पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Sunday, August 22, 2010

न्यायपालिका में कम खर्च के लिए सरकार की आलोचना

उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश ने शनिवार को न्याय प्रणाली में कम खर्च की योजना और राष्ट्रमंडल खेलों में करीब 40 हजार करोड़ रुपये के खर्च की आलोचना की।

न्यायमूर्ति एके गांगुली ने एक सेमिनार में कहा कि नौवीं योजना में सरकार ने न्यायिक प्रणाली के लिए सिर्फ 385 करोड़ रुपये आवंटित किए जो खर्च योजना का सिर्फ 0.071 फीसदी था। दसवीं योजना में स्थिति में आंशिक रूप से सुधार आया जब सरकार ने 700 करोड़ या खर्च योजना का 0.078 फीसदी खर्च किया।

इंडियन चैंबर ऑफ कामर्स द्वारा आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि 120 करोड़ की आबादी वाले देश के उच्च न्यायालय में 600 न्यायाधीश हैं।

गांगुली ने कहा कि अगर आप समग्र विकास चाहते हैं तो न्यायिक संरचना में अवश्य सुधार किया जाना चाहिए। वंचित तबके को न्यायाधीशों की जरूरत होती है। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी अपना केस लड़ सकती है लेकिन अगर किसी व्यक्ति को नौकरी से निकाल दिया गया है, तो उसका क्या परंपरागत अदालत प्रणाली में विलंब एवं काफी खर्च होता है। इसलिए हमें वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली विकसित करने की जरूरत है।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पिंकी सी घोष ने कहा कि देश की आठ हजार अदालतों में दो करोड़ 40 लाख मामले लंबित हैं। न्यायाधीशों की वर्तमान संख्या और वर्तमान लंबित मामलों के समाधान में ही 300 से ज्यादा वर्ष लग जाएंगे।

1 टिप्पणियाँ:

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

बहुत अफ़सोस है कि-नौवीं योजना में सरकार ने न्यायिक प्रणाली के लिए सिर्फ 385 करोड़ रुपये आवंटित और राष्ट्रमंडल खेलों में करीब 40 हजार करोड़ रुपये के खर्च किए। 120 करोड़ की आबादी वाले देश के उच्च न्यायालय में 600 न्यायाधीश हैं, देश की आठ हजार अदालतों में दो करोड़ 40 लाख मामले लंबित हैं। न्यायाधीशों की वर्तमान संख्या और वर्तमान लंबित मामलों के समाधान में ही 300 से ज्यादा वर्ष लग जाएंगे।
यह हमारे के लोगों की बहुत बड़ी बदनसीबी हैं कि-आज देश की न्याय व्यवस्था इतनी ख़राब हो चुकी है फिर भी हमारे देश के नेता के सुधार हेतु इच्छुक
नहीं है. होना तो यह चाहिए कि-आबादी को देखते हुए उच्च न्यायालयों में कम से कम 12000 न्यायाधीश और न्यायिक प्रणाली के लिए 20,000 करोड़ रुपये आवंटित हो.
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