पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Thursday, May 27, 2010

प्रमिल माथुर राजस्व मण्डल के सदस्य

सदस्यों की कमी झेल रहे राजस्व मण्डल को सरकार ने थोडी राहत दी है। राज्य सरकार ने सोमवार को आदेश जारी कर राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा के 1992 बैच के अधिकारी प्रमिल माथुर को राजस्व मण्डल में न्यायिक कोटे से सदस्य नियुक्ति किया है। वे मंगलवार को पद भार ग्रहण कर सकते हैं।

माथुर अलवर में एडीजे के पद पर नियुक्त थे। उनकी नियुक्ति के बाद मण्डल की सदस्य संख्या बढकर सात हो गई है। गौरतलब है कि राजस्व मण्डल प्रशासन ने हाल ही मण्डल में न्यायिक कोटे से सदस्य रहे पवन एन.चन्द्र को पदोन्नति देकर अजमेर जिला एवं सेशन न्यायालय में न्यायाधीश श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक अधिकरण के पद पर लगाया है। मण्डल में न्यायिक कोटे का एक पद पहले ही रिक्त चल रहा था। पवन एन.चन्द्र के स्थानान्तरण के बाद दोनों पद रिक्त हो गए थे।

सिर्फ घोषणाएं
राजस्व मण्डल में 52 हजार से अधिक मामले लम्बित हैं। वहीं सदस्यों के 8 पद लम्बे समय से रिक्त चल रहे हैं। हाल ही राज्य सरकार ने मण्डल की सदस्य संख्या 15 से बढा कर 20 करने की घोषणा की है। जबकि पहले से ही सदस्यों के पद खाली चल रहे हैं।

अवैध संतान पुश्तैनी जायदाद की वारिस नहीं, केवल माता पिता की सम्पत्ति पर हक- सुप्रीम कोर्ट

मद्रास उच्च न्यायालय के एक फैसले को पलटते हुए उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि शादी के बिना साथ रहने वाले जोड़ों से उत्पन्न होने वाली संतान पुश्तैनी जायदाद की वारिस नहीं हो सकती और माता-पिता द्वारा बनाई गई संपत्ति पर ही उसका अधिकार होगा।

न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा कि अवैध विवाह के जरिए पैदा होने वाली संतान पुश्तैनी जायदाद की वारिस होने का दावा नहीं कर सकती। वह केवल अपने माता-पिता द्वारा अर्जित संपत्ति में अपने हिस्से का दावा कर सकती है।

न्यायमूर्ति बीएस चौहान और न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ द्वारा दिए गए आदेश में मद्रास उच्च न्यायालय के उस फैसले को रदद कर दिया गया, जिसमें कहा गया था कि लिव इन संबंधों से पैदा होने वाले बच्चों भी पुश्तैनी जायदाद में हिस्से के हकदार हैं।

एक मामले में यह विवाद पैदा हो गया था कि रेंगाम्मल और मुथु रेडिडयर के बीच लिव इन संबंधों के दौरान जो बच्चों पैदा हुए हैं, क्या वह मुथु की मौत के बाद उसकी जायदाद के हकदार होंगे।

न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि वर्तमान मामले में प्रतिवादी ने कहीं भी यह कुबूल नहीं किया कि विवादित भूमि मुथु रेडिडयर की अपनी खरीदी हुई संपत्ति है।

न्यायालय ने कहा कि दस्तावेजों से यह पता चला कि मुथु रेडिडयर ने अपने संयुक्त परिवार की संपत्ति का बंटवारा नहीं किया था और 1974 में उसकी बेऔलाद बिना वसीयत किए मौत हो गई, इसलिए लिव इन संबंधों के दौरान पैदा हुए दो बच्चों का पुश्तैनी जायदाद का वारिस होने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

फांसी देनी है तो दे दो, पर जल्दीः अफजल गुरु

संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है कि उसे जल्द से जल्द फांसी सजा दी जाये. उसका कहना है कि दया याचिका में हो रही देरी वह परेशान हो चुका है. उसने गुहार की है उसे जल्द से जल्द फांसी दे दी जाये.इसे अफजल का नया पैंतरा कहा जा सकता है. उसका कहना है कि : मर्सी पिटिशन पर फ़ैसला नहीं हो पाने से मैं निराश और हताश हं. चाहता हं कि जो कुछ हो जल्द हो. अगर सरकार की इच्छा है तो वह मुङो फ़ांसी पर लटका ही दे.  उसका यह भी कहना है कि अगर ऐसा न हो सके तो उसे उसे कश्मीर के किसी जेल में शिफ्ट कर दिया जाये. उसने तर्क दिया है कि दिल्ली की जेल में रहने के कारण उसके परिवारवाले उससे साल में एक या दो बार ही मिल पाते हैं. मिलने आने पर उनका अच्छा खासा पैसा भी खर्च हो जाता है. कम से कम कश्मीर की जेल में रहेगा, तो परिवारवालों से तो बराबर मिल पायेगा.

84 रुपये के बोनस के लिए 25 साल चला केस

एक महिला को अपने मालिक से 84 रुपये बोनस पाने के लिए 25 साल तक संघर्ष करना पड़ा। 1984 में पद्मावती को उसके मालिक सुपर बाजार को-ऑपरेटिव स्टोर ने बताया कि उसे 84 रुपये बोनस देने का जो वादा किया गया था, वह अब नहीं मिलेगा। उसके अलावा 66 अन्य लोगों से कहा गया कि उन्हें यह बोनस अब नहीं मिलेगा।

पद्मावती बताती हैं कि मैंने 1983-84 के दौरान पीस रेट आधार पर सुपर बाजार में बतौर पैकर काम किया था। सुपर बाजार मैनेजमेंट ने उस टाइम का बोनस देने की घोषणा की थी। लेकिन जब हम लोगों ने उसकी मांग की तो हमें देने से मना कर दिया गया। पद्मावती की उम्र अब 50 साल हो चुकी है। उन्होंने बताया कि हम 67 कर्मचारियों ने मिलकर अपने वकील अशोक अग्रवाल के जरिए सुपर बाजार पर मुकदमा कर दिया।

हालांकि 1984 में इस केस की सुनवाई शुरू हुई लेकिन अदालत को इसे निपटाने में 15 साल लगे। इस बीच दिसंबर 1999 में तीस हजारी स्थित लेबर कोर्ट ने सभी कर्मचारियों के पक्ष में अपना फैसला सुनाया और सुपर बाजार मैनेजमेंट को तीन महीने में बोनस राशि का भुगतान करने को कहा। लेकिन उनकी परेशानी का यहीं अंत नहीं हुआ। सुपर बाजार मैनेजमेंट ने इस फैसले के खिलाफ सन् 2000 में दिल्ली हाई कोर्ट में अपील कर दी और फैसले के खिलाफ स्टे प्राप्त कर लिया।

आखिरकार इसी महीने 25 साल बाद सुपर बाजार मैनेजमेंट हाई कोर्ट के सामने इस बात के लिए राजी हो गया कि वह सभी कर्मचारियों को बकाया बोनस का भुगतान ब्याज सहित करने को राजी है। कोर्ट ने अब सभी कर्मचारियों को निर्देश दिया है कि वे कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के दफ्तर में अपने दस्तावेजों के साथ उपस्थित हों, वहां उन्हें पैसे का भुगतान किया जाएगा। हालांकि अदालत ने इस बात पर चिंता भी जताई कि पिछले 10 साल से इन लोगों को भुगतान नहीं हो सका।

हालांकि पद्मावती को ब्याज के साथ कुल 2000 रुपये मिलेंगे लेकिन वह इससे संतुष्ट नहीं है। वह कहती है कि मुझे नहीं मालूम कि हमें अपना पैसा पाने के लिए इतना लंबा इंतजार करना पड़ेगा। मैंने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी। हालांकि मुझे 84 रुपये से ज्यादा मिलेंगे लेकिन इसके लिए मुझे 25 साल तक संघर्ष करना पड़ा। इस मुद्दे पर वकील अशोक अग्रवाल का कहना है कि इस केस में लंबा टाइम जरूर लगा लेकिन आखिरकार फैसला कर्मचारियों के ही पक्ष में आया। इसलिए अदालत का आदेश महत्वपूर्ण है।

दीक्षित के खिलाफ चालान पेश करने पर रोक

राजस्थान हाईकोर्ट ने आसीए सचिव संजय दीक्षित के खिलाफ सीबीआई द्वारा चालान पेश करने पर रोक लगा दी। न्यायधीश महेश भगवती की एकलपीठ ने यह आदेश दीक्षित की ओर से दायर उस याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए जिसमें दीक्षित ने सीबीआई द्वारा एफआर्रआर दर्ज करने को चुनौती दी थी।
गौरतलब है कि आईएएस दीक्षित द्वारा 07 में रणजीत सिंह के पासपोर्ट के लिए चरित्र सत्यापन किया था। इस पर हाईकोर्ट ने प्रकरण की जांच सीबीआई से कराने के आदेश दिए थे। सीबीआई ने दीक्षित के ठिकानों पर छापा मारकर उनके खिलाफ पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 (2) और भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471, और 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज किया था।
दीक्षित ने अदालत में याचिका दायर कर सीबीआई को इस आधार पर चुनौती दी सीबीआई ने पासपोर्ट एक्ट के अलावा भारतीय दंड संहिता में मुकद्दमा दर्ज किया है। जो विधि विरूद्ध है। इसके अलावा यह उनके क्षेत्राधिकार से बाहर है। सुनवाई के दौरान प्रहलाद गुर्जर की ओर सके पक्षकार बनने की याचिका दायर की गई। लेकिन वह बाद में वापस कर ली गई।
मामले की सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने सीबीआई को चालान पेश करने पर रोक लगा दी।

हाईकोर्ट से राहत नहीं, अभी जेल में रहेंगे राठौड

हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौड़ को जेल में एक रात बिताने के बाद बुधवार को तत्काल राहत नहीं मिल सकी, क्योंकि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने रुचिका छेड़छाड़ मामले में उसकी जमानत याचिका को शुक्रवार तक टाल दिया।

अदालत के स्थगन के चलते 68 वर्षीय राठौड़ को कम से कम दो रातें और बुड़ैल जेल में बितानी होंगी जहां उसे मंगलवार शाम भेजा गया था। राठौड़ ने उच्च न्यायालय में अपनी वकील पत्नी आभा राठौड़ के माध्यम से एक पुनरीक्षा याचिका दायर करते हुए चिकित्सा आधार पर जमानत मांगी थी।

गौरतलब है कि इससे एक दिन पहले सत्र न्यायालय ने इस मामले में दोषी ठहराने संबंधी उसकी अपील को खारिज कर दिया था और जेल की सजा की अवधि को छह माह से बढ़ाकर 18 माह कर दिया था। न्यायमूर्ति गुरदेव सिंह ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए इस मामले को 28 मई तक स्थगित कर दिया और साथ ही सीबीआई को एक नोटिस जारी किया।

आभा राठौड़ ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि अपीली अदालत ने मीडिया के दबाव के तहत आदेश पारित किया था। जब दोपहर में न्यायमूर्ति सिंह की अदालत में सुनवाई के लिए याचिका पेश की गई, आभा राठौड़ ने कहा कि अदालत इस मामले की सुनवाई गुरुवार को करे, लेकिन न्यायाधीश ने इसे शुक्रवार के लिए टाल दिया।

आभा ने कहा कि पूर्व पुलिस प्रमुख को गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हैं। लेकिन न्यायाधीश ने इसके लिए वकील को एक अलग आवेदन दायर करने को कहा। राठौड़ की जमानत याचिका का भविष्य उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले पर जल्दी सुनवाई करने के फैसले पर निर्भर करता है। अदालत 29 मई को एक माह के लिए ग्रीष्मकालीन अवकाश के लिए बंद हो जाएगी।

सत्र न्यायालय ने 14 वर्षीय किशोरी रुचिका गिरहोत्रा से 1990 में छेड़छाड़ के मामले में राठौड़ की सजा को छह माह से बढ़ाकर 18 माह करते हुए पूर्व पुलिस अधिकारी को मंगलवार को जेल भेज दिया था। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश गुरबीर सिंह ने मंगलवार को 103 पृष्ठ के अपने फैसले में यह भी कहा, ‘‘इस मामले के प्रत्येक गवाह को एक न एक आरोप का सामना करना पड़ा और गवाहों को सुनियोजित तरीके से कानूनी उलझनों में उलझाने के प्रयास किए गए.’’ न्यायाधीश ने 68 वर्षीय राठौड़ की छह माह सश्रम कारावास की सजा को चुनौती देने संबंधी अपील खारिज करते हुए कहा कि कानूनी लड़ाई दो असमान पक्षों के बीच थी.

राठौड़ को 14 वर्षीय उभरती टेनिस खिलाड़ी रुचिका गिरहोत्रा का यौन उत्पीड़न करने का दोषी ठहराया गया था और छह माह की सजा सुनाई गई थी. राठौड़ ने इस फैसले को चुनौती दी थी जिसके बाद अदालत ने उसकी सजा बढ़ा कर 18 माह कर दी.

न्यायाधीश ने कहा ‘‘हालांकि दोषी, भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत अपराध के लिए निर्दिष्ट अधिकतम सजा पाने का हकदार हैं, लेकिन उसकी उम्र, स्वास्थ्य संबंधी पृष्ठभूमि, उसकी अविवाहित एवं दिल की बीमारी से ग्रस्त बेटी, उसका बेहतर सर्विस रिकार्ड तथा मामले की सुनवाई के दौरान 200 से अधिक तारीखों पर अदालत में उपस्थिति को देखते हुए मेरी राय है कि सजा का उद्देश्य तब पूरा होगा, जब दोषी को डेढ़ साल के सश्रम कारावास की सजा दी जाए. अन्यथा लोगों का न्याय प्रणाली पर से विश्वास उठ जाएगा.’’

Monday, May 24, 2010

आरोपी विवादित चैक की हस्तलेख विशेषज्ञ से करा सकता है जांच - राजस्थान उच्च न्यायालय

राजस्थान उच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में माना है कि यदि आरोपी विवादित चैक की लिखावट की जांच किसी हस्तलेख विशेषज्ञ से कराना चाहता है तो उसे मना नहीं किया जा सकता है।
 न्यायमूर्ती आर एस चौहान ने देवेन्द्र कुमार के मामले में आज यह आदेश दिया। इस मामले में प्रार्थी देवेन्द्र कुमार ने अभियुक्त महावीर प्रसाद पर चैक अनादरण का आरोप लगाते हुये अदालत में एक परिवाद दायर किया था तब अभियुक्त ने न्यायालय में हाजिर होकर कहा कि जिस चैक को अनादरित किया गया है वह तो बहुत पहले ही चोरी हो गया था और इसकी सूचना बैंक में दी गई थी साथ ही उस चैक पर हस्ताक्षर के अलावा उसने कुछ भी नहीं लिखा था। इसलिये इस चैक पर मौजूदा लिखावट की जांच हस्तलेख विशेषज्ञ से कराई जानी चाहिए।
 लेकिन न्यायालय ने उसकी प्रार्थना को खारिज कर दिया। इस पर उसने सेशन में अपील पेश की लेकिन यह भी रद्द हो गई तत्पश्चात उच्च न्यायालय में याचिका पेश की गई। यहां दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायालय ने निर्धारित किया कि अभियुक्त के पास अभियोजन पक्ष के आरोप झुठलाने का पूरा अधिकार होता है और यदि मजिस्ट्रेट किसी दस्तावेज की जांच कराने की अनुमति नहीं देता है तो वह अभियुक्त के इस अधिकार का हनन करता है। न्यायालय ने निचले न्यायालय के आदेशों को रद्द करते हुये विवादित चैक को हस्तलेख विशेषज्ञ के पास भेजे जाने तथा उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे सुनवाई करने के निर्देश दिये।

हिट ऐंड रन के दौरान नशे में थे सलमान

मुंबई के बांद्रा इलाके में साल 2002 में अपनी कार एक बेकरी से भिड़ा देने के आरोपी ऐक्टर सलमान खान घटना के वक्त शराब के  नशे में थे। मुंबई की एक अदालत में गवाही के दौरान एक केमिकल ऐनलिस्ट ने यह बात कही। इस केमिकल ऐनलिस्ट ने सलमान के ब्लड सैंपल को टेस्ट किया था।

28 सितंबर 2002 को तड़के बेकरी से सलमान की लैंड क्रूजर पर टकरा जाने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। इस घटना में एक शख्स की मौत हो गई थी और चार अन्य घायल हो गए थे, जो बेकरी के बाहर फुटपाथ पर सो रहे थे।

जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि सलमान के ब्लड सैंपल में 62 मिलीग्राम अल्कोहल पाया गया जो स्वीकार्य स्तर से अधिक था। केमिकल ऐनलिस्ट डी. के. भालशंकर घटना के बाद पुलिस को दिए अपने बयान पर शुक्रवार को अदालत में भी कायम रहे। भालशंकर से सलमान के वकील दीपेश मेहता 15 जुलाई को जिरह करेंगे।

सेना पर एक लाख रु. का जुर्माना

सैन्य अधिकरण की क्षेत्रीय पीठ जयपुर ने पूर्व हवलदार को निशक्तता पेंशन नहीं देने पर सेना पर 1 लाख का जुर्माना किया है। साथ ही सेवामुक्ति की तारीख 19 नवंबर 04 से निशक्तता पेंशन और बकाया पेंशन राशि 6 प्रतिशत ब्याज सहित देने के आदेश दिए हैं। अधिकरण ने ये आदेश हवलदार मोहरसिंह की याचिका पर दिए।

अधिकरण ने कहा कि जुर्माना राशि मोहरसिंह को दी जाए और इसकी वसूली अपील मेडिकल बोर्ड के सदस्य एयर कमाडोर डीपी जोशी, लेफ्टिनेंट कर्नल शोभनादास और कर्नल एसपी सिंह के वेतन से की जाए। साथ ही अधिकरण ने रक्षा मंत्रालय को तीनों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश भी दिए।

मोहरसिंह के वकील एस.बी.सिंह ने बताया कि फरवरी 02 में अरुणाचल में एक अभियान में मोहरसिंह दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे। इलाज के बाद 19 नवंबर 04 को उसे सेवा मुक्त कर दिया। सिंह ने प्रिंसीपल कंट्रोलर ऑफ डिफंेस अकाउंट्स (पेंशन) के यहां निशक्तता पेंशन का क्लेम किया। कंट्रोलर ने इसे संवैधानिक मामला मान 20 जुलाई 05 को क्लेम निरस्त कर दिया था।

Friday, May 21, 2010

अल्पसंख्यकों को शैक्षिक संस्थाएं स्थापित करने का अधिकारः सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अल्पसंख्यकों को शैक्षिक संस्थाएं स्थापित करने का मौलिक अधिकार है और सरकार उसमें कोई बेजा रोक-टोक नहीं कर सकती।

उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता एक धार्मिक अल्पसंख्यक है। संविधान का अनुच्छेद 30 एक धार्मिक अल्पसंख्यक की हैसियत से उसे अपनी पसंद की शैक्षिक संस्था स्थापित करने और उसका प्रबंधन करने का स्पष्ट अधिकार देता है।

अनुच्छेद 30 के अनुसार, चाहे वह धर्म या भाषा पर आधारित हों तमाम अल्पसंख्यकों को देश में शैक्षिक संथाओं की स्थापना और प्रबंधन का अधिकार होगा। यह अनुच्छेद इसका भी प्रावधान करता है कि इस तरह के संस्थान अगर सरकार से कोष पाते हैं तब भी राज्य उनके साथ भेदभाव नहीं करेगा।
उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला कन्नोर डिस्ट्रिक्ट मुस्लिम एडयूकेशन ऐसोसिएशन की ओर से दायर अपील के पक्ष में किया। याचिका में केरल उच्च न्यायालय के इस फैसले को चुनौती दी गई थी कि ऐसोसिएशन को अपने प्रबंधन वाले सर सैयद कालेज में कोई हायर सेकंडरी कोर्स चलाने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

कालेज ने हायर सेकंडरी कोर्स चलाने की इजाजत चाही थी लेकिन सरकार ने यह कहते हुए उसकी अनुमति नहीं दी कि तत्कालीन नियमावली में उसका प्रावधान नहीं था। केरल उच्च न्यायालय ने केरल शिक्षा नियमावली की व्याख्या करते हुए कहा कि अल्पसंख्यक संस्थाओं को कोर्स चलाने का वैधानिक अधिकार नहीं है। इसके बाद ऐसोसिएशन ने उच्चतम न्यायालय में अपील दायर की।

उच्चतम न्यायालय ने अपील को सही करार देते हुए कहा कि राज्य को याचिकाकर्ता की संस्था में अगले शैक्षिक सत्र से हायर सेकंडरी कोर्स का आबंटन करने का निर्देश दिया। उसने इसके साथ ही यह भी कहा कि संस्था को शिक्षकों की नियुक्ति के वैधानिक प्रक्रियाओं पर अवश्य ही अमल करना चाहिए।

फ्रांस में बुर्का पहनने वालों को 150 यूरो का जुर्माना

फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने कहा कि बुर्का पर प्रस्तावित प्रतिबंध से मुस्लिमों को आहत नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि फ्रांसीसी कैबिनेट ने सार्वजनिक स्थलों पर बुर्का पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानूनी मसौदे को मंजूरी दे दी है। सरकोजी ने बुधवार को कैबिनेट बैठक में कहा, ""यह एक ऎसा फैसला है, जिसे कोई हल्के में नहीं ले।"" फ्रांस में यह कानून लागू हो जाने के बाद किसी को भी कप़डे की सहायता से चेहरा ढकने की इजाजत नहीं होगी। कानून का उल्लंघन करने वालों पर 150 यूरो का जुर्माना या फिर उसे फ्रांसीसी नागरिकता का पाठ पढ़ने के लिए भेज दिया जाएगा। सरकोजी ने कहा, ""किसी को भी आहत या कलंकित होना नहीं चाहिए।
मैंने खास तौर पर मुस्लिम निवासियों के लिए कहा है कि उन्हें यहां आदर महसूस करना चाहिए।"" ब्रिटिश समाचार पत्र "द टेलीग्राफ" ने सरकोजी के हवाले से कहा, ""मानवीय गरिमा के विचार से जु़डे हम एक पुराने राष्ट्र हैं, जहां विशेषतौर पर महिलाओं को विशेष सम्मान दिया जाता है। हम एक साथ रहने के एक विशेष विचार से भी जु़डे हैं। बुर्का, जो चेहरे को पूरी तरह से ढक देता है वह इन मूल्यों के खिलाफ है। बुर्का पहनना हमारे लिए बहुत रूढि़वादी है, इसलिए इसे हटाना जरूरी है। "" फ्रांस में बुर्का को लेकर तनाव का माहौल सबसे पहले उस वक्त बना जब एक वकील ने दुकान में झग़डे के दौरान मुस्लिम महिला का बुर्का उतार दिया था।

हॉकी फेडरेशन की बहाली का आदेश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज एक अहम फैसला सुनाते हुए भारतीय हॉकी फेडरेशन को भंग करने के केन्द्र सरकार के आदेश को खारिज कर दिया है। साथ ही केन्द्र सरकार और भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन पर इस मामले में दस हजार का जुर्माना भी लगाया है। अदालत का यह निर्णय उस वक्त आया है जब एक स्टिंग ऑपरेशन में संघ के सचिव के जाथिकुमारन को एक खिलाड़ी चयन के लिए रिश्वत लेते हुए दिखाया गया है।

हॉकी संघ के अध्यक्ष केपीएस गिल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश एस मुरीदिहार ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने केन्द्र को हॉकी फेेडरेशन को भंग करने का आदेश को गलत करार दिया और केन्द्र को हॉकी फेडरेशन को बहाल करने को कहा। साथ ही खेल मंत्रालय और भारतीय ओलम्पिक एसोशिएसन पर 10 हजार रूपए जुर्माना भी लगाया गया।

गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने 2008 में बीजिंग ओलम्पिक के तुरंत बाद हॉकी संघ को भंग करने के आदेश दिए थे। भारतीय हॉकी टीम के बीजिंग ओलम्पिक क्वालिफाई नहीं कर पाने और खिलाडियों द्वारा भी संघ पर लगातार पक्षपात करने के आरोपों के बाद सरकार ने यह कदम उठाया था। सरकार ने इसके स्थान पर ए के मट्टू की अध्यक्षता में हॉकी इंडिया का गठन किया था।

महिला आरक्षण असंवैधानिक

राजस्थान हाई कोर्ट ने पंचायतीराज चुनावों में युवाओं को 20 फीसदी व महिलाओं को आनुपातिक जनसंख्या के आधार पर 50 फीसदी आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश जगदीश भल्ला व न्यायाधीश एमएन भंडारी की खंडपीठ ने झुंझुनूं निवासी सीताराम शर्मा की याचिका पर सुनवाई के बाद आदेश में कहा कि चूंकि यही मुद्दा हाई कोर्ट में पूर्व में मोहम्मद कलीम की ओर से दायर याचिका में उठाया गया था, इसलिए उस मामले में दिया गया इसी तरह का आदेश इसमें भी पढ़ा जाए।

यह आदेश पूर्व के मामलों में लागू नहीं होगा तथा भविष्य में प्रभावी रहेगा। याचिका में राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम की धारा 15 (5)(6) व 16 (5) में किए गए उस संशोधन को चुनौती दी थी, जिसके तहत महिला आरक्षण को 33 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत और धारा 19 ए जोड़कर 21 से 35 साल के युवाओं के लिए अलग से 20 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया।

याची ने कहा कि पंचायती राज अधिनियम में पहले से ही महिलाओं को 33 प्रतिशत व अन्य आरक्षित वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान है। यदि महिला आरक्षण को बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया जाता है एवं प्रत्येक 5 सीट में से एक सीट 21 से 35 साल के युवाओं के लिए आरक्षित रखी जाती है तो यह एससी/एसटी व ओबीसी को दिए आरक्षण के साथ 75 से 80 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति में सामान्य वर्ग के लिए 20 प्रतिशत सीटें ही बचती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इंदिरा साहनी के प्रकरण में व्यवस्था दी है कि किसी भी स्थिति में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। हाई कोर्ट ने अपने पहले के आदेश में कहा था कि राज्य सरकार ने महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण लै¨गक अनुपातके आधार पर नहीं दिया है। यदि सरकार इसका आधार लैंगिक अनुपात मानती है तो यह आरक्षण चलने योग्य माना जा सकता है।

यदि पुरुषों व महिलाओं का जनसंख्या अनुपात 55 एवं 45 प्रतिशत है तो ऐसी स्थिति में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण दिया जाना अवैधानिक होगा। जिस तरह एससी व एसटी वर्ग को आरक्षण दिया जाता है, उसी तरह महिलाओं को भी आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए था, लेकिन राज्य सरकार ने ऐसी प्रक्रिया नहीं अपनाई।

ऐसी स्थिति में ये प्रावधान न केवल रद्द करने योग्य है बल्कि असंवैधानिक भी है। साथ ही कुछ सीटों पर 21 से 35 साल के युवाओं को दिया आरक्षण भी संविधान के प्रावधानों के विपरीत है, इससे अन्य युवाओं को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए यह भी रद्द किए जाने योग्य है।

इस निर्णय से पहले हाई कोर्ट ने स्थानीय चुनावों में युवा व महिलाओं के आरक्षण के संबंध में ऐसा ही निर्णय दिया था। उस मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी है। अब पंचायत राज चुनावों में युवा व महिला आरक्षण के संबंध में दिए अदालत के निर्णय का कोई अधिक फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि पंचायत के चुनाव हो गए हैं। हालांकि इस आदेश के बाद अब महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुसार ही आरक्षण मिलेगा।

Wednesday, May 19, 2010

तड़के अखबार पढ़ना बंद करें : सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को सुझाव दिया कि किसी को भी सुबह तड़के अखबार पढ़ने से बचना चाहिए।

न्यायमूर्ति जी.एस.सिंघवी और न्यायमूर्ति सी.के.प्रसाद की अवकाशकालीन खण्डपीठ ने कहा, ''यदि आप अपने पूरे दिन को तरोताजा रखना चाहते हैं तो सुबह तड़के कम से कम दो घंटे तक अखबार न पढ़ें।''

सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुझाव तब दिया, जब उत्तर प्रदेश सरकार की ओर जारी मामलों के लिए पेश होते हुए अधिवक्ता रत्नाकर दास ने अदालत का ध्यान एक अखबार की उस रिपोर्ट की ओर खींचा, जिसमें लिखा गया था कि कानून एवं न्याय मंत्री एम.वीरप्पा मोइली ने नक्सलवाद में बढ़ोतरी के लिए न्यायिक सक्रियता को जिम्मदार ठहराना चाहा है।

'अस्वाभाविक न्यायिक सक्रियता' को नक्सली गतिविधियों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण बताते हुए मोइली ने कहा था, ''यदि अदालतें संयम बरती होतीं और जगलों की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखीं होतीं तो आज स्थितियां पूरी तरह भिन्न होतीं।''

रिपोर्ट के अनुसार मोइली ने कहा है, ''मेरी चिंता यह है कि जब न्यायाधीश लोग जनहित याचिकाएं स्वीकार करें और फैसले दें, तो उन्हें उसमें यथार्थवादी होना चाहिए और बहसों पर विश्वास करने के बदले जमीनी हकीकतों को देखना-समझना चाहिए।''

मोइली के बयान पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए न्यायमूर्ति सिंघवी ने कहा, ''हमने अखबार पढ़ना बंद कर दिया है।'' इस पर दास ने कहा कि वह कानून मंत्री के बयान से खफा हैं और इसे अदालत के समक्ष उठाने से वह अपने आपको नहीं रोक सकते।

इस पर न्यायमूर्ति सिंघवी ने कहा, ''बेकार की बातों का हमारे ऊपर कोई असर नहीं होता।''

''मृत्यु पूर्व बयान पर सावधानी बरतें अदालतें'' - सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों को मृत्यु पूर्व बयानों पर विचार करते हुए बहुत सावधानी बरतनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मृतक ने बगैर किसी दबाव के पूरे होश में स्वेच्छा से सही बयान दिया है।
अदालत ने विवाह के एक सप्ताह के भीतर ही दहेज की खातिर नवविवाहिता को जलाकर मारने की लोमहर्षक घटना में जेठ की सजा बरकरार रखते हुए मृत्यु पूर्व बयान के बारे में अदालतों को सचेत किया है।
न्यायमूर्ति वीएस सिरपुर्कर और मुकुन्दकम शर्मा की खंडपीठ ने देवरानी को जलाकार मारने के अपराध में जेठ पूरन चंद की सजा बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। इस मामले में नवविवाहिता संतोष की हत्या के अपराध में दोषी ठहराए गए पति गुरदयाल ने फैसले के खिलाफ अपील दायर नहीं की थी।
इस मामले में संतोष का विवाह आठ दिसंबर 1997 को हुआ था लेकिन एक सप्ताह के भीतर ही उसे दहेज की खातिर प्रताडि़त किया जाने लगा था। अंतत: 15 दिसंबर 1997 को ससुराल में उसके ऊपर मिट्टी का तेल छिड़कर आग लगा दी गई थी। नवविवाहिता ने मृत्यु से पूर्व चंडीगढ़ के अस्पताल में पूर्व न्यायिक मजिस्ट्रेट को अपना बयान दिया था। जेठ पूरन चंद ने अपनी अपील में मृत्यु पूर्व बयान को ही मुख्य आधार बनाया था।
न्यायाधीशों ने पूरन चंद की अपील खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालतों को मृत्यु पूर्व दिए गए बयान पर बहुत बारीकी से विचार करना चाहिए क्योंकि ऐसा बयान देने वाला तो जिरह के लिए उपलबध होता नहीं है जो अभियुक्त के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है। न्यायाधीशों ने कहा कि कई मामलों में तो अपने पति के शांतिपूर्ण और सुखमय जीवन गुजारने की आस ससुराल के उन सदस्यों के नाम घसीट लेती है जिन्हें वह असुविधाजनक महसूस करती हैं।
कई बार रिश्तेदार भी जांच एजेंसी को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। ऐसी स्थिति में जांच एजेंसी द्वारा दर्ज मृत्यु पूर्व बयान की बहुत बारीकी से जांच की जानी चाहिए और अदालत को घटना के आसपास की परिस्थितियों को भी ध्यान रखना चाहिए।