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Tuesday, February 23, 2010

माया की मूर्तियां लगाना चुनाव चिह्न संहिता का उल्लंघन है या नहीं, चुनाव आयोग तीन महीने के अंदर फैसला करें- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से बसपा के चुनाव चिह्न (हाथी) का दुरूपयोग किए जाने संबंधी शिकायतों पर तीन महीने के अंदर फैसला करने को कहा है।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थलों पर मुख्यमंत्री मायावती व हाथी की मूर्तियां लगाए जाने का विरोध करने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आयोग से यह अनुरोध किया। मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा व न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने वकील रविकांत की याचिका पर सुनवाई तीन महीने के लिए टाल दी।
इससे पहले रविकांत ने कहा कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग ने अभी तक याचिका पर अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। चुनाव आयोग की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि आयोग को ऐसी ही शिकायतों के कुछ और ज्ञापन मिले हैं। इसीलिए अभी तक जवाब नहीं दाखिल किया है। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए आयोग ने निर्णय किया है कि कोर्ट के रूख के मुताबिक ही काम करेगा। इस पर पीठ ने कहा कि आयोग तो स्वयं एक संवैधानिक संस्था है, वह ज्ञापनों पर निर्णय ले सकता है।
बसपा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश चंद्र मिश्रा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद चुनाव आयोग में शिकायत की गई है। बसपा चुनाव आयोग को अपना जवाब दे चुकी है। उन्होंने कहा कि हाथी की मूर्तियां चुनाव चिह्न नहीं हैं। वे हाथी स्वागत मुद्रा में हैं। राष्ट्रपति भवन से लेकर अक्षरधाम मंदिर तक में हाथियों की मूर्तियां लगी हैं तो क्या सब बसपा के चुनाव चिह्न मान लिए जाएंगे?
उत्तर प्रदेश सरकार की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने भी यही रूख अपनाते हुए कहा कि एक मामले में दो जगह सुनवाई नहीं हो सकती। कोर्ट इस याचिका को निपटा दे और चुनाव आयोग को फैसला करने दे। उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक स्थलों पर मुख्यमंत्री की मूर्तियों को विरोध करते हुए रविकांत ने कहा कि सरकार ने हजारों करोड़ रूपये इस निर्माण में बर्बाद कर दिए हैं। यह महत्वपूर्ण मुद्दा है और कोर्ट को इस पर सुनवाई करनी चाहिए।
सतीश मिश्रा ने आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि करीब 450 योजनाएं कांग्रेस के नेताओं के नाम चल रही हैं। राजघाट पर महात्मा गांधी और अन्य नेताओं की समाधि पर खर्च हुआ। तीन मूर्ति भवन पर खर्च हुआ। इन सबका किसी ने कभी विरोध नहीं किया। रविकांत ने कहा कि उन्हें दलित नेताओं के स्मारकों पर कोई आपत्ति नहीं है। आपत्ति सिर्फ मुख्यमंत्री और बसपा के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों को लेकर है। उन्होंने ये मूर्तियां हटाए जाने और उन्हें लगाने पर हुआ खर्च बसपा से वसूले जाने की मांग की।

1 टिप्पणियाँ:

dr.aalok dayaram said...

तरक्कीकी दोड में पिछड राज्य उत्तर प्रदेश की विकास योजनाओं में अपेक्छ्त राज्य के नाकाफ़ी संसाधनों का माया की मूर्तियों लगवाने में बेलगाम उपयोग करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी से माया की तुलना भी बेमानी है। मेरा तो मानना है कि माया की मूर्तियों को हटाकर इन पर किया गया खर्च वसूला जाकर यू.पी के विकास में लगाया जाना समुचित न्याय होगा।