, ''निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों का बहिष्कार करने का कार्यक्रम पूरी तरह सफल रहा। कुछ अदालतों में हालांकि काम हुआ लेकिन 60,000 वकील कार्यवाही से दूर रहे।''
    एएबी के बैनर तले सैकड़ों वकीलों के दिनाकरन के कक्ष के बाहर प्रदर्शन किया और नारेबाजी की। दिनाकरन उस वक्त एक मामले की सुनवाई कर रहे थे। इस दौरान गुस्साए वकीलों के एक समूह ने एक पत्रकार की पिटाई भी कर दी।
    उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति दिनाकरन के खिलाफ जमीन पर अवैध कब्जे और आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप लगे हैं। इन गंभीर आरोपों के बावजूद उनके पद पर बने रहने का वकील विरोध कर रहे हैं।
    जब वकीलों ने अपना विरोध प्रदर्शन रोकने से इंकार किया तो न्यायमूर्ति दिनाकरन ने एएबी के प्रतिनिधियों को अपने कक्ष के भीतर बुलाया और उनसे कहा कि वे उन्हें उनके संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने दें।
    न्यायमूर्ति दिनाकरन ने कहा, ''मैंने क्या अपराध किया है? आप लोग मेरे खिलाफ प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? अदालत इस तरह की गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं कर सकती।''
    वकीलों ने उनकी बात को अनसुना करते हुए अपना प्रदर्शन जारी रखा। उन्होंने अदालत की कार्यवाही को भी रोक दिया। उल्लेखनीय है कि शनिवार को उच्च न्यायालय ने वकीलों द्वारा न्यायमूर्ति दिनाकरन के बहिष्कार करने पर रोक लगा दी थी।
    उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के मुताबिक वकीलों ने न्यायमूर्ति गोपाल गौड़ा और न्यायमूर्ति नागरत्ना को भी मामलों की सुनवाई नहीं करने दी।
    इस बीच कुछ वकीलों ने एक वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार और एक कैमरामैन की इसलिए पिटाई कर दी क्योंकि वह प्रदर्शन की शूटिंग नहीं कर रहा था। उल्लेखनीय है कि अदालत की कार्यवाही को कैमरे में कैद करने की इजाजत नहीं है।

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