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Monday, August 30, 2010

गलती चाहे यात्री की हो, रेलवे को भरना होगा हर्जाना

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि यदि कोई रेल यात्री अपनी गलती या लापरवाही से भी ट्रेन से गिरकर मरता है तो रेलवे का यह दायित्व है कि वह उसके परिजनों को मुआवजा दे।

न्यायमूर्ति आफताब आलम और आरएम लोढ़ा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस आदेश को दरकिनार कर दिया कि रेलवे उस स्थिति में मुआवजा देने को बाध्य नहीं है यदि कोई यात्री अपनी गलती से रेल से गिरकर मर जाए।

पीठ ने कहा कि हमारा विचार है कि उच्च न्यायालय का यह मानना त्रुटिपूर्ण है कि अपनी गलती से रेल से गिरकर जान गंवाने वाले यात्रियों के परिजनों को कानून की धारा 124 ए के तहत किसी तरह का मुआवजा हासिल करने का हक नहीं है।

पीठ ने कहा कि पहले रेलवे की बात करें तो उसका यह कहना पूरी तरह अनुमान पर आधारित है कि एम हफीज रेल के खुले दरवाजे के सामने लापरवाही से खड़े थे। इस बात को स्वीकार किया जा चुका है कि जिस समय वह ट्रेन से गिरे उस घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है इसलिए रेलवे की बात को साबित करने के लिए कोई सुबूत नहीं है।

न्यायमूर्ति आलम द्वारा लिखे गए आदेश में कहा गया कि अगर यह मान भी लें कि मरहूम अपनी लापरवाही से ट्रेन से गिरा, तब भी उसके परिजनों को कानून की धारा 124 ए के तहत मुआवजा मिलने पर कोई हरफ नहीं आता। न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ हफीज की पत्नी जमीला और उसके आश्रितों की तरफ से दाखिल की गई अपील को सही ठहराते हुए यह फैसला सुनाया।

रेलवे पंचाट ने हफीज के परिवार को दो लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने यह कहकर रेलवे को मुआवजे की जवाबदेही से बचा लिया था कि हफीज की मौत उसकी अपनी लापरवाही से ट्रेन से गिरने के कारण हुई।

2 टिप्पणियाँ:

honesty project democracy said...

सर्वोच्च न्यायलय द्वारा जनहित में एकदम सही निर्णय ...ऐसे निर्णय लेने की जरूरत है ....

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

मैं जय कुमार झा के इस विचार से सहमत हूँ. सर्वोच्च न्यायलय द्वारा जनहित में एकदम सही निर्णय. ऐसे निर्णय लेने की आज जरूरत है.
मगर साथ में मुआवजा की रकम कुछ ज्यादा भी कर देनी चाहिए थीं. जब रेलवे पंचाट ने हफीज के परिवार को दो लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन उच्च न्यायालय ने यह कहकर रेलवे को मुआवजे की जवाबदेही से बचा लिया था कि हफीज की मौत उसकी अपनी लापरवाही से ट्रेन से गिरने के कारण हुई। क्या उपरोक्त निर्णय देखकर नहीं लगता है कि-आज केवल सुप्रीम कोर्ट जाकर ही न्याय मिलता है? यहाँ एक बात और कहना चाहता हूँ कि-ऐसे आदेश सिर्फ अखबार और ब्लॉग में सुर्खियाँ बनकर न रहें और भविष्य में इस प्रकार के मामलों को निचली अदालतों में ही न्याय मिलना चाहिए.

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