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Thursday, April 29, 2010

खुशबू मामले में अदालत ने की मीडिया की आलोचना

सुप्रीम कोर्ट ने विवाह पूर्व यौन संबंध के बारे में अभिनेत्री खुशबू द्वारा व्यक्त की गई राय के बारे में उसके अवलोकन को गलत तरीके से उद्धृत करने और गलत व्याख्या करने के लिए मीडिया और लोगों की आलोचना की।
   
प्रधान न्यायाधीश केजी बालकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने कहा कि उसके पास याचिकाओं की बाढ़ आ गई जिसमें उससे अपने आदेश की समीक्षा करने को कहा गया है। जबकि उसने वकील से सवालों के रूप में कुछ टिप्पणियां की थीं।

मामले में बहस के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि विवाह पूर्व यौन संबंध और लिव इन संबंधों पर कोई वैधानिक पाबंदी नहीं है और उसने अपने नजरिये की पुष्टि के लिए कृष्ण और राधा का उदाहरण दिया था।

पीठ ने कहा कि वास्तव में सुनवाई के दौरान पक्षों से जुड़े वकील के समक्ष कुछ सवाल रखे गए ताकि मामले से जुड़े कानूनी मुद्दे को स्पष्ट किया जा सके लेकिन दुर्भाग्य से उन सवालों को न सिर्फ मीडिया बल्कि आम आदमी ने गलत रूप में समझा।

न्यायालय ने कहा कि परिणामस्वरूप हमारे पास याचिकाओं की बाढ़ आ गई जिसमें हमसे अपने आदेश की समीक्षा की गुहार लगाई गई।

यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि हमारी ओर से कोई आदेश पारित नहीं किया गया था और सुनवाई के दौरान हमने वकील के समक्ष कुछ उदाहरण या सवाल रखे थे जिनका उन्हें जवाब देना था।
   
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा, इसलिए आम आदमी के अतिसक्रिय रुख की आवश्यकता नहीं थी। कुछ ने तो यहां तक कह दिया कि हमें इस तरह के सवाल को रखने से पहले भारतीय पौराणिक कथाओं को जानना चाहिए। इसलिए सुनवाई के दौरान हमने जो कुछ भी कहा उसकी समीक्षा की जानी चाहिए।

पुराना विज्ञान है ज्योतिष : केंद्र

बंबई हाईकोर्ट में दाखिल अपने शपथ पत्र में केंद्र सरकार ने कहा है कि ज्योतिष एक पुराना विज्ञान है और इसे प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
अदालत अभी एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। इसमें ज्योतिष और वास्तुशास्त्र को प्रतिबंधित करने की मांग की गई है। इस याचिका में ज्योतिष विज्ञापनों को औषधीय और चमत्कारिक इलाज (आपत्तिजनक विज्ञापन निरोधक) अधिनियम 1954 के तहत प्रतिबंधित करने की मांग की गई है।
इस जनहित याचिका के जवाब में भारत सरकार के डिप्टी ड्रग कंट्रोलर डा. आर रामकृष्ण ने कहा कि ज्योतिष पर प्रतिबंध की मांग एक गलत अवधारणा पर आधारित है और यह अनुचित है। उन्होंने कहा कि ज्योतिष चार हजार वर्षों पुराना समय की कसौटी पर खरा विज्ञान है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि ज्योतिष पाठ्यक्रम पेश करना देश के संविधान की धर्मनिरपेक्षता की भावना का अतिक्रमण नहीं है। केंद्र का शपथ पत्र भी न्यायालय के उसी फैसले पर आधारित है। केंद्र ने कहा कि ज्योतिष और संबंधित विषय औषधीय और चमत्कारिक इलाज (आपत्तिजनक विज्ञापन निरोधक) अधिनियम 1954 के दायरे में नहीं आते।
शपथपत्र में कहा गया है कि इस कानून का उपयोग केवल औषधियों और चमत्कारिक इलाज के दावे करने वाले भ्रामक विज्ञापन जैसे अवैज्ञानिक तर्क पर गर्भनिरोध को आश्वस्त करने वाले या यौन शक्ति बढ़ाने के दावे करने वाले विज्ञापनों के खिलाफ किया जा सकता है।

राजस्थान में 175 न्यायिक अधिकारियों के तबादले

राजस्थान उच्च न्यायालय प्रशासन ने बुधवार को अलग-अलग आदेश जारी कर 175 से अधिक न्यायिक अधिकारियों के स्थानान्तरण किए हैं। इसके तहत कई अधिकारियों को पदोन्नति दी गई है।
फास्ट ट्रेक अदालतों में कार्यरत ज्यादातर अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को नियमित पदोन्नति मिल गई है। वहीं, अधिकांश मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को पदोन्नत कर फास्ट ट्रेक अदालतों में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश बनाया गया है। कमोबेश सभी जिलों में नए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भी नियुक्त किए गए हैं।
उ"ा न्यायालय प्रशासन ने दो न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी इधर-उधर किया है, जबकि जयपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-5 (जयपुर शहर) कैलाशचन्द्र अटवासिया को शैलेन्द्र व्यास के स्थान पर जयपुर पीठ में डिप्टी रजिस्ट्रार (न्यायिक) नियुक्त किया है। इस पद पर कार्यरत शैलेन्द्र व्यास को पदोन्नत कर अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रेक) जयपुर जिला संख्या- तीन नियुक्त किया गया है।
उ"ा न्यायालय के रजिस्ट्रार कैलाश जोशी द्वारा जारी आदेश के अनुसार जिला न्यायाधीश स्तर के अधिकारियों में से रामचन्द्र झाला को डूंगरपुर में जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा रोहिताश कुमार रामधारी को बीकानेर में तथा रामचन्द्र मीणा को कोटा में विशिष्ठ न्यायाधीश भ्रष्टाचार निरोधक मामलात नियुक्त किया गया है। इसी तरह राजेश नारायण शर्मा एडीजे भाद्रा (हनुमानगढ), एन.एस. ढbा एडीजे-2 अजमेर, हेमन्त कुमार जैन एडीजे-3 उदयपुर, नृसिंहदास व्यास एडीजे-1 भीलवाडा, अशोक कुमार गुप्ता एडीजे रामगंज मंडी (कोटा), सोमप्रकाश गोदारा विशिष्ट न्यायाधीश अजा-जजा मामलात न्यायालय बीकानेर, उमाशंकर व्यास एडीजे-3 अजमेर, केदारलाल गुप्ता एडीजे-1 जयपुर शहर, सुरेन्द्र कुमार जैन एडीजे अकलेरा (झालावाड), धर्मचंद जैन एडीजे रतनगढ (चूरू), शिवचरण भूषण एडीजे हिण्डौन (करौली), श्रीमती संगीता शर्मा एडीजे-1 जोधपुर, फूलचंद झांझरिया एडीजे-गुलाबपुरा (भीलवाडा), शुभा मेहता विशिष्ट न्यायाधीश अजा-जजा मामलात न्यायालय टोंक, रवि कुमार गुप्ता एडीजे मालपुरा (टोंक), राम बाबू चतुर्वेदी एडीजे-1 जयपुर जिला, कमलचंद नाहर एडीजे-1 बयाना (भरतपुर), विनोद कुमार भैरवानी एडीजे नागौर (मेडता), मदन गोपाल व्यास एडीजे चूरू, महावीर प्रसाद शर्मा-प्रथम विशिष्ट न्यायाधीश अजा-जजा मामलात न्यायालय दौसा, देवेन्द्र प्रसाद शर्मा एडीजे-2 जयपुर शहर, एन.एस. मेडतवाल विशिष्ट न्यायाधीश अजा-जजा मामलात न्यायालय जयपुर शहर, राजेन्द्र प्रकाश सोनी एडीजे नाथद्वारा (राजसमंद), गजानंद शर्मा एडीजे खेतडी (झुंझुनूं), रविन्द्रकुमार जोशी विशिष्ट न्यायाधीश अजा-जजा मामलात न्यायालय जोधपुर, अशोक कुमार जैन-द्वितीय एडीजे-7 जयपुर शहर, सूर्यप्रकाश काकडा एडीजे डीडवाना (मेडता), छोटूलाल एडीजे-1 गंगानगर, योगेन्द्र कुमार पुरोहित एडीजे-2 सीकर, अशोक कुमार शर्मा-द्वितीय एडीजे राजगढ (अलवर), राजेन्द्र सिंह एडीजे शाहपुरा (भीलवाडा), विष्णु दत्त शर्मा-द्वितीय एडीजे- 5 जयपुर शहर, भुवन गोयल एडीजे-6 जयपुर शहर, प्रवीर भटनागर एडीजे ब्यावर (अजमेर), मदनलाल भाटी एडीजे-5 कोटा, आशुतोष कुमार एडीजे-8 जयपुर शहर, ओमकुमार व्यास एडीजे भीनमाल (जालोर), श्रीमती अनीता शर्मा एडीजे-4 जयपुर शहर, चन्द्रशेखर शर्मा एडीजे बाडमेर, नरेश चुग एडीजे कोटपूतली, प्रभूलाल आमेठा विशिष्ट न्यायाधीश महिला अत्याचार एवं दहेज मामालात न्यायालय भीलवाडा, रविन्द्र कुमार माहेश्वरी विशिष्ट न्यायाधीश अजा-जजा मामलात न्यायालय प्रतापगढ, गिरीश कुमार शर्मा एडीजे शाहपुरा, अर्चना अग्र्रवाल एडीजे-2 कोटा, सत्यजीत राय एडीजे-2 गंगानगर, नवल किशोर शर्मा एडीजे साम्भर, ओमप्रकाश सिंवर एडीजे रायसिंहनगर नगर (गंगानगर), अजय कुमार मीणा एडीजे तिजारा (अलवर), देवेन्द्र जोशी एडीजे-2 बीकानेर, सी.के. सोनगरा एडीजे नीमकाथाना (सीकर), कैलाशचंद मीणा एडीजे-1 कोटा, हरफूल सिंह पिलानिया एडीजे-2 जयपुर जिला, बृजलाल मीणा विशिष्ट न्यायाधीश सती निवारण मामलात न्यायालय जयपुर शहर, बलदेव राम एडीजे-1 अजमेर, सुरेन्द्र कुमार स्वामी एडीजे-1 सीकर तथा राजेन्द्र कुमार पारीक को एडीजे लक्ष्मणगढ (अलवर) के पद पर नियुक्त किया है।
उ"ा न्यायालय ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट स्तर के 57 अधिकारियों को पदोन्नत कर एडीजे (फास्ट ट्रेक) बनाया है। इसके तहत एलडी किराडू एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-4 भरतपुर मुख्यालय डीग, बीएल बुगालिया एडीजे (फास्ट ट्रेक) जालोर, अविनाश चन्द्र शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 पाली मुख्यालय जैतारण, सुधीर पारीक एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-2 जोधपुर, ओमी पुरोहित एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-2 पाली, पृथ्वीराज शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) बालोतरा मुख्यालय बाडमेर, उर्मिला वर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-3 झुंझुनूं मुख्यालय नवलगढ, कमल प्रकाश सक्सेना एडीजे (फास्ट ट्रेक) तिजारा (अलवर), गणेशाराम एडीजे (फास्ट ट्रेक) कोटपूतली, देवेन्द्र दीक्षित एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-4 उदयपुर, राजेन्द्र कुमार एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-3 हनुमानगढ, महेन्द्र सिंह एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-2 झुंझुनूं, सतीश चन्द्र एडीजे (फास्ट ट्रेक) हिण्डौन (करौली), युधिष्ठर शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-2 जयपुर शहर, माधवी दिनकर एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-5 जयपुर शहर, तनवीर चौधरी एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 अलवर, लक्ष्मण सिंह एडीजे (फास्ट ट्रेक) छाबडा (बारां), राजेश्वर सिंह एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-2 हनुमानगढ मुख्यालय नोहर, शशि कांत शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 बीकानेर, झूमरलाल चौहान एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 करौली, जगमोहन शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 बून्दी, नैपाल सिंह एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 धौलपुर, संदीप कुमार शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक)-2 धौलपुुर, राज व्यास एडीजे (फास्ट ट्रेक)-4 जोधपुर, कमल छंगाणी एडीजे (फास्ट ट्रेक)-2 भीलवाडा, मुकेश भार्गव एडीजे (फास्ट ट्रेक)-5 उदयपुर, महावीर स्वामी एडीजे (फास्ट ट्रेक) अनूपगढ मुख्यालय सूरतगढ, पवन कुमार शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक)-2 अलवर, प्रदीप कुमार जैन एडीजे (फास्ट ट्रेक) झालावाड, श्यामसुंदर लता एडीजे (फास्ट ट्रेक)-2 सीकर हैड क्वार्टर श्रीमाधोपुर, नरेन्द्र कुमार शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक)-2 कोटा, उमा शंकर शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक)-2 करौली, रामेश्वर दयाल रोहिला एडीजे (फास्ट ट्रेक) बहरोड (अलवर), हनुमान प्रसाद एडीजे (फास्ट ट्रेक) नागौर, रेखा भागर्व एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 उदयपुर, शिव कुमार शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-3 उदयपुर हैड क्वार्टर सलूम्बर, ममता व्यास एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-1 ब्यावर (अजमेर), अरूण कुमार दुबे एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-2 भरतपुर, सुरेन्द्र सिंह एडीजे (फास्ट ट्रेक)संख्या- 2 बूंदी, ओमकार त्यागी एडीजे (फास्ट ट्रेक) राजसमंद, संजय कुमार एडीजे (फास्ट ट्रेक) दौसा, कृष्ण स्वरूप एडीजे (फास्ट ट्रेक)-1 झुंझुनूं, दीपक पांडे एडीजे (फास्ट ट्रेक)-1 भीलवाडा, सोहन लाल शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक)-1 अजमेर, वीरेन्द्र कुमार पाठक एडीजे (फास्ट ट्रेक) आबूरोड (सिरोही), राजवीर सिंह एडीजे (फास्ट ट्रेक) नं. 9 जयपुर शहर, अजय कुमार शर्मा-प्रथम, एडीजे (फास्ट ट्रेक) बांदीकुई मुख्यालय दौसा, मुकेश त्यागी एडीजे (फास्ट ट्रेक)-8 जयपुर शहर, जगदीश प्रसाद शर्मा-चतुर्थ, एडीजे (फास्ट ट्रेक)-4 जयपुर शहर, सत्यनारायण व्यास एडीजे (फास्ट ट्रेक)-2 ब्यावर (अजमेर), महेन्द्र कुमार शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक) चित्तौडगढ, नंदिनी व्यास एडीजे (फास्ट ट्रेक)-4 अजमेर, रेखा शर्मा एडीजे (फास्ट ट्रेक)-1 जोधपुर, भल्लाराम परमार एडीजे (फास्ट ट्रेक)-3 जोधपुर, शिवदयाल सिंह एडीजे (फास्ट ट्रेक)-1 हनुमानगढ, रामनिवास जाट एडीजे (फास्ट ट्रेक) महुवा (दौसा) तथा फूलसिंह तोमर एडीजे (फास्ट ट्रेक) संख्या-3 जयपुर शहर के पद पर नियुक्त किया गया है।
इसी प्रकार उ"ा न्यायालय ने 55 मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) स्तर के अधिकारियों को स्थानांतरित किया है। इसमें अजय कुमार भोजक सीजेएम गंगानगर, गणेश कुमार सीजेएम कोटा, गोपाल बिजोरीवाल सीजेएम प्रतापगढ, रतन लाल मूंड सीजेएम अजमेर, महेश कुमार शर्मा सीजेएम पाली, जितेन्द्र सिंह सीजेएम बाडमेर, ख्यालीराम शर्मा सीजेएम चूरू, रमा शंकर वर्मा सीजेएम उदयपुर, योगेन्द्र शर्मा सीजेएम सीकर, धीरेन्द्र सिंह राजावत सीजेएम जालोर, ईश्वरीलाल वर्मा सीजेएम जोधपुर, संजीव मागो एसीजेएम (आर्थिक अपराध) जयपुर शहर, मुकेश सीजेएम करौली, दीपचन्द्र जोशी एसीजेएम जयपुर जिला, सतीश कुमार व्यास सीजेएम राजसमंद, चन्द्र कला जैन सीजेएम झुंझुनूं, योगेश कुमार गुप्ता सीजेएम भीलवाडा, अशोक कुमार अग्र्रवाल सीजेएम सवाईमाधोपुर, अनिल कुमार आर्य एसीजेएम-3 जोधपुर, इंदु पारीक सीजेएम झालावाड, मनोज कुमार सहारिया एसीजेएम-1 विशिष्ट न्यायालय जेडीए जयपुर, गोविन्द अग्र्रवाल सीजेएम अलवर, साहबराम मोतियार सीजेएम हनुमानगढ, बुद्धिप्रकाश छंगाणी सीजेएम नागौर, रवि प्रकार शर्मा एसीजेएम (रेलवे) बीकानेर, सतीश चन्द्र कौशिक सीजेएम सिरोही, पूरण कुमार शर्मा सीजेएम जयपुर शहर, रीता तेजपाल सीजेएम दौसा, कृष्ण चन्द्र मोड सीजेएम चित्तौडगढ, विनोद कुमार सोनी सीजेएम जैसलमेर, भारत भूषण गुप्ता सीजेएम बू्ंदी, रूपचंद सुथार एसीजेएम नं.-5 कोटा, अजीक कुमार हिंगड एसीजेएम भीलवाडा, अशोक कुमार शर्मा एसीजेएम (रेलवे) अजमेर, मंजू चौहान सीजेएम टोंक, राकेश कटारा सीजेएम बीकानेर, मुकेश श्रीवास्तव एसीजेएम साम्प्रदायिक दंगा मामलात जयपुर शहर, हरिमोहन गुप्ता एसीजेएम (रेलवे) कोटा, शिल्पा समीर एसीजेएम चौमूं (जयपुर जिला), अनिल कुमार शर्मा एसीजेएम नं. 6 जयपुर शहर, जमीर हुसैन सैय्यद एसीजेएम नं. 1 बाडी (धौलपुर), हरिनारायण सारस्वत एसीजेएम फलोदी (जोधपुर), महेन्द्र कुमार मेहता एसीजेएम नाथद्वारा (राजसमंद), नारायण सिंह एसीजेएम भीम (राजसमंद), रेखा शर्मा एसीजेएम सीबीआई मामलात न्यायालय जोधपुर, भवानीशंकर पांडिया एसीजेएम सोजत (पाली), मधुसूदन शर्मा एसीजेएम खेतडी (झुंझुनूं), पूनम दुर्गन एसीजेएम किशनगढ (अजमेर), आरती भारद्वाज एसीजेएम नं. 1 जयपुर शहर, मोहिता भटनागर एसीजेएम नं.1 ब्यावर (अजमेर), बालकृष्ण मिश्रा एसीजेएम नं. 1 बीकानेर, अर्चना मिश्रा एसीजेएम नं. 2 बीकानेर, सुशील कुमार जैन सीजेएम भरतपुर, जगमोहन अग्र्रवाल-द्वितीय एसीजेएम-3 अलवर तथा तिरूपति कुमार गुप्ता को एसीजेएम नं. 5 जयपुर शहर के पद पर लगाया है। इसी तरह दो न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी स्थानान्तरित किया है। डॉ. चेतना को न्यायिक मजिस्ट्रेट चौमूं तथा रश्मि आर्य को अजमेर लगाया गया है।

Wednesday, April 28, 2010

ललित मोदी और उनकी पत्नी मीनल मोदी को राहत


जयपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट युधिष्ठिर शर्मा ने नागरिक मोर्चा की ओर से दायर उस इस्तगासे को बुधवार को खारिज कर दिया जिसमें आमेर की संरक्षित हवेलियों की अवैध खरीद प्रकरण में निलम्बित आईपीएल आयुक्त ललित मोदी और उनकी पत्नी मीनल मोदी समेत दस लोगों के खिलाफ पुलिस जांच का अनुरोध किया गया था।

परिवादी के वकील अजय कुमार जैन ने निर्णय की जानकारी देते हुए बताया कि अदालत ने नागरिक मोर्चा अध्यक्ष संदीप भातरा की ओर से दायर इस्तगासे को खारिज करते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा इस प्रकरण की रिपोर्ट दर्ज करने के बाद राजस्थान उच्च न्यायालय ने यथा स्थिति का आदेश दे रखा है। ऐसी स्थिति में इस्तगासे पर पुलिस को जांच करने के आदेश नहीं दिये जा सकते। जैन ने कहा कि इस फैसले को चुनौती दी जायेगी।

गौरतलब है कि नागरिक मोर्चा के अध्यक्ष संदीप भातरा ने गत शुक्रवार को अदालत में इस्तगासा दायर कर ललित मोदी, उनकी पत्नी मीनल मोदी, सज्जन मोदी, सत्य नारायण सिंह, मनोज कुमार गुप्ता, विकास भटटाचार्य, गीता देवी, कमलेश, विमलेश और सरला भटटाचार्य को पक्षकार बनाया था।

इस्तगासे में कहा कि ललित मोदी दंपति समेत दस लोगों ने वर्ष 2004 में आमेर की हवेलियों को हड़पने का षड़यंत्र रचकर आपराधिक साजिश रची है।

बयान बदलना भारी पड़ा

एक युवती ने पहले तो पति के व्यावसायिक सहयोगी पर बलात्कार की प्राथमिकी दर्ज करवाई और मजिस्ट्रेट के समक्ष भी बयान दिए, लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान युवती अपने पूर्व बयानों से मुकर गई। बलात्कार से इनकार करते हुए पति के दवाब में आकर झूठी रिपोर्ट व बयान देने का कहा। संगीन मामले में गवाह के बयान बदलने को फास्ट-ट्रेक अदालत क्रम-एक जयपुर शहर ने गम्भीर माना है।

अदालत ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 193 में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जयपुर शहर के यहां बयान बदलने वाली युवती के खिलाफ परिवाद दायर करने के आदेश दिए है, ताकि झूठे मुकदमों की प्रवृत्ति हतोत्साहित हो सके। इससे अदालत ने बलात्कार के मामले में आरोपी महेन्द्र कुमार रैगर को दोषमुक्त कर दिया और युवती को नोटिस देकर स्पष्टीकरण देने को कहा।


भाजपा टिकट लेने के लिए उधारी...

अदालत के नोटिस पर बलात्कार का आरोपी लगाने वाली पीडिता ने जवाब दिया कि उसके पति ने बगरू विधानसभा क्षेत्र से भाजपा का टिकट लेने के लिए काफी पैसे खर्च किए। हालांकि उसे टिकट नहीं मिला। व्यवसाय में सहयोगी महेन्द्रकुमार रैगर से भी काफी पैसा उधार लिया। उसके पति उधार का पैसा नहीं देना चाहते थे। महेन्द्र पर दबाव डालने के लिए पति ने उसका इस्तेमाल किया और झूठा आरोप लगाकर प्राथमिकी दर्ज करवाई। मजिस्ट्रेट के समक्ष भी दबाव में बयान दिए। बाद में अदालत में अंतर्अात्मा से सही बयान दिए है। आरोपी निर्दोष है, उसके खिलाफ झूठा साक्ष्य पेश किया गया है।

पति बोला-दोनों के बीच थे सम्बन्ध

इस मामले में पति ने भी अदालत में जवाब में कहा कि बलात्कार की प्राथमिकी दर्ज करवाने के लिए पत्नी पर कोई दबाव नहीं डाला और न ही उसने महेन्द्र से कोई पैसे उधार लिए। दोनों के बीच सम्बंध थे, रंगे हाथों पकड़ा तो उसकी पत्नी ने इस कृत्य की माफी मांगी। फिर स्वेच्छा से महेन्द्र के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाई। धारा 193 में कार्यवाही सम्बंधी नोटिस से बचाव के लिए उस पर 498ए का झूठा मुकदमा दर्ज करवाया है।

जज ने डांटा, महिला की कोर्ट में हार्ट अटैक से मौत

रोहिणी की सत्र अदालत में हत्या के प्रयास मामले में गवाही देने पहुंची एक बुजुर्ग महिला अचानक कोर्ट रूम में बेहोश हो गई। महिला की तबीयत ज्यादा खराब होने के चलते उसे नजदीकी सरोज अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक जांच में महिला की मौत का कारण हृदय गति का रुकना बताया गया है। दूसरी तरफ परिजनों ने आरोप लगाया है कि न्यायाधीश की फटकार के कारण महिला को हार्ट अटैक हुआ और उसकी मौत हो गई।

यह घटना रोहिणी की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ की अदालत में सोमवार सुबह हुई। रोहिणी सेक्टर-१६ निवासी ६क् वर्षीय आरोपी पूनम सिंह अदालत में हत्या के प्रयास के एक मामले में अपनी गवाही देने आई थी। सुबह करीब ११ बजे कोर्ट रूम में अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई। वकील ने जज को इसकी सूचना दी। इसके बाद पूनम अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी, जिसके बाद जज ने खुद अपनी सीट से नीचे आकर उसे देखा। इस घटना के बाद जज कामिनी लॉ ने सभी मामलों की सुनवाई को स्थगित कर दिया। पूनम को अदालत परिसर में बनी डिस्पेंसरी में ले जाया गया, जहां से डॉक्टरों ने उसे तुरंत अस्पताल जे जाने की सलाह दी।

इसके बाद पूनम को एंबुलेंस के जरिए निकट के सरोज अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक जांच में डॉक्टरों ने महिला की मौत का कारण हार्ट अटैक बताया। पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। उधर, अदालत में मौजूद पूनम की बहू प्रिया ने आरोप लगाया कि जब उनकी सास की तबीयत खराब हो रही थी, तो उन्होंने जज से उन्हें अस्ताल ले जाने की गुहार लगाई थी।

प्रिया का आरोप है कि जज ने पूनम को कहा था कि ‘मैं इसे अस्पताल नहीं, जेल भेजूंगी’। इस बाबत प्रिया की ओर से रोहिणी कोर्ट चौकी में अपनी लिखित शिकायत भी दी गई है। वहीं, महिला के वकील राजीव चौधरी ने कहा कि फिलहाल वह पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने का इंतजार कर रहे हैं। उधर, रोहिणी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष इंदर सिंह सरोहा ने कहा कि इस मामले में अब तक कोई शिकायत उन्हें नहीं मिली है।


हत्या के प्रयास मामले में गवाही देने आई थी

वर्ष २00५ में पूनम सिंह के दामाद त्रिलोक सिंह की हत्या हुई थी। त्रिलोक की लाश गाजियाबाद से मिली थी। पुलिस ने इस मामले में पूनम सिंह, उसके पति पीएल पुरुषोत्तम, उसके दो बेटे विजय और बलजिंदर पुरुषोत्तम के अलावा उसकी बहन अंजू वर्मा को आरोपी बनाया था। पुलिस ने इनके खिलाफ हत्या और अपहरण का मामला दर्ज कर सभी को गिरफ्तार कर लिया था।

इसके बाद अगले वर्ष २00६ में पूनम के घर पर उसकी नाती के ऊपर गोली चलाई गई थी। इसमें पुलिस ने पूनम की शिकायत पर दामाद त्रिलोक सिंह के पिता मंगलसेन वर्मा और रिश्तेदार कुलदीप वर्मा के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया था।

बाद में पुलिस ने पूनम पर ही आरोप लगाया था कि उसने उसने दामाद की हत्या के केस को मोड़ने के लिए अपने ऊपर गोली चलवाई। हत्या के प्रयास मामले में ही अदालत ने गवाही के लिए पूनम सिंह को तलब किया था। हालांकि अदालत ने सोमवार को हत्या के मामले में विजय, बलजिन्दर और उसकी बहन अंजू वर्मा को २१ दिनोंे के लिए अंतरिम जमानत दे दी।

शादी से पहले सेक्स के बयान पर खुशबू को कोर्ट से राहत, सभी मुकदमे ख़त्म

दक्षिण भारतीय फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री खुशबू को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिल गई है. सुप्रीम कोर्ट ने खुशबू के खिलाफ इस बयान को लेकर दर्ज सभी 22 शिकायतें खारिज करने के निर्देश दिए हैं.

शादी से पहले सेक्स को जायज ठहराने का बयान देने पर खुशबू के खिलाफ ये शिकायतें दर्ज की गई थीं, जिनके खिलाफ खुशबू ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. हाईकोर्ट ने इन मामलों की सुनवाई निचली अदालत में करने के निर्देश दिए तो खुशबू ने 2008 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस याचिका को खारिज करने के निर्देश दिए हैं.

प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा तथा न्यायमूर्ति बी एस चौहान ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अभिनेत्री द्वारा दायर अपील को अनुमति दे दी जिसने इन मामलों को खारिज करने संबंधी याचिका खारिज कर दी थी.

तमिलनाडु में विभिन्न स्थानों पर यह मामले तब दायर किये गये थे जब 2005 में अभिनेत्री के विवाह पूर्व सेक्स संबंधों पर आधारित साक्षात्कार एक मैगजीन में प्रकाशित हुए थे.

खुशबू ने इंटरव्यू में कहा था कि अगर लड़कियां एहतियात बरतें तो शादी से पहले सेक्स में कोई बुराई नहीं है. बाद में इसी को जायज ठहराते हुए खुशबू ने यहां तक कह दिया था कि किसी भी पढ़े लिखे आदमी को ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि उसकी पार्टनर के पहले किसी से जिस्मानी रिश्ते ना बने हों.

Friday, April 23, 2010

बंबई उच्च न्यायालय की महाराष्ट्र सरकार को आईपीएल मैचों पर मनोरंजन कर नहीं लगाए जाने को लेकर फटकार

आईपीएल मैचों पर मनोरंजन कर नहीं लगाए जाने को लेकर महाराष्ट्र सरकार को बंबई उच्च न्यायालय के कड़े सवालों का सामना करना पड़ा, जिसने इस बात पर हैरानी जताई कि जब इस मामले में तमाम उद्योगपति शामिल हैं तो इसे विशेष छूट क्यों दी जा रही है।
अदालत ने सवाल किया कि अगर उद्योगपति इससे जुड़े हुए हैं तो राज्य आईपीएल को विशेष छूट क्यों दे रहा है? यह एक गंभीर मुद्दा है।
न्यायमूर्ति पीबी मजमूदार और न्यायमूर्ति राजेश केतकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या वह आईपीएल मैचों पर मनोरंजन कर लगाएगी? साथ ही पीठ ने दिन-रात के मैच पर खर्च होने वाली बिजली पर भी टिप्पणी की।
पीठ ने नवी मुंबई में कल आयोजित होने वाले मैच के दौरान पड़ोसी इलाकों में हुई बिजली कटौती का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार को इस पर कुछ नियंत्रण करना चाहिए। इस कदर बिजली की बर्बादी, केवल इस मनोरंजन के लिए? इससे पहले बहस के दौरान न्यायाधीशों ने कहा कि यह (आईपीएल) मनोरंजन है या खेलकूद की कोई गतिविधि?
क्या इंडियन प्रीमियर लीग लाभकारी गतिविधि है, यह सवाल करते हुए अदालत ने बीसीसीआई और आईपीएल से कहा कि वह महाराष्ट्र में खेले गए टी-20 मैचों से हुई आय के बारे में जानकारी दे। अदालत का यह निर्देश शिवसेना विधायक सुभाष देसाई की जनहित याचिका पर आया, जिन्होंने माँग की थी कि आईपीएल से राज्य को मनोरंजन कर वसूलना चाहिए।
न्यायाधीशों ने आईपीएल से मौजूदा सत्र में राज्य में आयोजित होने वाले बाकी बचे मैचों से होने वाली आय का लेखा जोखा भी रखने को कहा। अदालत ने दोनों क्रिकेट संगठनों को निर्देश दिया कि वे 26 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई की तारीख पर अपने अपने विधान और उद्देश्य की प्रतिलिपि मुहैया कराए।
अदालत ने अन्य बातों के अलावा इस संबंध में भी जानकारी माँगी है कि जिस प्रकार आईपीएल और बीसीसीआई टी 20 मैचों का आयोजन कर रहे हैं और बीसीसीआई आईपीएल को कैसे नियंत्रित करती है..क्या आईपीएल एक लाभकारी गतिविधि है? आईपीएल के टिकटों के दाम 40 हजार रूपए तक होने पर हैरानी जताते हुए अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि टिकटों की दर क्या है

आमेर हवेली मामले में ललित मोदी के खिलाफ परिवाद दायर

 इंडियन प्रीमियर लीग .आईपीएल. कमिश्नर ललित मोदी के खिलाफ आमेर हवेली मामले को लेकर एक परिवाद अदालत में दायर किया गया हैं !
यह परिवाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट युधीष्ठर शर्मा की अदालत में गैर सरकारी संगठन नागरिक मोर्चा के जिला अध्यक्ष संदीप भतरा ने श्री मोदी उनकी पत्नी मीनल मोदी तथा अन्य के खिलाफ दायर किया है !
आरोप लगाया गया है कि श्री मोदी तथा उसके सहयोगियों ने एक फर्जी कंपनी बनाकर सरकारी संपति हडप ली1 यह भी आरोप है कि श्री मोदी के एक प्रभावशाली व्यक्ति होने के कारण इस मामले में पुलिस ने भी रिपोर्ट दर्ज नहीं की1 इसलिए अदालत की शरण लेने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचा था !
अदालत इस मामले की सुनवाई 26 अप्रैल को करेगी !

राष्ट्रीय चिह्न के सम्मान के लिए दसवीं की छात्रा दीपशिखा ने की पैरवी

राष्ट्रीय चिह्न के अपमान के मामले को लेकर चंडीगढ़ के सेक्रेड हार्ट स्कूल की दसवीं की छात्रा वीरवार को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंच गई। याचिका पर चीफ जस्टिस मुकुल मुदगल व जस्टिस जसबीर सिंह की खंडपीठ ने 27 मई के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय, हरियाणा व पंजाब सरकार तथा चंडीगढ़ प्रशासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सेक्टर-48 की दीपशिखा सिंह ने जनहित याचिका में कहा है कि वाहनों के आगे नंबर प्लेट पर लगा राष्ट्रीय चिह्न कमर से नीचे के हिस्से पर लगा होता है। वाहन चालक के पैरों के समान ऊंचाई पर लगा होने के कारण यह राष्ट्रीय चिह्न का निरादर है और स्टेट एम्ब्लम ऑफ इंडिया एक्ट व नियमों की भी अनदेखी है।

इसके मुताबिक कमर की ऊंचाई से नीचे राष्ट्रीय चिह्न नहीं लगा सकते। याचिका में एक अन्य उदाहरण देते हुए कहा गया कि हाल ही में पंजाब की मंडियों में बोरियों के ऊपर राष्ट्रीय चिह्न लगा पाया गया। समाचार पत्रों में इन बोरियों के ऊपर श्रमिकों को बैठे दिखाया गया है। यह राष्ट्रीय चिह्न का सरासर निरादर है जिस पर रोक लगाई जाए। दीपशिखा ने कोर्ट में यह भी कहा कि स्कूलों के पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से संबंधित नियम कानून के बारे में विस्तार से बताया जाए।

दीपशिखा ने अपने केस की पैरवी अदालत में खुद ही की। चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान पूछा कि पढ़ाई पूरी कर क्या बनना चाहोगी? उत्तर का इंतजार किए बिना ही चीफ जस्टिस ने कहा कि शायद आपके लिए वकील बनना ही ठीक रहेगा। इस पर अदालत के भीतर मौजूद वकीलों के चेहरों पर मुस्कराहट तैरती नजर आई।

सुनवाई से पहले चीफ जस्टिस ने दीपशिखा से पूछा था कि आप वकील की मदद लेना चाहेंगी, तो उसने हां में जवाब दिया था। फिर दीपशिखा से कहा गया कि अपनी बात संक्षेप में बताइए, जिसपर दीपशिखा ने 10 मिनट में अपनी बात रखी। दीपशिखा ने भास्कर संवाददाता को बताया कि पहले दिन बुधवार को जब याचिका दायर की थी तो नर्वस थीं। हालांकि इस केस से संबंधित पेपर प्रोसेस उन्होंने खुद ही किया। राष्ट्रीय चिह्न के बारे में उन्होंने इंटरनेट से काफी जानकारी जुटाई।

जयपुर में मोबाइल टावर लगाने से रोक हटी

राजस्थान हाई कोर्ट ने जयपुर शहर में नगर निगम क्षेत्र में मोबाइल टावर लगाने से रोक हटा दी है। न्यायाधीश अजय रस्तोगी ने यह आदेश शुक्रवार को विमला शर्मा की याचिका की सुनवाई के दौरान टाटा टेलीकॉम सर्विसेज के प्रार्थना पत्र को स्वीकार करते हुए दिया। हालांकि याचिका में विवादित जगह पर मोबाइल टावर लगाने पर यथास्थिति जारी रहेगी। प्रार्थना पत्र में कहा गया कि मोबाइल टावर तय मापदंडों के अनुसार ही लगाए जाते हैं। इसलिए शहर में मोबाइल टावर लगाए जाने की अनुमति दी जाए।


न्यायाधीश ने प्रार्थना पत्र को स्वीकार कर शहर में मोबाइल टावर लगाए जाने पर लगी रोक को हटा दिया। गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने 7 दिसंबर 09 को राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि शहर में कहीं पर भी मोबाइल टावर लगाए जाने की अनुमति देने के लिए अदालत से इजाजत लेनी होगी। यह आदेश अदालत ने विमला देवी की याचिका पर दिया था।


याचिका में दुर्गापुरा के श्रीजी नगर मोबाइल टावर लगाए जाने के विरोध करते हुए कहा था कि रिहायशी क्षेत्र में मोबाइल टावर से कैंसर के मरीज व विकलांग प्रभावित होते हैं और यह मानव मस्तिष्क पर भी विपरीत प्रभाव डालता है। बाहर के देंशों अमेरिका, ब्रिटेन, चीन व पाकिस्तान में मोबाइल टावर के लिए नियम बने हुए हैं, लेकिन यहां पर कोई नियम नहीं हैं। याचिका में गुहार की गई कि मोबाइल टावर लगाने के लिए नियम बनाए जाएं और कॉलोनी में मोबाइल टावर की प्रक्रिया का रोका जाए।

Thursday, April 22, 2010

भ्रष्ट वकीलों को न्यायाधीश बनने से रोकने के लिए विधेयक

भ्रष्ट वकीलों को न्यायाधीश बनने से रोकने के लिए विधेयक  संसद के अगले सत्र में पेश किया जाएगा। मोइली के अनुसार इस विधेयक के तहत कानूनी पेशेवरों का एक डाटा बैंक तैयार किया जाएगा, जिसके जरिए संदिग्ध पृष्ठभूमि वालों को उच्च न्यायिक व्यवस्था में न्यायाधीश बनने से रोका जा सकेगा।

मोइली ने कहा कि फिलहाल इस विधेयक का मंत्रियों का एक समूह परीक्षण कर रहा है। यह विधेयक संसद के अगले सत्र में पेश किया जाएगा।

'कानूनी शिक्षा में दूसरी पीढ़ी के सुधार' के लिए एक राष्ट्रीय परामर्श शुरू करने की घोषणा हेतु संवाददाताओं से बातचीत में मोइली ने कहा कि उनका मंत्रालय न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के संदर्भ में एक अलग विधेयक पर भी काम कर रहा है।

पहली और दूसरी मई को आयोजित राष्ट्रीय परामर्श का उद्घाटन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह करेंगे। विज्ञान भवन में आयोजित इस समारोह में प्रधान न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन भी उपस्थित होंगे।

मोइली ने कहा कि इस परामर्श के जरिए कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में खड़ी प्रमुख चुनौतियों की पहचान की जाएगी और सुधार का एक खाका तैयार किया जाएगा।

मोइली ने कहा, "वैश्विक चुनौतियों से निपटने की दिशा में कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में भारत फिलहाल बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है।"

बिना जज साहब की इजाजत के गोपनीय दस्तावेजों की कॉपी देना कोर्ट स्टाफ को मंहगा पड़ सकता है।

बिना जज साहब की इजाजत के अगर उनका स्टाफ अदालत के गोपनीय दस्तावेजों की कॉपी वकीलों और मुल्जिमों को उपलब्ध कराता पाया गया, तो अब उसकी खैर नहीं। दरअसल, ऐसे मामलों पर न्यायाधीशों की कड़ी नजर है। कोर्ट स्टाफ द्वारा ऐसे अनुचति कार्य किए जाने पर  दिल्ली जिला जज (प्रथम) जीपी मित्तल ने अपनी कड़ी आपत्ति जाहिर करते हुए इसे ‘विश्वासघात’ करार दिया है। जिला जज ने विशेषकर कुछ आशुलिपिक, अलहमदों को ऐसे कार्य किए जाने का जिम्मेदार ठहराया है।

साथ ही कहा है कि बिना जज की इजाजत के ऐसे दस्तावेजों की प्रति मुल्जिमों, वादी और वकीलों को दिया जाना न सिर्फ अनुशासनहीनता है, बल्कि नैतिक मूल्यों की खिलाफत करना है। इस संबंध में जिला जज जीपी मित्तल ने सभी अदालतों के साथ-साथ जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के लिए एक परिपत्र जारी किया है। न्यायाधीश मित्तल ने इस परिपत्र में कड़ी टिप्पणियां की हैं। उन्होंने लिखा है कि उनके कार्यालय को सूचना मिली है कि कुछ आशुलिपिक (स्टेनोग्राफर) अदालत के फैसलों की प्रति जज के जांचने से पहले ही वकीलों और वादियों के अलावा मुल्जिमों को भी दे देते हैं। ऐसे में जज के बिना हस्ताक्षर किए ऐसे फैसलों की कॉपी इन लोगों को मिल जाती है। यह घोर अनुशासनहीनता के अलावा न्यायपालिका के साथ विश्वासघात करना है। इस प्रकार के अनुचित कार्य को किया जाना नैतिक मूल्यों के खिलाफ है और कदाचार के साथ-साथ भ्रष्टाचार का प्रमाण भी है।



परिपत्र में यह भी कहा गया है कि उन्हें यह भी सूचना मिली है कि कुछ आशुलिपिक अैर अलहमद गलत तरीके से गवाहों के बयान की प्रति भी वकीलों और वादियों को देते हैं, जो कि गोपनीय दस्तावेज हैं। ऐसा किया जाना न सिर्फ कार्यालय स्टेशनरी का दुरुपयोग करना है, बल्कि इससे भारत सरकार को भी आर्थिक नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

जिजा जज ने राजधानी की पांचों जिला अदालतों में नियुक्त आशुलिपिकों, अलहमदों और सहायक अलमदों को साफ कहा है कि अगर भविष्य में वे ऐसे कार्य करते हुए पाए गए तो उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। न्यायाधीश मित्तल ने राजधानी के सभी जिला जजों के अलावा तीस हजारी, पटियाला हाउस, कड़कड़डूमा, रोहिणी और द्वारका जिला न्यायालय के जज और मजिस्ट्रेटों को यह परिपत्र भेजा है। साथ ही जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और भिक्षु न्यायालयों को भी इसकी कॉपी भेजी गई है। जिला जज ने सभी जिला जजों और पीठासीन अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वह इस परिपत्र को गंभीरता से लें और अपनी अदालतों में ऐसे अनुचित कार्यो पर लगाम लगाएं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जेडीए सचिव से पूछा "कितने साल में पूरे होंगे 72 घंटे!"

अदालती आदेश के बावजूद दो वर्ष तक अतिक्रमण हटाने में विफल रहने को गंभीरता से लेते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने जेडीए सचिव को फटकार लगाई है। साथ ही सात दिन में श्याम नगर योजना से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं।

यह निर्देश न्यायाधीश डॉ. विनीत कोठारी ने राजीव गांधी कॉलोनी हितकारी समिति व अन्य की याचिका की सुनवाई के दौरान दिए। कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने में नाकाम रहे अधिकारियों की खिंचाई करते हुए पूछा कि न्यायालय द्वारा 72 घंटे में अतिक्रमण हटाने के लिए दो वर्ष पूर्व दिए गए नोटिस की अवधि क्या अब तक पूरी नहीं हुई। उन्होंने जेडीए सचिव तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (यातायात) को 27 अप्रेल को न्यायालय में तलब किया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 2 मई 2008 को तत्कालीन नगर विकास न्यास को श्याम नगर योजना की सड़कों व पार्को से अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए थे। इस पर तत्कालीन न्यास ने 30 अप्रेल 2008 को अतिक्रमियों को 72 घंटे में स्वेच्छा से हटने का नोटिस जारी किया था।

इस नोटिस के बावजूद न तो अतिक्रमी हटे व न ही न्यास ने इस दिशा में कोई प्रयास किया। उधर अतिक्रमण हटाने के न्यास के नोटिस को राजीवगांधी कॉलोनी हितकारी समिति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने उनका स्थगन प्रार्थनापत्र खारिज करते हुए कहा कि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण गंभीर सामाजिक समस्या है, इसका समाधान जरूरी है। यदि इस तरह के मामलों में अतिक्रमण करने वालों से सहानुभूति रखी गई तो इस समस्या को प्रोत्साहन मिलेगा।

क्यों न वेतन रोक दें ?

हाईकोर्ट ने चौबीस घंटे के अंदर जेडीए के टॉप टू बॉटम अधिकारियों की सूची, अतिक्रमण निरोधक दस्ते व इस कार्य में लगे पुलिस वालों की सूची पेश करने के निर्देश दिए। साथ ही पूछा कि क्यों नहीं कर्तव्यों का निर्वाह करने में लापरवाही बरतने तथा गंभीर अकर्मण्यता के दोषी कर्मचारियों का वेतन रोक दिया जाए।कोर्ट ने आदेश दिया कि जेडीए एक सप्ताह में विवादित स्थल से अतिक्रमण हटाए। आवश्यक हो तो सरकारी विभागों व एजेंसियों की भी सहायता ले। विफल रहने पर संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों पर दंडात्मक कार्रवाई होगी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने जेडीए सचिव तथा एएसपी (यातायात) को 27 अप्रेल को न्यायालय में तलब किया है।

थानों में 20 करोड़ के वाहन बने कबाड़

रायपुर जिले के थानों में 20 करोड़ के जब्त वाहन कबाड़ में सड़ रहे हैं। थानों के कैंपस में तीन हजार से ज्यादा बाइक और बड़ी गाड़ियां सड़ रही है। शहर के थानों की बात करें तो यहां दो हजार से ज्यादा गाड़ियां कबाड़ में पड़ी हैं। इनमें से 70 फीसदी गाड़ियां या तो सड़ चुकी हैं, या फिर वे किसी काम की नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बीमा कंपनी की याचिका पर सुनवाई में ऐसी गाड़ियों को उनके मालिकों और कंपनियों को लौटाने का आदेश जारी कर दिया है। इस आदेश की कॉपी का अब शहर की थाना पुलिस को भी इंतजार है। एसपी अमित कुमार ने बताया कि थानों में ऐसी सैकड़ों गाड़ियां सड़ रही हैं, लेकिन इनकी नीलामी पुलिस के हाथ नहीं है।

इनमें से ज्यादातर गाड़ियां क्रिमिनल मामलों की हैं, जिनकी सुनवाई कोर्ट में लंबित है। 20 फीसदी गाड़ियां ऐसी भी हैं जो या तो जब्ती की हैं या फिर उनके मालिक इन्हें लेने नहीं आ रहे। शहर के थानों में खड़ी 40 फीसदी गाड़ियां चोरी और गुमी हुई थीं, जिन्हें पुलिस ने जब्त कर लिया है। कोर्ट में मामलों का निपटारा नहीं होने की वजह से इन्हें बीमा कंपनियां और इनके मालिकों के सुपुर्द नहीं किया जा रहा।

साल के अंत में होती है नीलामी : पुलिस अफसरों का कहना है कि पुरानी गाड़ियों के अलावा जिन गाड़ियों के मालिक एक निश्चित समय तक इन्हें लेने नहीं आते, उन्हें नीलाम करने का प्रावधान है। इसके लिए एसडीएम कोर्ट से आदेश लेना पड़ता है। इसके बाद गाड़ियों की लिस्टिंग की जाती है। फिर विज्ञापन जारी कर नीलामी की कार्यवाही होती है। अफसरों का कहना है कि पिछले कुछ सालों से थानों में नीलामी नहीं हुई है, यही वजह है कि दिनोंदिन वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है।

कसाब मामला : जज पर अदालत की अवमानना का केस!

कसाब मामले की सुनवाई कर रही विशेष अदालत के जज एमएल टाहिलियानी के खिलाफ अदालत की अवमानना की याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई है। याचिकाकर्ता अब्बास काजमी हैं, जो कसाब के वकील रह चुके हैं। उसे चार माह पहले जज द्वारा ही मामले से हटा दिया गया था।

काजमी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा है कि, ‘कसाब मामले की सुनवाई के दौरान जब विशेष सरकारी वकील उज्ज्वल निकम मेरा अपमान कर रहे थे, तब जज मूक दर्शक बने रहे। यह अदालत की अवमानना है।’

उन्होंने कहा कि, ‘सरकारी वकील ने मुझे झूठा.आतंकी का वकील. कहा और मेरी तुलना मुंबई हमले के षडयंत्रकारी से की। ऐसे समय जज ने चुप रहकर अवमानना कानून 1971 की धारा 15 व 16 के तहत अपनी ही अदालत की अवमानना की है। अदालत में उपस्थित हुआ वकील एक तरह से अदालत का अधिकारी होता है, मामले की सुनवाई कर रहे जज को वकील का अपमान करने का कोई हक नहीं होता।’

काजमी ने पत्रकारों से बातचीत में यह मांग भी की है कि कसाब का केस लड़ने के लिए उसे पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिकता सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’ से सम्मानित किया जाना चाहिए। पाकिस्तानी आतंकी कसाब और दो भारतीयों के खिलाफ सुनवाई पूरी हो चुकी है और फैसला 3 मई को संभावित है।

Tuesday, April 20, 2010

यूएई में पहली बार महिला को मौत की सजा

अपने प्रेमी के साथ मिलीभगत से सात वर्ष पहले पति की हत्या करने वाली एक अमीराती महिला को संयुक्त अरब अमीरात में मौत की सजा दी जाएगी।

मौत की सजा पाने वाली अमीरात की यह पहली महिला होंगी। शीर्ष न्यायालय ने इस महिला की मौत की सजा को बहाल रखा था। खबरों में कहा गया है कि महिला को अपने प्रेमी और ब्वॉयफ्रेंड के दो मित्रों के साथ मिलकर पति की हत्या करने का दोषी करार दिया गया है। सभी को मृत्युदंड दिया गया है।

अपनी सजा खारिज कराने के लिए चारों आरोपी दो बार अपीलीय अदालत में दलील दे चुके हैं। हालांकि अबु धाबी के सुप्रीम कोर्ट ने चारों के मृत्युदंड को दोनों बार बरकरार रखा। 2003 से चारों आरोपी शारजाह के केंद्रीय कारागार में बंद हैं। मृतक अमीरात में ही एक पुलिसकर्मी था।

Monday, April 19, 2010

अब खण्डपीठ में नहीं सुनी जाएगी एकलपीठ के निर्णय के खिलाफ अपील-राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि किसी मामले में अधीनस्थ अदालत के फैसले के विरूद्ध दायर याचिका पर एकलपीठ के निर्णय के खिलाफ खण्डपीठ में विशेष अपील दायर नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट न्यायाधीश प्रकाश टाटिया व दिनेश माहेश्वरी की खण्डपीठ ने दीवानी मामलों में अधीनस्थ अदालतों के आदेश के विरूद्ध एकलपीठ द्वारा याचिकाओं में दिए निर्णय के विरूद्ध दायर विशेष अपीलों को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।

खण्डपीठ ने 47 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में कहा कि अधीनस्थ अदालत के फैसले के विरूद्ध हाईकोर्ट में याचिका सामान्यत: संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर की जाती है। ये याचिकाएं हाईकोर्ट में सुपरवाइजरी क्षेत्राधिकार के तहत दायर की जाती है। इन याचिकाओं को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के मूल क्षेत्राधिकार के तहत दायर याचिकाओं के समान नहीं देखा जा सकता।

खण्डपीठ ने कहा कि अनुच्छेद 227 के तहत दायर रिट याचिका में दिए एकलपीठ के निर्णय के विरूद्ध नियम 134 के तहत अपील का प्रावधान है, इसलिए खण्डपीठ में विशेष अपील पोषणीय नहीं है। खण्डपीठ ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत उसका मूल क्षेत्राधिकार है, जबकि अनुच्छेद 227 के तहत मूल क्षेत्राधिकार नहीं, बल्कि पर्यवेक्षण क्षेत्राधिकार मात्र है।

खण्डपीठ ने कहा कि अनुच्छेद 227 के तहत एकलपीठ द्वारा पारित निर्णय के विरूद्ध खण्डपीठ में अपील दायर करने के लिए कोई कानूनी प्रावधान व नियम ही नहीं है। राजस्थान केश फ्लो मेनेजमेंट नियम 2006 के नियम 8बी के तहत भी ऎसे मामलों में अपील का प्रावधान नहीं है। खण्डपीठ के इस महत्वपूर्ण फैसले से हाईकोर्ट में विचाराधीन सैकड़ों मामले निस्तारित हो जाएंगे तथा अब दीवानी मामलों में एकलपीठ के निर्णय के विरूद्ध पक्षकारों को याचिका सुप्रीम कोर्ट में ही दायर करनी होगी।

रियायत पाने वाला छूट की शर्तों को चुनौती नहीं दे सकता -सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सरकारी अथवा निजी कंपनियों द्वारा यात्रा में रियायत की सुविधा पाने वाले लोग छूट की शर्तों को चुनौती नहीं दे सकते। यानी वरिष्ठ नागरिक, विकलांग या छात्र, जिन्हें भी यात्रा में छूट दी जाती है, उन्हें इससे जुड़ी शर्तों का पालन करना होगा।
न्यायाधीश एच.एस. बेदी और जे.एम. पंचाल की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी परिवहन साधन में दी जाने वाली छूट, चाहे वह रेलवे, एयरलाइंस या फिर सड़क परिवहन निगम हो, किसी को यह अधिकार नहीं देती कि छूट की शर्तें उसके हिसाब से निर्धारित होनी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने इंडियन एयरलाइंस और कुछ निजी कंपनियों को निर्देश दिया था कि वरिष्ठ नागरिकों को हवाई यात्रा में मिली छूट पर वे अपनी शर्तें न लगाएं।
इंडियन एयरलाइंस ने शर्त लगा रखी है कि किसी वरिष्ठ नागरिक को रियायती टिकट के लिए कम से कम सात दिन पहले आवेदन करना होगा। इसके साथ ही इस टिकट के लाभार्थी को वापसी का टिकट हासिल करने के लिए गंतव्य स्थान पर कम से कम दो दिन तक ठहरना होगा।
हाईकोर्ट ने एक वरिष्ठ नागरिक के आवेदन पर सुनवाई करते हुए विमानन कंपनी के इस नियम को मनमाना और अवैध करार दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
 

Wednesday, April 14, 2010

13 पृष्ठों के अनुवाद पर खर्च हुए साढ़े चार लाख

बोफोर्स तोप खरीद में कथित भ्रष्टाचार की जांच के दौरान आरोपी ओत्तावियो क्वात्रोच्चि को अर्जेटीना से भारत प्रत्यर्पित कराने की नाकाम रही कोशिश में सीबीआई ने महज 13 पृष्ठों के अनुवाद पर करीब साढ़े चार लाख और स्थानीय वकील पर लगभग 12.78 लाख रुपए खर्च कर डाले थे। यह खुलासा एक आरटीआई अर्जी के जरिये हुआ है।

प्रत्यर्पण से जुड़े दस्तावेजों के अंग्रेजी से स्पेनिश और स्पेनिश से अंग्रेजी में अनुवाद पर 4 लाख 44 हजार 684 रुपए आया। अनूदित दस्तावेजों में अर्जेटीना सरकार को प्रत्यर्पण के लिए भेजा अनुरोध पत्र और अल डोराडो अदालत का आदेश शामिल था।

आरटीआई कार्यकर्ता अजय अग्रवाल की अर्जी पर मिले जवाब में खुलासा हुआ कि वर्ष 2007 में क्वात्रोच्चि को अज्रेटीना से भारत प्रत्यर्पित कराने की कोशिश में सीबीआई ने अपने दो वरिष्ठ अधिकारियों को दो बार लातिन अमेरिकी देश भेजा। तब इस इतालवी कारोबारी के खिलाफ इंटरपोल का वॉरंट जारी था। उसे अर्जेंटीना में छह फरवरी 2007 को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद फरवरी और जून 2007 में सीबीआई अधिकारी आरोपी को प्रत्यर्पित कराने के मकसद से अर्जेटीना गए।

इससे पहले अभिषेक शुक्ला को मिले आरटीआई अर्जी के जवाब में सीबीआई ने कहा था कि क्वात्रोच्चि के प्रत्यर्पण की कोशिश में उसके दो अधिकारियों की यात्रा पर 14 लाख 15 हजार 622 रुपए खर्च हुए थे। यह बात समझ से परे है कि इतने कम पृष्ठों के अनुवाद पर इतनी अधिक राशि कैसे खर्च हुई। सीबीआई के जवाब में कहा गया कि प्रत्यर्पित कराने के लिये एक स्थानीय वकील की भी मदद ली गयी। उसे 12 लाख 78 हजार की राशि दी गयी। स्थानीय वकील के रहने और आवागमन पर 1 लाख 27 हजार रुपऐ की अतिरिक्त राशि खर्च हुई। मलेशियाई प्रशासन ने भी क्वात्रोच्चि को 1999 में हिरासत में लिया था। तब भी सीबीआई उसे भारत प्रत्यर्पित कराने में नाकाम रही थी।

सगौत्र में शादी मंजूर नहीं, हत्यारों को बचाएगी खाप पंचायत

खाप पंचायतों की महापंचायत ने समान गौत्र में शादी का विरोध और इस विवाद में मौत के घाट उतारे गए दंपत्ति मनोज-बबली के हत्यारों का समर्थन करने का फैसला किया है। 
हत्यारों को फांसी की सजा से बचाने के लिए महापंचायत चंदा जुटाएगी और सजा के खिलाफ अपील करने के लिए कोई ब़डा वकील ख़डा करेगी। मनोज-बबली प्रकरण में आरोपियों को फांसी को सजा जुनाए जाने के बाद सकते में खाप पंचायतों के प्रतिनिधि मंगलवार को यहां इस मुद्दे पर विचार करने के लिए जाट धर्मशाला में जुटे थे। इसमें देशभर की विभिन्न राज्यों की खाप पंचायतों के करीब सात हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया। पंचायतों के सदस्यों ने यह मांग की है कि हरियाणा सरकार को हिंदू मैरिज एक्ट में बदलाव करने के लिए चिट्ठी लिखी जाए ताकि सगौत्र में शादी पर प्रतिबंध लग सके। अपनी मांगों को लेकर कुछ सदस्य दिल्ली-चंडीगढ़ के बीच जीटी रोड जाम करने के लिए रवाना भी हो गए जबकि कुछ सदस्य जाम जैसा कदम उठाने के पक्ष में नहीं थे। 
महापंचायत का यह भी रूख था कि पंचायतें मौत का फरमान या पति-पत्नी को भाई-बहन घोषित करने जैसे फरमान न सुनाए जाएं। प्रतिनिधियों का मानना था कि इससे पंचायत की छवि खराब होती है। इस मुद्दे पर जमकर बहस हुई और नौबत मारपीट तक भी आ गई। एक गुट चाहता था कि मौत का फरमान जारी रहे जबकि दूसरा गुट इसे खत्म करना चाहता था। ऎसे में महापंचायत इस मुद्दे पर कोई फैसला नहीं ले सकी।

शादी के 66 साल बाद चाहिए तलाक

उम्र के जिस पड़ाव पर ज्यादातर दंपती अपनी शादी के एलबम देखते हैं और पुरानी यादें ताजा करते हैं उस अवस्था में एक दंपती तलाक और भत्ते की कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। 86 वर्षीय रमेश और 81 वर्षीय सुधा (नाम परिवर्तित) इस स्थिति के लिए एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं।
 
रमेश और सुधा 1977 से ही अलग रह रहे हैं। रमेश ने अब बांबे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें सुधा के वैवाहिक अधिकार बहाल करने और दंपती को पुन: एक साथ रहने का आदेश दिया गया था। रमेश ने कहा कि सुधा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने में इतनी तल्लीन हो गई कि बाकी किसी भी चीज पर ध्यान नहीं दिया। उनके वकील संजीव कदम के मुताबिक, सुधा महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस की महिला इकाई की अध्यक्ष रही हैं। दोनों की शादी 1944 में हुई थी और वे मुंबई में रहते थे। 1972 में रमेश ठाणो के इंदगांव जाकर पोल्ट्री फार्म का व्यवसाय शुरू करना चाहते थे।

तब सुधा ने जाने से मना कर दिया क्योंकि इससे उनका राजनीतिक जीवन प्रभावित होता। रमेश सुधा को एक फ्लैट, कार देकर इंदगांव रहने चले गए। रमेश ने बताया कि सुधा उनसे 20 साल से अलग है। वह उम्र के इस पड़ाव में उनके पास सिर्फ पैसों की खातिर आना चाहती है। उधर सुधा का कहना है कि रमेश के अपनी एक बिजनेस पार्टनर से प्रेम संबंध थे, इसलिए वे अलग हुईं थीं। सुधा ने कोर्ट से उचित भत्ता मांगा है।

कोटा न्यायालय होगा भी ऑनलाइन

राजस्थान के अन्य न्यायालयों के साथ ही अगले वर्ष मार्च तक कोटा न्यायालय भी ऑनलाइन हो जाएगा। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मुकेश भार्गव ने बताया कि अभी वर्तमान में मुख्य जोधपुर राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर सेशन न्यायालय एवं जयपुर खंडपीठ हाईकोर्ट ऑनलाइन किया हुआ है।

आगामी मार्च 2011 तक पूरे राजस्थान के न्यायालय के साथ-साथ कोटा जिले की सभी न्यायालयों में कम्प्यूटर लगा दिए जाएंगे। प्रकरणों के फैसले, नकलें, कॉज लिस्ट सहित अन्य न्यायिक कामकाज कम्प्यूटर के जरिए पूरे होंगे।

उन्होंने बताया कि कोटा न्यायालय में बिजली फिटिंग का कार्य तेजी से चल रहा है। प्रत्येक कोर्ट में चार-चार कम्प्यूटर व प्रिंटर लगाए जाएंगे। एक-एक कम्प्यूटर स्टेनो, रीडर एवं क्लर्क को दिए जाएंगे। न्यायिक कर्मचारियों को कम्प्यूटर की ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

14 दिनों में बनायें मानवाधिकार आयोग

झारखण्ड हाईकोर्ट ने सरकार को 14 दिनों के भीतर मानवाधिकार आयोग गठन करने के आदेश दिया है।


मालूम हो कि राज्य गठन के दस साल बाद भी मानवाधिकार आयोग का गठन न किए जाने पर हाईकोर्ट ने पहले भी अपनी नाराज़गी जताई थी। झारखण्ड उच्च न्यायालय कई मुख्या न्यायाधीश ज्ञान सुधा मिश्रा और आर.आर. प्रसाद कई खंडपीठ ने सरकार का पक्ष सुनने के बाद यह आदेश दिया।



कोर्ट ने कहा कि आयोग का गठन कर अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति जल्द की जाए। इसके बाद कोर्ट कई सुनवाई दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दी गई।

कोल्ड ड्रिंक में कचरा, कोका कोला पर फाइन

शहर की एक कन्जयूमर कोर्ट ने कोल्ड ड्रिंक की बोतल में कचरा पाए जाने के बाद कंपनी कोका कोला इंडिया को 25,000 रुपये का भुगतान करने को कहा है।

दिल्ली जिला फोरम के अध्यक्ष जे. पी. शर्मा और सदस्य प्रेमलता और एस. एम. मजुमदार ने कहा कि बोतल के अंदर कचरे को नंगी आंखों दे देखा जा सकता है। निश्चित रूप से इस प्रकार की कोल्ड ड्रिंक पीने से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा।

फोरम ने कहा कि हिंदुस्तान कोका कोला बेवरेजेज प्राइवेट लिमिटेड को मुआवजे के रूप में पीड़ित शीला को 25,000 रुपये और खराब समान की कीमत देने का निर्देश देते हैं। हरियाणा की रहने वालीं शीला की अपील पर सुनवाई के बाद जिला कन्जयूमर फोरम ने यह आदेश दिया। शीला ने कंपनी की ओर से सेवा में कमी के मामले में 5 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी।

एक साल तक पानी पिलाएगा दुष्कर्म का आरोपी

चंडीगढ़ जुविनाइल जस्टिस बोर्ड के चीफ जस्टिस हरीश गुप्ता ने चार साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास करने के लिए दोषी ठहराए गए झज्जर के किशोर युवक को सजा के तौर पर एक साल तक झज्जर बस स्टैंड पर पानी पिलाने की सजा दी है। सामुदायिक सेवा के इस आदेश के तहत दुष्कर्म के प्रयास के दोषी को बस स्टैंड इंचार्ज के नियंत्रण में रहते हुए एक साल तक बोर्ड द्वारा दिए गए फैसले को अमल में लाना होगा।

गौरतलब है कि 7 मार्च 2002 को झज्जर के रिशु नामक किशोर युवक के खिलाफ पुलिस ने पड़ोस में रहने वाली चार वषीर्य बच्ची के साथ दुष्कर्म के प्रयास के संबंध में पीड़ित बालिका की दादी की शिकायत पर रिशु के खिलाफ यह मामला दर्ज किया गया था। आरोपी युवक के नाबालिग होने के कारण यह मामला जुविनाइल बोर्ड में भेज दिया गया। सहायक जिला न्यायवादी किरण चौधरी ने मामले के दोषी किशोर को अधिकतम सजा देने की मांग बोर्ड से की। उन्होंने इस संदर्भ में अपना तर्क रखते हुए कहा कि दोषी द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति गंभीर किस्म की है और समाज में इस तरह की घटनाएं दिनों-दिन बढ़ रही हैं, इसलिए दोषी को सख्त सजा दिया जाना जरूरी है।

दोषी के वकील ने अपना तर्क रखते हुए कहा कि चूंकि यह दोषी साबित हुए किशोर युवक का पहला अपराध है और वह अपने वृद्ध-माता पिता का इकलौता कमाने वाला पारिवारिक सदस्य है। इस लिहाज से बोर्ड दोषी के साथ नरमाई बरते। मामले से जुड़े सभी पक्षों की सुनवाई के बाद बोर्ड ने बच्ची से दुष्कर्म के प्रयास के आरोपी रिशु को सजा के तौर पर स्थानीय बस स्टैंड पर एक साल तक सामुदायिक सेवा करने का फैसला दिया है।

Saturday, April 10, 2010

'धोखेबाज' पति का वेतन जानने के लिए आरटीआई का सहारा

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के जमाने में कुछ भी नहीं छिप सकता। यहां तक कि आपको हर माह मिलने वाली तनख्वाह भी। अब केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी का वेतन निजी जानकारी नहीं मानी जाए। सीआईसी ने यह व्यवस्था एक महिला की अपील मंजूर करते हुए दी।

सूचना आयुक्त अन्नपूर्णा दीक्षित ने छत्तीसगढ़ निवासी शिवकुमारी कश्यप के पक्ष में आदेश जारी किया। कश्यप को संदेह था कि दक्षिण-पूर्वी मध्य रेलवे के कर्मचारी बलदेव सिंह ने अपनी सर्विस बुक में दूसरी बीवी का नाम लिखा रखा है। ऐसे में कश्यप ने आरटीआई कानून के तहत रेलवे को आवेदन भेजा। इसमें उन्होंने अपने पति का वेतन संबंधी ब्योरा तथा सर्विस बुक की प्रति मांगी।

रेलवे के यह जानकारी देने से इनकार करने पर कश्यप ने सीआईसी में अपील की। उन्होंने वीडियो कान्फ्रेंसिंग में दावा किया कि वे बलदेव की वैध रूप से विवाहित पत्नी हैं। पति का उनके साथ बर्ताव अच्छा नहीं रहता है। मामले की सुनवाई के बाद सीआईसी ने कहा कि कश्यप के द्वारा मांगी गई जानकारी 10 अप्रैल तक मुहैया कराई जाए।

रामलला की पूजा की इजाजत देने की अर्जी मंजूर

उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में विवादित स्थल पर स्थित मंदिर में भगवान राम की पूजा करने पर अधिकारियों की ओर से कथित तौर पर लगाई गई अतर्कसंगत पाबंदियों को हटाने संबंधी याचिका पर विचार करने पर शुक्रवार को सहमति जता दी।
प्रधान न्यायाधीश के जी बालकृष्णन और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की पीठ ने कहा कि हम आपकी अर्जी पर विचार करेंगे। पीठ ने जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी से इस मामले में नया आवेदन देने को कहा। गौरतलब है कि स्वामी इस मामले में एक पक्ष हैं।
पीठ ने कहा कि आपको उचित आवेदन दाखिल करना होगा और तभी प्रतिवादी अपना जवाब दाखिल कर सकेंगे। पीठ ने स्वामी को आवेदन देने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया।
जनता पार्टी प्रमुख ने न्यायालय से कहा कि उन्होंने पिछले साल मार्च में शीर्ष न्यायालय ओर से दिए गए दिशा-निर्देश के अनुसार एक हलफनामा दायर किया है और उसमें ये बातें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मेरी प्रार्थना पूजा पर लगाई गई पाबंदी के खिलाफ है। उन्होंने पीठ का ध्यान आकर्षित किया कि उन्हें लंबित मामले में पक्ष के तौर पर शामिल किया गया है।

संक्षिप्त सुनवाई के दौरान स्वामी ने पीठ को स्पष्ट किया कि वह यह सवाल नहीं उठा रहे हैं कि उस स्थान पर राम मंदिर बनाया जाए या नहीं बल्कि उनका निवेदन मंदिर में भगवान राम की पूजा तक सीमित है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने अयोध्या में विवादित स्थल पर स्थित मंदिर में भगवान राम की पूजा करने पर अतर्कसंगत पाबंदी लगा रखी है।

इससे पहले 29 जनवरी को स्वामी ने कहा था कि उस स्थल पर कानूनी अधिकार को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित विवाद का अंतिम नतीजा चाहे जो भी हो, अधिकारियों को प्रतिमाओं के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं के लिए पर्याप्त इंतजाम सुनिश्चित करना चाहिए। ऐसा नहीं किया जाना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
स्वामी ने दावा किया है कि फैजाबाद जिले के आयुक्त एवं वैधानिक रिसीवर के परामर्श से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पूजा पर अंकुश लगाया जाना अतर्कसंगत और अनावश्यक रूप से कठोर है। अपने आवेदन के समर्थन पर पीठ के समक्ष स्वामी की ओर से रखे गए हलफनामे में कहा गया है, इस आवेदक (स्वामी) के अनुसार ये नियमन काफी अपमानजनक, अतर्कसंगत और वृद्ध, अशक्त या महिला श्रद्धालुओं के लिए खासतौर पर काफी कठोर हैं।
स्वामी ने कहा था कि मामले पर तत्काल सुनवाई किए जाने की आवश्यकता है क्योंकि इससे लोक स्वास्थ्य और नैतिकता का सवाल जुड़ा हुआ है और वह श्रद्धालुओं की तरफ से राहत की मांग कर रहे हैं।

जस्टिस दिनकरन सिक्किम हाई कोर्ट भेजे गए

कर्नाटक हाई कोर्ट के विवादास्पद चीफ जस्टिस पी. डी. दिनकरन का सिक्किम हाई कोर्ट में तबादला कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने गुरूवार देर रात यह फैसला किया। दिनकरन पर जमीन घोटाले तथा भ्रष्टाचार के आरोप हैं।

इससे पहले कॉलेजियम ने उन्हें एक अप्रेल को छुट्टी पर जाने की सलाह दी थी लेकिन दिनकरन ने इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया जिसके बाद उन्हें सिçक्कम उच्च न्यायालय भेजने का निर्णय लिया गया। दिनकरन की जगह दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मदन बी लोकुर को कर्नाटक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया है।

कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने गुरूवार को कहा कि "दिनाकरन कानून से ऊपर नहीं है। कानून के हाथ बहुत लंबे हैं। ऎसा नहीं है कि कानून की पहुंच उन तक नहीं है।"

दिनाकरण पर आरोप है कि उन्होंने तमिलनाडु के तिरूवल्लूर में जमीन हथियाई है। राज्यसभा के 75 सांसदों ने दिनाकरण के खिलाफ महाभियोग चलाने को लेकर सभापति हामिद अंसारी को पत्र भी सौंपा है।

70 हजार पेज का चालान

बालको के 1200 मेगावाट के पॉवर प्लांट की निर्माणाधीन चिमनी 23 सितंबर 2009 को धराशायी हुई। इसमें 40 मजदूर मारे गए। पुलिस ने बालको थाने में एक मामला अपराध क्रमांक 377/09 पर धारा 304, 34 भादवि के तहत् पंजीबद्ध किया।

विवेचना के दौरान मिले तथ्यों के आधार पर इसमें धारा 324, 326, 201 भादवि भी जोड़ी गई। इस मामले में पुलिस ने अब तक 9 आरोपियों की गिरफ्तारी की है। जिनमें बालको के प्रोजेक्ट मैनेजर विरल मेहता सहित तीन अधिकारी, सेपको के प्रोजेक्ट मैनेजर वू छुनान तथा दो इंजीनियर, जीडीसीएल के प्रोजेक्ट मैनेजर मनोज शर्मा व दो अन्य तथा एनसीसीबीएम बल्लभगढ़ हरियाणा के हेड एमएम अली व दो इंजीनियर शामिल हैं।


पुलिस ने 18 फरवरी को इस मामले में पहली चार्ज शीट पेश की थी। शुक्रवार 9 अप्रैल को पुलिस ने इस मामले का चालान जेएमएफसी श्रीमती सरोजनंद दास के न्यायालय के पेश किया। न्यायालयीन सूत्रों के अनुसार पुलिस ने आज पेश किए गए चालान में आरोप पत्र के साथ साक्ष्य, गवाहों के बयान, जांच रिपोर्ट के जो दस्तावेज संलग्न किए हैं वह 70 हजार पेज से अधिक के हैं।


इन दस्तावेजों को बक्सों में भरकर एक वाहन से अदालत लाया गया। कानूनी जानकार कहते हैं कि पुलिस ने इस मामले से जुड़े प्रत्येक बिंदुओं की सूक्ष्मता पूर्वक जांच की है यह इन दस्तावेजों से प्रतीत होता है। अपने तरह का यह एक ऐतिहासिक चालान है।


पुलिस ने इस मामले में अब तक 9 आरोपियों को गिरफ्तार किया जाना तथा पांच अन्य आरोपियों को फरार बताते हुए मामले की विवेचना जारी होने की बात कही है। इन फरार आरोपियों में बालको के इंजीनियर संजय देव तथा जीडीसीएल के चिमनी निर्माण से जुड़े विकास भारतीय, शिव पालीवाल, अनिरुद्ध तोमर तथा व्यंकटेश शामिल हैं।

इन आरोपियों की गिरफ्तारी पर पुलिस अभी और सप्लीमेंट्री चालान पेश करेगी। पुलिस ने इस मामले में 130 गवाह नामित किए हैं। शासन की ओर से उपसंचालक अभियोजन जे चंद्रा, जीडीसीएल की ओर से अधिवक्ता अशोक तिवारी, सेपको की ओर से अधिवक्ता श्रीमती मीनू त्रिवेदी जोशी व वल्लभगढ़ लेब के आरोपियों की ओर से अधिवक्ता महेन्द्र तिवारी न्यायालय में पेश हुए।

मामले की अगली सुनवाई 19 अप्रैल को उपरपण के लिए तय की गई है। चालान आज रिमांड कोर्ट में पेश किया गया है। चूंकि मामले की सुनवाई की अधिकारिता डीजे या एडीजे कोर्ट की है सो अगली सुनवाई की तिथि पर केस वहां स्थानांतरित किया जावेगा।

महिलाओं के लिए नकाब बाध्य नहीं: बांग्लादेश शीर्ष अदालत

बांग्लादेश की एक शीर्ष अदालत ने ने व्यवस्था दी है कि विद्यालयों और कालेजों में काम करने वाली महिलाओं को बुर्का पहनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बंगलादेश के हाई कोर्ट ने कल यह फैसला देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी महिला को बुर्का पहनने के लिए बाध्य करता है तो यह संविधान के अनुसार उस महिला के अधिकारों के उल्लंघन का मामला होगा ।

न्यायालय के अधिकारियों ने संवाददाताओं को बताया कि यह याचिका एक महिला अध्यापिका ने दायर की थी। इस अध्यापिका को एक शिक्षा अधिकारी ने इस बात के लिये डांटा था कि उसने बुर्का नहीं पहना था। मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने या सिर पर स्कार्फ बांधने का मामला अब तुर्की .इंडोनेशिया और यूरोपीय देश फ्रांस में राजनीतिक मुद्दा बन चुका है । बुर्के को प्राय रूढिवादिता का प्रतीक समझा जाता है।

Friday, April 9, 2010

हिंदी की जीत : दिल्ली की अदालत में बहस की अनुमति

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अंग्रेजी भाषा में बहस की अनिवार्यता को परे रखते हुए आज पहली बार एक वकील को हिन्दी भाषा में बहस करने की इजाजत दी !
न्यायमूर्ति रेखा शर्मा ने यह जानने के बाद कि अधिवक्ता दास गोनिन्दर सिंह संबंधित मामले को अपनी मातृभाषा में बेहतर बहस कर सकते हैं, उन्हें हिन्दी में ही बहस करने की इजाजत दे दी !   इतना ही नहीं उन्होंने श्री सिंह से उन्हीं की जुबान में सवाल भी किए !
हालांकि श्री सिंह ने याचिका अंग्रेजी में लिखी थी. लेकिन उसमें उन्होंने यह कहा था कि उनकी शिक्षा..दीक्षा शुरू से ही हिन्दी माध्यम से हुई है और यदि उन्हें हिन्दी में बहस की इजाजत दी जाती है तो वह अपनी बात अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी में ज्यादा बेहतर तरीके से रख सकेंगे !
जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने अपनी याचिका हिन्दी में ही क्यों नहीं दाखिल की तो उन्होंने कहा यदि मैं हिन्दी में याचिका दायर करता तो वह फाइलिंग काउंटर पर ही खारिज कर दी जाती1 उच्च न्यायालय में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल की अनुमति संबंधी याचिका पहले से ही लंबित है !   राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उच्च न्यायालयों में हिन्दी को आधिकारिक भाषा की मान्यता प्रदान कर दी गई है. लेकिन दिल्ली में अभी तक ऐसा नहीं हो सका है !
बाद में उन्होंने कहा कि अनेक वकील ऐसे हैं जिनकी अंग्रेजी अच्छी नहीं है. इसलिए उन्हें मुकदमे के लिए अंग्रेजी बोलने वाले वकील का सहयोग लेना पडता है और इसका अतिरिक्त बोझ वादियों..प्रतिवादियों को झेलना पडता है !

दिनाकरन को छुट्टी पर जाना ही होगा : मोइली

केंद्र सरकार ने संकेत दिया है कि महाभियोग के लिए जांच का सामना कर रहे कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरन को छुट्टी पर जाना होगा। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजिमय ने उन्हें छुट्टी पर जाने की सलाह दी थी।

केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने यहां गुरुवार को मीडिया से कहा, ‘कानून के हाथ किसी को भी पकड़ने के लिए पर्याप्त लंबे हैं। मुझे नहीं लगता कि जस्टिस दिनाकरन कानून से ऊपर या कानून की पहुंच से बाहर हैं।’

उल्लेखनीय है कि कर्नाटक हाईकोर्ट का काम प्रभावित होने की लगातार शिकायतों के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस दिनाकरन को छुट्टी पर जाने की सलाह दी थी। हालांकि कॉलेजियम के निर्देश के बाद वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने कहा था कि जस्टिस दिनाकरन इस निर्देश को मानने से इनकार भी कर सकते हैं।

Wednesday, April 7, 2010

सुप्रीम कोर्ट की प. बंगाल को चेतावनी

पश्चिम बंगाल को सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है। सार्वजनिक स्थानों पर पूजा स्थलों के अवैध निर्माण के मामले में राज्य सरकार ने अदालत में अगर तीन सप्ताह में हलफनामा दाखिल नहीं किया तो राज्य के मुख्य सचिव को अदालत में पेश होना पड़ेगा।

न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को ये निर्देश जारी किए। पश्चिम बंगाल इकलौता राज्य है, जिसने अब तक इस सिलसिले में उठाए जा रहे कदमों को लेकर वस्तुस्थिति रिपोर्ट अदालत में पेश नहीं की है। अदालत ने 16 फरवरी को सभी राज्यों को इस संबंध में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे।

इसमें राज्यों को बताना था कि उन्होंने अब तक सार्वजनिक स्थलों पर बने पूजा स्थलों को ढहाने या दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए क्या कदम उठाए हैं। साथ ही नए निर्माण रोकने के लिए क्या-कुछ किया।

अदालत के निर्देश के बाद सभी राज्यों ने हलफनामा दाखिल कर दिया लेकिन पश्चिम बंगाल ने ऐसा नहीं किया। राज्य सरकार की वकील ने इस सिलसिले में दलील दी कि पुराने निर्माण को ढहाने या रखने के संबंध में राज्य सरकार ने अब तक नीति तय नहीं की है। अत: हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय और दिया जाए। अदालत ने राज्य सरकार को मांगा हुआ समय तो दे दिया लेकिन साथ में चेतावनी भी दी कि अगर इस अवधि में हलफनामा नहीं दाखिल हुआ तो मुख्य सचिव को अदालत में पेश होना होगा। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 अप्रैल की तारीख तय की है।

इस मामले में अदालत की मदद कर रहे महाधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर पूजा स्थलों के नए निर्माण पर रोकने के कोर्ट के आदेश पर राज्यों ने कड़ाई से अमल किया है। लेकिन पुराने पूजा स्थलों को हटाने की नीति तैयार करने के मसले पर सभी राज्यों के हलफनामें अभी नहीं मिले हैं। सभी के हलफनामे मिलने के बाद वे उसका समग्र चार्ट तैयार करेंगे। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 7 दिसंबर 2009 को अपने अंतरिम आदेश में कहा था कि किसी भी सार्वजनिक स्थल पर पूजा स्थलों निर्माण अवैध माना जाएगा। अदालत ने सार्वजनिक स्थलों पर मौजूद इस तरह के सभी निर्माणों को ढहाने या उन्हें कहीं और ले जाने का भी निर्देश दिया था।

मीटर सील टूटी होना बिजली चोरी नहीं

फतेहाबाद जिला उपभोक्ता फोरम ने बिजली चोरी संबंधी एक मामले की सुनवाई करते हुए बिजली निगम को उपभोक्ता पर लगाए गए जुर्माने को रद्द करने के आदेश दिए हैं। साथ ही निगम पर 500 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। इस मामले में फोरम ने साफ कहा है कि बिजली मीटर की सील टूटी होना बिजली चोरी को साबित नहीं करता है। इसलिए निगम की यह कार्रवाई गलत है और उपभोक्ता से जुर्माना वसूल नहीं किया जाना चाहिए।

इस संबंध में फतेहाबाद की रतिया चुंगी निवासी बलजिंद्र सिंह ने दिसंबर 2009 को अपने वकील संतकुमार की मार्फत फोरम में याचिका दायर की थी, जिसमें उसने बताया था कि निगम ने 23 दिसंबर 2009 को उसे एक नोटिस भेजकर 20 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था। यह नोटिस उसी माह उसके संस्थान पर की गई चेकिंग के संदर्भ में था, जिसमें उस पर बिजली चोरी का आरोप लगाया गया था। निगम का कहना था कि चेकिंग के दौरान उसके बिजली मीटर की सीलें टूटी हुई थी, इसका मतलब वह बिजली मीटर से छेड़छाड़ कर बिजली चोरी कर रहा है। इस आधार पर उसे उक्त जुर्माना लगाया गया है। बाद में उपभोक्ता ने अपने वकील की मार्फत फोरम में याचिका दायर निगम के नोटिस को गलत करार दिया था। मामले की सुनवाई करते हुए उपभोक्ता को सही ठहराया।

राजस्थान में 58 हजार गैर कानूनी धार्मिक निर्माण

उच्चतम न्यायालय में मंगलवार को राजस्थान सरकार ने सार्वजनिक स्थलों पर अनाघिकृत धार्मिक निर्माण और भविष्य की नीति के मामले में शपथपत्र पेश किया। राजस्थान सरकार ने शपथपत्र में बताया कि राजस्थान के 33 जिलों में कुल 58 हजार 253 ऎसे अनाघिकृत निर्माण है। इनमें जयपुर नगर निगम के 3095 निर्माण शामिल नहीं है।

राज्य सरकार ने भविष्य में अनाघिकृत धार्मिक निर्माण नहीं हो इसके नियम बनाने के लिए मंत्रिमंडलीय उप समिति का गठन कर दिया है। समिति जो नियम बनाएगी, उसे बजट सत्र के बाद लागू किया जाएगा। सरकार ने शपथ पत्र में जानकारी दी है कि अजमेर में सबसे अघिक 9638 और भीलवाड़ा में सबसे कम एक निर्माण हैं। जोधपुर में 3889, उदयपुर में 116 और बंसवाड़ा में केवल 7 निर्माण हैं।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने 16 फरवरी को सभी राज्याें को निर्देश दिया था कि वे शपथ पत्र पर बताएं कि उनके राज्य में जिलेवार कितने सार्वजनिक स्थलाें पर अनाघिकृत धार्मिक निर्माण हैं और भविष्य में ऎसे निर्माण नहीं हो, इसके
लिए क्या नीति बनाई है। कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ब्यौरा पेश नहीं किए जाने पर नाराजगी व्यक्त की।

साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि तीन सप्ताह में शपथ पत्र पर ब्यौरा पेश करे अन्यथा अगली सुनवाई 28 अपे्रल को मुख्य सचिव व्यक्तिगत रूप से हाजिर हो।

Tuesday, April 6, 2010

सरकार अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार नहीं कर सकती

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक अहम फैसला दिया है कि सरकार अभियोजन की मंजूरी देने से इनकार नहीं कर सकती। यह फैसला सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार को कम करने में बड़ा मददगार साबित हो सकता है। भ्रष्टाचार या किसी भी तरह के अन्य अपराध को रोकने के लिए अन्य तरीकों के साथ ही यह भी अत्यधिक आवश्यक होता है कि इसमें लिप्त व्यक्ति को उसके किए की सजा मिले और व्यक्ति को दंड मिले। इसके लिए जरूरी है कि मामला न्यायालय में पहुंचे, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में यह सामान्य-सा है कि अनेक मामले सिर्फ इसलिए न्यायालय की दहलीज तक ही नहीं पहुंच पाते है कि संबद्ध सरकारें अपने कर्मचारियों-अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति ही नहीं देती है। इससे एक ओर भ्रष्ट कर्मचारी-अधिकारियों का हौसला बढ़ता है, वहीं न्याय की आस करने वाले ईमानदार व्यक्तियों व प्रवर्तन एजेंसियों का विश्वास डिगता है।

पूरी स्थिति जो मकड़ी के मजबूत जाले से फैल चुके भ्रष्टाचार को और पोषित करने का काम करती है। प्रवर्तन एजेंसियां कानूनी एजेंसियां है। उन्हें किसी कर्मचारी-अधिकारी की धरपकड़, उसके खिलाफ मामला दर्ज करने का अधिकार इसी नाते हैं कि वे कानून से भलीभांति वाकिफ होती है व इसकी ऊंच-नीच को अच्छी तरह समझती हैं। वे भी किसी के खिलाफ अभियोजन चलाने का निर्णय करने से पहले मामले को हर तरह से परखती है और इसके बाद भी उनके निर्णय में कोई कमी होती है तो न्यायालय उनकी राह में होते है।

वे मामले को अभियोजन योग्य न मानकर उसे खारिज कर देते है। न्यायालय से पहले सरकार के स्तर पर अभियोजन के बारे में निर्णय करना इसलिए गैर जरूरी भी है कि न्यायालय के स्तर पर तो फैसला होगा ही। तब सरकार के पास मामले को रखकर इसके निर्णय तक पहुंचने की समयावधि को क्यों बढ़ाया जाए? साथ ही यह भी कि न्यायालय के स्तर पर निर्णय विशुद्ध परिस्थितियों व साक्ष्य के आधार पर होता है, जबकि सरकार के स्तर पर कई तरह के दबाव की आशंका निरंतर बनी रहती है। चूंकि संदर्भित फैसला मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने दिया है, इसलिए राज्य के हालात का जिक्र करना अप्रासंगिक न होगा। प्रदेश में लोकायुक्त, राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और अन्य एजेंसियों से जुड़े न सिर्फ ऎसे उदाहरण विद्यमान है, जिनमें राज्य सरकार ने अभियोजन चलाने की अनुमति नहीं दी है, बल्कि ऎसे भी मामले है, जिन अनुमति का निर्णय करने में ही सालों लगा दिए गए और अब भी ऎसे कई प्रकरण सरकार के पास अभियोजन की अनुशंसा के लिए लंबित पड़े है। यह पहलू इस दृष्टि से गंभीर है कि इस संबंध में अपनी अदालतें पहले ही व्यवस्था दे चुकी है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 1997 और वर्ष 2005 में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने ही व्यवस्था दी कि अनुशंसा के लिए मामला आने के बाद अधिकतम तीन (आपात परिस्थितियों में चार) माह में सरकार को फैसला करना जरूरी है। साफ तौर पर प्रदेश में इसका पूरी तरह से पालन नहीं हो रहा है। राज्य सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि न्याय व इसके प्रति विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायिक क्षेत्र के फैसलों को सही रूप व समय सीमा में लागू करवाना जरूरी है।

शोएब-आयशा प्रकरण के बहाने सुप्रीम कोर्ट में ठहाके

पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक और हैदराबादी बाला आयशा सिद्दीकी की कथित शादी का मामला अभी अदालत के बाहर ही है, लेकिन इस पर अदालत में चर्चा शुरू हो गई है। वह भी देश की सर्वोच्च अदालत में। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान जज ने परोक्ष तौर पर शोएब-सानिया प्रकरण का जिक्र किया।

पश्चिम बंगाल के बिकास चंद्र सोम ने एक महिला से शादी को नकारते हुए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर की थी। महिला माला सोम का दावा है कि वह बिकास की पत्‍‌नी है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने बिकास को कहा है कि वह माला को हर महीने दो हजार रुपये गुजारे के लिए दे। उसने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी। अदालत ने अर्जी पर सुनवाई से इन्कार करते हुए कहा कि आजकल शादी कर लेते हैं और बाद में कहते हैं कि हमने नहीं किया। तीन दिन से हम टीवी पर यही देख रहे हैं। जज मार्कंडेय काटजू और ए.के. पटनायक की पीठ की इस टिप्पणी पर पूरा इजलास ठहाकों से गूंज गया।

मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा कानून के उल्लंघन पर रोक

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून के उल्लंघन के मामले में राजधानी की एक छात्रा के फेल होने पर स्कूल से निष्कासन पर रोक लगा दी है और उसकी पढाई जारी रखने का निर्देश जारी किया है।
न्यायमूर्ति कै लाश गंभीर ने आज इस मामले की सुनवाई करते हुए यह स्थगनादेश जारी किया है। गौरतलब है कि दिल्ली के राजनिवास इलाके में स्थित सेंट जेबियर सीनियर सेकेंडरी स्कूल ने छठी कक्षा की छात्रा सुमन भाटी को फेल होने पर स्कूल से निकाल दिया था। सुश्री भाटी के पिता नरेश भाटी ने दिल्ली उच्च न्यायालय में शनिवार को एक याचिका दाखिल कर अदालत से इस मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगायी थी। उनकी दलील थी कि स्कूल का यह निर्णय एक अप्रैल से देश में लागू हुए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून का सरासर उल्लंघन है।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने एक अप्रैल को इस कानून के कारगर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने की राज्यों से अपील की थी। लेकिन इसके तीन दिन के भीतर ही अदालत के सामने यह मामला सामने लाया गया कि देश की राजधानी दिल्ली में इस कानून का सरासर उल्लंघन कर एक छात्रा को शिक्षा के अधिकार से वंचित किया गया। श्री भाटी के वकील अशोक अग्रवाल ने बताया कि न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर ने सुमन भाटी के फेल होन पर सेंट जेबियर स्कूल से निकाले जाने के फैसले पर रोक लगा दी है और स्कूल प्रशान को निर्देश दिया है कि वह उस छात्रा को कल से स्कूल में पढाई जारी रहने दे। श्री नरेश भाटी ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि स्कूल का फैसला संविधान की धारा 226 तथा मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 एवं संविधान के अनुच्छेद 38 21 एवं 21..ए एवं दिल्ली स्कूल शिक्षा कानून का उल्लंघन है। श्री अग्रवाल ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब सरकार लडकियों को आगे बढाने. उन्हें स्कूल में प्रोत्साहित करने की नीति और कानून बना रही है. एक स्कूल छठी कक्षा की छात्रो को स्कूल से बाहर कर उसके भविष्य तथा करियर को बिगाडने में लगा है।

दिनाकरन नहीं मानेंगे सु्प्रीम कोर्ट की 'सलाह'

भ्रष्टाचार और जमीन हड़पने के आरोप में महाभियोग का सामना कर रहे कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनकरन ने सुप्रीम कोर्ट कोलीजियम की सलाह ठुकरा दी है। कोलीजियम ने उन्हें अवकाश पर जाने की सलाह दी थी। लेकिन, वह सामान्य दिनों की तरह सोमवार को भी प्रशासनिक काम करते दिखे। उन्होंने छुट्टी पर जाने का कोई संकेत भी नहीं दिया है।

इससे विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है। वह हाई कोर्ट में बतौर मुख्य न्यायाधीश काम कर रहे हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली कोलीजियम दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मदन बी. लोकुर को कर्नाटक भेज रही है। वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने इस बाबत कहा, दिनकरन कोलीजियम की सलाह मानने से इन्कार कर सकते हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तभी प्रभार ले सकते हैं जब दिनकरन अवकाश पर जाएं।

59 वर्षीय दिनकरन हालांकि गत वर्ष दिसंबर से ही न्यायिक मामलों की सुनवाई नहीं कर रहे हैं। राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने पिछले साल दिसंबर में दिनकरन के खिलाफ भ्रष्टाचार, जमीन कब्जाने और न्यायिक पद के दुरुपयोग के आरोप में महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी तरक्की पहले ही रोक दी थी। महाभियोग में उनके खिलाफ लगाए गए आरोप में आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति रखने का भी आरोप है। इसके अलावा उन पर पत्‍‌नी और दो बेटियों के नाम से गलत ढंग से आवास बोर्ड के पांच भूखंड लेने के आरोप हैं। दिनकरन ने हालांकि सभी आरोपों का खंडन किया है। उनका दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में उनकी प्रोन्नति रोकने के लिए ही उन पर ये आरोप लगाए गए।

जोधपुर डेयरीकर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष करने पर रोक

जोधपुर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने डेयरी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 58 वर्ष से बढ़ा कर 60 वर्ष करने पर रोक लगा दी है। यह रोक मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला व न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी की खंडपीठ ने सोमवार को पश्चिमी राजस्थान दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ की ओर से दायर अपील पर लगाई है।

अपीलार्थी की ओर से अधिवक्ता राजेश जोशी ने एकल पीठ द्वारा 25 फरवरी 2010 को पारित निर्णय को चुनौती देते हुए कहा कि पश्चिमी राजस्थान दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ राजस्थान को-ऑपरेटिव डेयरी फैडरेशन (आरसीडीएफ) से पृथक एक रजिस्टर्ड सहकारी संस्था है।

ऐसे में आरसीडीएफ के महाप्रबंधक द्वारा पारित सेवानिवृत्ति संबंधी प्रस्ताव उस पर बाध्यकारी नहीं हैं। अपील में यह भी कहा गया कि आरसीडीएफ का सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने से संबंधित प्रस्ताव सिर्फ ड्राफ्टेड ही था। साथ ही जोधपुर जिला दुग्ध उत्पादक कर्मचारी रेगुलेशन के नियम 19 के तहत सेवानिवृत्ति आयु 58 वर्ष ही है। इन नियमों में बिना संशोधन किए सेवा निवृत्ति आयु बढ़ाना नियम विरुद्ध है।

Monday, April 5, 2010

दिल्ली सरकार पड़ोसियों के झगड़े तीन महिने में सुलझाएगी

अगर पड़ोसी सताए या फिर कोई चेक बाउंस हो जाए तो कोर्ट या थाने के चक्कर काटने की बजाए सीधे दिल्ली सरकार के पास जाएं। दिल्ली सरकार पड़ोसियों के झगड़े सुलझाएगी। न केवल छोटे-मोटे झगड़े बल्कि संपत्ति विवाद, वित्तीय लेन-देन यहां तक कि दंपती विवाद भी उठाए जा सकेंगे।  सरकार का दावा है कि उनकी अदालत में उठाए गए प्रत्येक मामले को महज 3 दिन से 3 माह के बीच सुलझा लिया जाएगा। सरकार के समक्ष आपको अपने मामले की पैरवी करनी होगी। पैरवी पर आने वाला सारा खर्च मुकदमे का फैसला आने के बाद देना होगा। दरअसल सरकार दिल्ली में डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन सोसायटी नामक मंच का गठन करने जा रही है।


सोसायटी का काम दिल्लीवासियों का आपसी विवाद सुलझाना होगा। दिल्ली के मुख्य सचिव व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राकेश मेहता सोयायटी के चेयरमैन हैं। दिल्ली के सभी १क् जिलों में इस प्रकार की एक-एक सोसायटी गठित की जाएगी। जिसमें स्थानीय अधिकारी, अदालत से जुड़े विशेषज्ञ व स्थानीय नुमांइदे शामिल होंगे।

सभी  सोसायटियों के चेयरमैन मुख्यसचिव ही रहेंगे। मुख्यसचिव राकेश मेहता के मुताबिक दिल्ली की अदालतों पर बढ़ते दबाव व दीवानी विवादों के जल्द निपटारे के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है। मेहता ने बताया कि सोसायटी का पहला कार्यालय सबसे पहले पड़पड़गंज इलाके में शुरू होना है। इसके बाद जल्द ही दिल्ली के शेष क्षेत्रों में भी शुरुआत की जाएगी।

मंच की खासियत यह भी है कि यहां केवल दीवानी मामले ही उठाए जा सकते है। झगड़ा, चोरी, हत्या, बलात्कार, छेड़छाड़ या फिर किसी भी प्रकार का कोई अन्य फौजदारी मामला यहां नहीं सुना जाएगा। फौजदारी मामलों के लिए पीड़ित व्यक्ति को पहले की ही तरह पुलिस स्टेशन और फिर कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।


छह लाख दीवानी मामले हैं लंबित


दिल्ली में दीवानी मामलों की भी भरमार है। एक सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट में इस समय 6 लाख दीवानी मामले लंबित हैं। इनमें कई तो ऐसे हैं, जिनमें कोई व्यक्ति अपने पड़ोसी के कुत्ते से परेशान है तो किसी ने पड़ोसी के पेड़ पौधों की शिकायत की है। इस प्रकार के सभी मामले सरकार द्वारा गठित इस सोसायटी में उठाए जा सकेंगें। नव दंपतियों से जुड़े मामलों के लिए भी यहां विशेषज्ञ मौजूद होंगे। विशेषज्ञ विवाह के उपरांत ससुराल वालों या फिर पति-पत्नी के बीच उत्पन्न मतभेदों को दूर करने का प्रयास करेंगे।

अब ईमेल अकाउंट्स की भी वसीयत

ईमेल और उनमें सेव इन्फर्मेशन की अहमियत कितनी बढ़ती जा रही है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब लोग इनकी वसीयत भी करने लगे हैं। दिल्ली में एक शख्स ने अपने ईमेल अकाउंट्स और उनमें दर्ज डिजिटल सीक्रेट्स की वसीयत अपने बेटों के नाम कर दी है। राजधानी में शायद यह अपनी तरह का पहला मामला है।

उसकी डिजिटल विल के मुताबिक, जब यह वसीयत करने वाला इस दुनिया में नहीं रहेगा, तब उसके बेटे को एक पासवर्ड दिया जाएगा। जिसकी मदद से वह उसके इनबॉक्स में प्राइवेट ईमेल्स, पर्सनल फोटो, एल्बम्स, डॉक्युमेंट्स, विडियो क्लिप्स को एक्सेस कर सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट के ऐडवोकेट और साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने बताया कि यह वसीयत एक बिजनेसमैन ने की है, जिसका पेंट्स का कारोबार है। उसके कई ईमेल अकाउंट्स हैं। उसने हर अकाउंट के लिए नॉमिनी तय किए हैं।
 
दुग्गल के मुताबिक, एक अकाउंट में उसके आर्टिस्टिक वर्क हैं। दूसरे में ऑडियो रिकॉर्डिंग्स का कलेक्शन और तीसरे में ऑटो बायोग्रफी है। एक अन्य ईमेल अकाउंट में उसके कई राज हैं। वह नहीं चाहता कि ये चीजें उसकी मौत के साथ ही दफन हो जाएं, इसीलिए उसने अपने एक बेटे के नाम इसकी वसीयत कर दी है। उसे विश्वास है कि वह इनका दुरुपयोग नहीं करेगा। दुग्गल ने बताया कि डिजिटल विल का कंसेप्ट नया है।

विदेश में एक व्यक्ति ने अपने ईमेल अकाउंट्स की वसीयत अपनी बहन के नाम की है। उसकी इच्छा है कि बहन एक ब्लॉग बनाकर उसके अकाउंट्स में दर्ज जानकारियों को ऑनलाइन कर दे।

राजस्थान राज्य के पहले न्यायिक सेवा केंद्र का शुभारंभ

राजस्थान राज्य के पहले न्यायिक सेवा केंद्र का शुभारंभ शनिवार को यहां के जिला न्यायालय परिसर में हुआ। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश व राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष केएस राठौड़ ने इसका विधिवत उद्घाटन किया। न्यायिक सेवा केंद्र की स्थापना से अब अधीनस्थ अदालतों में लंबित दीवानी मुकदमों के स्टेटस की जानकारी शीघ्र मिल सकेगी। इसके लिए केंद्र में पांच कम्प्यूटर लगाए गए हैं जहां से वकील व पक्षकार निशुल्क जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

राज्य में इस तरह का यह पहला सूचना केंद्र है। इसमें मुकदमा संख्या, पक्षकारों या वकीलों के नाम से केस का स्टेटस सर्च किया जा सकेगा। उद्घाटन समारोह में न्यायाधीश राठौड़ ने कहा कि न्यायिक क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी का विकास हो रहा है। राज्य में सबसे पहले जोधपुर में ही अदालतों को कम्प्यूटरीकृत किया गया था।

वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए आपराधिक मामलों की सुनवाई करने से सरकारी खर्च में कटौती हुई। साथ ही पेशी पर कोर्ट में लाते समय मुलजिमों के भागने की घटनाओं में कमी आई है। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों व वकीलों को कम्प्यूटर विज्ञान व तकनीक सीखने की हिदायत देते हुए कहा कि इससे हाईटेक न्यायिक प्रणाली को विकसित करने में मदद मिलेगी। न्यायाधीश राठौड़ ने कहा कि आने वाले समय में दिल्ली की तर्ज पर यहां भी ई-कोर्ट की स्थापना होगी। इससे धीरे-धीरे संपूर्ण न्यायिक प्रणाली को पेपरलेस किया जा सकेगा।

जिला एवं सेशन न्यायाधीश के.एस. भटनागर ने सेवा केंद्र के बारे में जानकारी दी। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश डी.पी. शर्मा ने आभार व्यक्त किया। न्यायिक मजिस्ट्रेट निहालचंद जैन ने कार्यक्रम का संचालन किया।

महंगाई के दौर में हर दिन कम से कम सौ रुपए पत्नी का हक-मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि महंगाई के दौर में पत्नी को गुजर बसर के लिए हर दिन कम से कम सौ रुपए चाहिए होते हैं। ऐसे में हर माह के भरण पोषण के लिए पति द्वारा पत्नी को तीन हजार रुपए अदा करना एकदम उचित है।

इस मत के साथ जस्टिस आरएस गर्ग और जस्टिस केएस चौहान की युगलपीठ ने याचिकाकर्ता पति को कहा है कि वह पत्नी द्वारा दिए गए आवेदन की तारीख से अब तक के भरण-पोषण की राशि 20 अप्रैल तक जमा कराए। साथ ही हर माह की दस तारीख तक वह पत्नी को गुजर-बसर की राशि कोर्ट के जरिए प्रदान करे।

प्रकरण के अनुसार कटनी के उमेश चंद्र का विवाह वर्ष 1991 में नरसिंहपुर में रहने वाली वंदना के साथ हुआ था। विवाह के बाद वंदना ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। वर्ष 2001 में हुए विवाद के बाद से उमेश के साथ उसका पुत्र और वंदना अपने मायके में अपनी पुत्री को लेकर रह रही है।

उमेश का कहना है कि उसके काफी प्रयासों के बाद भी वंदना उसके साथ नहीं रह रही, बल्कि मार्च 2009 में सीजेएम की कोर्ट में भरण पोषण के लिए अर्जी दायर की। इस अर्जी पर सीजेएम ने वंदना को हर माह पांच सौ रुपए देने कहा। बाद में जिला न्यायालय ने यह कहते हुए भरण-पोषण देने का आदेश निरस्त कर दिया कि वंदना बिना किसी कारण के अलग रह रही, इसलिए वह इस राशि को पाने की हकदार नहीं है। इसके बाद यह मामला हाईकोर्ट में दायर किया गया।


इस मामले पर हुई सुनवाई के दौरान वंदना की ओर से अधिवक्ता जेए शाह ने युगलपीठ को बताया कि उमेश को हर माह करीब साढ़े 11 हजार रुपए पगार के रूप में मिल रहे हैं, ऐसे में उनकी मुवक्किल को इतनी राशि मिलना ही चाहिए, जिससे वह अपना और अपनी बच्ची का गुजर-बसर कर सके।


उमेश की ओर से दलील दी गई कि उसे हर माह सिर्फ साढ़े 9 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है। इतनी कम राशि में उसे अपने पुत्र और वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना पड़ती है ऐसे में उमेश को मात्र दो हजार रुपए हर माह वंदना को देने के निर्देश दिए जाएं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद युगलपीठ ने महंगाई के दौर को देखते हुए वंदना को हर माह तीन हजार रुपए देने के आदेश उमेश को दिए। मामले का निराकरण करते हुए युगलपीठ ने इसके अलावा चार हजार रुपए की राशि वाद व्यय के रूप में वंदना को देने के आदेश भी उमेश को दिए।

हाईकोर्ट: पहली बार हुई नियमित केस की संडे को सुनवाई

आप केस की सुनवाई जल्दी चाहते हैं तो जज से संडे के दिन सुनवाई का आग्रह भी किया जा सकता है। जज और वकील दोनों तैयार हों तो फिर ये काम नामुमकिन नहीं। ऐसी ही एक मिसाल पेश करते हुए रविवार के दिन पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। हाईकोर्ट के इतिहास में यह दिन जस्टिस के कन्नन की तरफ से संडे को कोर्ट लगाकर सुनवाई करने के लिए जाना जाएगा। इससे पहले शनिवार को अवकाश के दिन हाईकोर्ट ने कई अहम केसों पर सुनवाई तो की है लेकिन रविवार को सुने जाने वाले केसों में यह पहला मामला रहेगा। 

Saturday, April 3, 2010

शादी से जुड़े मामले में एफआईआर के लिए सबूत जरूरी नहीं : उच्चतम न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि दूसरी शादी से जुड़े मामले में आपराधिक शिकायत दर्ज कराने के दौरान असंतुष्ट पक्ष के लिए यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि विवाह की रस्म पूरी की गई है क्योंकि आरोप की सत्यता पर फैसला करना अदालत का काम है। न्यायालय ने कहा कि आपराधिक मामलों में अदालतें आरोप पत्र को अभियुक्त की सिर्फ इस दलील के आधार पर निरस्त नहीं कर सकतीं कि आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘इस बात को ध्यान में रखने की जरूरत है कि आरोप पत्र को निरस्त करने के दौरान प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों और जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्रियों पर विचार किए जाने की आवश्यकता है।’’ न्यायमूर्ति डीके जैन और न्यायमूर्ति सी के प्रसाद की पीठ ने अपने फैसले में कहा, ‘‘सच्चाई या आरोपों के बारे में अन्य बातों पर इस चरण में गौर करना सही नहीं है क्योंकि यह हमेशा मुकदमे का मामला है। विवाह की आवश्यक रस्मों का आयोजन किया गया अथवा नहीं यह मुकदमे की सुनवाई का मामला है।’’

शीर्ष अदालत ने यह फैसला के नीलावाणी नाम की एक महिला की अपील को बरकरार रखने के दौरान दिया। उसने मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसके तहत अदालत ने उसके पति एस के शिवकुमार के खिलाफ आईपीसी की धारा 406 (विश्वास हनन) और धारा 494 (दूसरी शादी) के तहत दायर आरोप पत्र को निरस्त कर दिया था। नीलावाणी के अनुसार उनकी शादी के बरकरार रहने के दौरान ही कुमार ने भारती नाम की दूसरी महिला से शादी की और उसके बच्चे के पिता बने।

उच्च न्यायालयों में 265 न्यायाधीशों की कमी

देश भर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में लगभग 265 न्यायाधीशों की कमी है और इसके चलते लंबित मुकदमों की संख्या 38 लाख से ज्यादा हो गई है। विधि मंत्रालय के पास मौजूद ताजा आंकडों के अनुसार देश के 21 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 895 है। महज 630 न्यायाधीश विभिन्न मामलों की सुनवाई कर रहे है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कामकाज काफी बुरी तरह प्रभावित है। यहां न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 160 है, जबकि 83 न्यायाधीशों की है। इस उच्च न्यायालय में स्थाई न्यायाधीशों के 30 ओर अतिरिक्त न्यायाधीशों के 53 पद रिक्त है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के 21-21 पद रिक्त है। कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 58 और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में इन पदों की स्वीकृत संख्या 68 है। गुजरात उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत पद 42 है जहां 24 न्यायाधीश ही है। शेष 18 पद रिक्त है। दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत पद 48 है। यहां तीन न्यायाधीशों की कमी है। सिçक्कम उच्च न्यायालय में स्वीकृति पदों की संख्या तीन है और एक पद रिक्त है। उच्तम न्यायालय की वेबसाइट के अनुसार, विभिन्न उच्च न्यायालयों में 38,74, 090 दीवानी और आपराधिक मुकदमें लंबित हैं।

Friday, April 2, 2010

एसएमएस से जान सकेंगे मुकदमे की स्थिति

राजस्थान उच्च न्यायालय भवन में किस कार्य दिवस पर कौन से कोर्ट रूम में कौन सा मुकदमा चल रहा है, इस आशय की जानकारी अब मोबाइल पर एसएमएस से मालूम की जा सकेगी। इसके लिए सॉफ्टवेयर तैयार कर लिया गया है। अगले सप्ताह तक इस तरह की जानकारी ऑन लाइन मिलने लगेगी।

राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मिलाप चंद भूत ने गुरुवार को हाईकोर्ट परिसर स्थित एमएम पारख लाइब्रेरी में संवाददाताओं को बताया कि अब हाईकोर्ट में सभी कोर्ट रूम के बाहर इलेक्ट्रोनिक डिस्प्ले लग गए हैं जिन्हें देख कर यह पता चल सकता है कि उस कोर्ट रूम में कौन सा मुकदमा चल रहा है।

अन्य कोर्ट रूम में जारी मुकदमों की जानकारी भी डिस्प्ले के माध्यम से पता चल सकती है। इससे वकीलों को कर्मचारियों से पूछताछ नहीं करनी पड़ेगी। उनका समय भी बचेगा। जिला न्यायालय में केन्द्रीय सूचना कक्ष तैयार किया गया है जो इस सप्ताह के अंत तक कार्य शुरू कर देगा।

130 लड़कियों के कातिल को सजा-ए-मौत

अमेरिका के रहने वाले रोडने एलकाला ने सिर्फ मजे के लिए 130 लड़कियों को मौत के घाट उतार दिया। हत्या करने से पहले वो इन लड़कियों के साथ बलात्कार भी करता। उसकी शिकार लड़कियों में से कई तो स्कूली लड़कियां भी थीं। 1979 से जेल में बंद इस शख्स को अब जाकर मौत की सजा सुनाई गई। लेकिन जब इसे सजा सुनाई जा रही थी, उस वक्त भी ये कातिल हंस रहा था। उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी।


66 साल का फोटोग्राफर रोडने एलकाला अमेरिका का सबसे खतरनाक सीरियल किलर। ये 1979 से जेल में बंद है। अब 31 सालों बाद अदालत ने इसे सजा-ए-मौत सुनाई है। इसने ऐसे घिनौने अपराधों को अंजाम दिया है जिसके लिए मौत की सजा भी कम ही लगेगी। 4 औरतों और 12 साल की एक लड़की की हत्या के आरोप में अदालत ने इसे मौत की सजा सुनाई।


रोडने को जहरीला इंजेक्शन लगाकर मौत के घाट उतार दिया जाएगा। पुलिस को शक है कि रोडने अब तक करीब 130 लड़कियों और औरतों की हत्या कर चुका है। पुलिस को रोडने के घर से इन लड़कियों की तस्वीरें मिलीं। ये सभी कई साल से लापता हैं।

जांचकर्ताओं के मुताबिक रोडने एक साइको किलर था। जिस लड़की को उसे अपना शिकार बनाना होता था, वो उसे फोटो खिंचवाने और मॉडल बनाने का लालच देता था। बाद में जब वो लड़की उसके पास आती, तो रोडने उसका गला दबाता। जब लड़की बेहोश होने लगती, तो वो उसे छोड़ देता। जब लड़की दोबारा पूरी तरह से होश में आ जाती, तो ये हत्यारा फिर से उसका गला दबाता और इसी तरह से तड़पा तड़पा कर हत्या कर देता।

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक रोडने को इस तरह से लड़कियों को तड़पते देखने में बेहद मजा आता था। मनोवैज्ञानिकों ने इस कातिल को जीनियस माना और इसका IQ लेवल 160 माना गया। रोडने अमेरिका के मशहूर टीवी रियलिटी शो THE BLIND DATE का विनर भी रह चुका है। लेकिन इस गेम शो में जिस लड़की ने रोडने को डेट पर जाने के लिए चुना, उसने बाद में अपनी ये डेट कैंसिल कर दी। उसके मुताबिक जब उसने रोडने से बात की तो वो बेहद डरावना और अजीब सा लगा।

रोडने के लॉकर से कई लड़कियों की न्यूड तस्वीरें भी बरामद हुईं। उसके शिकारों में स्कूली लड़कियों से लेकर 40 साल तक की महिलाएं शामिल हैं। ये सभी फोटोग्राफ 1977 से 1979 के बीच खींचे गए। रोडने ने कई महिलाओं की तस्वीरें उनकी हत्या करने के बाद खींची। पुलिस के मुताबिक उसने न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, लास एंजिल्स के साथ-साथ अमेरिका से बाहर की भी कई औरतों को अपना निशाना बनाया।

ट्रायल के दौरान रोडने हंसता और खिलखिलाता रहा। साथ ही अपने वकील से बातें भी करता रहा। अपने इन अपराधों के लिए 1979 से जेल में बंद कातिल रोडने को 30 सालों बाद अपने किए की सजा मिली।