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Saturday, September 4, 2010

गुजारे भत्ते की राशि तय करने का आधार नहीं पारिवारिक संपत्ति-दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति की निजी आय उसकी परित्यक्ता पत्नी के गुजारे-भत्ते का निर्णय करने के लिए आधार होना चाहिए न कि उसकी पारिवारिक संपत्ति। जस्टिस एसएन ढींगरा ने एक पारिवारिक अदालत द्वारा दिए गए निर्णय को दरकिनार करते हुए यह व्यवस्था दी है।पारिवारिक अदालत ने एक व्यक्ति को अपनी परित्यक्ता पत्नी को गुजारे-भत्ते के लिए 45,000 रुपए प्रति माह देने का आदेश दिया था, जबकि उस व्यक्ति की निजी आय 41,000 रुपए प्रति माह है। जस्टिस ढींगरा ने सत्र न्यायालय के फैसले को अनुचित करार देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के आत्मनिर्भर और बारोजगार होने के बाद उस व्यक्ति की निजी आय ही उस पर निर्भर रहने वाली उसकी पत्नी या उसके बच्चों के लिए गुजारे भत्ते की राशि तय करने के लिए आधार होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि उस व्यक्ति की मौजूदा संपत्ति उसके पिता, माता और भाभी के नाम है, जिसे उसकी पत्नी की संपत्ति के तौर पर विचारित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि उसके भाई या अभिभावकों के नाम की संपत्ति को गुजारा-भत्ता तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। किसी व्यक्ति के स्तर का आंकलन उसके भाई या पिता के स्तर के आधार पर नहीं हो सकता है। जस्टिस ढींगरा ने उसके गुजारे-भत्ते की राशि को 45,000 रुपए से घटाकर 20,000 रुपए कर दिया है।

हाईकोर्ट एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसने सत्र न्यायालय के फैसले को इस आधार पर चुनौती दी थी कि उसकी परित्यक्ता पत्नी के लिए गुजारे-भत्ते की राशि तय करने में उसके परिवार के स्तर और संपत्ति को आधार नहीं बनाया जा सकता है।

सत्र न्यायालय ने पत्नी द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दाखिल सुरक्षा और गुजारे-भत्ते की अर्जी को स्वीकार कर लिया था और मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा तय रखरखाव की राशि को बढ़ाकर 10,000 रुपए से 30,000 रुपए कर दिया था और घर के किराए की राशि को ५क्क्क् रुपए से बढ़ाकर 15,000 रुपए कर दिया था।

1 टिप्पणियाँ:

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

वाह! सत्र न्यायालय ने कमाल कर दिया रुमाल को खींचकर धोती बना दिया.निजी आय से ज्यादा गुजारा भत्ता देने का निर्णय दे दिया. इससे कहते हैं आँखें होते हुए भी आँखों का न होना या पक्षपात करना या बंद आँखों से निर्णय देना.

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