पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Thursday, September 2, 2010

महिला ने सड़क पर क्यों दिया बच्ची को जन्म?

नई दिल्ली  में  एक महिला ने बच्ची को जन्म दिया और इस दौरान वह चल बसी। हाई कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। दिल्ली  हाई कोर्ट ने सरकार से इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है कि तमाम योजनाओं के बावजूद गर्भवती महिला को सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं भर्ती किया गया। अदालत ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज में इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने इस मामले में दिल्ली सरकार से हलफनामा दायर कर 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने को कहा है।

कनॉट प्लेस इलाके में जुलाई के आखिरी सप्ताह में एक महिला ने शंकर रोड पर एक बच्ची को जन्म दिया और इस दौरान वह चल बसी। वहां रीतू नामक युवती ने उस बच्ची को सहारा दिया और उसे अपने घर ले गई लेकिन इसी बीच किसी ने इस घटना के बारे में पुलिस को खबर दी और पुलिस ने उस बच्ची को चाइल्ड होम के हवाले कर दिया। वहीं रीतू ने इस बच्ची को गोद लेने की इच्छा जताई। इस बारे में आई मीडिया रिपोर्ट पर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने संज्ञान लिया और दिल्ली सरकार, चाइल्ड होम के डायरेक्टर और उन डॉक्टरों को बुलाया जिसने बच्ची का इलाज किया था।

हाई कोर्ट के निर्देश के बाद ये लोग अदालत में पेश हुए। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि तमाम स्कीम के बावजूद गर्भवती महिला को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया और आखिर में उसे सड़क पर ही बच्ची को जन्म देना पड़ा। मामले की सुनवाई के दौरान बच्ची को इलाज करने वाले डॉक्टर ने बताया कि बच्ची को सेप्टिसेमिया हो गया था लेकिन उसकी स्थिति ठीक होने के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि बच्ची के पैदा होने के बाद उसे सहारा देने वाली युवती रितू उसे गोद लेना चाहती है। इस पर चाइल्ड होम की डायरेक्टर ने कहा कि गोद लेने की एक प्रक्रिया होती है और उसके लिए गाइड लाइंस को देखना पड़ता है और लोगों की लंबी लाइन लगी हुई है। हाई कोर्ट को बताया गया कि रितू व उनकी रिश्तेदार अधिकार से वहां मिलने जाती हैं इस कारण वहां के नियम कायदा का उल्लंघन हो रहा है। रितू की ओर से पेश उनकी रिश्तेदार ने कहा कि रितू को बच्ची के साथ भावनात्मक लगाव है और इस कारण उसे मिलने से नहीं रोका जाए साथ ही वह गोद लेने के लिए भी तैयार है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि हफ्ते में 3 बार 45 मिनट के लिए रितू को बच्ची से मिलने दिया जाए।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि कई सरकारी अस्पताल हैं बावजूद इसके प्रेग्नेंट महिला को भर्ती नहीं किया गया और वह अपनी बच्ची को सड़क पर पैदा करने के लिए मजबूर हुई। यह गंभीर विषय है। हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास ऐसी तमाम महिलाओं व बच्चों के लिए योजनाएं हैं ये तमाम योजनाएं लागू भी है फिर भी बच्चे फुटपाथ पर पैदा होने के लिए मजबूर हो रहे हैं। यह सरकार की ड्यूटी है कि वह देखे कि गर्भवती महिलाओं के लिए लागू स्कीम के तहत कोई भी सरकारी अस्पताल उन्हें भर्ती करने से मना नहीं करे। अगली सुनवाई 20 अक्टूबर को होगी।

1 टिप्पणियाँ:

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

मीडिया में आई रिपोर्ट पर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने संज्ञान लेकर कार्य तो बहुत अच्छा किया. मगर माननीय चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा जी काफी सारे ऐसे मामले भी होते हैं. जिनकी पहुँच मीडिया या हाईकोर्ट तक नहीं होती है. वो बेचारे यूँ ही कीड़े-मकोड़ों की तरह मर जाते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं. अगर किसी बेचारे को कभी-कभार सरकारी वकील मिल भी जाता है तब सरकारी वकील दबाब में आ जाता है या बिक जाता है. अगर यह सम्भव नहीं होता है तब अपने कार्य की गति इतनी धीमी कर देता है कि-एक गरीब को न्याय मिलने में कई सालों लग जाते हैं और वो न्याय न होकर एक प्रकार से अन्याय ही होता है.

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