उच्चतम न्यायालय ने अपने एक अहम फ़ैसले में व्यवस्था दी है कि किसी भी मामले में तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही अग्रिम जमानत के आवेदन पर निर्णय लिया जाना चाहिए क्योंकि इससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल जुड़ा है जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. न्यायमूर्ति तरुण चटर्जी और न्यायमूर्ति सुरिंदर सिंह निज्जर की खंडपीठ ने धोखाधड़ी से जुडे एक मामले में अग्रिम जमानत मंजूर करते हुए यह व्यवस्था दी. खंडपीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार नहीं कर बहुत बड़ी कानूनी भूल की है. उच्च न्यायालय को तथ्यों और परिस्थितियों की जांच में अपने विवेक के इस्तेमाल की जरत थी. यदि उसे उपयुक्त जान पड़ता तो वह जमानत मंजूर करता. खंडपीठ ने कहा कि यह स्पष्ट व्यवस्था है कि जबतक आवेदनकर्ता गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक कभी भी उसे अग्रिम जमानत मंजूर की जा सकती है. उल्लेखनीय है कि आवेदनकर्ता रबीना सक्सेना ने अग्रिम जमानत के लिए तीन बार राजस्थान उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन तीनों बार उसे नामंजूर कर दिया गया. श्री सक्सेना के अनुसार संबंधित विवाद दीवानी प्रकृति का है और शिकायतकर्ता अवकाश प्राप्त पुलिस अधिकारी के बेटे ने दीवानी मामले वापस लेने के वास्ते उस पर दवाब बनाने के लिए उसके खिलाफ़ झूठे मामले दर्ज किए हैं.
Tuesday, December 29, 2009
Wednesday, December 23, 2009
चार्जशीट के आधार पर अग्रिम जमानत से इनकार नहीं-सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल पुलिस के आरोपपत्र में किसी व्यक्ति को आरोपित किए जाने के आधार पर अदालत उसे अग्रिम जमानत देने से इनकार नहीं कर सकती। न्यायाधीश तरूण चटर्जी और न्यायाधीश सुरिंदर सिंह की खण्डपीठ ने जयपुर के रविन्द्र सक्सेना के मामले में यह फैसला सुनाया।
सक्सेना पर प्रोपर्टी डीलर करण सिंह ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2007 में अनुबन्ध पर हस्ताक्षर करने के बाद भी उन्हें फ्लैट नहीं बेचा गया था। सिंह ने सक्सेना के पिता और मां के खिलाफ भी धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। जयपुर की एक अदालत ने एक बार व राजस्थान हाईकोर्ट ने दो बार सक्सेना की जमानत याचिका को खारिज कर दिया था।
राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने पर खण्डपीठ ने कहा कि हमारे विचार से हाईकोर्ट ने कानून के अनुसार बड़ी गलती की है। न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों को नहीं समझा। हाईकोर्ट को परिस्थितियों और तथ्यों की जांच कर विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने अंतत: सक्सेना को 15 दिसम्बर को जमानत दे दी। जमानत सन्बन्धी फैसला शनिवार शाम जारी किया गया था। खंडपीठ ने फैसला अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत सुनाया।
सक्सेना पर प्रोपर्टी डीलर करण सिंह ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2007 में अनुबन्ध पर हस्ताक्षर करने के बाद भी उन्हें फ्लैट नहीं बेचा गया था। सिंह ने सक्सेना के पिता और मां के खिलाफ भी धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। जयपुर की एक अदालत ने एक बार व राजस्थान हाईकोर्ट ने दो बार सक्सेना की जमानत याचिका को खारिज कर दिया था।
राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने पर खण्डपीठ ने कहा कि हमारे विचार से हाईकोर्ट ने कानून के अनुसार बड़ी गलती की है। न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों को नहीं समझा। हाईकोर्ट को परिस्थितियों और तथ्यों की जांच कर विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने अंतत: सक्सेना को 15 दिसम्बर को जमानत दे दी। जमानत सन्बन्धी फैसला शनिवार शाम जारी किया गया था। खंडपीठ ने फैसला अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत सुनाया।
मनमोहन की नियुक्ति वैधता याचिका खारिज,याची पर 10 हजार रूपये हर्जाना।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने मनमोहन सिंह की प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति की वैधता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका याची को 10 हजार रूपये हर्जाना अदा करने के आदेश देने के साथ खारिज कर दी। न्यायमूर्ति एस.पी. मेहरोत्रा एवं न्यायमूर्ति अनिल कुमार की खण्डपीठ ने यह निर्णय अवकाश प्राप्त मेजर एस.एन. त्रिपाठी की जनहित याचिका पर पारित किया। पूर्व में खण्डपीठ ने फैसला सुरक्षित कर लिया था जिसे न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने सुनाया। याची का कहना था कि मनमोहन सिंह ने जब प्रधानमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया वह समय कानूनी प्रावधानो के खिलाफ था। क्योकि संसद भंग होने और गठित होने के बीच अंतर था।
उधरकेन्द्र सरकार की ओर से अधिवक्ता आर.पी. शुक्ल ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि यह याचिका महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए दायर की गयी है।
उधरकेन्द्र सरकार की ओर से अधिवक्ता आर.पी. शुक्ल ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि यह याचिका महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए दायर की गयी है।
वसुंधरा सहित 14 के खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा
दीनदयाल ट्रस्ट की मूल फाइल देवस्थान विभाग से गायब होने के मामले में जयपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, भाजपा के वरिष्ठ नेता ललित किशोर चतुर्वेदी,भंवर लाल शर्मा और देवस्थान विभाग के दो अधिकारियों सहित चौदह लोगों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 156 में मुकदमा दर्ज करने को लेकर जयपुर के माणक चौक थाना पुलिस को निर्देश दिए है।
मजिस्ट्रेट ने यह आदेश श्रीकृष्ण कुक्कड़ की इस्तगासा की सुनवाई पर दिए। इस्तगासा में फाइल गायब कराने की आशंका जताते हुए आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की बात कही गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह निर्णय दिया। अब पुलिस संबंधितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की कार्रवाई करेगी। पिछले दिसंबर में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद फरवरी में पता चला कि देवस्थान विभाग के सहायक आयुक्त कार्यालय प्रथम से दीनदयाल उपाध्याय चेरिटेबल ट्रस्ट के पंजीयन की मूल गायब है। खोजबीन में पता चला कि सरकार बदलने से पहले से ही देवस्थान विभाग के मूवमेंट रजिस्टर में इस फाइल की चाल ही दर्ज नहीं है। इस बात की जानकारी सामने आने के बाद देवस्थान विभाग के मंत्री बृजकिशोर शर्मा ने अधिकारियों को पत्र लिखकर दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश दिए।
लेकिन मामले की प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अध्यक्षता वाले दीनदयाल उपाध्याय ट्रस्ट को भाजपा सरकार ने जयपुर के सी-स्कीम इलाके में राजमहल होटल के निकट करोड़ों की जमीन कौड़ियों में आवंटित कर दी थी।
मजिस्ट्रेट ने यह आदेश श्रीकृष्ण कुक्कड़ की इस्तगासा की सुनवाई पर दिए। इस्तगासा में फाइल गायब कराने की आशंका जताते हुए आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने की बात कही गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने यह निर्णय दिया। अब पुलिस संबंधितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की कार्रवाई करेगी। पिछले दिसंबर में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद फरवरी में पता चला कि देवस्थान विभाग के सहायक आयुक्त कार्यालय प्रथम से दीनदयाल उपाध्याय चेरिटेबल ट्रस्ट के पंजीयन की मूल गायब है। खोजबीन में पता चला कि सरकार बदलने से पहले से ही देवस्थान विभाग के मूवमेंट रजिस्टर में इस फाइल की चाल ही दर्ज नहीं है। इस बात की जानकारी सामने आने के बाद देवस्थान विभाग के मंत्री बृजकिशोर शर्मा ने अधिकारियों को पत्र लिखकर दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश दिए।
लेकिन मामले की प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई गई। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अध्यक्षता वाले दीनदयाल उपाध्याय ट्रस्ट को भाजपा सरकार ने जयपुर के सी-स्कीम इलाके में राजमहल होटल के निकट करोड़ों की जमीन कौड़ियों में आवंटित कर दी थी।
Saturday, December 19, 2009
दलित होने के कारण निशाना बनाया-कांग्रेस सांसद
कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पीडी दिनकरन के खिलाफ महाभियोग चलाने की कवायद को कांग्रेस के दो सांसदों ने राज्यसभा में नया मोड़ देने की कोशिश की। कांग्रेस के प्रवीण राष्ट्रपाल और जेडी सलीम ने शुक्रवार को शून्यकाल में यह मामला उठाते हुए कहा कि दिनकरन को दलित होने की वजह से निशाना बनाया जा रहा है।
पीठासीन अधिकारी पीजे कुरियन ने इस मामले को उठाने की अनुमति नहीं दी, लेकिन सदस्य आरोप लगाने से बाज नहीं आए। उल्लेखनीय है कि राज्यसभा के सभापति ने 75 सदस्यों के हस्ताक्षर से युक्त महाभियोग याचिका को विचारार्थ स्वीकार किया है। याचिका पर भाजपा, सपा और वामदलों के सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन कांग्रेस ने इस मसले पर अपना कोई रुख तय नहीं किया है।
कॉलेजियम के प्रमुख देश के चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने शुक्रवार को बताया कि जस्टिस दिनकरन पर जमीन पर कब्जा करने के आरोपों को लेकर राज्यसभा में शुरू की गई महाभियोग की कार्यवाही को देखते हुए कॉलेजियम ने अपनी सिफारिश को निलंबित रखने का फैसला किया है। समझा जाता है कि कॉलेजियम ने गुरुवार शाम को हुई अपनी बैठक में यह फैसला किया।
कॉलेजियम के प्रमुख देश के चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने शुक्रवार को बताया कि जस्टिस दिनकरन पर जमीन पर कब्जा करने के आरोपों को लेकर राज्यसभा में शुरू की गई महाभियोग की कार्यवाही को देखते हुए कॉलेजियम ने अपनी सिफारिश को निलंबित रखने का फैसला किया है। समझा जाता है कि कॉलेजियम ने गुरुवार शाम को हुई अपनी बैठक में यह फैसला किया।
मीडिया से रूबरू सही ट्रेंड नहीं : दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि सुनवाई के बाद वकीलों द्वारा मीडिया से रूबरू होना सही ट्रेंड नहीं है। न्यायालय ने कहा कि आमतौर पर वकील खुद ही मीडिया को अपडेट करते हैं। चीफ जस्टिस अजीत प्रकाश शाह और न्यायमूर्ति एस मुरलीधर की खंडपीठ ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया को इस मामले में कोई निर्णय लेने के लिए कहा है। खंडपीठ ने कहा कि लंबित मामले की सुनवाई के बाद वकील अदालत परिसर से बाहर जाकर मीडिया को सारी बातें बताते हैं, जो परेशानी वाली बात है।
उधर सॉलीसीटर जनरल ने कहा कि लोगों तक खबर पहुंचाना मीडिया का काम है। लेकिन उन्होंने इस याचिका की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस मसले में सरकार, प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया और याचिकाकर्ता को आपस में बैठकर विचार करना चाहिए। न्यायालय एक गैर सरकारी संस्था द्वारा दाखिल याचिका पर दिया है। संस्था ने याचिका में गत वर्ष 19 सितंबर को हुए बटला हाउस एनकाउंटर मामले से संबंधित कथित आरोपियों के इकबालिया बयान को मीडिया तक पहुंचाने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने की गुहार की गई थी।
याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि पुलिस अधिकारी द्वारा संवाददाता सम्मेलन आयोजित करना और प्रेस रिलीज जारी करने पर भी यह सिद्धांत लागू होता है। उन्होंने कहा कि यह तय करना अदालत का काम है कि कोई व्यक्ति निर्दोष है या गुनहगार। किसी व्यक्ति के दोषी होने या न होने संबंधी बयान अदालत को छोड़़कर मीडिया के समक्ष देना गलत है। पुलिस अधिकारियों को इसके लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए। इससे पहले हाईकोर्ट ने कहा था कि गंभीर मामलों की रिपोर्टिंग करते वक्त मीडिया को अपनी हद तय करनी चाहिए।
उधर सॉलीसीटर जनरल ने कहा कि लोगों तक खबर पहुंचाना मीडिया का काम है। लेकिन उन्होंने इस याचिका की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस मसले में सरकार, प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया और याचिकाकर्ता को आपस में बैठकर विचार करना चाहिए। न्यायालय एक गैर सरकारी संस्था द्वारा दाखिल याचिका पर दिया है। संस्था ने याचिका में गत वर्ष 19 सितंबर को हुए बटला हाउस एनकाउंटर मामले से संबंधित कथित आरोपियों के इकबालिया बयान को मीडिया तक पहुंचाने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने की गुहार की गई थी।
याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि पुलिस अधिकारी द्वारा संवाददाता सम्मेलन आयोजित करना और प्रेस रिलीज जारी करने पर भी यह सिद्धांत लागू होता है। उन्होंने कहा कि यह तय करना अदालत का काम है कि कोई व्यक्ति निर्दोष है या गुनहगार। किसी व्यक्ति के दोषी होने या न होने संबंधी बयान अदालत को छोड़़कर मीडिया के समक्ष देना गलत है। पुलिस अधिकारियों को इसके लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए। इससे पहले हाईकोर्ट ने कहा था कि गंभीर मामलों की रिपोर्टिंग करते वक्त मीडिया को अपनी हद तय करनी चाहिए।
Friday, December 18, 2009
आसाराम को सुप्रीम कोर्ट में भी राहत नहीं।
गुजरात के आध्यात्मिक गुरु आसाराम बापू को कोई राहत देने से सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इनकार कर दिया। आसाराम बापू ने हत्या की कोशिश के एक मामले में अपनी गिरफ्तारी से राज्य पुलिस को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी।
आसाराम बापू के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी कि जब तक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई नहीं होती, पुलिस को उनके मुवक्किल को गिरफ्तार करने से रोका जाए। लेकिन जस्टिस अल्तमस कबीर और दीपक वर्मा की बेंच ने उनकी यह दलील ठुकरा दी। गुजरात पुलिस द्वारा 6 दिसंबर को अपने खिलाफ दर्ज हत्या की कोशिश के मामले को चुनौती देते हुए आसाराम बापू ने विशेष अनुमति याचिका दाखिल की है। बेंच ने इस पर सुनवाई के लिए 4 जनवरी की तारीख मुकर्रर करते हुए कहा कि हम ऐसा कोई आदेश नहीं देंगे।
आसाराम बापू के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी कि जब तक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई नहीं होती, पुलिस को उनके मुवक्किल को गिरफ्तार करने से रोका जाए। लेकिन जस्टिस अल्तमस कबीर और दीपक वर्मा की बेंच ने उनकी यह दलील ठुकरा दी। गुजरात पुलिस द्वारा 6 दिसंबर को अपने खिलाफ दर्ज हत्या की कोशिश के मामले को चुनौती देते हुए आसाराम बापू ने विशेष अनुमति याचिका दाखिल की है। बेंच ने इस पर सुनवाई के लिए 4 जनवरी की तारीख मुकर्रर करते हुए कहा कि हम ऐसा कोई आदेश नहीं देंगे।
दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग याचिका मंजूर, इस्तीफा नहीं देंगे दिनाकरन,
राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने गुरुवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए 75 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित याचिका स्वीकार कर ली। दिनाकरन पर भूमि घोटाले का आरोप है। हालांकि यह महाभियोग प्रस्ताव पारित हो पाएगा, इसमें संदेह है।
उपराष्ट्रपति कार्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि सभापति ने दिनाकरन को हटाने संबंधी 75 सांसदों के हस्ताक्षर वाली याचिका स्वीकार कर ली है। मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में यह याचिका सोमवार को अंसारी को सौंपी गई थी।
दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का भविष्य हालांकि अनिश्चित है क्योंकि इस याचिका पर कांग्रेस के किसी भी सदस्य ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
किसी भी कार्यरत न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का यह तीसरा मामला है। पिछले साल प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन की सिफारिश पर राज्यसभा ने वित्तीय अनियमितता के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ तीन सदस्यीय समिति गठित की थी।
इससे पहले वर्ष 1993 में न्यायाधीश वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग लाया गया था लेकिन यह सफल नहीं रहा था। उस मामले में तीन सदस्यीय समिति ने जांच की थी और न्यायाधीश को भ्रष्टाचार का दोषी पाया था लेकिन जब प्रस्ताव को मतदान के लिए लोकसभा में पेश किया गया तो कांग्रेस ने इसमें हिस्सा नहीं लिया और यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था।
दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की स्थिति तब पैदा हुई है, जब सर्वोच्च न्यायालय के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों की समिति और केंद्र सरकार ने दिनाकरन को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत न करने का फैसला किया है।
महाभियोग का प्रस्ताव लाने के लिए राज्यसभा के कम से कम 50 या फिर लोकसभा के 100 सांसदों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है। हस्ताक्षरों की जांच के बाद संबंधित याचिका राज्यसभा के सभापति अथवा लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी जाती है।
हस्ताक्षरित याचिका पाने के बाद राज्यसभा के सभापति तीन सदस्यीय समिति गठित करते हैं, जिसमें एक सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और एक न्यायविद् शामिल होता है। यह समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट सदन को सौंप देती है।
यदि यह समिति दिनाकरन को दोषी पाती है और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश करती है तो मामले को संसद में मतदान के लिए पेश किया जाएगा। वहां दोनों सदनों में यह प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होने पर ही दिनाकरन के पद से हटने का रास्ता साफ हो पाएगा।
उपराष्ट्रपति कार्यालय के एक अधिकारी ने बताया कि सभापति ने दिनाकरन को हटाने संबंधी 75 सांसदों के हस्ताक्षर वाली याचिका स्वीकार कर ली है। मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में यह याचिका सोमवार को अंसारी को सौंपी गई थी।
दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का भविष्य हालांकि अनिश्चित है क्योंकि इस याचिका पर कांग्रेस के किसी भी सदस्य ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
किसी भी कार्यरत न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का यह तीसरा मामला है। पिछले साल प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन की सिफारिश पर राज्यसभा ने वित्तीय अनियमितता के मामले में कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ तीन सदस्यीय समिति गठित की थी।
इससे पहले वर्ष 1993 में न्यायाधीश वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग लाया गया था लेकिन यह सफल नहीं रहा था। उस मामले में तीन सदस्यीय समिति ने जांच की थी और न्यायाधीश को भ्रष्टाचार का दोषी पाया था लेकिन जब प्रस्ताव को मतदान के लिए लोकसभा में पेश किया गया तो कांग्रेस ने इसमें हिस्सा नहीं लिया और यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था।
दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की स्थिति तब पैदा हुई है, जब सर्वोच्च न्यायालय के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों की समिति और केंद्र सरकार ने दिनाकरन को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत न करने का फैसला किया है।
महाभियोग का प्रस्ताव लाने के लिए राज्यसभा के कम से कम 50 या फिर लोकसभा के 100 सांसदों के हस्ताक्षर की जरूरत होती है। हस्ताक्षरों की जांच के बाद संबंधित याचिका राज्यसभा के सभापति अथवा लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी जाती है।
हस्ताक्षरित याचिका पाने के बाद राज्यसभा के सभापति तीन सदस्यीय समिति गठित करते हैं, जिसमें एक सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और एक न्यायविद् शामिल होता है। यह समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट सदन को सौंप देती है।
यदि यह समिति दिनाकरन को दोषी पाती है और उन्हें पद से हटाने की सिफारिश करती है तो मामले को संसद में मतदान के लिए पेश किया जाएगा। वहां दोनों सदनों में यह प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होने पर ही दिनाकरन के पद से हटने का रास्ता साफ हो पाएगा।
उधर पी. डी. दिनाकरन ने इस्तीफा देने की संभावना खारिज करते हुए राज्यसभा में अपने खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव को दुर्भाग्यपूर्ण बताया.
न्यायमूर्ति दिनाकरन ने तमिलनाडु में जमीन हड़पने के अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को ‘‘निराधार और गलत’’ बताया. उन्होंने कहा कि वह साबित कर सकते हैं कि उनके परिवार के पास सीमा से ज्यादा जमीन नहीं है. कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश से जब पूछा गया कि अपने खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव और वकीलों के विरोध प्रदर्शन के परिदृश्य में क्या वह हट जाएंगे तो उनका जवाब था, ‘‘हटने का सवाल कहां उठता है.’’
राज्यसभा में अपने खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव पर उन्होंने कहा कि यह अपने आप में कोई साध्य नहीं है और उसके आधार पर कुछ भी निर्धारित नहीं किया जा सकता. न्यायमूर्ति दिनाकरन ने कहा, ‘‘मैं बस यही कह सकता हूं कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. दुर्भाग्यपूर्ण मेरे दृष्टिकोण से नहीं, दुर्भाग्यपूर्ण रिकॉर्ड पर उपलब्ध समूचे यथार्थ को और समूचे तथ्य पर विचार नहीं करने के लिए.’’
न्यायमूर्ति दिनाकरन ने तमिलनाडु में जमीन हड़पने के अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को ‘‘निराधार और गलत’’ बताया. उन्होंने कहा कि वह साबित कर सकते हैं कि उनके परिवार के पास सीमा से ज्यादा जमीन नहीं है. कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश से जब पूछा गया कि अपने खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव और वकीलों के विरोध प्रदर्शन के परिदृश्य में क्या वह हट जाएंगे तो उनका जवाब था, ‘‘हटने का सवाल कहां उठता है.’’
राज्यसभा में अपने खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव पर उन्होंने कहा कि यह अपने आप में कोई साध्य नहीं है और उसके आधार पर कुछ भी निर्धारित नहीं किया जा सकता. न्यायमूर्ति दिनाकरन ने कहा, ‘‘मैं बस यही कह सकता हूं कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. दुर्भाग्यपूर्ण मेरे दृष्टिकोण से नहीं, दुर्भाग्यपूर्ण रिकॉर्ड पर उपलब्ध समूचे यथार्थ को और समूचे तथ्य पर विचार नहीं करने के लिए.’’
बलात्कार पीडिता की दया मृत्यु याचिका मंजूर
मुंबई के एक अस्पताल में 36 साल से अपंग पड़ी महिला के लिए मौत की इजाजत मांगने वाली याचिका को बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया। चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन और जस्टिस एके गांगुली ने कहा कि वह भारतीय कानून के तहत किसी को भी मरने की इजाजत नहीं दे सकते। इस पूरी घटना पर केंद्र और महाराष्ट्र सरकार से जवाब भी तलब किया गया है।
मालूम हो कि 1973 में अरुणा के साथ मुंबई के केईएम अस्पताल में एक सफाई कर्मचारी ने दुष्कर्म किया था। सोहनलाल नाम के इस शख्स ने अरुणा का गला एक चेन से बांध दिया और उसके साथ बलात्कार किया। यह हादसा अरुणा के लिए इतना खौफनाक रहा कि वह उसके बाद अपंग हो गयी। 36 साल बाद भी जब उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आया, तब उसने अपनी दोस्त के जरिए यह याचिका कोर्ट में डलवायी।
अरुणा के वकील ने दलील दी है कि आम लोगों की तरह अरुणा को अच्छी जिंदगी जीने का हक है, लेकिन जिस तरह की जिंदगी उसे गुजारनी पड़ रही है, वह उसके लिए मौत से कम भी नहीं।
मालूम हो कि 1973 में अरुणा के साथ मुंबई के केईएम अस्पताल में एक सफाई कर्मचारी ने दुष्कर्म किया था। सोहनलाल नाम के इस शख्स ने अरुणा का गला एक चेन से बांध दिया और उसके साथ बलात्कार किया। यह हादसा अरुणा के लिए इतना खौफनाक रहा कि वह उसके बाद अपंग हो गयी। 36 साल बाद भी जब उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आया, तब उसने अपनी दोस्त के जरिए यह याचिका कोर्ट में डलवायी।
अरुणा के वकील ने दलील दी है कि आम लोगों की तरह अरुणा को अच्छी जिंदगी जीने का हक है, लेकिन जिस तरह की जिंदगी उसे गुजारनी पड़ रही है, वह उसके लिए मौत से कम भी नहीं।
दीनदयाल ट्रस्ट की जांच पर रोक।
राजस्थान हाईकोर्ट ने दीनदयाल ट्रस्ट प्रकरण मे आपराधिक जांच पर रोक लगा दी है। न्यायाधीश के एस राठौड की एकलपीठ ने यह आदेश विधायक अशोक परनामी की और से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए ।
याचिका मे कहा गया था कि प्रस्तुत पूरी तरह से राजनिति से प्रेरित है। प्रकरण मे जमीन को हस्तान्तरण नही किया गया है इसलिए धोखाधडी नहीं हुई हैं। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने आपराधिक जांच पर रोक लगा दी । गोरतलब है कि शहर की निचली अदालत के आदेश पर गत 12 जनवरी को दीनदयाल ट्रस्ट प्रकरण मे एफआईआर दर्ज हुई थी। इसके बाद पुलिस ने जांच आंरभ की थी।
याचिका मे कहा गया था कि प्रस्तुत पूरी तरह से राजनिति से प्रेरित है। प्रकरण मे जमीन को हस्तान्तरण नही किया गया है इसलिए धोखाधडी नहीं हुई हैं। याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने आपराधिक जांच पर रोक लगा दी । गोरतलब है कि शहर की निचली अदालत के आदेश पर गत 12 जनवरी को दीनदयाल ट्रस्ट प्रकरण मे एफआईआर दर्ज हुई थी। इसके बाद पुलिस ने जांच आंरभ की थी।
चारा घोटाला मामला: 18 आरोपियों को सजा
करो़डों रूपये के चारा घोटाला मामले में केन्द्रयी जांच ब्यूरों (सीबीआई) रांची की विशेष अदालत ने 18 आरोपियों को दो से छह साल की सजा सुनाई। अदालत ने रांची कोषागार से फर्जी तरीके से 8.60 करो़ड रूपये निकालने के लिए आरोपियों पर 26 लाख रूपये का जुर्माना भी किया।
सीबीआई की अदालत के विशेष न्यायाधीश एस.के.दुबे ने गुरूवार को 48 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इनमें से आठ को उसी दिन से तीन वर्ष की सजा सुनाई गई थी। अन्य दोषियों को बुधवार को सजा सुनाई जाएगी। इस मामले में कुल 58 आरोपी थे जिनमे से चार की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है।
चारा घोटाले का खुलासा वर्ष 1996 में बिहार में हुआ था। बिहार से वर्ष 2000 में झारखंड राज्य के गठन के बाद 61 मामलों को झारखंड स्थानांतरित कर दिया गया था। सीबीआई की विशेष अदालत अब तक 32 मामलों में फैसला सुना चुकी हैं।
सीबीआई की अदालत के विशेष न्यायाधीश एस.के.दुबे ने गुरूवार को 48 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इनमें से आठ को उसी दिन से तीन वर्ष की सजा सुनाई गई थी। अन्य दोषियों को बुधवार को सजा सुनाई जाएगी। इस मामले में कुल 58 आरोपी थे जिनमे से चार की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है।
चारा घोटाले का खुलासा वर्ष 1996 में बिहार में हुआ था। बिहार से वर्ष 2000 में झारखंड राज्य के गठन के बाद 61 मामलों को झारखंड स्थानांतरित कर दिया गया था। सीबीआई की विशेष अदालत अब तक 32 मामलों में फैसला सुना चुकी हैं।
ज़रदारी को माफ़ी देने वाला अध्यादेश रद्द
पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी को माफ़ी देने वाले अध्यादेश को रद्द कर दिया है. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की अगुवाई वाली 17 जजों की बेंच ने माफ़ी वाले अध्यादेश को अवैध और असंवैधानिक करार दिया. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का असर ज़रदारी समेत आठ हज़ार से ज़्यादा नेताओं और अफ़सरों पर पड़ेगा. इस आदेश के बाद कई वरिष्ठ नेताओं के ख़िलाफ़ मुकदमे पहले की तरह चलने लगेंगे. इससे पहले अक्टूबर 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने एनआरओ नामके इस अध्यादेश के ज़रिए कई नेताओं को राहत दी थी. अध्यादेश के चलते ज़रदारी समेत अन्य लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमें बिना सुनवाई के बंद हो गए थे. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि मुक़दमे 2007 वाली स्थिति से ही बहाल होंगे. हालांकि आसिफ़ अली ज़रदारी पर इस फ़ैसले का तब तक कोई असर नहीं पड़ेगा, जब तक वह राष्ट्रपति पद पर बने हुए हैं.
हिंदू मैरिज एक्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13बी की वैधानिकता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। इस धारा के मुताबिक पत्नी को तलाक का मामला पेश करने के लिए पति की सहमति लेना आवश्यक है।
चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन की अगुवाई वाली बेंच ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे की बेटी स्मृति शिंदे की याचिका पर नोटिस जारी किया है। कोर्ट में पेश स्मृति के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि तलाक मांगने के महिला के अधिकार को पति की सहमति पर निर्भर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत महिला को मिले मौलिक अधिकारों का हनन है। स्मृति ने इससे पहले आपसी सहमति से तलाक का आवेदन किया था, लेकिन सुनवाई के दौरान उनके पति ने अपनी अनुमति वापस ले ली थी। इस आधार पर निचली कोर्ट ने स्मृति को तलाक देने से इनकार कर दिया था। बांबे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बहाल रखा।
चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन की अगुवाई वाली बेंच ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे की बेटी स्मृति शिंदे की याचिका पर नोटिस जारी किया है। कोर्ट में पेश स्मृति के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि तलाक मांगने के महिला के अधिकार को पति की सहमति पर निर्भर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत महिला को मिले मौलिक अधिकारों का हनन है। स्मृति ने इससे पहले आपसी सहमति से तलाक का आवेदन किया था, लेकिन सुनवाई के दौरान उनके पति ने अपनी अनुमति वापस ले ली थी। इस आधार पर निचली कोर्ट ने स्मृति को तलाक देने से इनकार कर दिया था। बांबे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बहाल रखा।
याचिका में कहा गया है कि शादी के बाद अपने पति के साथ मानसिक और भावनात्मक रूप से तालमेल नहीं बिठा पा रही किसी महिला को कानून उसी विवाह बंधन में बंधे रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
Tuesday, December 15, 2009
कोर्ट ने कहा उम्रकैद,,जीवन भर के लिए होती है ।
उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि हत्या के मामलों में उम्र कैद की सजा पाए दोषी लोग न्यूनतम 14 साल कैद में गुजारने के बाद विशेष संवैधानिक प्रावधानों को छोड़कर रिहाई के किसी अधिकार का दावा नहीं कर सकते। शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि उम्र कैद के मामले में दोषी को न्यूनतम 14 साल कारावास गुजारना चाहिए।
न्यायमूर्ति अल्तमास कबीर और न्यायमूर्ति साइरिएक जोसफ ने छत्तीसगढ़ सरकार को यह निर्देश देने के दौरान यह टिप्पणी कि वह उम्र कैद की सजा काट रहे एक दोषी रामराज के कम से कम 20 साल कारावास को सुनिश्चित कराए।
गोडसे के मामले में निर्णय के बाद आए विभिन्न फैसलों में बार-बार कहा गया कि उम्र कैद के मायने दोषी के प्राकृतिक जीवनकाल तक कारावास में रहने से हैं। हालांकि, माफी मिलने के चलते कारावास की वास्तविक अवधि कम हो सकती है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि लेकिन संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को मिले अधिकारों के संभावित अपवाद और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को प्रदत्त अधिकार के तहत माफी मिलने पर भी उम्र कैद की सजा कम कर 14 वर्ष तक हो सकती है। शीर्ष अदालत ने रामराज की अपील खारिज कर दी, जिसने दावा किया था कि वह उसे मिली माफी के तहत अवधि की गणना के बाद 14 साल बाद रिहाई का हकदार है।
न्यायमूर्ति अल्तमास कबीर और न्यायमूर्ति साइरिएक जोसफ ने छत्तीसगढ़ सरकार को यह निर्देश देने के दौरान यह टिप्पणी कि वह उम्र कैद की सजा काट रहे एक दोषी रामराज के कम से कम 20 साल कारावास को सुनिश्चित कराए।
गोडसे के मामले में निर्णय के बाद आए विभिन्न फैसलों में बार-बार कहा गया कि उम्र कैद के मायने दोषी के प्राकृतिक जीवनकाल तक कारावास में रहने से हैं। हालांकि, माफी मिलने के चलते कारावास की वास्तविक अवधि कम हो सकती है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि लेकिन संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को मिले अधिकारों के संभावित अपवाद और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को प्रदत्त अधिकार के तहत माफी मिलने पर भी उम्र कैद की सजा कम कर 14 वर्ष तक हो सकती है। शीर्ष अदालत ने रामराज की अपील खारिज कर दी, जिसने दावा किया था कि वह उसे मिली माफी के तहत अवधि की गणना के बाद 14 साल बाद रिहाई का हकदार है।
अमित यादव आत्महत्या प्रकरण ३ आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट
अमित यादव आत्महत्या प्रकरण में आज न्यायालय ने सी.आई.डी. (सी.बी.) को तीनों पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के वारन्ट जारी कर दिये। यादव आत्महत्या प्रकरण में भीलवाड़ा के साथ ही समूचे प्रदेश की पुलिस अपने ही महकमे के इंसपेक्टर, थानेदार व कांस्टेबल को गिरफ्तार नहीं कर पाई है। इसके विरोध में भीलवाड़ा में पिछले २५ दिनों से अदालती कामकाज ठप्प है वहीं अधिवक्ता धरने पर बैठे है।
इस बीच सी.आई.डी.सी.बी. के आवेदन पर भीलवाड़ा के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आज तीनों पुलिसकर्मियों के गिरफ्तारी वारन्ट जारी कर दिये।
उधर, अधिवक्ता संघर्ष समिति के संयोजक अरूण व्यास ने बताया कि मंगलवार को अधिवक्ता मौन जुलूस निकालकर कलेक्टर को ज्ञापन देंगे।
इस बीच सी.आई.डी.सी.बी. के आवेदन पर भीलवाड़ा के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आज तीनों पुलिसकर्मियों के गिरफ्तारी वारन्ट जारी कर दिये।
उधर, अधिवक्ता संघर्ष समिति के संयोजक अरूण व्यास ने बताया कि मंगलवार को अधिवक्ता मौन जुलूस निकालकर कलेक्टर को ज्ञापन देंगे।
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