पढ़ाई और जीवन में क्या अंतर है? स्कूल में आप को पाठ सिखाते हैं और फिर परीक्षा लेते हैं. जीवन में पहले परीक्षा होती है और फिर सबक सिखने को मिलता है. - टॉम बोडेट

Monday, September 6, 2010

पति भिखारी हो या साधु, देना होगा गुजारा भत्ता

पत्नी की जिम्मेदारी उठाना पति का नैतिक कर्तव्य है। पति चाहे भिखारी, साधु या दिवालिया उसे अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देना होगा। यह टिप्पणी करते हुए रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने एक व्यक्ति की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा है कि न्यूनतम वेतन मजदूरी के आधार पर पति को अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देना होगा। ध्यान रहे कि हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा था कि बेरोजगार पति को गुजारा भत्ता देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजीव अग्रवाल की अदालत में पुनर्विचार अर्जी दाखिल कर आशुतोष कुमार ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश को न्याय के खिलाफ बताते हुए खारिज करने का अनुरोध किया था। अदालत में दाखिल अर्जी में याचिकाकर्ता ने कहा था कि वह 3200 रुपये मासिक कमाता है, जबकि मेट्रो पोलिटन मजिस्ट्रेट ने उसे गुजारा भत्ता 4500 रुपये की न्यूनतम मजदूरी के आधार पर देने का आदेश दिया है, ऐसे में यदि वह आदेशानुसार पत्नी को दो हजार रुपये का गुजारा भत्ता दे देता है, तो वह अपना व बीमार मां का जीवन निर्वाहन कैसे करेगा, जबकि याचिकाकर्ता की पत्नी ने अदालत से कहा कि पति की जिम्मेदारी है कि वह उसकी जरूरतों को पूरा करे। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई कमी नहीं है। सत्र न्यायालय ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश को सही ठहराया।

3 टिप्पणियाँ:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

कभी कभी मज़ाक भी हो जाता है.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा था कि बेरोजगार पति को गुजारा भत्ता देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस तरह के आदेश को देखकर लगता हैं कि-मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट व सत्र न्यायालय ही एक गरीब आदमी को भी हाईकोर्ट या उच्चतम न्यायालय जाने के लिए लगभग मजबूर कर देता है. अगर किसी बेचारे के पास वकीलों के लिए पैसे न हो तो बेचारा आत्महत्या नहीं करेगा तो क्या करेगा?

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रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

एक दुर्भाग्यपूर्ण आदेश है. जिसमें पक्षपात व तानाशाही की झलक मिलती हैं. माना कि-पत्नी की जिम्मेदारी उठाना पति का नैतिक कर्तव्य है। लेकिन क्या कभी पति के प्रति पत्नी द्वारा नैतिक जिम्मेदारी न निभाने पर कोर्ट ने कोई सजा दी है. वहां पर सभी मौन हो जाते हैं. गौरतलब है कि-हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा था कि बेरोजगार पति को गुजारा भत्ता देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस तरह के आदेश को देखकर लगता हैं कि-मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट व सत्र न्यायालय ही एक गरीब आदमी को भी हाईकोर्ट या उच्चतम न्यायालय जाने के लिए लगभग मजबूर कर देता है. अगर किसी बेचारे के पास वकीलों के लिए पैसे न हो तो बेचारा आत्महत्या नहीं करेगा तो क्या करेगा? ### रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"