पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Friday, June 11, 2010

अब तलाक के लिए 9 झूठ बोलने की जरूरत नहीं

विवाह सफल नहीं साबित होने पर तलाक लेना अब और आसान होगा। सरकार ने विवाह से जुड़े दो महत्वपूर्ण कानूनों में संशोधन के प्रस्ताव को गुरुवार को मंजूरी दे दी।

किसी एक पक्ष के अदालत में पेश नहीं होने और जानबूझ कर मुकदमे की कार्यवाही लंबा खींचने के मद्देनजर परस्पर सहमति से तलाक की अर्जी देने वाले पति या पत्नी का उत्पीड़न रोकने के उद्देश्य से हिन्दू विवाह कानून में संशोधन का फैसला किया गया है।

प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में तय किया गया कि हिन्दू विवाह कानून, 1955 में संशोधन के लिए विधेयक संसद में पेश किया जाएगा।

बैठक के बाद सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने स्पष्ट किया कि यह विधेयक उन पक्षों को सुरक्षा प्रदान करेगा, जो सहमति से तलाक की अर्जी देते हैं लेकिन किसी एक पक्ष के अनुपस्थित होने या जान बूझ कर अदालत की कार्यवाही में शामिल नहीं होने के कारण उत्पीड़न का शिकार होते हैं।

अंबिका ने बताया कि सरकार ने विशेष विवाह कानून, 1954 में भी संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

उन्होंने बताया कि अकसर ऐसा पाया जाता है कि परस्पर सहमति से तलाक की अर्जी देने वाले पति या पत्नी अदालत की कार्यवाही से अनुपस्थित रहते हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष का उत्पीड़न होता है और अदालती कार्यवाही का नतीजा भी नहीं निकल पाता है।

कानून में ऐसे संशोधन की पहल से अदालतों में लंबित तलाक के मुकदमों का चेहरा बदल जाएगा।  हालांकि, ऐसे रिश्तों से छुटकारा पाने की जरूरत 32 साल पहले ही महसूस कर ली गई थी। 1978 में विधि आयोग की 71वीं रिपोर्ट में ही हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 में संशोधन करने की सिफारिश कर दी गई थी लेकिन उसे कानूनी जामा पहनाने की पहल में तीन दशक से ज्यादा का समय बीत गया। इस बीच सुप्रीमकोर्ट के कई फैसलों और गत वर्ष विधि आयोग की 217वीं रिपोर्ट में फिर इसे तलाक का 10वां आधार बनाए जाने की सिफारिश हुई। इससे अदालतों में लंबित तलाक के मुकदमे जल्दी निपटेंगे। पक्षकारों को कानून में मौजूद तलाक के 9 आधारों के झूठे बहाने नहीं ढूंढ़ने पड़ेंगे। उन्हें सिर्फ सिद्ध करना होगा कि वे वर्षों से अपने साथी से अलग रह रहे हैं और उनका एक दूसरे से कोई संबंध नहीं है। अब दोबारा साथ रहना मुमकिन नहीं है।

विवाह कानून [संशोधन] विधेयक, 2010 में हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 व विशेष विवाह अधिनियम, 1954 में उपरोक्त संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है। अभी तक वर्षों से अलग अलग रहना और संबंध के दोबारा न जुड़ सकने की संभावना तलाक का आधार नहीं थे और इसलिए देश में हजारों जोड़े वस्तुत: अलग रहते हुए अपने वैवाहिक संबंधों को ढोने को मजबूर थे। सरकार ने कानून में संशोधन का जो प्रस्ताव पेश किया है उसमें हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी व विशेष विवाह अधिनियम की धारा 28 के तहत अगर पति पत्नी आपसी सहमति से तलाक की अर्जी देते हैं और अर्जी देने के बाद एक पक्ष जानबूझ कर अदालती कार्यवाही से बचता है और पेश नहीं होता तो अदालत उस अर्जी पर तलाक दे सकती है। इस संशोधन से एक पक्ष दूसरे पक्ष को बेवजह प्रताड़ित नहीं कर पाएगा।

तलाक के 9 आधार -व्यभिचार

-क्रूरता

-परित्याग

-धर्म परिवर्तन

-पागल

-कुष्ठ रोग

-छूत की बीमारी वाले यौन रोग

-संन्यास

-सात साल से जीवित होने की खबर न हो

विधि आयोग की सिफारिशें

अप्रैल, 1978 विधि आयोग की 71वीं रिपोर्ट में कहा गया कि इरिट्रिवेएबल ब्रेकडाउन आफ मैरिज यानी शादी के टूट चुके रिश्ते के दोबारा जुड़ने की संभावना न होना भी तलाक का एक आधार माना जाए। कानून में संशोधन कर हिन्दू मैरिज एक्ट में धारा 13 सी जोड़ने की सिफारिश की गई।

मार्च 2009 विधि आयोग की 217वीं रिपोर्ट में भी इरिट्रिवेएबल ब्रेकडाउन आफ मैरिज को तलाक का आधार बनाए जाने की सिफारिश की गई।

सुप्रीमकोर्ट के फैसले जिनमें तलाक का यह आधार जोड़े जाने की दी गई सलाह

-जार्डन डाइंगडेह बनाम एसएस चोपड़ा

-नवीन कोहली बनाम नीलू कोहली

-समर घोष बनाम जया घोष

1 टिप्पणियाँ:

Arun Jaat said...

सर,
अगर कोई लड़का लड़की लव मेरिज करते ह और लड़के को बद मे पता चलता ह की लड़की कोई आपराधिक कार्य ( जूठे बलात्कार के मुकदमे दर्ज करा कर पेसे ठगना.. बेंक मे जाल्साजी करना....फर्जी आधिकारि बनकर जाल्साजी करना ) करती हे तो क्या लड़का तालाक ले सकता ह ?